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बाबा बच्छराज कुंवर एवं जोबा पहाड़ की पुरा सम्पदा

सरगुजा सम्भाग मुख्यालय से लगभग 80 कि0मी0 दूर बलरामपुर नये जिले के अन्तर्गत चलगली मार्ग में वाड्रफनगर विकास खण्ड के अलका ग्राम पंचायत के आश्रित ग्राम मानपुर में ग्रामीणों की अटूट श्रद्धा के आराध्य देव ‘‘बाबा बच्छराजकुवंर‘‘ विराजमान हैं। मानपुर से 5 कि0मी0 दूर ‘‘जोबा पहाड़‘‘ अपना सीना ताने खड़ा है। इस पहाड़ी पर अज्ञात इतिहास का रहस्य छुपा हुआ है। इसे देखने से ऐसा लगता है कि पहले यहाँ कोई महान् प्रतापी राजा ने राज्य किया होगा।

लगभग चारों तरफ पुरातात्विक अवशेष, पुराने किले का अवशेष, मूर्तियाँ शिवलिंग बिखरी पड़ी हैं। जियोलाजिकल सर्वे आफ इण्डिया के भौगोलिक नक्शे में ‘‘फोर्टेस आफ वसराज कुंवर‘‘ का उल्लेख मिलता है 1। ऐसा माना जा सकता है कि वंशराज कुंवर नाम का कोई राजा रहा होगा, जिसका अपभ्रंश रूप ‘‘बच्छराज कुंवर‘‘ हो गया। ग्रामीणों की अटूट श्रद्धा के देव ‘‘बाबा बच्छराज कुंवर‘‘ की प्रतिमा देखने से भगवान विष्णु की चतुर्भुजी प्रतिमा है।

जोबा पहाड़ के चारो तरफ अवशेष, खण्डहर, मूर्तियाँ, किले, टीले, पत्थरों की नलियाँ आदि अपनी अज्ञात कहानी को बताती हुई उत्खनन एवं संरक्षण की राह जोह रही हैं। छत्तीसगढ़ शासन इस दिशा में सार्थक पहल करे तो निश्चित ही भारत के इतिहास में एक नया स्वर्णिम इतिहास जोड़ेगा ‘‘जोबा पहाड़‘‘।

‘‘जोबा पहाड़‘‘ में बिखरी पुरावशेष बरबस ही मन को मोह लेते हैं। इस पहाड़ पर अनेक शाक्त और शैव सांप्रदाय की देवी देवताओं की मूर्तियाँ यत्र-तत्र बिखरी पड़ी हैं। यहाँ की मुख्य प्रतिमा ‘‘बाबा बच्छराज कुंवर‘‘ की है।

बाबा बच्छराज कुंवर की प्रतिमा (चतुर्भुजी विष्णु)

बाबा बच्छराज कुंवर की प्रतिमा – यह दुर्लभ प्रतिमा काफी प्राचीन है, जो पुरातात्विक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। बच्छराज कुंवर स्थानीय लोगों के स्वयंभू देव हैं। यह चतुर्भुजी प्रतिमा लगभग 4.5 फुट ऊँची शिलाखण्ड में बनी हुई है। इसकी दो भुजाएँ खण्डित हैं तथा शेष दो भुजाओं में दाहिने हाथ में गदा और बायें हाथ में शंख लिए हुए हैं। इस मूर्ति के मुख वाला हिस्सा छिला हुआ दिखता है। सिर के बाल जुड़े के रूप में बँधा हुआ कंधे तक बिखरा है। कानों में कुण्डल जनेऊ एवं धोती पहने हुए दिखता है। इस मूर्ति के पैरों के पास दो मानव आकृतियाँ उत्कीर्णित हैं, जो नारी प्रतिमा जैसी प्रतीत होती है। इन सभी प्रतीकों से यह प्रतिमा भगवान विष्णु की लगती है।

आसनस्थ प्रतिमा – बच्छराज कुवंर की प्रतिमा के पास में पालथी मारे एक पुरूष की प्रतिमा है। इसे ग्रामीण लोग साधू की प्रतिमा बताते हैं। सम्भवतः यह प्रतिमा संन्यासी (उपासक) की है। शिवलिंग एवं नन्दी की प्रतिमा – तमाम मूर्तियों के बीच में एक शिवलिंग एवं खण्डित रूप में नन्दी की भी प्रतिमा रखी हुई है। इससे यह स्थल शैव सम्प्रदाय से संबंधित भी प्रमाणीत होता है।

रानी की प्रतिमा – बच्छराज कुंवर की प्रतिमा से लगभग एक हजार फुट ऊँचे जोबा पहांड़ की एक लम्बी पर्वत श्रृंखला है। यहीं गोल पहाड़ी पर रानी की खण्डित मूर्ति है। इस स्थल तक पहुँचने वाला रास्ता काफी दुर्लभ है। यह रास्ता लगभग दो फुट चौड़ा विशाल चट्टान को काट कर बनाया हुआ लगता है। इसी दुर्गम रास्ते से उपर समतल पाट पर चढ़ते समय दायें एवं बायें किनारे भी पत्थर की सुरंग रक्षकों के छुपने के लिए बना हुआ है। यह चढ़ाई अंग्रेजी की ‘‘टी‘‘ अक्षर की तरह है। इसमें छुप कर रक्षक लोग पहाड़ी के समतल पाट पर चढ़ने वाले शत्रुओं का वध आसानी से करते रहे होंगे ऐसा लगता है। पहाड़ी के उपर मैदानी भाग में ग्रामीणों का स्वयंभू देव के रूप में बाबा बच्छराज कुंवर की रानी की खण्डित मूर्ति एक स्तंभ के सहारे टिकी हुई है। यह प्रतिमा भी देवी की प्रतीत होती है। कमर के पास खण्डित पूर्वाभिमुखी प्रतिमा 6 फुट ऊँचे स्तंभ के साथ टिकी है। यह स्तंभ भी नक्काशीदार है। इस प्रतिमा के पाँव के पास किसी चौपाये की आकृति जैसी दिखती है। इसके मुख के पास एक छोटी सी मूर्ति उकेरी गई है। जिसके बाल (केश) देवी के हाँथ में हैं। इस मूर्ति के कंधे पर देवी त्रिशुल से प्रहार करती हुई मुद्रा में दिखाई देती थी, किन्तु वर्तमान समय में हाथियों के उत्पात से ये मूर्तियाँ क्षतिग्रस्त हो गई हैं, जो स्पष्ट नही दिखती हैं।

किले एवं मंदिर के अवशेष – दुर्गम चढ़ाईदार पहाड़ी के उपर पत्थरों की मजबूत दीवार वृत्ताकार रूप में दिखती है। जनश्रुतियों एवं बिखरी मूर्तियों से ज्ञात होता है कि इस पहाड़ी पर किले एवं मंदिर का निर्माण कराया गया रहा होगा।

टीले एवं खण्डहर – बच्छराज कुंवर की प्रतिमा के समीप एक दुधिया रंग का एवं एक स्वचछ जल का नाला बहता है। इस नाले के समीम काफी प्राचीन खण्डहर एवं पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं। इन खण्डहरों में खाँचेदार पत्थर देखने को मिलते हैं। इन पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए खाँचे बनाये गये होंगे। कुछ पत्थरों को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि शायद उन्हे दरवाजे के अगल-बगल, नीचे एवं उपर लगाया गया रहा होगा। यहीं पर काफी प्राचीन ईंटे भी बिखरी हुई हैं।

इस स्थल पर प्राचीन अनेक टीले भी हैं। ये टीलें गढे़ हुए पत्थरों से ढ़ँका हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ पर पत्थरों के सहारे महलों का निर्माण किया गया रहा होगा।

चोर चोरनीन की प्रतिमा – दुधिया नाले के ठीक उपर एक गुफा मे ढ़ेर सारी तमाम मूर्तियाँ बिखरी पडी हुई हैं इन प्रतिमाओ के गॉव के लोग चोर चोरनीन की प्रतिमा बताते हैं ।

पत्थरों से निर्मित नालियाँ – बच्छराज कुंवर की प्रतिमा के समीप पत्थरों से निर्मित अनेक नालियाँ टुकड़े-टुकडे़ में देखने को मिलती है। इन्हे उपर जलाशय से टीले तक जोड़कर लाया गया है। ऐसा लगता है कि इन्ही नालियों से महल तक पानी लाने का काम किया जाता रहा होगा। ग्रामीण लोग इन पत्थरों के टुकड़ों को बच्छराज बाबा के प्रहरी सर्प बतलाते हैं।

पेयजल हेतु प्राकृतिक जल श्रोत – धर्मिक एवं ऐतिहासिक पुरातात्विक स्थल बच्छराज कुंवर के समीप पेयजल के उद्देश्य से शासन द्वारा बोर कराया गया तो जल की अविरल धारा निकलने लगी जो वर्तमान समय में भी बारहों महीने बहती रहती है।

किवदंती एवं जनश्रुतियाँ – जोबा पहाड़ (बच्छराज कुंवर) के संबंध कोई ठोस प्रमाण तो नही मिलता है। यहां बिखरे पुरातात्विक अवशेषों, खण्डहर एवं कलात्मक मूर्तियाँ आठवीं से दसवीं शताब्दी के बीच डीपाडीह शिल्प कला से मिलती-जुलती प्रतीत होती हैं। जनश्रुति एवं ग्रामीणों की मान्यताओं के आधार पर इतिहास की गहराई तक पहुँचा जा सकता है। इस स्थल के सम्बंध में अनेक किवदंतियाँ प्रचलित हैं। किवदंतियों के आधार पर यह तथ्य तो स्पष्ट है कि यहाँ कोई महान प्रतापी राजा ने राज्य किया एवं महल मंदिर आदि का निर्माण कराया।

बच्छराज कवंर एवं किवदंतियाँ – बच्छराज कुवंर के संबंध में ग्रामीण लोग बताते हैं कि बच्छराज कुवंर सतयुग के एक महान प्रतापी राजा थे। वे अपने राज्य से एक राजकुमारी को अगुवा कर घनघोर जंगल ‘‘जोबा पहाड़‘‘ में सुरक्षा की दृष्टि से लाये थे। इसी पहाड़ पर वे सैनिकों की छावनी बनाकर रहने लगे। इसी पहाड़ पर एक बड़ा साँप भी था जो राजा का प्रहरी था। एक दिन राजा ने अपने सैनिकों के साथ पहाड़ के नीचे उतरा तो कुछ खतरनाक लुटेरों ने राजा एवं सैनिकों की हत्या कर रक्षक सर्प को भी कई टुकड़ों में विभक्त कर दिया। ये लुटेरे रानी एवं सैनिकां की भी हत्या कर सारा सामान लेकर भाग रहे थे। किन्तु कुछ दूर जाने के बाद नाले के समीप सभी लुटेरे पत्थर की मूर्ति बन गये। वर्तमान समय में भी नाले के समीप अनेक प्रतिमाएं बिखरी पड़ी हैं, जिसे ग्रामीण लोग चोर एवं चोरनीन की प्रतिमाएं बताते हैं।

जोबा पहाड़ महल के संबंध में किवदंतियाँ – मानपुर ग्राम के ग्रामीणों ने जोबा पहाड़ में बने महल के सम्बंध मे एक किवदंती बताया कि हजारों साल पहले जोबा पहाड़ में एक वीर योद्धा महान प्रतापी राजा ‘‘बच्छराज कुवंर‘‘ रहते थे। एक दिन देवताओं ने घोषणा किया कि ‘‘जो राजा अपनी रानी के साथ जोबा पहाड़ में एक ही रात में महल बनाकर दरवाजे पर दीपक जलयेगा उसको सुख, संवृद्धि तथा यष का आषीर्वाद प्राप्त होगा। बच्छराज कुवंर राजा ने यह चुनौती तो स्वीकार कर लिया किन्तु वे कुंवारे थे इस चुनौती को पूरा करने के लिए सीमावर्ती राज्य चन्दौरा की रूपवती राजकुमारी को भगाकर गंधर्व विवाह कर लिया।

घोषणानुसार राजा ने शाम होते ही अपनी रानी के साथ महल निर्माण कार्य प्रारंभ कर दिया। चंदौरा के राजा को जब अपहरण की सूचना मिली तो उसने युद्ध के लिए सैनिकों को जोबा पहाड़ भेजा। सभी सैनिक बच्छराज कुवंर के रक्षक पालतू सर्प से डर कर वापस चले गये। दूसरी बार राजा ने नयी युक्ति के साथ दूध एवं लावा (भुना हुआ धान) देकर भेजा सैनिकों ने पहले साँप को दूध एवं लावा दिया। साँप जब ग्रहण करने लगा तो सैनिकां ने उसे टुकड़े-टुकड़े में काट डाला। सर्प के मरने के बाद बच्छराज एवं सैनिकों के बीच जंग छिड़ गयी। इस युद्ध के दौरान सुबह हो गई। तथा महल भी अधुरा रह गया। देवताओं की चेतावनी के अनुरूप राजा-रानी एवं सैनिक पत्थर की प्रतिमा मे तब्दील हो गये। चन्दौरा के सैनिकों ने पत्थर के राजा एवं रानी के हाथ पांव, नाक एवं कान काटकर राजा के पास ले गया। इस किवदंती के अनुसार सभी दृश्य आज भी प्रतिमा के रूप में दृष्टीगोचर होती है।

अटूट श्रद्धा के देव बाबा बच्छराज कुंवर -¬ स्थानीय लोग उन्हें संरक्षक योद्धा के रूप मे पूजते हैं। श्रद्धालुओं में बाबा बच्छराज कुंवर के प्रति काफी जन आस्था हैं। बच्छराज कुंवर क्षेत्रवासियों के श्रद्धा एवं विष्वास के देव हैं यहां काफी दूर- दूर से लोग मनौती मानने आते हैं। मनौती पूर्ण होने पर बकरे की बलि चढ़ाते हैं। इस स्थल पर कुंवार नवरात्रि, चैत्र नवरात्रि एवं महाशिवरात्रि के अवसर पर मेला लगता है। आज पुरातात्विक ऐतिहासिक तपोभूमि बच्छराज कुंवर धार्मिक आस्था का केन्द्र बना हुआ है।

सुविधाओं का आभाव – छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक भूमि जोबा पहाड़ (बच्छराज कुवंर) तक सुगम रास्ते नही हैं। यहां ठहरने लायक कोई धर्मशाला भी नही है। इस धार्मिक स्थल पर पर्यटक लोग काफी दूर-दूर से आते हैं और परेशानियों का सामना करते हुए बाबा बच्छराज कुंवर का आशीर्वाद लेकर अपने घर को लौटते हैं। इस स्थल को पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित कर संरक्षण देने की आवश्यकता है।

मनोहारी प्राकृतिक रमणीय स्थल ‘‘जोबा पहाड़‘‘ की गर्भ में अनेक ऐतिहासिक रहस्य छुपे हुए हैं। साथ हीं बाबा बच्छराज कुवंर ग्रामीणों के मन एवं हृदय में काफी गहराई तक बसे हुए हैं। यहाँ की बिखरी पुरातात्विक अवशेष अपना इतिहास स्वमेव बखान करेंगे जब इस क्षेत्र में शासन स्तर पर शोध कार्य एवं खुदाई कराया जायेगा। यहाँ की ऐतिहासिकता को भले ही ख्याति नही मिल पायी है किन्तु धार्मिकता छत्तीसगढ़ सहित आस-पास के राज्यों तक फैली हुई है। जब यहाँ के वास्तविक इतिहास का पर्दाफाश होगा तो यह निश्चित है कि भारत के इतिहास में एक स्वर्णिम ऐतिहासिक अध्याय जोड़ेगा सरगुजा संभाग का ‘‘जोबा पहाड़।‘‘

आलेख एवं छायाचित्र

अजय कुमार चतुर्वेदी (राज्यपाल पुरस्कृत)
ग्राम – बैकोना, जिला – सूरजपुर (छ0ग0) 497223

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