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चंद्र कलाओं पर आधारित हिन्दू त्यौहार : छेरछेरा पुन्नी विशेष

सूर्य और ग्रह मंडल से मिलकर सौरमण्डल बना है। जिसका मुखिया सूर्य है। सूर्य को ‘सर्वति साक्षी भूतम’ (सब कुछ देखने वाला) कहा गया है। ऐसा कहा जाता है कि सूर्य भगवान हर क्रियाकलाप के साक्षी हैं। भारतीय ज्योतिष में नव ग्रह हैं- सूर्य, चंद्र, बुद्ध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, राहु और केतु। यही ग्रह चराचर जगत को प्रभावित करते हैं एवं ॠतुओं के संचालक हैं।

शुकेषु मे हरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि ।
अथो हारिद्रवेषु मे हरिमाणं नि दध्मसि ॥१२॥ ॠग्वेद
हम अपने हरिमाण(शरीर को क्षीण करने वाले रोग) को शुको(तोतों), रोपणाका(वृक्षों) एवं हरिद्रवो (हरी वनस्पतियों) मे स्थापित करते हैं॥१२॥ ॠग्वेद

सम्पूर्ण विश्व में विभिन्न धर्म सम्प्रदाय और उनके पर्व एवं त्यौहार हैं। हिन्दू धर्म का पंचांग तो चंद्र मास की तिथियों पर आधारित है। अधिकांश पर्व व त्योहार इन्ही में मनाए  जाते हैं। ग्रहों में सबसे अधिक गति से चलने वाला चंद्रमा मन का प्रतिनिधित्व करता है।  चन्द्र को काल पुरुष का मन कहा गया है।

सूर्योदय – ॠषिकेश, फ़ोटो – ललित शर्मा

चन्द्रसापेक्ष घटित होने वाले दिन रात को भारतीय गणितज्ञों ने पैत्रमान (पितरों से सम्बन्धित दिनरात्रि व्यवस्था) कहा है – 

त्रिंशता तिथिभिर्मासश्चान्द्रः पित्र्यमहः स्मृतः।
निशा च मासपक्षान्तौ तयोर्मध्ये विभागतः।।

अर्थात – चन्द्रमा की 30 तिथियों का एक चान्द्रमास होता है, तथा वही एक मास पितरों का एक अहोरात्र (दिन-रात) के बराबर होता है। अर्थात् 15 तिथियों के बराबर एक दिन और 15 तिथियों के बराबर एक रात्रि होती है। अमावस्या को पितरों की मध्यरात्रि एवं पूर्णिमा को दिनार्द्ध होता है। कृष्णपक्ष की साढ़े सप्तमी से पितरों के दिन का आरंभ तथा शुक्लपक्ष की साढ़े सप्तमी से उनकी रात्रि का आरम्भ होता है।        

चन्द्रमा की सोलह कलाएं होती हैं जिन्हें अमृत,मनदा, पुष्प, पुष्टि, तुष्टि, ध्रुति, शाशनी,चन्द्रिका, कांति, ज्योत्स्ना, श्री, प्रीति,अंगदा, पूर्ण, और पूर्णामृत के नाम से जानते हैं। वैसे इन्हें प्रतिपदा, दूज, एकादशी, पूर्णिमा भी कहतें हैं। चंद्रमा की आकृति प्रतिदिन बदलती रहती है, इस परिवर्तन को ही कला कहते हैं।

ये ललित कलाएं अत्यंत मनमोहक होती हैं। पूर्णिमा को पूर्ण गोल चाँद के दर्शन होते हैं जो क्रमशः घटते हुए एक दिन लुप्त हो जाता है, जिसे अमावस्या तिथि कहतें हैं।  हिन्दू पंचांग में पंद्रह-पंद्रह दिन के दो पक्ष कृष्ण और शुक्ल पक्ष होते हैं। इन्ही पक्षों में बारह मास बहुत से पर्व व त्यौहार मनाएं जाते हैं।

प्रतिपदा से पूर्णिमा और अमावस्या तक  प्रत्येक तिथि में विभिन्न व्रत, पूजा, त्यौहार जैसे नागपंचमी, रक्षाबंधन, दशहरा, दीपावली, तुलसी विवाह, करवा चौथ, जन्माष्टमी, भाई दूज, तीज, गणेश चतुर्थी, गुरु नानक जयंती, छेरछेरा पुन्नी, माघी पुन्नी, ओणम, होली, दुर्गा, पूजा, रामनवमी इत्यादि बहुत से पर्व मनाए जाने की परंपरा है।

प्रारम्भ गणेश चतुर्थी से करें तो माह के दोनों पक्षों में गणेश जी का पूजन व व्रत किया जाता है जिसमे भाद्र पक्ष की चौथ को छोड़कर क्योंकि इस दिन चंद्र दर्शन निषिद्ध माना गया है शेष सभी में चंद्रमा को अर्ध्य देकर पूजन किया जाता है। गणेशोत्सव का दस दिवसीय पर्व संपूर्ण भारत में धूमधाम से मनाया जाता है जो अनन्त चतुर्दशी को गणेश विसर्जन के साथ संपन्न होता है।

श्रावण मास की पूर्णिमा को श्रावणी पर्व मनाया जाता है, यह दिन नव बटुकों के यज्ञोपवीत संस्कार का दिन होता था और वैदिक काल में इसी दिन से विद्यारंभ किया जाता था। इसी दिन भाई बहन का पवित्र त्यौहार रक्षाबंधन आता है जिसमे बहन अपने भाई की दीर्घायु की कामना और अपनी रक्षा हेतु भाई की कलाई में राखी बांधकर करती है। श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी नाग देवता के पूजन अर्चन से मनाया जाता है।

शरद पूर्णिमा  के दिन चन्द्रमा, पृथ्वी के समीप रहता है उसकी अमृतमयी किरणें सीधी धरती पर पड़ती हैं। इस दिन  खीर बनाकर चन्द्रमा की चांदनी में रख दिया जाता है । हिंदु धर्म में ये परम्परा पर्व के रूप में मनायी जाती है। इस दिन पूर्ण चंद्र की किरणों का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक माना जाता है।

अश्वनी शुक्ल पक्ष की दसमी तिथि को दशहरा पर्व पुरे हर्सोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन श्री राम जी ने रावण का वध किया और असत्य पर सत्य की, बुराई पर अच्छाई की विजय का त्यौहार विजियादशमी के रूप में मनाते है। कृष्ण पक्ष की अमावस्या को दीपावली पर्व श्री राम जी के चौदह वर्ष वनवास को पूरा कर अयोध्या आने की खुशी में काली अँधेरी रात में दीप प्रज्वलित कर मनाया गया था तब से आज तक यही परंपरा का निर्वहन किया जा रहा ।

चूँकि यह ऋतू परिवर्तन का समय रहता है, शीत ऋतू का आगमन भी होता है तो लोग घरों की साफ सफाई, रंग रोगन करके इस दिन लक्ष्मी-गणेश का पूजन अर्चन कर आतिशबाजी के साथ दीपोत्सव को हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं।

छेरछेरा मांगते हुए बच्चे – फ़ोटो – मनोज पाठक (छैडोरिया)

पूष पूर्णिमा को छेरछेरा पुन्नी त्यौहार मनाया जाता है, इसे कुछ इलाकों में छेरता भी कहा जाता है। माघ पूर्णिमा का त्यौहार महत्वपूर्ण होता है, इस दिन भारत की सभी प्रमुख नदियों के तीर मेले लगते हैं तथा लोग इस दिन स्नान दान का पुण्य लाभ करते हैं। माघ पूर्णिमा का स्नान प्राचीन परम्परा में समाहित है, इस दिन स्नान के स्नान को स्वास्थ्य की दृष्टि से धर्म से जोड़ा गया है।

फाल्गुन शुक्लपक्ष की पूर्णिमा को होली का त्यौहार होलिका दहन करके दूसरे दिन एक दूसरे को रंग, गुलाल लगाकर प्रेम और सौहाद्र के साथ मनाया जाता है।

भारत वर्ष में हिंदुओं के सारे पर्व, त्यौहार आपसी प्रेम और भाई चारा को बढाते हैं, अमीर गरीब, ऊंच-नीच  की भावना से हट कर भेद भाव रहित वातावरण में सभी मिल जुल कर खुशियों को बांटते हैं। चंद्रमा का घटना-बढ़ना खगोलीय  संरचना है किंतु इस को मानव ने कितनी खूबसूरती के साथ पर्व और त्यौहार का रूप प्रदान कर दिया।

संसार में जब तक जीवन रहे खुशियां भी रहें। इन पर्वों के पीछे वैज्ञानिक तथ्य भी जुड़े हैं जो ऋतू परिवर्तन और ऋतू विशेष में होने वाली फसलों अन्न, फल, फूलों उनकी तासीर से भी सम्बद्ध होती है और इन त्योहारों में उन्ही वस्तुओं का सेवन  किया जाता है जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती हैं।

भारतीय वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा को बदुत अधिक महत्व दिया जाता है और व्यक्ति के जीवन से लेकर विवाह और फिर मृत्यु तक बहुत से क्षेत्रों के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए कुंडली में चंद्रमा की स्थिति को बहुत अधिक ध्यान से पढ़ा जाता है।

भारतीय ज्योतिष पर आधारित दैनिक, साप्ताहिक तथा मासिक भविष्य फल भी व्यक्ति की जन्म के समय की चंद्र राशि के आधार पर बताए जाते हैं। चंद्रमा की गति से सर्वदा परिवर्तन होता रहता है। चंद्रमा हृदय का स्वामी है।

ऋग्वेद के अनुसार चन्द्रमा की किरणें अमृत बिन्दु के समान हैं तथा वह समस्त औषधियों का स्वामी है 

“त्वमिमा ओषधी: सोम विश्वास्त्वमपो अजनयंस्त्वं गा:। 
त्वमा ततन्योर्वन्तरिक्षं त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ॥’’

पूर्णचंद्र हरिद्वार गौघाट – फ़ोटो ललित शर्मा

भारत में विभिन्न धर्म संप्रदाय के लोग और उनके विभिन्न पर्व व् त्यौहार हैं जो एकता, प्रेम,भाईचारा का संदेश देते हैं, वर्तमान में रूढ़िवादिता और जातिगत भेदभाव से हटकर सभी मिलजुल कर सारे त्योहारों का आनन्द लेते हैं। कहीं कोई अलगाव नहीं, यहां मैं नही, हम और हमारा की भावना के दर्शन होते हैं। जो एक शक्तिशाली व् मजबूत राष्ट्र का प्रतीक है।

हिन्दू धर्म के अलावा दूसरे धर्मों  के भी अपने कैलेंडर हैं ,जो सौर मंडल और खगोलीय संरचना पर ही आधारित हैं उनके पर्व व् त्यौहार भी ग्रह  नक्षत्रों के परिवर्तन केअनुसार ही मनाएं जाते हैं। चन्द्रमा और मानव मन का घनिष्ट सम्बंध है, इसलिए  भारतीय ज्योतिष में चंद्र का विशेष महत्व है।

आलेख

श्रीमती रेखा पाण्डेय
व्याख्याता
अम्बिकापुर, सरगुजा

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3 comments

  1. धामिक मान्यताओं एवं वैञानिक तथ्यों से भरा सुंदर आलेख। आप
    सबको छेरछेरा पुन्नी की बधाई एवं शुभकामनाएं।

  2. बहुत ही अच्छी जानकारी

  3. छेरछेरा पुन्नी की इतनी विस्तृत जानकारी और इसके वैज्ञानिक महत्व को बताने वाला ये आलेख बेहद रोचक और ज्ञानवर्धक है। धन्यवाद दक्षिण कोसल टीम।
    छेरछेरा की बधाई।

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