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शिवार्चना करते हुए हनुमान (फ़िंगेश्वर)

छत्तीसगढ़ की स्थापत्य कला में हनुमान

हमारे देश में मूर्ति पूजा के रूप में महावीर हनुमान की पूजा अत्यधिक होती है क्योंकि प्रत्येक शहर, कस्बों तथा गांवों में भी हनुमान की पूजा का प्रचलन आज भी देखने को मिलता है। हनुमान त्रेतायुग में भगवान राम के परम भक्त तथा महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ के ध्वजा पर विराजमान रहे हैं।

हनुमान के चरित्र का वर्णन रामायण एवं रामचरित मानस तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों में भी प्राप्त होता है। रामकथा के पूर्व यक्ष के रुप में भी हनुमान प्रतिष्ठित थे। उनके द्वारा सम्पन्न किये गये अविश्वसनीय कार्य तथा मनचाहा रुप धारण कर लेने की उनकी क्षमता की समानता यक्षों से प्रदर्शित करती है।

पातालेश्वर मंदिर मल्हार

बाल्मीकि रामायण में हनुमान को प्रभंजनपुत्र, पार्जिटर ने ऋग्वेद में वर्णित वृषाकपि को हनुमान मानकर उनकी प्राचीनता ऋग्वेदिक काल तक निर्धारित की है। हनुमान शिव के अवतार थे । इसलिये हनुमान के लिये वृषाकपि संज्ञा का उपयोग उचित है। प्राचीन भारतीय साहित्य में वर्णित हनुमान बौद्ध और जैन धर्म में भी समान रुप से प्रतिष्ठित थे। ब्रह्मपुराण में हनुमान वायुपुत्र तथा शिवमहापुराण में शिवपुत्र कहे गये हैं।

हनुमान की उत्पत्ति के संबंध में संक्षिप्त में पौराणिक ग्रंथों से प्राप्त जानकारी का वर्णन निम्नानुसार है-देवराज इंद्र की अमरावती में एक पुंजिक स्थला नाम की अप्सरा रहती थी। एक दिन उसके कुछ अपराध होने के कारण वह वानरी होकर पृथ्वी पर जन्म ली।

शिवार्चना करते हुए हनुमान, फ़णीकेश्वर महादेव (फ़िंगेश्वर)

शाप देने वाले ऋषि ने बड़ी प्रार्थना के बाद उसे वरदान दिया था कि वह चाहे वानरी रहे चाहे मानवी। वानरराज केसरी ने उसे पत्नी के रूप में ग्रहण किया था। एक दिन दोनों ही मनुष्य का रूप धारण कर सुमेरू पर्वत पर विचरण कर रहे थे। उसी समय वायु के हल्के से झोंके से अंजना की साड़ी का पल्ला उड़ गया तथा उन्हें ऐसा एहसास हुआ कि कोई स्पर्श कर रहा है।

अंजना अपने कपड़े को सम्हालती हुई अलग खड़ी होकर डांटते हुये कहा कि ऐसा ढीठ कौन है जो मेरा पतिव्रत्य भ्रष्ट करना चाहता है। अंजना को अहसास हुआ कि मानो वायुदेव कह रहे हैं- देवी मैंने तुम्हारा व्रत नष्ट नहीं किया है। ‘‘देवि! तुम्हे एक ऐसा पुत्र होगा जो शक्ति में मेरे समान होगा। बल और बुद्धि में उसकी समानता कोई न कर सकेगा। मैं उसकी रक्षा करूंगा, वह भगवान का सेवक होगा।’’ इसके बाद अंजना और केसरी अपने स्थान पर चले गये।

हनुमान जी, रमई पाट

भगवान शंकर ने अंश रूप से अंजना के कान के द्वारा उसके गर्भ में प्रवेश किया। चैत्र शुक्लपक्ष 15 मंगलवार के दिन अंजना के गर्भ से भगवान शंकर ने वानर रूप से अवतार ग्रहण किया। इस प्रकार हनुमान जी की माता का नाम अंजना तथा पिता का नाम केसरी था।

छत्तीसगढ़ में लगभग 7वीं शताब्दी ई. से लेकर अद्यतन निर्मित होने वाले मंदिरों में हनुमान की प्रतिमाएं प्राप्त होती हैं जो विभिन्न कालों की है। छत्तीसगढ़ में अभी तक जहाँ से स्थापत्य में हनुमान की प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं उसकी जानकारी निम्नानुसार है :- मल्हार, राजिम, बारसूर, महेशपुर, डीपाडीह, पचराही, घटियारी, खरोद, फिंगेश्वर, भोरमदेव, रमईपाट, दूधाधारी मंदिर, नागरीदास मंदिर रायपुर।

उक्त प्राचीन स्थल विभिन्न राजाओं के काल में निर्मित किये गये हैं तथा हनुमान की प्रतिमाएं मंदिरों के जंघा, द्वार शाखाएं तथा मण्डप के स्तंभों में उत्कीर्ण प्राप्त हुई हैं जो 6वीं शताब्दी से लेकर आधुनिक काल तक की है। वर्तमान में ज्ञात लक्ष्मणेश्वर मंदिर खरोद के मण्डप के स्तंभ में प्राप्त हनुमान की प्रतिमा प्राचीनतम है जो सोमवंशी काल की लगभग 6-7वीं शताब्दी ई. की है।

तत्पश्चात् कल्चुरी, फणिनागवंशी, सोमवंशी, त्रिपुरी कल्चुरी, मराठाकाल तथा आधुनिक काल में निर्मित प्रतिमायें भी निरंतर मिलती हैं। प्राप्त आधुनिक प्रतिमाएं पूर्णरूपेण पूजित होने के कारण सिंदूर तथा वंदन से ढंकी होने के कारण उनके वास्तविक काल की पहचान नहीं हो पाती है।

पातालेश्वर महादेव मंदिर स्थित हनुमान जी

प्राचीन काल में निर्मित प्रतिमाएं जो कि मंदिरों के विभिन्न हिस्सों में जड़ी हुई प्राप्त हुई हैं, उन्हीं का काल निर्धारण वास्तविक रूप से ज्ञात हो पाता है। प्राचीन मंदिरों के अलावा कहीं-कहीं पर विलग रूप में भी प्राचीन प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं जैसे भोरमदेव मंदिर परिसर में एक मढ़िया में हनुमान की उत्कृष्ट प्रतिमा पूजित स्थिति में विराजमान है जो पूर्णरूपेण सिंदूर से ढंकी हुई है।

इस प्रतिमा के दायें हथेली में शिवलिंग का अंकन है जो राम-रावण संग्राम प्रारंभ होने के पूर्व भगवान राम के शिवपूजा के लिए हनुमान के द्वारा शिवलिंग लाने की कथा का चित्रण दिखाई पड़ता है। निर्धारित समय में भगवान राम के द्वारा शिवपूजन सम्पन्न हो जाने के कारण हथेली में धारित शिवलिंग राम के आदेशानुसार हनुमदीश्वर के नाम से जाना जाता था।

कल्चुरि काल में कल्चुरि शासक प्रतापमल्लदेव तथा फणिनागवंशी शासक नक्कड़देव के सोने के सिक्के में पीछे तरफ हनुमान का अंकन प्राप्त हुआ है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ की स्थापत्य कला में हनुमान के विविधरूपों का चित्रण प्राप्त हुआ है। जैसे-शिवमंदिर घटियारी की एक स्थापत्य खण्ड में अशोक वाटिका में सीता के साथ हनुमान का चित्रण, उसी प्रकार खरोद के लक्ष्मणेश्वर मंदिर के मण्डप के स्तंभ में, फणिकेश्वर मंदिर फिंगेश्वर की जंघा में, भोरमदेव मंदिर के दक्षिणी जंघा भित्ति के अलिद में, दूधाधारी मंदिर रायपुर में, बजरंगबली मंदिर सहसपुर के सुकसानिका वाले भाग में राम तथा सुग्रीव मिलाप के प्रसंग में हनुमान का विशिष्ट योगदान दृष्टव्य है।

आलेख

डॉ. कामता प्रसाद वर्मा,
उप संचालक (से नि) संचालनालय संस्कृति एवं पुरातत्व रायपुर (छ0ग0)

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