Home / इतिहास / राजिम त्रिवेणी स्थित कुलेश्वर मंदिर एवं संरक्षण प्रक्रिया

राजिम त्रिवेणी स्थित कुलेश्वर मंदिर एवं संरक्षण प्रक्रिया

राजिम त्रिवेणी संगम स्थित यह मंदिर राज्य संरक्षित स्मारक है। तथापि धार्मिक स्थल होने के कारण यह मंदिर पूजित है। इस मंदिर की व्यवस्था, पूजा तथा सामान्य देखभाल स्थानीय ट्रस्ट के अधिन है। यहॉं पर नियमित रूप से दर्शनार्थी आते रहते हैं। शिवरात्रि के पर्व पर राजिम में विशाल मेला भरता है जो 15 दिन तक चलता रहता है। इस अवसर पर लगभग लाखों की संख्या में दर्शनार्थी एकत्रित होते हैं।

जन मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर पैरी, सोढूर तथा महानदी के संगम पर स्थित है। पैरी नदी का उद्गम ग्राम भाटीगढ़, तहसील मैनपुर से होता है जो राजिम से लगभग 92 कि.मी. दूरी पर है। पैरी नदी में राजिम से लगभग 40 कि.मी. दूरी पर मालगाँव के पास सोढूर नदी का संगम होता है तथा राजिम में पैरी नदी का संगम महानदी में होता है। राजिम के पुजारियों द्वारा कहा जाता है कि वर्षा ऋतु में यहाँ तीनों नदियों के प्रवाह का जल पृथक-पृथक दृष्टिगोचर होता है।

वास्तव में यहाँ पैरी तथा महानदी का संगम है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह मंदिर प्रारंभ में महानदी के दायें तट भाग पर निर्मित रहा होगा। शनैः शनैः नदी के प्रवाह से भूक्षरण होने तथा पाट के विस्तार के कारण अब प्रवाह के मध्य यह अवस्थित है। कालान्तर में मंदिर के ध्वस्त हो जाने के पश्चात् पुनः, लगभग 100-150 वर्ष पूर्व इसका पुर्नसंयोजन स्थानीय महंतों के द्वारा मराठों के काल में करवाया गया प्रतीत होता है।

यह मंदिर ऊंचे चबूतरे पर निर्मित है। इस पर चारों ओर से मजबूत पत्थर तथा सीमेंट की चुनाई है जिससे नदी के प्रवाह से क्षरण न हो सके। वर्षा ऋतु में यह मंदिर प्रवाह के मध्य रहता है। चबूतरों पर चढ़ने के लिये तीन ओर से पैड़ियाँ बनी हुई है। चबूतरे के फर्श पर फर्शी पत्थर की चिनाई की गई है। चबूतरे पर एक पुराना पीपल का पेड़ उगा हुआ है जो लगभग 100-150 वर्ष पुराना है।

यह मंदिर महानदी और पैरी नदी के संगम स्थल पर तथा महानदी के दांए एवं पैरी नदी के बांए तट पर स्थित है। यह मंदिर भी ऊंची जगती पर आधारित है। जगती की ऊंचाई 5.18 मीटर है जो प्रस्तर खण्डों से निर्मित है। जगती के ऊपर स्थापित मंदिर पूर्वाभिमुखी है। मंदिर के तल विन्यास में गर्भगृह, अन्तराल तथा मण्डप हैं। मण्डप के उत्तर दक्षिण में पार्श्व भित्तियाँ निर्मित है तथा पूर्व से खुला है। मण्डप की छत सपाट है। मण्डप के मध्य में तीन पंक्ति में तथा दानों पार्श्व भित्तियों में भित्ति स्तंभ स्थापित हैं। प्रथम पंक्ति में मात्र दो स्तंभ तथा भोष दो पंक्तियों में 3-3 स्तंभ हैं।

मण्डप के स्तम्भों को चार वर्गो में बांटा जा सकता है। प्रथम वर्ग के स्तंभों का निचला तीन चौथाई भाग चतुष्कोणीय है। इसके ऊपर पूर्ण घट निर्मित है। घट के ऊपर का भाग वृत्ताकार तथा चतुष्कोणीय है। दूसरे पंक्ति के तीनों स्तंभ एक समान नहीं हैं। दो स्तंभ नीचे तथा ऊपर के भाग चतुष्कोणीय, मध्य भाग अष्टकोणीय, षोडसकोणीय तथा वृत्ताकार क्रम में है। चतुष्कोणीय के ऊपर कपोतावली निर्मित है। तीसरे स्तंभ में नीचे तथा ऊपर का भाग चतुरस्त्र, मध्य भाग षोडसास्त्र तथा उसके ऊपर पुनः अष्टकोणीय बनाकर दो भागों में विभक्त है।

तीसरी पंक्ति के स्तम्भों को भी 2 वर्गों में विभक्त किया गया है। पहले वर्ग के स्तंभ में नीचे तीन चौथाई भाग चतुष्कोणीय तथा उसके ऊपर एक चौथाई को पल्लव आकृतियों से युक्त तथा मध्य में वृत्त निर्मित है। ऊपरी भाग चतुष्कोणीय है। इसका भीर्ष पत्रावली युक्त है। इसके ऊपर बैठकी है। मण्डप के ये सभी स्तंभ अन्यत्र कहीं स लाकर स्थापित कर दिये गये हैं। मण्डप के बायी पार्श्व भित्ति पर प्रस्तर शिलालेख जड़ा है जो 8-9 वीं, शती ई. का है।

मण्डप के भित्ति स्तंभ में मानवाकार प्रतिमायें स्थापित हैं। मण्डप के प्रवेश द्वार से बायें तरफ की प्रथम भित्ति स्तंभ में मयूरासीन कार्तिकेय, दूसरे स्तंभ पर देवी की प्रतिमा उत्पलाक्षी निर्मित है जबकि दॉयें पार्श्व भित्ति पर प्रथम स्तंभ में अश्वारूढ़ा नारी, तथा दूसरे स्तंभ में महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा स्थापित है।

गर्भगृह :- इस मंदिर में दो गर्भगृह निर्मित हैं जिनमें से दायें तरफ का गर्भगृह आकार में बड़ा तथा बायें तरफ का छोटा है। दायें तरफ के गर्भगृह में शिवलिंग की स्थापना है जिसे कुलेश्वर महादेव के नाम से पूजा की जाती है। यह शिवलिंग वर्तमान में अत्यधिक क्षरित है। बायें तरफ का लघु आकार का गर्भगृह वर्तमान में खाली है।

ऊर्ध्व विन्यास :- मंदिर के ऊर्ध्व विन्यास में अधिष्ठान, जंघा शिखर और मस्तक है। मंदिर मूलतः नागर शैली में निर्मित है। डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर के मतानुसार यह मंदिर रायपुर के कलचुरियों के शासन काल में निर्मित कराया गया प्रतीत होता है। जंघा 2 तलों में विभक्त है। यह मंदिर भी 8-9वी शती ई. में निर्मित प्रतीत होता है लेकिन परवर्तीकाल में जीर्णोद्धारित किया गया प्रतीत होता है।

रसायनिक संरक्षण :- कुलेश्वर मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग का रसायनिक संरक्षण कार्य प्रथम चरण में फरवरी माह में प्रारंभ किया गया था तथा बीच में राजिम कुम्भ के प्रारंभ होने के कारण इसे बंद कर दिया गया था तथा राजिम कुम्भ के समापन पश्चात इसे पुनः दिनांक 19 मार्च 2013 से प्रारंभ किया गया था जिसका कार्य लगभग अप्रैल 2013 के प्रथम सप्ताह में पूर्ण किया गया है। इस कार्य में हमारे सहयोगी श्रीमति फलाविया सुकृतातिर्की रसायनज्ञ तथा श्री भीरेन्द्र धीवर सहायक रसायनज्ञ का भी योगदान रहा है। इसके पूर्व डॉ. शिवाकांत बाजपेयी पुरातत्वीय अधिकारी के निर्देशन में उप अभियंता श्री पोखराजपुरी गोस्वमी के द्वारा गर्भगृह में अनुक्षरण कार्य संपन्न करवाया गया है।

शिवलिंग की कार्य पूर्व स्थिति :- शिवलिंग का व्यास-1.67 मीटर है तथा शिवलिंग की गोलाई-37ग्37 से.मी. है। शिवलिंग की ऊंचाई-37 से.मी. पूर्व दिशा में, 40 से.मी., पश्चिम से 38 से.मी. दक्षिण सक तथा 30 से.मी. उत्तर दिशा से है।

बनावट :- सफेद तथा काले रंग के धब्बे चारों तरफ दिखते थे, तथा शिवलिंग के ऊपरी सतह पर एवं उसके अन्दर में निर्मित गड्ढों के अन्दर लेटराइटनुमा संरचना स्पष्ट रही है। इसके अलावा बीच-बीच में फर्शी पत्थर अर्थात कडप्पा पत्थर के द्वारा शिवलिंग का निर्माण किया गया है जो सफेद रंग का था।

शिवलिंग में चारों तरफ गड्ढे निर्मित थे जिनका आकार निम्नानुसार था :- पूर्व दिशा में 30 से.मी. गहरा, 18 से.मी. चौड़ा, तथा 7 से.मी. लम्बा था। दक्षिण दिशा में 40 से.मी. गहरा, 12 से.मी. चौड़ा, तथा 14 से.मी. लम्बा था। पश्चिम दिशा में 38 से. मी. गहरा, 20 से.मी. चौड़ा, तथा 22 से.मी. लम्बा है जो ऊपर से दिखता था। इस गड्ढे से दक्षिण तरफ का गड्ढा अन्दर से जुड़ा था। इस गड्ढे के नीचे एक और गड्ढा था जिसका आकार 13 से.मी. गहरा तथा 7 से.मी. चौड़ा था जो बाहर से दिखाई नहीं देता था। शिवलिंग के मध्य में सबसे ऊपर तरफ भी एक गड्ढा था जिसकी गहराई 9 से. मी., तथा व्यास 7ग6 से.मी. आकार का था। शिवलिंग के उत्तर दिशा में भी एक गड्ढा था जिसका आकार 40 से.मी. गहरा ग से.मी. ग10 से.मी. चौड़ा था। यह गड्ढा भी पश्चिम दिशा में निर्मित गड्ढे से संयुक्त रूप से जुड़ा था।

संरक्षण की विधि :- सर्वप्रथम शिवलिंग की अमोनिया का 2 प्रतिशत विलयन पानी में तैयार कर अच्छी तरह से सफाई की गई। तत्पश्चात लेबोलीन का 2-5 प्रतिशत पानी में विलयन तैयार कर अच्छी तरह से साफ किया गया। सफाई के बाद शिवलिंग के अच्छी तरह से सूख जाने पर ओ. एच. 100 का पेंट ब्रश से सतह पर लेप करके प्रस्तर चूर्ण को ओ. एच. 100 में पेस्ट बनाकर गड्ढे में क्रमशः भरा गया जब तक कि पूरा गड्ढा भर नही गया। इसके बाद भरें हुये गड्ढे तथा सम्पूर्ण शिवलिंग को आं.एच.100 का निरंतर आवश्यकतानुसार स्प्रे किया गया जब तक कि वह पूर्णरूपेण भर नहीं गया।

इसके बाद अच्छी तरह से सूख जाने पर सोडियम पेन्टा क्लोरोफीनट का एक प्रतिशत विलयन पानी में तैयार कर स्प्रे किया गया तथा इसके सूख जाने पर बी.एस.290 तथा एम.टी.ओ. का 1:15 विलयन तैयार कर स्प्रे किया गया। इस प्रकार शिवलिंग का रसायनिक संरक्षण तथा प्रीजर्वेसन कार्य पूर्ण किया गया।

आलेख

डॉ. कामता प्रसाद वर्मा,
उप संचालक (से नि) संचालनालय संस्कृति एवं पुरातत्व रायपुर (छ0ग0)

About hukum

Check Also

दक्षिण कोसल के प्रागैतिहासिक काल के शैलचित्र

प्रागैतिहासिक काल के मानव संस्कृति का अध्ययन एक रोचक विषय है। छत्तीसगढ़ अंचल में प्रागैतिहासिक …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *