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बैगा जनजाति में मृतक संस्कार की परम्परा

वैदिक कालीन मानव का जीवन सोलह संस्कारों में विभक्त था एवं उसी के अनुसार उनके कार्य और व्यवहार थे। परन्तु जनजातीय समुदाय में संस्कार तो होते हैं पर सोलह संस्कारों जैसी कोई सामाजिक मान्यता नहीं है। जनजातीय समाज मुख्य रुप से जन्म, नामकरण, विवाह और मृत्यु संस्कार को मानता है। बैगा जनजाति द्वारा भी यह संस्कार किए जाते हैं, जिनमे मृत्यु संस्कार के विषय में जानते हैं।

बैगा जनजाति में किसी की मृत्यु हो जाने पर शव को माटी देना (गाड़ना) और अग्निदाह दोनों प्रथाएं प्रचलित है। फिर भी अग्नि संस्कार मुख्य रुप से किया जाता है। अधिक दिनों से बीमारी से पीड़ित ब्यक्ति की मृत्यु होने पर शव को माटी दी जाती है, तथा छोटे बच्चों की मृत्यु होने पर उसे माटी दी जाती है। इसके साथ ही संक्रामक बीमारियों से जैसे हैजा, चेचक आदि मरे ब्यक्ति को ये लोग माटी देते है।

बैगाओं का श्मशान घाट नदी या नाले के पार होता है। इनका विश्वास है भटकी हुई आत्मा नदी को पार करके गांव में नही आ सकती। मरने वाले को अंतिम सांस के समय आत्म तृप्ति के लिए सोने, चांदी के रुपये के ऊपर दही रखकर उसके मुंह मे रखते है ऐसा इसलिए करते है कि अगले जन्म में वह ब्यक्ति धन धान्य से परिपूर्ण होगा, इसे “सामरा “प्रथा कहते है।

मृत्यु संस्कार की तैयारी

किसी भी घर मे मृत्यु होने पर घर का मुखिया या कोई “अमुक भाई बीत गईस जोश दईन “को सूचना पास पड़ोस तथा अन्य रिश्तेदारों में देता है। थोड़ी ही देर में पूरी बस्ती के लोग एकत्र हो जाते है, महिलाएं इस ब्यक्ति का नाम तथा अच्छाइयों का गुणगान करते हुए रोना शुरू कर देती है। मरते समय ब्यक्ति को जमीन में नही उतारते है। बैगा शव को स्नान नही करवाते है।

शव के शरीर मे तेल हल्दी लगाई जाती है, सफेद कपड़े को नई लँगोटी पहनाई जाती है, पांच या छः हाथ कोरा कपड़ा शव वस्त्र के लिए लाते है, हल्दी पीसकर शव वस्त्र पर छिड़कते है, शव वस्त्र ओढ़ाने के बाद शव को खटिया से नीचे जमीन पर उतारते है। नीचे एक एक पुराना कपड़ा बिछाते है। खटिया को आंगन में निकालकर दरवाजे के सामने उल्टी करके बिछा देते है।

नगाड़ा बजाते हुए बैगा वाद्यक

शव को घर से बाहर निकालकर खटिया पर सुला दिया जाता है। मृतक के पैर घर की तरफ रखे जाते हैं, खटिया न होने पर बॉस की टीफ़री (सीढ़ी) बनाई जाती है। मृतक के सिरहाने “धनुष बाण ,कुलहाडी, चिलम, बीड़ी आदि रखते है। एक छोटे कपड़े में हल्दी की गांठ, चावल और सामरा का रुपया भी रखते है। एक आदमी एक हांडी में मड़िया, कुटकी एवं रमतीला के दाने, तेल और नमक रखता है।

दूसरा आदमी एक कंडे में आग तथा एक पुला छीरा घास रखता है। एक दोना में पेज तथा बासी भात रखते है, शव का सम्पूर्ण श्रृंगार होने पर श्मशान घाट की यात्रा शुरू होती है। \पुरुष की मृत्यु होने पर उसके शव के साथ धनुष ,बान, रापा, टंगिया, रखा जाता है तथा स्त्री की मृत्यु होने पर लोटा, गिलास, डेचकी, खनता (भूमि खोदने का उपकरण) आदि रखा जाता है।

अग्नि संस्कार

यदि शव को जलाया जाना है तो लकड़ी की चिता बनायी जाती है, चिता की लकड़ी श्मशान में आने वाले लोग इकट्ठा करते है। शव को भूमि को रखकर सबसे नेतनार तीन बार परिक्रमा करता है, उसके बाद मृतक के परिवार के लोग एवं उपस्थित सभी जन तीन बार परिक्रमा करते हैं। पहले शव को मुखाग्नि नेतनार (समधी) देते थे परन्तु अब बदलाव हो गया है और अब मुखाग्नि बेटा या सपिंड देते हैं।

श्मशान में तुम्बी में पानी भरकर रख दिया जाता है, अग्निदाह के पश्चात तुम्बी का पानी लेकर सभी अपने हाथ धोते है और हाथों में तेल हल्दी लगाते है इसके बाद सभी लोग घर लौट जाते है। पुरुषों के घर पहुचने से पहले मृतक के रिश्तेदार आंवला की पत्ती ओर उसी को दांतोंन तोड़कर लाते है ,उसे लाकर मृतक की विधवा देते है। तुम्बी के पास आकर सभी हाथ पैर धोते है घर का मुखिया उसी तुम्बी के पानी से जमीन पर एक सीधी रेखा बनाता है।

सभी लोग रेखा के किनारे कतारबध्द होकर घर की तरफ मुंह करके बैठ जाते है, इस रेखा को मरघट से लौटा कोई आदमी नही लाँघता, केवल घर के सदस्य और समधी घर मे प्रवेश कर सकते है। नेतगार (कुढ़हा) समधी हल्दी तेल मिलाकर सभी लोगो को देता है, सभी लोग हल्दी तेल को हाथ पैर में लगाते है।

हल्दी तेल लगाने के बाद नेतगार एक बोतल शराब (महुआ) की सभी मे बांटते है उक्त शराब को सभी लोग हाथ पैर में लगाते है शेष बची शराब नेतागर समधी के साथ आपस मे बैठकर पीते है। चोंगा (बीड़ी) ओर तम्बाकू पी खाकर सभी लोग अपने-अपने घर चले जाते है। शव वस्त्र गीला करके लौटा पुत्र या घर का मुखिया सीधे घर मे प्रवेश करता है।

मृतक के घर मे भोजन की ब्यवस्था मृतक के रिश्तेदार या गांव के लोग करते है। प्रत्येक घर से सामर्थ्य अनुसार पेज, भात रोटी बनाकर मृतक के घर लाया जाता है। तीन दिन बाद घर के मुखिया के साथ दो पुरुष और एक महिला को भोजन कराया जाता है। इसके बाद घर के अन्य लोग भोजन करते है। भोजन के पहले और बाद में “दोरी” में सबके हाथ धुलाए जाते है, यह कार्य नेतगार करते है।

तीज नहावन या तीया

तीन दिन तक मृतक के परिवार में सूतक होता है, तीसरे दिन पूरे घर को लीपा-पोता जाता है। इस दिन मृतक के रिश्तेदार हल्दी के साथ एक बोतल शराब लेकर मृतक के घर जाते है। यहां सबका भोजन होता है, तीन दिनों तक जिस स्थान पर मृतक ने अंतिम सांस ली थी। उस जगह पर दाल भात छिटककर मृतात्मा को भोजन कराया जाता है।

तीसरे दिन श्मशान घाट में जाकर मृतक भोजन कराया जाता है, भोजन में मछली, केकड़ा, एक बोतल शराब महुआ के साथ मृतात्मा को होम दिया जाता है। मछली केकड़ा मृतक के अंतिम संस्कार वाले स्थान में रखा जाता है। महुआ के शराब से तर्पण करते है। शेष बची शराब वही पर पंच लोग पी जाते हैं, घर आकर गांव के लोग मिलकर शराब पीते है।

तीज नहावन के दिन अस्थि विसर्जन के लिए उसके शरीर की समस्त अस्थियों में से ठोढी और घुटने की हड्डी को निकाल कर नदी में प्रवाहित किया जाता है तथा उसके साथ सरसों तेल को भी नदी में प्रवाहित किया जाता है यदि तेल नदी में बह जाता है तो शुभ माना जाता है और प्रवाहित नहीं तो अपशकुन माना जाता है।

दशगात्र की तैयारी

बैगाओ में नहावन (किर्याक्रम) सामर्थ्यनुसार किया जाता है। नेतगार और गांव के सयाने पहले सलाह करते है कि पन्द्रह दिन, छः माह या एक वर्ष में कभी भी संस्कार किया जाता है। घर का मुखिया यथास्थिति पंचों के आगे कबुल करता है और पच लोग तिथि तय करते है। इसी मांदी (पंचों के बैठक) में मुकद्दम (पटेल) घर के मुखिया को यह सलाह देता है कि नहावन संस्कार के लिए एक बोरा महुआ पंचों की आज्ञा मानकर घर मालिक ब्यवस्था करता है।

टोला भर में दो-दो, चार-चार किलो महुआ बाट दिया जाता है, जिससे मंद (शराब) बनाई जाती है। गांव के युवाओं को पतरी बनाने के लिए कहा जाता है। जंगल से महलोंन (मोहलाईन) के पत्ते तोड़कर लाने और उससे पत्तल बनाने को क्रिया को पतरी खिलना चाहते है। इसके लिए हर कोई सहायता करता है।

मृतक के नहावन क्रियाकर्म में किसी प्रकार के गीत नही गाए जाते है। लेकिन इस अवसर पर नगाडा बजाना अनिवार्य है। पंचों की इसी बैठक में नगाडा वाले को भी आमन्त्रित किया जाता है। नगाड़े वाला गांव में प्रवेश करते ही नगाडा बजाने लगता है। नगाड़े के बजते ही लोग समझ जाते हैं कि गांव में कही न कही-कही नहावन क्रियाकर्म होने जा रहा है। बैगा जनजाति में नहावन तीन प्रकार से किया जाता है, मादी नहावन, मेली नहावन ओर उजरी नहावन।

मांदी नहावन-

संस्कार में सभी गांव वालों और नाते रिश्तेदारों को न्योता दिया जाता है। नहावन के दिन प्रातः काल घर की राख कचरा ओर बर्तनों में रखे पानी को निकालकर गांव के बाहर फेंक दिया जाता है। घर के चारो कोने लीपे पोते जाते हैं। घर मालिक दो बोतल मंद निकलता है, कुछ मंद में हल्दी तेल मिलाकर घर मे छींट दिया जाता है इससे घर पवित्र हो जाता है। शेष शराब घर के सयाने आंगन में बैठकर पीते है, नगाडा बजता रहता है।

नदी स्नान करती बैगा महिलाएं

इसके बाद घर का लड़का आठ बोतल शराब निकलता है, दो बोतल शराब सयानींन और घर को औरतों को दी जाती है जो नदी पर स्नान के लिए जाती है। पुरूष शराब की बोतल एक मुर्गी ओर चावल लेकर श्मशान भूमि में जाते हैं, श्मशान में जाकर चिता या समाधि के आसपास सभी लोग बैठ जाते हैं। चिता या समाधि के चारो कोने पर चार पत्थर रख दिये जाते है राख एकत्र कर सभी लोग अपनी अपनी शराब से तर्पण करते है, नगाडा बजता रहता है।

नगाडा वादक को गांव वाले नेग (दक्षिणा)देते है, समाधि हुई तो मंद को मिट्टी में सींचते है, जिस स्थान पर मृतक का अंतिम संस्कार होता है उस स्थान के आसपास कुछ चावल के दाने फैला देते है और उसे मुर्गी को चुगाते है। अगर मुर्गी दाने चुग ले तो समझिए तर्पण लग गया। इसके बाद सभी लोग थोड़ा थोड़ा खा चावल हाथ मे ले लेते है और शराब पीना शुरू कर देते है ऐसा मृतक की आत्मा को तृप्ति के लिए करते है।

श्मशान से सभी लोग नही आते है, आंवला की शाखाओं से दातुन करते है। घाट पर मृतक का लडका ओर उसके परिवार के लोग दाढ़ी ओर मूंछ मुंडवाते है, सिर के बाल सामने की ओर मुंडवाते है। पूरे बाल नही मुंडवाते है, परन्तु अब देखा-देखी मुंडवाने लगे हैं। चिता की राख और अस्थियों को नदी में प्रवाहित कर देते है।

सबसे बड़ा लड़का या घर का मुखिया नहाता है इसके बाद बचे सभी लोग नहाते है। घर लौटते समय सिक्के में थूक कर पीछे फेंकते। बिना देखे हुए आते है घर पहुचकर तुमड़ी के पानी से हाथ पैर धोते है। घर के महिलाएं भी स्नान करने जाती है, वहां पर विधवा को गुंदला के वृक्ष की दांतोंन करने के बाद महलांइन के पत्तो में हल्दी चावल रखकर दिया जाता है।

पत्तो में छिंद की बनी एक मुंदरी (अंगूठी) रखी रहती है पत्ते के पास ही विधवा बैठती है और गांव की अन्य महिलाएं उस पर पानी के थपेड़े मारती है। पानी के थपेड़े में कोई जीवजन्तू आ जाए तो समझ लो मृतक को स्त्री से अत्यधिक प्यार था। पत्तों को वही पानी मे विसर्जित कर दिया जाता है, इसका अर्थ है मृतक से विधवा का अब कोई सम्बद्ध नही है।

मैली नहावन-

सभी लोग मृतक के घर वापस आ जाते है, घर मे खाना बनता है। खाना बन जाने के बाद महलोंन के दोना में भात मंद ओर पानी रखकर गांव के बाहर जाकर मृतक का अंतिम भोज करते है। वहां से लौटने पर नेतगार मंद लेकर घर के अंदर जाते है, मृतक का लड़का भी पंचों को अपनी बोतल से मंद देता है। सभी पंच दौरी (समूह) में हाथ धोते है और भोजन का एक-एक कौर लड़के को खिलाते है, इसके बाद सभी लोग मृत्यु भोज करते है, इसे मैली मांदी कहते है।

उजरी नहावन-

प्रायः प्रत्येक घर से एक एक कूड़ा अनाज तथा एक बोतल मंद लिया जाता है। यह मदद सामुहिक रूप से होती है, इसे अलग रखा जाता है इसे “थनवई” कहते हैं। मेहमान के द्वारा लाया हुआ अनाज घर मालिक को लौटना नही पड़ता है। परंतु सहायता के रूप में लिए अनाज को घर मालिक को लौटना पड़ता है, इसका अलग हिसाब से रखा जाता है

यदि मृतक पुरुष है तो उसकी विधवा को देवर के नाम की “तरकी” (कान का गहना) पहनाते है, जेवर ओर नए गहने पहनाते है। घर के सदस्य भी नए कपड़े और गहने पहनाते है। पहनने के बाद विधवा व परिवार के अन्य लोग घर से बाहर निकलते है, सबके पैर पड़ते है तो पंच आशीर्वाद देते है, नगाडा बजता रहता है।

इसी अवसर पर नगाडा वादक को पाँच छः कूड़ा धान नेग में दिये जाता है और नगद राशि भी दी जाती है। आजकल पांच से छ: हजार रुपए लग जाता है। नगाड़े की थाप और थाली की टंकार के साथ सभी महिला पुरुष नाचते है, रात्रि भोजन के बाद सभी लोग अपने अपने घर चले जाते है। घर के मुखिया बहन और बहनोई को लौटते समय कपड़ा, बछिया आदि मृतक के नाम से दान पुण्य में देते है। नवजात शिशु के मरने पर उसे घर मे ही गाड़ दिया जाता है उसके कब्र के उपर दो माह तक दीपक जलाते है।

आलेख एवं चित्र

गोपी सोनी, लेखक पत्रकार, कुई-कुकदूर कवर्धा

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One comment

  1. मनोज पाठक

    बहुत अच्छी जानकारी.. सोनी जी को साधुवाद 💐

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