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इतिहास जानने का प्रमुख स्रोत छत्तीसगढ़ की लोक कथाएं

छत्तीसगढ़ के भू-भाग से मानव सभ्यता का इतिहास जुड़ा हुआ है। इस संदर्भ के पुरातात्विक साक्ष्य मिलते हैं। धार्मिक और पौराणिक ग्रंथों में छत्तीसगढ़ का उल्लेख मिलता है। सभ्यता की शुरूआत होने का यहां संकेत मिलता है। इसे ऋषि-मुनियों की तपोस्थली भी कहा गया है। जीव जंतुओं और वनस्पतियों की दुर्लभ प्रजातियां यहां मौजूद हैं। जीवन के आधारभूत तत्व यहां विद्यमान हैं।

जब आदिम मानवों के बीच सभ्यता की छाप पड़ी, तब से संवाद, बोली और जीवन की कथाएं चल पड़ीं। कालान्तर में कथाएं परिमार्जित होती चली गईं। जो वाचिका परंपरा के रूप में लोगों के बीच होते हुए आज हमारे समक्ष है। इन लोक कथाओं में जीवन के हर तथ्य मिलते हैं तथा ये इतिहास जानने का प्रमुख स्रोत भी हैं।

प्रकृतिजन्य सहज जीवन में घटनाएं घटीं। परिवेशजन्य विषमता से मानव ने कुछ सीखा। जिज्ञासा की ललक से विकास के द्वार खुले और ऐसा ज्ञान एक दूसरे तक पहुंचता चला गया। छत्तीसगढ़ की जनजातियों ने अपनी उपस्थिति का इतिहास भी बनाया। जीवन, परिवेश, प्रकृति से उबरते हुए उल्लासित मन ने भावनाओं के अनुरूप संवाद में चित्रित किया। ऐसा ही संवाद पीढ़ी दर पीढ़ी निरंतर चला, परिमार्जित हुआ, जिनमें किवदंतियां, लोककथा, लोक गीत, लोकोक्तियां बनीं जो आज हमारे बीच हैं।

छत्तीसगढ़ की सभ्यता, संस्कृति अनूठी है। इसी संस्कृति के विविध आयामों में जनजीवन का इतिहास परिलक्षित होता है। इसकी झलक लोक कथाओं में मिलती हैं।

अनेक जनजातियों को अपने आगोश में समेटे छत्तीसगढ़ की लोक कथाएं अद्भूत सौंदर्य लिए हुए हैं। लोक कथाओं में जनजातियों के उत्पत्ति की झलक है। वहीं पृथ्वी पर शुरूआती जीवन दुर्लभ घटनाएं हैं। आदिम जीवन संवैदिक युगीन छाप यहां की लोक कथाओं में मिलती है। धरती के महा जलप्लावन के साथ रामायण और महाभारतकालीन घटनाओं से प्रेरित लोक कथाओं का विपुल भंडार है।

वाचिकापरंपरा से ऐसी लोककथाएं इसलिए हमारे बीच हैं क्योंकि उन्हें धार्मिक क्रियाकलाप, लोक संस्कृति व परंपरा में पिरो दिया गया। छत्तीसगढ़ के विभिन्न भागों में रहने वाले निवासियों ने इन कथाओं के बीच अपनी पहचान भी कायम रखी है। लोक गाथाओं की विषयवस्तु, नायकों का चरित्र, आंचलिक परिवेश को उजागर करता है। जिसमें अंचल का भूगोल, परिस्थितियों, प्राकृतिक परिवेश, इतिहास, धर्म, परंपरा के साथ जनजीवन का उल्लेख मिलता है।

वर्तमान छत्तीसगढ़ का भू-भाग सिमटा हुआ है। जिसका विस्तृत स्वरूप प्राचीन ग्रंथों में कोसल जनपद के रूप में मिलता है। कोसल में वर्तमान उड़ीसा, मध्यप्रदेश के कुछ भू-भाग समाहित थे। इसी के साथ कतिपय ऐसी लोकगाथाएं भी हैं जो अपने मूल स्थान से अतिक्रमण कर छत्तीसगढ़ आ गईं। जहां ऐसी लोकगाथाओं की कथावस्तु सहित भूगोल, जाति,भाषा और संस्कृति, छत्तीसगढ़ की अस्मिता की पहचान बन गई। इन लोकगाथाओं में ढोलामारू, लोरिक चंदा, दसमत कइना, चरणदास चोर इत्यादि हैं।

छत्तीसगढ़ की दो प्राचीन जातियां शबर और निषाद हैं। शबरों को लोक देव भगवान जगन्नाथ से जुड़ी अनेक लोकगाथाएं हैं। शबरों की मूल संस्कृति, परंपरा और धार्मिक अनुष्ठान की छाप नेपाल में दिखती है। लामा संप्रदाय और शबर तंत्र से जुड़ी लोक गाथाओं में इसका विवरण मिलता है।

निषादों का छत्तीसगढ़ में वर्चस्व मिलता है। यह जाति केवल केंवट के नाम में सिमट गईं हैं। यास्क मुनि ने इनके बारे में कहा है- चात्वार वर्णा पंचमो निषाद। अर्थात चार वर्ण के अलावा निषाद भी एक थे। जल से अपना जीवन यापन करने वाले निषादों का विस्तृत साम्राज्य रहा है। आर्यों के साथ उनका सहयोग सराहनीय रहा। दक्षिण की असुर जाति से युद्ध में साथ दिया। रामायणकाल में निषादराज का उल्लेख मिलता है। निषादों से जुड़ी कई किवदंतियां प्रचलित हैं। छत्तीसगढ़ के वर्तमान बिलासपुर को बिलासा नामक केंवटिन ने बसाया था।

महाजलप्लावन की लोकगाथा, बैगा और गोंडों में मिलती है। खेती की शुरूआती तकनीक, संगीत की उत्पत्ति, कोसा (रेशम, के कपड़े बनने की शुरूआत वहीं, गोदना का चलन कैसे आरंभ हुआ, इन सब की लोककथाएं मिलती हैं। लोकनृत्य की विविध विधाओं का प्रारंभ कैसे हुआ इस पर भी कथाएं हैं।

वनवासियों की अनेक जातियां एवं उपजातियाँ हैं। इनके शिकार को लेकर कई किवदंतियां हैं। बस्तर की उरांव जाति की लोकथा में रामायणकाल का संदर्भ आया है। उरव ने राम-रावण युद्ध में राम का साथ दिया था। लोकगाथा के अनुसार हनुमान आंजन गांव के पुत्र थे। जिनकी माता का नाम अंजनी था। इसलिए उनका एक नाम अंजनी पुत्र भी पड़ा।

गोंड़ों की 53 प्रजातियां हैं, जो मूलतः बूढ़ादेव (महादेव, को अपना आराध्य मानती हैं। भूगर्भशास्त्रियों के आधार पर विंध्याचल के निवासी गोंड़ कहे गए हैं। बस्तर की गोंड़ जनजातियों को द्रविण भाषा के परिवार से संबंधित मानते हैं। गोंड़ स्वयं को गोंड़ नहीं, बल्कि कोयतुर कहते हैं।

मुरिया जनजाति गोंड़ों की एक उपजाति है। लोकगाथा के अनुसार दंडकारण्य में तुलाडोंगरी में भकिया राक्षस का राज था। वनवास काल में राम यहां आए थे। मुरिया लोगों ने राक्षस को मारने का अनुरोध किया। राक्षस का संहार करने के बाद उसका राज्य किसे सौंपा जाए, राम ने मुरिया मुखिया से पूछा, तुम्हारे वंशज इस अंचल में कब से हैं। मुरिया मुखिया ने कहा- प्रभु, जब से संसार बना तभी से हमारे पूर्वज अर्थात मुर दिन से यहां निवास कर रहे हैं। भगवान राम ने उन्हें तब मुरिया कह कर संबोधित किया। मुरिया जनजाति की उत्पत्ति सृष्टि के प्रारंभ से कही गई है।

बस्तर की भतरा जनजाति की लोक गाथा में भतरा अपना संबंध भरत से मानते हैं। राम के भाई भरत के काल का भरत अपने आपको कहते हैं। मड़िया, हलबा, धुरवा, दोरला, आदि जनजातियों की उत्पत्ति की लोकगाथा आज भी प्रचलित है। बस्तर में लौह शिल्प, घड़वा शिल्प इत्यादि से संबंधित लोक कथाएं हैं।

महाभारत काल से जुड़ी अनेक लोकगाथाएं विभिन्न जनजातियों में प्रचलित हैं। बहेलिया, पारधी, मरकाम, छेदान आदि की कथाओं में इस काल का उल्लेख आया है। बहेलिया एक शिकारी जाति है। लोकगाथा में कहा गया है। कि बहेलिया का एक तीर अनजाने में श्रीकृष्ण के पैर में जा लगा। जिसके कारण श्रीकृष्ण को अपना प्राण त्यागना पड़ा। बहेलियों ने तब से तीर कमान से शिकार करना बंद कर दिया। यह जनजाति आज भी फंदा डाल कर शिकार करती है।

कोरवा जनजाति अपने को एकलव्य का वंशज मानती है। जो तीर चलाने में अंगूठे का इस्तेमाल नहीं करते। मोरध्वज राजा की नगरी में श्रीकृष्ण ने राजा की परीक्षा ली थी। राजा-रानी ने अपने पुत्र को आरे से चीरा था। भगवान की परीक्षा में राजा सफल हुए तब से यहां आरा का प्रयोग वर्जित रहा था।

सरगुजा, रायगढ़, जशपुर और बिलासपुर जिले के वन्य क्षेत्रों में पहाड़ी कोरवा और डीह कोरवा जनजातियां रहती हैं। इनसे जुड़ी अनेक कथाएं हैं। खैरवार, पांडो जनजाति की लोकगाथाओं में इतिहास के विभिन्न तथ्य मिलते हैं। बिंझवार की उत्पत्ति कथा बारह भाइयों से जुड़ी है। कोरकू जनजाति की गाथा ढोला मारू प्रसिद्ध है। राजस्थान मूल की यह लोक कथा छत्तीसगढ़ से ओतप्रोत है। मालवा, गुजरात की लोक कथा दसमत कइना एकतरफा प्रेम की कथा है।

ऐसी लोक कथा महादेवन और दसमत की है। जिससे जुड़ा इतिहास दुर्ग से राजनांदगांव तक मिलता है। छत्तीसगढ़ की चर्चित प्रेम कथा लोरिक चंदा पशुपालक समाज को चित्रित करती है। ठीक ऐसी ही लोक कथा मैथिली, मगही, अवधी औी भोजपुरी में भी मिलती है। कचना-धुरवा की लोक कथा छत्तीसगढ़ की है। वहीं कामकंदला लोक कथा का परिवेश छत्तीसगढ़ तो है लेकिन इस कथा को अनेक भाषाओं में विद्वानों ने लिखा है।

ऐतिहासिक तथ्यों को समेटे लोकगाथा का संसार बड़ा विचित्र है। शिवरीनारायण और जांजगीर के मंदिर निर्माण की लोकगाथा ऐसी ही है। कहा गया है कि छैमासी रात में दोनों मंदिर का निर्माण एक साथ प्रारंभ हुआ था। शिवरीनारायण का मंदिर बन गया। जांजगीर का मंदिर अधूरा रह गया, जिसे नकटा मंदिर कहा जाता है। इस मंदिर के शीर्ष का भाग आज भी बना हुआ नीचे रखा है। कथा भले ही कल्पित प्रतीत होती है लेकिन गौर करने वाली बात है कि क्या इस तरह उस काल में मंदिर बनाए जाते थे? ऐसी कथाएं पुरातत्व स्थल की खोज में एक महत्वपूर्ण कुंजी है। लोकगाथाओं के माध्यम से अन्वेषण करने की जरूरत है।

छत्तीसगढ़ में शक्ति पूजा की प्राचीन परंपरा रही है। शिवरीनारायण, रतनपुर, दंतेवाड़ा, बालोद, धमतरी, सिंगारपुर, तुरतुरिया, रायगढ़, अंबिकापुर, सरसींवा इत्यादी जहां भी प्राचीन जहां भी प्राचीन देवी के मंदिर हैं, इनसे जुड़ी लोक गाथाएं भी हैं। ऐसी लोक गाथाओं में देवी का उद्भव, मंदिर निर्माण और धार्मिक अनुष्ठान, परंपरा के तथ्य मिलते हैं। बिंझवार जनजाति अपनी उत्पत्ति भगवती विंध्यवासिनी देवी से मानते हैं।

देवी-देवताओं सहित भूत-प्रेत, जादू-टोना से संबंधित अनेक चमत्कारिक लोक गाथा आज भी सुनी व सुनाई जाती है। भूतों के नाम पर घाटगोसन, देवगुन राउत, तेलिया मसान, कोल्हू परधान, मुरखोरी मसान, भइसासुर, गूंगापीर इत्यादि प्रचलित हैं। जादू के नाम पर टोनही, परेतिन की कहानियां बड़ी सरस हें।

पंचतंत्र की शैली में भी छत्तीसगढ़ की अनेक लोकगाथाएं हैं। वहीं छत्तीसगढ़ के मुहावरो को ले कर भी और जानवरों के स्वभाव को जोड़ कर लोकगाथाएं मिलती हैं। ऐसी लोकगाथाओं में शेर शक्तिशाली परंतु मूर्ख, हाथी शीलवान और दानवीर, भालू की अपेक्षा मनुष्य कृतघ्न और सियार को चतुर शैतान कहा गया है।

मेला-मड़ई के लिए छत्तीसगढ़ प्रसिद्ध है। नारायणपुर की मावली मड़ई विश्वप्रसिद्ध है। पलारी के समीप रणबौर की मड़ई के बाद छत्तीसगढ़ में सिलसिला प्रारंभ होता है मड़ई का। रणबौर मड़ई से जुड़ी लोक गाथा है। गाय ने शेर को वचन दिया था कि वह अपने बछड़े को दूध पिला कर वापसी आएगी। जब गाय वापस आई तब शेर का हृदय परिवर्तन हो गया। यह लोकगाथा कई क्षेत्रों में मिलती है।

नदियों, पहाड़ और तालाबों की अद्भुत लोक गाथाएं हैं। ऐसी कथाओं में कहीं इतिहास, कहीं परंपरा तो रीतिरिवाजों की झलक भी मिलती है। राजिम में महानदी संगम है। नदी में मामा-भांचा एक साथ नौकायन नहीं करते।

अमरकंटक में नर्मदा नदी की लोकगाथा नदी उद्गम को मानवीय संवेदना के साथ जोड़ती है। लोक गाथा में नर्मदा राजकुमारी और सोन राजकुमार है। जोहिला राजकुमारी की सहेली है, जिसकी ओर राजकुमार आकर्षित हो जाता है। राजकुमार के व्यवहार से क्षुब्ध हो कर नर्मदा पहाड़ से कूद कर अपने प्राण त्याग देती है। यह देख कर सोन ने भी अपने प्राण त्याग दिए और जोहिला का भी अंत ऐसा ही होता है। आज भी नर्मदा और सोन नदी का बहाव विपरीत दिशा में हैं। कहानी के कथानक से यही उजागर होता है।

तालाबों से जुड़ी अनेक लोक गाथाएं छत्तीसगढ़ में बिखरी पड़ी हैं। हर बड़े तालाब के साथ एक-एक कथा मिलती है, जिनमें तालाबों के साथ एक-एक कथा मिलती है, जिनमें तालाबों का इतिहास और तत्कालीन परिवेश झलकता है।

प्रेम प्रधान लोकगाथाएं और मध्य युग की वीर गाथाओं को लोक गीतों में संजोया गया है, जिसे लोक कलाकार मंचों पर सुनाया करते थे। देवार जाति के लोक कलाकार रूंझू बजा कर राजा कल्याण साय की कथा सुनाते थे।

लोरिक चांदनी, सरवन गीत और बोधारू गीतों की शैली भी लोक गाथाओं के समान है। धार्मिक और पौराणिक गाथाओं में पंडवानी का प्रारंभ परधान जाति ने शुरू किया। महाभारत के पात्रों को ले कर पंडवानी गायन आज विश्व प्रसिद्ध है। तीजन बाई का पंडवानी गायन अनेक देशों में चर्चित भी हुआ।

प्राचीन धरा छत्तीसगढ़ अपनी अनमोल धरोहर को समेटे हुए है जिसकी लोक कथाओं में ऐतिहासिक तथ्यों से कहीं अधिक यहां की परंपरा, संस्कृति और रीतिरिवाज के साथ मानवीय संवेदना भी झलकती है। कहीं-कहीं मानव व्यवहार के ज्ञान को उकेरती है। छत्तीसगढ़ की लोक कथाओं को जान, सुन कर उसकी अस्मिता को भलीभांति जाना जा सकता है। बिखरी हुई लोक कथाओं को समेट कर उनसे प्रेरणा ले सकते हैं। जैसे आदिम मानव ने मिट्टी से बर्तन बनाने की कला प्रकृति से सीखी।

आलेख

श्री रविन्द्र गिन्नौरे
भाटापारा, छतीसगढ़

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