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प्रकृति की अनुपम भेंट कांगेर वैली एवं उसकी अद्भुत गुफ़ाएं

कांगेर वैली राष्ट्रीय उद्यान छत्तीसगढ़ प्रदेश के बस्तर जिले के जिला मुख्यालय जगदलपुर में स्थित है। राष्ट्रीय उद्यान को कांगेर नदी से अपना नाम मिलता है, जो उत्तर-पश्चिम से दक्षिण पूर्व दिशा में केंद्र से बहती है। वर्ष 1982 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 के तहत राष्ट्रीय उद्यान अधिसूचित किया गया था और कुल क्षेत्र 200 वर्ग किलोमीटर है। कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान लगभग समतल क्षेत्रों से लेकर खड़ी ढलान, पठार, गहरी घाटियों और नदी मार्गों की अत्यधिक विषम भूमि संरचनाओं के लिए उल्लेखित किया गया है।

राष्ट्रीय उद्यान की ऊंचाई एमएसएल से 338 से 781 मीटर तक बदलती है। कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान ने मुख्य रूप से शैल संरचना अनुसार कुडप्पा समूह और कुछ स्थानों पर रॉक गठन के विंधन समूह में हैं। मिट्टी स्वभाव में चिकनी, बालुई और मुरुम मृदा है। पूरा राष्ट्रीय उद्यान मौसमी और बारहमासी धाराओं से भरा है जो कांगेर नदी में शामिल हो जाते हैं।

कांगेर वैली द्वार, बस्तर

कांगेर वैली राष्ट्रीय उद्यान में असाधारण प्राकृतिक सौंदर्य के क्षेत्र हैं। यहां के इलाके शानदार परिदृश्य प्रदान करते है! राष्ट्रीय उद्यान भारत के नम पेनिनसुलर वैली साल के जंगलों का सबसे अच्छा उदाहरण दर्शाता है। यह भारत में घनत्व वाले राष्ट्रीय पार्कों में से एक है। घाटी छत्तीसगढ़ में बस्तर क्षेत्र के प्राचीन विकसित नम उष्णकटिबंधीय वनों का प्रतिनिधि है।

कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के विशाल लचीले इलाके विविधतापूर्ण चूना पत्थर की गुफाओं सहित विभिन्न प्रकार के वनस्पति और जीवों के लिए विविध और महत्वपूर्ण आवास, के रूप में एक आदर्श साइट प्रदान करते हैं, जिससे यह भारतीय उप-महाद्वीप में जैव विविधता के साथ-साथ भू-विविधता का एक हॉटस्पॉट बना रहा था। यहां की गुफाएं अद्वितीय हैं और यह भारत समेत दक्षिण एशिया के अन्य गुफाओं से जैविक तौर पर काफी भिन्न हैं।

वनस्पति की स्थितिः

भारत के बायोजोग्राफिक वर्गीकरण (रोडर्स और पनवार, 1988) के अनुसार, कांगर वैली राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में 93 परिवारों और 368 जेनर से संबंधित 553 पुष्प की प्रजातियां दर्ज की गई हैं। इन 12 प्रजातियों में से छत्तीसगढ़ के लिए नए हैं।

जीवजंतु (पशुवर्ग) की स्थितिः

यहां पर स्तनपाइयों के 22 परिवारों के 49 प्रजातियां, पक्षियों की 144 प्रजातियां, उभयचरों की 16 प्रजातियां, सरिसृप की 37 प्रजातियां, मछलियों की 57 प्रजातियां, तितलियों की 91 प्रजातियां एवं इसी प्रकार अन्य कीटों की प्रजातियां रहती हैं।

अद्भुत वैश्विक महत्व की सार्थकताः

कांगेर घाटी की पहचान यहां की जैव-विविधता सहित यहां की भू-विविधता है। यहां बहुत से ऐसी सघन वनाच्छादित क्षेत्र के साथ गहरी वादियां/खाई, कल-कल करते नदी-नाले, साथ में निर्मल निर्झर के साथ प्राकृतिक भूगर्भीय गुफाएं मिलती हैं, क्षेत्र को विशिष्ट पहचान दिलाती हैं।

कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में गुफाओं का विशेष महत्व है। तकनीकि तौर पर कहें तो यह उद्यान क्षेत्र चूना पत्थर शैल से भरा हुवा है, जो हमें भू-सतह के ऊपर और निचे दोनों तरफ दिखाई पड़ते हैं. ज्यादातर यहां की नदियाँ और नाले बहते हुए, भू-सतह के नीचे के शैल समूह में घुस कर उसे गलाते जाते हैं और इस प्रकार हजारों-लाखों सालों में इन प्राकृतिक गुफाओं का निर्माण होता है द्य इस राष्ट्रीय उद्यान में 20 से अधिक चूना पत्थर गुफाओं की खोज की गई है। राष्ट्रीय उद्यान में कुछ प्रसिद्ध चूना पत्थर गुफा इस प्रकार हैं:

कुटमसर गुफाः

कुटूमसर गुफा एक भूमिगत चूना पत्थर गुफा है जो कम्पार्टमेंट 85 में राष्ट्रीय उद्यान के पश्चिमी भाग में कांगेर नदी के किनारे स्थित है। यह 1900 ईस्वीं के आसपास स्थानीय ग्रामीणों द्वारा ढूंढा गया था और 1951 ईस्वीं में प्रसिद्ध भूगोलशास्त्री श्री शंकर तिवारी ने इसकी खोज की एवं प्रथम नक्शा तैयार किया ! यह छत्तीसगढ़ के साथ-साथ भारत में भी सबसे प्रसिद्ध और सबसे अधिक जैविक तौर पर अन्वेषित गुफा है।

कुटूमसर के भीतर

राष्ट्रीय उद्यान के मुख्य द्वार से गुफा लगभग 10 किमी दूर है। सफर के दैरान पूरा ड्राइव घने जंगल के माध्यम से किया जाता है, जिससे ड्राइव रोमांचक और सुखद हो जाता है। गुफा के बाहर का दृश्य बहुत अच्छा है और प्रवेश के ठीक पहले एक बोर्ड है जो गुफा के विभिन्न पहलुओं के बारे में जानकारी देता है।

कुटूमसर गुफ़ा का दृश्य

सीढ़ियों के ठीक पहले एक संकीर्ण प्रवेश है जिसके माध्यम से कुटूमसर गुफा के अंदर प्रवेश कर सकते हैं। यहां गुफा के अंदर पूरी तरह से अंधेरा है इसलिए आपको लैंप को जलाने की आवश्यकता है। 5-10 मिनट बिताने के बाद, स्टैलेक्टाइट्स और स्टैलेगमाइट्स को शानदार संरचनाओं में देखा जा सकता है। इन संरचनाओं को बनाने में लाखों साल लगते हैं। वे बहुत सफेद हैं और बहुत सुंदर दिखते हैं। एक व्यक्ति यहां संरचनाओं को शैशव अवस्था में भी देख सकता है।

कोटमसर गुफा 330 मीटर लंबा और सतह से लगभग 40 मीटर गहरा है। गुफा की संरचना शहद के छत्ते की तरह है, जिसमें कई अनियमित कक्ष हैं। गुफा की तीन कक्ष श्रृंखलाएं हैं जिनमे से नियमित रूप से आम पर्यटक हेतु मध्य वाली कक्ष श्रृंखला खोली जाती है ! यहां के पारिस्थितिकी तंत्र में मेंढक, सांप, क्रिकेट, मकड़ियों, मछलियों, मिलिपीड़ आदि जीव-जंतु पाए जाते हैं।

कोटमसर गुफा के अंदर नए बड़े और लंबे कक्ष की खोजः

हाल ही में मार्च 2011 में कोटमसर गुफा के अंदर एक नया कक्ष खोजा गया था। इस नए कक्ष को पहली बार 27 मार्च, 2011 को खोजा गया था। यह नया कक्ष कोटमसर गुफा के मध्य भाग में स्थित कक्ष के 25 फिट ऊपर स्थित है और लगभग 1500 फीट लंबा है।

कैलाश गुफाः

कैलाश गुफा की खोज 1993 में हुई थी और यह नेशनल पार्क की कम्पार्टमेंट 76 मिलकुलवाड़ा गाँव के पास नेशनल पार्क की लोअर कांगेर घाटी में स्थित है। इस गुफा के बारे में आदिवासियों को पहले पता चला था। यह गुफा सघन वनाच्छादित चुने पत्थर की पहाड़ी पर स्थित है। इस गुफा में एक संकीर्ण प्रवेश है, जिसके बाद गुफा के अंदर बड़े कक्ष हैं।

कैलाश गुफ़ा बस्तर

गुफा नीचे की ओर जाती है और लगभग 100 मीटर की दूरी के बाद दो कक्ष में मिल जाती है। बाएं कक्ष थोड़ा ऊंचा स्थान है जहां शंक्वाकार आकार के स्टैलेक्टाइट हैं। निचे उतरने पर अलग अलग खोहों में चमगादड़ों का बड़ा समूह लटका हुआ पाया जाता है। कोटमसर गुफा के विपरीत इस गुफा में भूमिगत धारा नहीं है, इसलिए पानी के पूल मौजूद नहीं हैं। जीवों की कई प्रजातियां इस गुफा में बसी हुई है। इस गुफा में विनियमित तरीके से पर्यटन की अनुमति है।

दंडक गुफाः

दंडक गुफा कांगेर वैली नेशनल पार्क की सबसे सुव्यवस्थित गुफा में से एक है, क्योंकि पर्यटक इस गुफा में हर गुफा संरचनाओं को अपने सर्वोत्तम उदाहरण में देख सकते हैं। यहाँ गुफा प्रवेश के ठीक बाद हम प्रकृति की संरचना का बेहतरीन उदाहरण देखे जा सकते हैं।

कुछ फिट नीचे जाकर, संकीर्ण प्रवेश द्वार एक बड़े कक्ष में खुलता है जिसमें ड्रिपस्टोन के एक जोड़े में फ्लॉस्टोन के सर्वोत्तम उदाहरण दिखाई देते हैं। यह चैंबर इतना बड़ा है की एक बार में 500 से अधिक पर्यटक पकड़ सकता है। पास की एक दीवार पर, हम गुफा की दूसरी कक्ष श्रृंखला के लिए एक बहुत ही संकीर्ण प्रवेश द्वार देख सकते हैं।

दंडक गुफ़ा बस्तर

इस गुफा की दूसरी चैम्बर श्रृंखला में अंतिम संकरा प्रवेश होता है, लेकिन यह एक बड़े कमरे में खुलता है, जिसमें एक बड़े केंद्रीय स्टेल्गमाइट और स्टैलेक्टाइट के साथ गुफा पॉपकॉर्न और सोडा स्ट्रॉ कुछ दुर्लभ उदाहरण का प्रदर्शन करता है। यहां यह स्टेल्गमाइट ऐसा लगता है कि 70 फीट गहरे सिंकहोल से विकसित हुआ है। आगे जाने पर, हम कई छोटे कक्ष देख सकते हैं, कुछ आतंरिक रूप से जुड़े हुए हैं जबकि कुछ के मार्ग आगे बंद हो जाते हैं।

इसका महत्व

यह गुफा शोधकर्ताओं के लिए पसंदीदा जगह है क्योंकि यह गुफा शोधकर्ताओं को जीवित जीवों और जीवाश्मों के आधार पर प्रागैतिहासिक और वर्तमान जलवायु को पढ़ने के लिए एक आदर्श जलवायु प्रदान करती है। “राष्ट्रीय गुफा अनुसंधान और संरक्षण संगठन, भारत“ के संस्थापक और अध्यक्ष डॉ.जयंत विश्वास ने कई शोध पत्र प्रकाशित किए हैं। उन्होंने गुफा-जीव विज्ञान के लिए बहुत काम किया है। यहां पाए जाने वाले जीवों के आधार पर, उन्होंने गुफा के जीवों को कवेर्निकॉल्स(गुफा जीव) के रूप में नामित किया और उन्हें तीन प्रकारों में विभाजित कियाः

(ए) ट्रोग्लोबाइट्सः प्रजातियां जो पूरी तरह से और स्थायी रूप से गुफाओं के अंधेरे क्षेत्र में रहती हैं। ज्यादातर अल्बिनिक हैं क्योंकि छलावरण रंग का कोई फायदा नहीं है।

(बी) ट्रोगोफाइल्सः प्रजातियां जो अंधेरे क्षेत्र में स्थायी रूप से रहती हैं, जिनमें से कुछ गुफा से दूर एक उपयुक्त निवास स्थान में रह सकती हैं।

(ग) ट्रोग्लॉक्सिनः प्रजातियाँ जो घूमने आती हैं या आश्रय लेती हैं लेकिन गुफा में अपना पूरा जीवन चक्र पूरा नहीं करती हैं। वे कुछ आवश्यकताओं के लिए समय-समय पर बाहरी दुनिया में जाते हैं, आमतौर पर भोजन के लिए। इसके अलावा इसे आकस्मिक ट्रोग्लॉक्सिन और अभ्यस्त ट्रोग्लॉक्सिन के रूप में विभाजित किया जा सकता है।

झूमर गुफ़ा बस्तर

संभाग के प्राचीन नाम “दंडकारण्य“ के कारण गुफा को दण्डक नाम मिला है। दंडक एक राक्षस था जो राक्षसों के एक शिक्षक (ऋषि) “शुक्राचार्य“ द्वारा शापित हो गया और अपने राज्य को स्वयं के साथ कुछ ही समय में घने जंगल में बदल दिया।

इस गुफा को जीवों के कुछ उत्कृष्ट उदाहरण के साथ स्पेलियोथेम्स संरचनाओं के सबसे शानदार प्रदर्शन के लिए जाना जाता है। इस परिघटना ने इस गुफा को शोधकर्ताओं और गुफा की वर्तमान जलवायु का गहराई से विश्लेषण करने के लिए विशेष ध्यान और वरीयता दी है। यह गुफा गुफा शोधकर्ताओं के लिए सबसे सकारात्मक गुफा में से एक साबित होती है।

इसके अतिरिक्त 15 और ऐसी गुफाएं हैं जो वन विभाग द्वारा लिपिबद्ध की गयी हैं, परन्तु सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण दृष्टिकोण से अभी तक खोली नहीं गयी हैं। इनमे से कुछ के नाम हैं : कनक गुफा, शिव गुफा, परेवाबाड़ी गुफा, देवगिरि गुफा, अरण्यक गुफा, शीत गुफा, हाथीसार गुफा, झूमर गुफा आदि।

आलेख

जितेन्द्र नक्का
भू विज्ञान विशेषज्ञ
(छत्तीसगढ़)

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