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जंगल सत्याग्रह 1930 की वर्षगांठ : हरेली तिहार

हरेली का त्यौहार छत्तीसगढ़ में प्राचीनकाल से धूमधाम से मनाया जाता है, इस दिन किसान अपने कृषि उपकरणों की पूजा के साथ देवताधामी को सुमरता है और बाल गोपाल गेड़ी चढ़कर उत्सव मनाते हैं। गांवों में इस दिन विभिन्न खेलकूदों का आयोजन किया जाता है। रोटी, पीठा, चीला के स्वाद के साथ आपसी जय जोहार से त्यौहार में आत्मीयता प्रकट होती है।

इसके साथ ही हरेली के त्यौहार से छत्तीसगढ़ का स्वतंत्रता आंदोलन भी जुड़ा हुआ है। प्रसिद्ध जंगल सत्याग्रह का सूत्रपात भी जंगल क्षेत्र के तमोरा ग्राम में ‘‘25 जुलाई 1930″ को हरेली अमावस के दिन हुआ। यह दिन इतिहास में जंगल सत्याग्राह के नाम से जाना जाता है जिसमें छत्तीसगढ़ के लोगों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया, गिरफ़्तार भी हुए और सजा भी पाई। आज का दिन इन जंगल सत्याग्रहियों को भी याद करने एवं नमन करने का दिन है।

भारत वर्ष के राष्ट्रीय आंदोलन में छत्तीसगढ़ की सहभागिता पर विचार करें, तो दो ही आंदोलन ऐसे है जिससे छत्तीसगढ़ का सम्मान बढ़ा हैं, प्रथम गुरू घासीदास जी का ‘सतनाम आंदोलन’ जिसने नारकीय जीवन जी रहे दबे कुचले लोगों को जीवन का नया आयाम दिया और दूसरा सन् 1922 का जंगल सत्याग्रह आंदोलन जो छत्तीसगढ़ वासियों के जीवन्त सृजनशीलता का श्रेष्ठ उदाहरण है।

जंगल सत्याग्रहियों 1930 के वंशज

गांधी जी के दक्षिण अफ़्रीका से वापसी एवं कांग्रेस की गतिविघियों में संलग्नता से, सुराजियों में नई आशा जगी थी। सन् 1920 के आते-आते समूची कांग्रेस गांधी जी के नियंत्रण में आ चुकी थी यद्यपि गरमदल के कुछ नेता इस नेतृत्व को नहीं स्वीकारते थे। गांधी जी के असहयोग आंदोलन का आम जनता में यथेष्ट प्रभाव पड़ा और वे सुराजी बनने लगे। जो आंदोलनों में भाग लेने शहरों एवं कस्बों तक नहीं जा सकते थे, उन्होंनें गाँव व जंगलो में अंग्रजो को ललकारा। सिवाहा नगरी के जंगल में श्री श्यामलाल सोम, श्री हरख राम सोम, श्री शोभाराम साहू एवं श्री विशंभर पटेल अंग्रेजी सरकार के खिलाफ सिंहनाद करने लगे। इन चारों वीरों के निरन्तर परिश्रम से जनवरी सन् 1922 के प्रथम सप्ताह में ‘वन अधिनियम’ को तोड़ने हेतु सत्याग्रह प्रांरभ हुआ जो तीन सप्ताह तक चला। उस दौरान 33 सत्याग्रही नेताओं को हथकड़ी लगाकर 70 किलोमीटर, पैदल चलाकर धमतरी लाया गया था। जिन सत्याग्रहियों को 3 से 6 माह के कारावास एवं जुर्माना किया गया हैं। सर्वश्री श्यामलाल सोम 2. विशंभर पटेल 3. हरख राम सोम 4. शोभाराम साहू 5. श्री राम सोम 6. लोहारू ठाकुर 7. पंचम सिंह सोम 8. जगतराम शेष 9. अनंद राम ध्रुव 10. पुराणिक साहू 11. धनसिंह गौर 12. सोनऊ राम साहू 13. तखत सिंह 14. मंसाराम 15. झिटकू गोड़ 16. बिसनाथ 17. बुधराम गोड़ 18. शोभाराम गोड़ 19. सरजू दास वैष्णव 20. आशाराम हल्बा, 21. सुखड़ू राम रावत 22. अमर साय साहू 23. अनंद राम पुजारी 24. मंगलू केंवट 25. सुधर साय 26. धेनू राम हल्बा 27. सहदेव गोड़ 28. हरनारायण पाड़े 29. सुकलाल 30. मनीहार केंवट 31. बुलबुल गोड़ 32. श्रीराम गोड़ 33. समेदास सतनामी।

उस आंदोलन का दुखद पहलू भी है, सत्याग्रहियों को यह विश्वास था कि उन्हें कांग्रेस के नेताओं का समर्थन मिलेगा किन्तु तत्कालीन नेताओं ने यह विश्वास तोड़ दिया परिणमस्वरूप कई आंदोलनकारी परिवार पुलसिया जुल्म का शिकार हुआ, कइयों के घर उजड़ गए। इतना कुछ हो जाने के बाद पं. सुन्दरलाल शर्मा सुख-दुख सुनने पहुँचे थे। यही कारण था कि तीव्र गति से उठे जंगल की क्रांति की आग राख के ढेर में दब गई।

महान सेनानी बाल गंगाधर तिलक जी के निधन के बाद कांग्रेस के भीतर राष्ट्रवादी चितकों की ताकत कमजोर होने लगी थी। डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार, लोकमान्य तिलक जी के समर्थक थे तथा वे कई क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहे थे। वे कांग्रेस में ही थे, किन्तु कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति से असंतुष्ट थे। उन्हें तत्कालीन कांग्रेस नेताओं के ढीला-ढाला चरित्र भी दुखी कर रहा था। अंततः वे अपने कुछ साथियों के साथ ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ” गठित कर युवा पीढ़ी के चरित्र निर्माण एवं राष्ट्रवाद का प्रशिक्षण देने लगे। कुछ ही वर्षों में यह संगठन विदर्भ, बरार सहित कुछ प्रांतों में फैल गया और हजारो युवा स्वयं सेवक हुए।

सन् 1920 में महात्मा गांधी नमक सत्याग्रह की घोषणा कर दांडी यात्रा के लिये निकले, देशभर के कांग्रेस के बड़े नेता उनके पीछे चल पड़े। विदर्भ के वरिष्ठ नेता श्री माधव श्रीहरि अणे (बापूजी अणे) को पीछे चलना स्वीकार्य नहीं था। वे डा0 हेडगेवार जी से संपर्क कर, स्थानीय स्तरों पर आंदोलन की रणनीति पर विचार किये। डा0 हेडगेवार बापूजी अणे की योजना से सहमत थे। योजनानुसार बापूजी अणे 15 जुलाई 1930 को यवतमाल जिले के पुसद में ‘‘जंगल सत्याग्रह’’ करते हुये गिरफ्तार हो गये, किन्तु आम-जनता से अपेक्षित समर्थन नहीं मिला फिर डा0 हेडगेवार 16 जुलाई को साथियों सहित सत्याग्रह के लिये यवतमाल पहुंचे। स्थानीय सत्याग्रहियों के विचार-विमर्श उपरांत 21 जुलाई को पुसद में सत्याग्रह करने का निर्णय लिया गया। डा0 हेडगंवार अपने तीन साथियों के साथ ‘सत्याग्रह स्थल’ रवाना हुये, 5 किलोमीटर की पद यात्रा में सैकड़ों स्वयं सेवक एवं आम जनता साथ हो गई थी। डा0 साहब जब सत्याग्रह स्थल पहुंचे, तब तक पांच हजार से अधिक लोग समर्थन में एकत्रित थे। डा0 साहब ने सुरक्षित वन क्षेत्र से घास काटकर, अपनी गिरफ्तारी दिये। उसी दिन उन पर मुकदमा चलाया गया और 9 माह का सश्रम कारावास दिया गया। डा0 साहब को अकोला जेल भेजा गया। यह बात जंगल की आग की तरह फैल गई, जिससे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयं सेवकों में सक्रियता बढ़ने लगी। कुछ दिनो बाद ‘‘चिरनेर नामक स्थान में ‘‘जंगल सत्याग्रह’’ हुआ, जिसमें सत्याग्रहियों एवं पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई। पुलिस की गोली से 8 सत्याग्रही शहीद हो गये। सेंट्रल प्रोविंस के कटनी में मोतीलाल ताम्रकार, राम गोपाल ताम्रकार, बैतुल में डा0 माखनलाल चतुर्वेदी, बालाघाट में अंबर लोधी, किशनलाल, हरदा में सीताचरण दीक्षित के नेतृत्व में जंगल सत्यागृह हुये।

तत्कालीन रायपुर जिले के महासमुंद शहर से लगभग 20 कि0मी0 दूर जंगल क्षेत्र के तमोरा ग्राम में ‘‘25 जुलाई 1930 को हरेली अमावस के दिन हरेली त्यौहार मनाया जा रहा था। तभी कुछ मवेशी सुरक्षित वन क्षेत्र में घुसकर चारा चर लिये। उन मवेशियों को वन विभाग द्वारा जब्त कर लिया गया। इस बात पर गांव वालों एवं वन विभाग के कर्मचारियों के बीच विवाद हुआ। वन विभाग द्वारा गांव वालों के विरूद्ध झूठी शिकायतें कर मुकदमा दर्ज किया गया, न्यायालय ने मामले की जांच कराया, जिसमें गांव वालों को निर्दोष पाया गया और मुकदमा खारिज कर दिया गया। इस घटना की चर्चा सुराजियों के बीच होने लगी और कई स्थानों में सत्याग्रह की योजना बनने लगी। धमतरी में पं0 नारायण राव मेधावाले एवं श्री नत्थू जगताप जी ने 1200 सत्याग्रही तैयार कर प्रशिक्षण भी दिये थे। 25 जुलाई 1930 की यह घटना जंगल सत्याग्रह का आधार बनी।
तमोरा मामले को लेकर 6 सितंबर 1930 को लभरा में श्री अरिमर्दन गिरी के नेतृत्व में सुराजियों की बैठक हुई, जिसमें 8 सितंबर से सत्याग्रह प्रारंभ करने का निर्णय लिया गया। 8 सितंबर 1930 को तमोरा में बड़ा आम सभा किया गया तथा सर्व श्री बजरंग दास, जनार्दन गिरी, नंबरदास, हिंगराज गिरी एवं सावल दास की टीम को सत्याग्रह के लिये भेजा गया। इस टीम ने घास काटा, किन्तु पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया। 9 सितंबर को कुछ सत्यागहियों के साथ सब-इंस्पेक्टर मिर्जा बेग ने मारपीट किया। 10 सितंबर को सत्याग्रही श्री शंकरराव गनौदवाले गिरफ्तार कर जेल भेज दिये गये। 11 सितंबर को 500 सत्याग्रहियों को रास्ते में रोक कर, 17 प्रमुखों को गिफ्तार किया गया तथा जंगल में दूर ले जाकर रिहा कर दिया गया। 12 सितंबर को हजारों सत्याग्रहियों की उपस्थिति के कारण धारा 144 लागू किया गया। लगभग 5000 लोगों की भीड़ पर लाठी चार्ज किया गया, जिससे भगदड़ मच गई। सशस्त्र पुलिस संगीन की नोंक में सत्याग्रहियों को हटाने लगी, तभी आदिवासी बाला ‘‘दयावती कंवर’’ के नेतृत्व में 200 महिला सत्याग्रही सशस्त्र पुलिस के सामने आ धमकी। इनके और पुलिस के बीच नोंक-झोंक होने लगा और दयावती की टीम सीना ताने गोली चलाने ललकारने लगी। इस अभूतपूर्व शौर्य को देख, सशस्त्र पुलिस के पांव उखड़ने लगी और अततः पुलिस सत्याग्रह स्थल से खाली हाथ वापस लौट गई। 14 सितंबर को श्री हिरामन साहू , श्री प्रेम गांड़ा एवं श्री लल्लू गांड़ा को गिरफ्तार किया गया तथा हिरामन साहू को जेल भेजा गया एवं, दोनो गांड़ा बंधुओं को 10-10 बेंत की सजा देकर, रिहा कर दिया गया। 16 सितंबर को सर्व श्री अद्वैत गिरी, चौथमल, खेलू, रूरू केंवट, रामाधर मरार, मनराखन कोष्टा, एवं महेश मरार को गिरफ्तार किया गया। 17 सितंबर 1930 को सर्व श्री रघुवीर सिंह कंवर, शिव राज गोंड़, कपिल गोड़, मनी गोंड़, राजा राम मरार को गिरफ्तार किया गया, इनमें से रघुवीर सिंह को जेल भेजा गया। इस प्रकार 24 सितंबर तक सत्याग्रह चला और अमेठी गांव में आम सभा के साथ समापन हुआ।

जंगल सत्याग्रही दयावती कंवर तमोरा के पुत्र स्व: उत्तम सिंह दिवान

जेल भेजे गये, श्री हिरामन साहू को 6 माह का कारावास 200 रूपये जुर्माना, तथा श्री रघुवीर सिंह को 4 माह का कारावास 200 रूपये जुर्माना का दण्ड दिया गया।
तमोरा सत्याग्रह से कौंदकेरा ( राजिम से 13 कि.मी. की दूरी ) गांव के पं0 मिलऊदास कोसरिया (सतनामी), जो ज्योतिष शास्त्र एवं वेद-वेदांग के ज्ञाता थे तथा प्रवचन करते थे, को इस आंदोलन से जबरदस्त सहानुभूति हुई और वे भी सपरिवार सत्याग्रह के लिये निकल पड़े। उन्हें 24 सितंबर 1930 को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। पं0 मिलऊदास को 4 माह का सश्रम कारावास तथा 30 रूपये जुर्माना, जुर्माना न पटाने पर एक माह का अतिरिक्त कारावास की सजा सुनाई गई। वे 5 माह का सजा काट कर 23 दिसंबर को रिहा हुये।

तमोरा से कुछ दूरी पर कौड़िया जमींदारी में सुराजी श्री बुढान शाह की गतिविधियों चल रही थी। उन्हें 25 सितंबर को गिरफ्तार कर लिया गया। उनके सहयोगी रामबगस, राम प्रसाद, चिंताराम, धनाराम, बैसाखु सतनामी, सहदेव, रूहा, धरमसिंह साहू, मस्तराम दास, जीत राम, रूपराय, बुधराम, पितांबर, मंगल, कोंदा, मालीगुड़ी ध्रुव एवं रती पनका को ढूंढ-ढूंढ कर 29 सितंबर को गिरफ्तार किया गया। ये सभी सत्याग्रही 30 सितंबर को सलिहागढ़ सत्याग्रह में जाने की तैयारी कर रहे थे। कौड़िया में सत्याग्रही लक्ष्मी नारायण तेली की बेदम पिटाई की गई, जिससे उसकी मृत्यु हो गई (छत्तीसगढ़ का इतिहास डा0 भगवान सिंह वर्मा, पृष्ठ 1027।।. छत्तीसगढ़ का जनजातिय इतिहास डा0 हीरालाल शुक्ल पृष्ठ 190.।।। छत्तीसगढ़ वृहद संदर्भ संजय त्रिपाठी पृष्ठ 331)

21 अगस्त 1930 को धमतरी की युद्ध सभा में पं0 नारायण राव मेधावाले जी को युद्ध समिति का डिक्टेटर नियुक्त किया गया, उन्होंनें 22 अगस्त से सत्याग्रह आरंभ करने की घोषणा की। प्रथम दिन के सत्याग्रह के लिए श्री नत्थू जी जगताप को केसरिया दुपट्टा, जिसपर ‘‘सत्याग्रही स्वयं सेवा सेनानी’’ लिखा हुआ था भेट कर प्रथम सत्याग्रही का दायित्व सौंपा गया। पं0 नारायण राव मेधावाले द्वारा श्री जगताप जी को चाँदी का हंसिया प्रदान करते तथा ललाट पर कुमकुम तिलक एवं पुष्पहार पहना कर गले से लगाया गया। 22 अगस्त 1930 को सूर्योदय के साथ श्री नत्थू जी जगताप एवं पं0 नारायण राव मेधावाले जी गिरफ्तार कर रायपुर जेल भेजे गये। सत्यग्रहियों के प्रथम जत्थे को बिदाई देने पं0 सुन्दर लाल शर्मा राजिम से रवाना हुए जिन्हें अभनपुर में गिरफ्तार कर लिया गया। जेल जाते-जाते पं0 नारायण राव मेधावाले जी ने अपने स्थान पर बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव को डिक्टेटर घोषित किये। इन नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में धमतरी में पूर्ण हड़ताल रही तथा विशाल आमसभा का आयोजन किया गया। 23 अगस्त को बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव के नेतृत्व में सत्याग्रही स्वयं सेवकों का जत्था रवाना हुआ। किन्तु सत्याग्रह स्थाल के आस-पास धारा 144 प्रभावशील होने के कारण रास्ते में रोक लिया गया। पुलिस द्वारा रोके जाने पर बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव, रामलाल अग्रवाल,गोविंद राव जोशी, अमृतलाल खरे, शंकर राव कथलकर निकट के जंगल में घुसकर, घास काटकर कानून तोड़े, और इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 24 अगस्त को धमतरी में पं0 गिरधारी लाल तिवारी जी की अध्यक्षता में आमसभा हुई, जिसे उनके अतिरिक्त श्री भोपाल राव पवार, श्री गंगाधर पडोले ने संबोधित किया। प्रातः 11.00 बजे सत्याग्रहियों का जत्था रूद्री नवागांव की ओर रवाना हुआ। जंगल में प्रवेश करते ही सत्याग्रही गिरफ्तार कर लिए गये और उन्हें 15 से 50 बेंतों के प्रहार की सजा दी गई। 25 अगस्त को पं0 गिरधारी लाल तिवारी तथा श्री गंगाधर राव पडोले गिरफ्तार देवांगन के नेतृत्व में सत्याग्रह किया गया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

09 सितंबर को 10 से 12 हजार लोगों का जुलूस निकला जो दोपहर 2.00 बजे रूद्री नवांगांव के समीप पहुंचा। तब पुलिस ने लोगों पर लाठी बरसाना शुरू किया। इस भगदड़ में एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर तथा एक सिपाही घायल हुए। जिससे बौखलाकर पुलिस ने भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया। लमकेनी ग्राम के सत्याग्रही मिंधु कुम्हार तथा रतनु को गोली लगी और वे गिर पड़े। इन्हें घायल अवस्था में गिरफ्तार कर रायपुर जेल भेज दिया गया। 11 सितंबर 1930 को रायपुर जेल में घायल मिंधु कुम्हार की मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद प0 शिवबोधन प्रसाद, मोहन लाल मेहेता, बिसाहू राव बाहर, यशवंत राव जगताप, नत्थूलाल घड़ीसाज, मनबोध राम यदु, ठाकुर फुलसिंह, दिनकर राव ऋषिकर, हस्तमल जैन, इंदु प्रसाद शास्त्री, जुम्मन शाह, ठाकुर छन्नू सिंह, श्रीमति दया बाई, श्रीमति सेवंती बाई, लाल सहाब, रनसिंह, ठाकुर महेश सिंह, चन्द्रया, बंगाली संत गिरफ्तार कर लिए गये। हिन्छाराम पटवारी जी सरकारी नौकरी छोड़कर सत्याग्रह में भाग लिया, उसे भी गिरफ्तार किया गया।

जिन सत्याग्रहियों को न्यायालय में मुकदमा चला कर दंडित किया गया वे हैः-

(1)पं0 सुन्दर लाल शर्मा 1 वर्ष का कारावास एवं 250 रूपये जुर्माना (2) पं0 नारायण राव मेधावाले 1 वर्ष का कारावास एवं 250 रूपये जुर्माना (3) नत्थू जी जगताप 1 वर्ष का कारावास एवं 1100 रूपये जुर्माना (4) बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव 1 वर्ष का कारावास एवं 500 रूपये जुर्माना (5) पं0 गिरधारी लाल तिवारी 6 माह कारावास (6) रामलाल अग्रवाल 6 माह कारावास (7)शोभाराम देवांगन 6 माह कारावास (8) गंगाधर राव पडोले 6 माह कारावास (9) गोविंद राव डाभावाले 6 माह 250 रूपये जुर्माना (10) मुकंद राव माने 6 माह कारावास (11) राम रतन यदु 6 माह कारावास (12) मनुलाल पानवाला 6 माह कारावास (13) महतरू उर्फ गोडो 6 माह कारावास (14) फिरतू आदिवासी 6 माह कारावास (15) गुलबू आदिवासी 6 माह कारावास (16) बोउदा आदिवासी 6 माह कारावास (17) शंकर लाल श्रीवास्तव 6 माह कारावास (18) शिव चरण राव जगताप 6 माह कारावास (19) शंकर राव जाधव 6 माह कारावास (20) हिरामन देवांगन 6 माह कारावास (21) झामन राम साहू 6 माह कारावास (22) रतन मालगुजार 2 वर्ष कारावास 200 रूपये जुर्माना (23) गोवर्धन सिंह 1 वर्ष कारावास एवं 50 रूपये जुर्माना (24) रतेल 1 वर्ष 50 रूपये जुर्माना (25) चलऊ 1 वर्ष कारावास 50 रूपये जुर्माना (26) कल्याण सिंह 1 वर्ष कारावास 100 रूपये जुर्माना (27) गणेश गोड़ 1 वर्ष कारावास 200 रूपये जुर्माना (28) बुटू गोंड़ 1 वर्ष कारावास 50 रूपये जुर्माना (29) राम चरण गोंड़ 1 वर्ष कारावास 50 रूपये जुर्माना (30) कुलंजन गोंड़ 1 वर्ष कारावास 50 रूपये जुर्माना (31) धुकेल गोंड़ 1 वर्ष कारावास 50 रूपये जुर्माना (32) बिहारी रावत 1 वर्ष कारावास 50 रूपये जुर्माना (33) भेलवा 1 वर्ष कारावास 50 रूपये जुर्माना (34) नान्हें 1 वर्ष कारावास 50 रूपये जुर्माना (35) कन्हई सिंग 1 वर्ष कारावास 50 रूपये जुर्माना (36) चमरू सिंग 1 वर्ष कारावास 50 रूपये जुर्माना (37) रतनू 1 वर्ष कारावास 50 रूपये जुर्माना (38) राम जी 6 माह कारावास (39) मनीराम 6 माह कारावास (40) सुखलाल प्रसाद पांडे 6 माह कारावास (41) भगोली राम 6 माह कारावास (42) मिलन दास 6 माह कारावास (43) अर्जुन कुमार 6 माह कारावास (44) परदेशी राम 6 माह कारावास (45) लिमना जी 6 माह कारावास (46) बरातू सतनामी 6 माह कारावास (47) बुद्धराम गोंड़ 2 माह कारावास 50 रूपये जुर्माना (48) मंगल दास धनंका 2 माह कारावास 50 रूपये जुर्माना (49) जोगी राम गरार 6 माह कारावास 50 रूपये जुर्माना (50) हिंछाराम ब्राम्हण 6 माह कारावास 50 रूपये जुर्माना (51) दिरबी रावत 4 माह कारावास (52) लाल दास 4 माह कारावास (53) बिसाहू राम साहू 4 माह कारावास (54) रजउ राम केंवट 4 माह कारावास (55) देवनाथ मास्टर 4 माह कारावास (56) जुरावन दास 6 माह कारावास (57) श्याम लाल सोम 6 माह कारावास (58) पंचम सिंह 6 माह कारावास (59) मंगल दास 6 माह कारावास (60) सुखराम नागे 6 माह कारावास (61) तुलसी राम 6 माह कारावास (62) मेघनाथ साहू 6 माह कारावास (63) साधूराम 6 माह कारावास (64) भुरूवा 6 माह कारावास (65) दुआरू 6 माह कारावास (66) धनसिंह 6 माह कारावास (67) सुन्दर सिंह 6 माह कारावास (68) जय सिंह 6 माह कारावास (69) राम जी 6 माह कारावास (70) घुसिया राम 6 माह कारावास (71) पतला राम 6 माह कारावास (72) बैजनाथ 6 माह कारावास (73) धीराज सिंह कारावास (74) पंडित 6 माह कारावास (75) शोभा राम 6 माह कारावास (76) छिटकू 6 माह कारावास (77) रैनू 6 माह कारावास (78) सगनू राम 6 माह कारावास (79) जवाहर सिंह 6 माह कारावास (80) माखन सिंह 6 माह कारावास (81) कुभक लाल भोई 6 माह कारावास (82) भैय्या लाल बरई 6 माह कारावास (83) घासी राम 6 माह कारावास (84) पांडुरंग 6 माह कारावास (85) शोभा राम 1 वर्ष कारावास(86) शंभू 6 माह कारावास (87) शोभा राम 6 माह कारावास (88) विशम्भर 6 माह कारावास (89) हरक राम 6 माह (90) मेहतरू गोंड़ 6 माह कारावास एवं अन्य सत्यग्रहियों को जुर्माना एवं बेंत प्रहार-

(1) शिव रतनपुरी 600 रूपये जुर्माना (2) रघुनाथ राव जाधव 500 रूपये जुर्माना (3) इशाक अलि 500 रूपये जुर्माना (4) बिसुजी पवार 500 रूपये जुर्माना (5) मधुसूदन ऋषिकर 500 रूपये जुर्माना (6) गुलाब राव बाबर 300 रूपये जुर्माना (7) हस्तमल जैन 300 रूपये जुर्माना (8) हर्सलाल तेजपाल 300 रूपये जुर्माना (9) सालिक राम 25 बेत (10) चमरू 25 बेत (11) लतेल 25 बेत (12) बिशंम्भर 25 बेत (13) शिव प्रसाद मास्टर 100 रूपये जुर्माना (14) कंवल सिंह 15 बेंत (15) महेश गोंड़ 50 बेंत (16) दसरू गोंड़ 50 बेंत

जुर्माना नहीं पटाने पर जेल की सजा काटने वाले सत्याग्रही –

(1) रतन छगू 2 वर्ष 3 माह कारावास (2) लतेल पनका 1 वर्ष 3 माह कारावास (3) कम्मन ताराचंद 1 वर्ष 3 माह कारावास (4) रामचरण बोधी 1 वर्ष 3 माह कारावास (5) बुटू बोधी 1 वर्ष 3 माह कारावास (6) परसादी नोहर 1 वर्ष 3 माह (7) थुकेल पंचम 1 वर्ष 3 माह कारावास (8) गोवर्धन चरण 1 वर्ष 3 माह कारावास (9) थनवार गुरूरू 1 वर्ष 3 माह कारावास (10) शंकर राजिबा 1 वर्ष 3 माह कारावास (11) जूठू मनीराम 1 वर्ष 3 माह कारावास (12) नम्मू दूलार 1 वर्ष 3 माह कारावास (13) रतनू गिरवर 1 वर्ष 3 माह कारावास (14) गणेश गोकुल 3 वर्ष 3 माह कारावास (15) कल्याण फिरतू 1 वर्ष 3 माह कारावास (16) शिव बोधन 2 माह कारावास (17) मदन 2 माह कारावास (18) नत्थू 2 माह कारावास (19) नितचेतन्य दास 2 माह कारावास (20) लाल साहब रामसिंह 2 माह कारावास (21) राव 2 माह कारावास (22) कांशी प्रसाद 2 माह कारावास (23) यशवंत राव 2 माह कारावास (24) पांडू 2 माह कारावास (25) कन्हैया 3 माह कारावास

30 सितंबर को पुराने महासमुंद तहसील के नुआपाड़ा (वर्तमान में ओड़िशा) जमींदारी के गांव सलिहागढ़ में लगभग एक हजार सत्याग्रही एकत्रित हुये थे। पुलिस का लाठी चार्ज हुआ, निहत्थे सत्याग्रहियों को पीटते देख गांव वालों ने पुलिस पर हमला किया। दिनभर संघर्ष चलते रहा, अंततः 19 सत्यग्रहियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। जिन्हें सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई वे हैः- 1.केजु दास बाबा, 2. लीला देवी, 3. रामलाल देवांगन, 4. रामा साहू, 5. केंदु कुर्मी, 6. लक्ष्मण दास, 7. गांड़ा राय, 8. सखा राम साहू, 9. राजा राम सांवरा, 10. भुजबल साहू, 11. दुकालू गोंड़, 12. बीरबल साहू, 13. महाजन घासी, 14. गणेश पुरी, 15. बैसाखु गांड़ा, 16. बजारू साहू, 17. कोटधारिन कुर्मी, 18. कार्तिक सांवरा, 19. जयमती सांवरा।

हरेली तिहार मनाते बाल-गोपाल – फ़ोटो प्रकाश देव साहू रायपुर

जंगल सत्याग्रह की आग अधिकांश छत्तीसगढ़ में फैल चुकी थी। सारंगढ़ में श्री धनी राम, कंवरभान जगतराम, मोहबना-पौंड़ी में श्री नरसिंह अग्रवाल, श्री रामाधर दुबे, बांधाखार में श्री मनोहर शुक्ला, छुई खदान में समारू बरई गरदाटोला में रामधीन गोंड़ के नेतृत्व में सत्याग्रह हुआ। श्री रामधीन गोंड़ भी पुलिस गोली से शहीद हुये थे। इस प्रकार छत्तीसगढ़ के ‘‘जंगल सत्याग्रह’’ में मिंधु कुम्हार, रतनु यादव, लक्ष्मी नारायण तेली एवं रामधीन गोंड़ शहीद हुये, सैकड़ों गिरफ्तार हुये हजारों का घर उजड़ गया।

सन् 1936 में राज्य पुनर्गठन में इस क्षेत्र को ओड़िशा के कालाहांडी जिला में शामिल किया गया, परिणाम स्वरूप महासमुंद तहसील के सत्याग्रही दो हिस्से में बंट गये।

इस राष्ट्रीय आंदोलन का दुखद पहलू यह है कि स्वतंत्रता के बाद ‘‘जंगल सत्याग्रह ’’ के सत्याग्रहियों को वह मान-समान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। इसके राजनीतिक द्वेष की भावना स्पष्ट दिखती है, चूंकि डा0 हेडगेवार इस सत्याग्रह की अगुवायी किये थे और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की बड़ी भूमिका थी, इसलिए कांग्रेस नेताओं ने उपेक्षित किया।

महासमुंद तहसील के दो बड़े सत्याग्रही श्री अद्वैत गिरी एवं श्री बुढ़ान शाह, पं0 रविशंकर शुक्ल को अपना नेता नहीं मानते थे। श्री अद्वैत गिरी जी, प्रथम आम चुनाव में महासमुंद लोक सभा से कांग्रेस के विरूद्ध के प्रत्याशी थे तथा श्री बुढ़ान शाह सन् 1965 में पिथौड़ा विधान सभा से कांग्रेस के विरूद्ध समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी बने। कांग्रेस सरकार की उपेक्षा के चलते आज तक कुछ सत्याग्रहियों को ‘‘स्वतंत्रता सेनानी’’ की सुविधा नहीं मिली है।

मेरी छत्तीसगढ़ के विद्वत समाज से करबद्ध प्रार्थना है कि राष्ट्रीय आंदोलन तथा अंग्रेजों के विरूद्ध छत्तीसगढ़ में हुए संपूर्ण आंदोलन और आंदोलनकारियों को अपने प्रदेश में सम्मान मिले। छत्तीसगढ़ में सबसे बड़ा आंदोलन जंगल सत्याग्रह ही था। यह आंदोलन यद्यपि शहर से दूर जंगल के समीप गॉंवों में हुआ था, यथापि यह आंदोलन इतना सशक्त था कि, इसकी अनुगूंज दूर-दूर तक सुनाई पड़ने लगी थी, इस आंदोलन का नेतृत्व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने किया था, इसलिए कांग्रेसी शासन में इसे नजर अंदाज कर दिया इस जबरदस्त आंदोलन की तथा-कथा को छत्तीसगढ़ के इतिहासकारों, लेखकों ने विशेष रूप से इतिहास में स्थान दिया है यही कारण है कि यह जंगल सत्याग्रह आंदोलन ने स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में प्रमुखता से अपना स्थान बना लिया।

छत्तीसगढ़ का जंगल सत्याग्रह आंदोलन छत्तीसगढ़ का गौरवशाली इतिहास है, इसलिए इस आंदोलन से जुड़े हुए सत्याग्रही परिवारों को छत्तीसगढ़ शासन में गौरवपूर्ण सम्मान प्राप्त हो। इनके महान बलिदान को युग-युग तक अमर रखने के लिए अंचल के गॉंवों के स्कूलों, कालेजों, ग्राम पंचायत भवन, सामुदायिक भवन, विभिन्न योजनाओं आदि का नामकरण इनके नाम पर होना चाहिए। इस आंदोलन के इतिहास को चिरस्थायी बनाने के लिए शासन की ओर से प्रतिवर्ष निश्चित तिथि में भव्य आयोजन संपन्न होने से प्रदेश में शासन की सकारात्मक छवि बनेगी।

संदर्भ सूत्र :
1-ठाकुर प्यारे लाल सिंह के जांच प्रतिवेदन के अनुसार
2- छत्तीसगढ़ का इतिहास डा0 भगवान सिंह वर्मा, पृष्ठ 1027.
3-छत्तीसगढ़ का जनजातीय इतिहास डा0 हीरालाल शुक्ल पृष्ठ 190.
4- छत्तीसगढ़ वृहद संदर्भ संजय त्रिपाठी पृष्ठ 331

आलेख

श्री चुन्नीलाल साहू
सांसद महासमुंद लोकसभा क्षेत्र
ग्राम – मौगरापाली,
तेंदूकोंना, जिला – महासमुंद
मोबाईल नं0 9977909977

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