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शौर्य और श्रृंगार का लोकनृत्य

कार्तिक एकादशी से छत्तीसगढ़ के गाँवों और नगरों की गलियों में उल्लास और आनंद से सराबोर राउतों की टोलियाँ अपने संग गड़वा बाजा की मनमोहक थाप पर झूमते-नाचते हुए जब निकलती हैं तब समझिये राउत समाज का देवारी पर्व प्रारंभ हो गया है। इस पर्व में राउत नाचा का आयोजन होता है। जो इस छत्तीसगढ़ का अद्भुत समूह लोकनृत्य है। यह पर्व उनकी पारंपरिक विरासत तो है ही साथ ही अंचल के लोकनृत्य और लोकसंस्कृति का अभिन्न अंग भी है।

छत्तीसगढ़ में राउतों की संख्या बहुत है। यह जाति अपने को यदुवंशी मानती है तथा भगवान श्री कृष्णजी को अपना पूर्वज। देवारी इनका मुख्य पर्व है। पौराणिक कथाओं के आधार पर कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन श्रीकृष्ण ने कंस के अत्याचारों से पीड़ित जनता को मुक्ति दिलाई थी तभी से यदुवंशियों ने मुक्ति का पर्व मनाते हुए इस उत्सव का आयोजन किया। कार्तिक एकादशी के दिन गांव भर के सारे राउत एकत्रित होकर, बाजे की धुन में लाठी ऊँची कर नाचने लगते हैं।

देवारी के दिन वे परम्परा के अनुसार सिर में धोती का पागा (पगड़ी) जो चमकीली मालाओं से सजी होती है साथ में मोर पंख की कलगी भी लगी होती है, चेहरे में वृंदावन की विशेष पीली या सफेद मिट्टी अथवा पावडर अभ्रक तथा आंखों में काजल और गाल में काजल से बनी डिठौनी, माथे पर चंदन टीका, गले में गेंदे या कागज के फूलों की माला, पीठ पर मोर पंख से बना झाल, कमर में घंटियाँ, पैरों में रंगीन जूते, घुटनों तक रंगीन मोजे, घुंघरु, घुटने के ऊपर तक कसा हुआ चोलना या धोती, रंगीन कुर्ता, चमकीले लेस से सजा जाकिट, कौड़ियों से बना कमरबंद और बाजूबंद, एक हाथ में तेंदु वृक्ष की सजी हुई लाठी तथा दूसरे हाथ में लोहे की फरी या ढाल इत्यादि से श्रृंगार कर इस शौर्ययुक्त वेशभूषा में जब राउत दल निकलता है तो लगता है जैसे श्रीकृष्ण की सेना आ रही हो। इनके साथ उत्साहवर्धन हेतु गड़वा बाजा होता है।

गड़वा बाजा बजाने वाले दल अधिकांशतः उड़िसा, सराईपाली, बसना से प्रतिवर्ष यहां कार्तिक एकादशी के समय आते हैं तथा नगर के एक निश्चित स्थान पर एकत्र होते हैं जहां पहुंचकर राउतों के दल उनके साथ मोल-भाव कर पन्द्रह दिनों या अपनी सुविधानुसार अपने साथ ले जाते हैं, गड़वा बाजा के प्रमुख वाद्य गुदुम-निसान, टिमकी, ढफली, मोहरी, डफड़ा, मांदर, ढोल, झांझ, मंजीरा इत्यादि होते हैं, तथा गड़वा बाजा के दल में परियाँ भी होती हैं जो साथ में नृत्य करते हुए चलती हैं ये परियाँ वास्तव में पुरुष होते हैं जो परियों की वेशभूषा धारण कर नृत्य करते हैं। इस पूरे दल को गोल भी कहते है। अपने देवता की विधिवत पूजा करने के उपरान्त जब वे घर से बाहर निकलते हैं, तब बड़ी मस्ती व जोश में रहते हैं।

राउत नाच की पूर्णता विभिन्न चरणों में सम्पन्न होती है। जिनमें ‘‘अखरा’’ या ‘‘अखाड़ा’’ जहां से राउत नाच का प्रारंभ होता है। यह ग्राम के बाहर दैहान में बनाया जाता है, कार्तिक एकादशी पर इस स्थान को गोबर से लीप कर बंदनवारों से सजाया जाता है तथा चारों कोनों में पत्थर गाड़ कर देवस्थापना के बाद नृत्य का अभ्यास किया जाता है। ‘‘देवाला’’ वह स्थान होता है जो राउत के घर में देव पूजन का स्थान होता है वहां दूल्हादेव की स्थापना कर अपने विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों की पूजा की जाती है। देवाला में पूजन के पश्चात् अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित होकर राउत जब देवाला से बाहर आता है तो वह एक विशेष भाव से अभिभूूत रहता है वह अपने भीतर अपने ईष्ट देव की अनुभूति करता है यही भाव ‘‘काछन’’ चढ़ना कहलाता है। कार्तिक एकादशी के दिन पलाश के तने से बनी रस्सियों की माला जिसे ‘‘सुहई’’ कहते हैं, उसे लेकर राउत अपने किसानों के यहां जाते हैं और गौधन की रक्षा हेतु उनके गले में सुहई बाँधकर दोहा पढ़ते हैं, इसके पश्चात् किसान के धान की कोठी में ‘‘सुखधना’’ देते है अर्थात् धान की कोठी की पूजा करते है। फिर किसान के आंगन में नृत्य का प्रदर्शन करते हुए दोहे गा कर किसान को आशीष देते है और फलस्वरुप धन, अन्न और वस्त्रादि प्राप्त करते हैं।

इस अवसर पर ‘‘मड़़ई’’ की स्थापना भी की जाती है यह मंडप का प्रतिरुप होता है जो बांस आदि से बना एक स्तंभ होता है जिसे रंगबिरंगे फूलों तथा चमकीले कागजों से सजाया जाता है और इसके शीर्ष पर मोरपंख आदि बांधकर श्रीकृष्ण का चित्र लगा देते है यह मड़ई राउत दल के साथ-साथ चलती है। एक मड़ई के आमंत्रण पर दूसरे स्थानों के मड़ई भी अपने दलों के साथ पहुंच जाते है, विभिन्न दलों के पहुंचने से मेला सा लग जाता है अतः यह ‘‘मड़ई मेला’’ भी कहलाता है। मड़ई के चारों ओर परिक्रमा करते हुए राउत दल नृत्य करते हैं। छोटे बच्चों को कृष्ण और बलराम के रुप में सजाकर उन्हें भी नृत्य में सम्मिलित किया जाता है। गाँवों और नगरों के साप्ताहिक हाट-बाजारों के अवसर पर ही मड़ई मेला का आयोजन किया जाता है। अंतिम चरण के रुप में बाजार का भ्रमण होता है इस ‘‘बाजार बिहाना’’ कहते है।

इस नाच को छत्तीसगढ़ के कुछ भागों में ‘‘गहिरा’’ अर्थात् ‘‘अहिरा नाच’’ भी कहते हैं। राउत जाति का मुख्य व्यवसाय गौ-पालन है। छत्तीसगढ़ के उत्तरीय भाग में राउतों का यह महोत्सव कार्तिक एकादशी से आरम्भ हो पूर्णिमा तक, और कभी-कभी दो-एक दिन बाद तक चलता रहता है। ये लोग जिन लोगों की गाय चराते हैं, उनके यहाँ सदल-बल नाचते हुए पहुंचते हैं और दुधारू गायों के गलों में ‘सुहई’ बाँध कर सूर, तुलसी, कबीर, हास्य-व्यंग्य के साथ सामाजिक संदेश और आशीर्वाद के दोहे पढ़ते हैं। यथा-
धन गोदानी भुंइया पावा, पावा हमर असीस।
नाती पूत लै घर भर जावे जीवा लाख बरीस।।
भावार्थ :- राउत आशीर्वचन बोलते हुए कहता है कि आपका घर गाय, भूमि, सम्पत्ति, पुत्र, नाती अर्थात् धन और जन दोनों से सम्पन्न हो जावे और आप इस संसार में इन सबका उपभोग लाखों वर्ष तक जीवित रहते हुए करें। ‘‘जीवा लाख बरीस’’ यह अंतःकरण से शुभकामनाओं की धारा मानों आलोड़ित हो बरबस निकली जा रही है। राउतों द्वारा यह दोहा दुधारू गायों को ‘‘सुहई या सुइहा’’ बांधकर कहा जाता है। इसे गौधन का रक्षा-बंधन कहा जाता है।

नदी तीर मा चन्दन रूखवा, जे तर माढ़े दइहान हो ।
डारा डारा में पंडरा बछुवा, पाल्हा बगर गय गाय हो ।।
भावार्थ :–नदी के तट पर चंदन का वृक्ष है उसके नीचे दईहान ( पशुओं का विश्राम स्थल ) है। उस चंदन-वृक्ष की डगालों की छाया में तो सफेद बछड़े़ विश्राम कर रहे हैं, किन्तु गैया इधर-उधर बिखर गई है।

भांठा देखेंव दुमदुमिया, उल्हरे देखेंव गाय हो ।
ओढे़ देखेंव कारी कमरिया, ओही ननद के भाय हो ।।
भावार्थ :– गांव के बाहर का भांठा (ऊँची सपाट भूमि) जो दुमदुमिया अर्थात् (सूखा, बिना कीचड़ का) है तथा जो गायों से भरा हुआ है और जो काली कमरी ओढ़े हुए हैं, वहीं मेरे ननद के भैया हैं, अर्थात मेरे पति हैं। इस प्रकार अपने प्रियतम का परिचय कैसे सुन्दर ढंग से दे रही है क्योंकि भारतीय नारी अपने पति का नाम नहीं लेती, परन्तु बड़ी चतुराई से उनका परिचय देती है ।

नील धोय न छूटिहैं, लोह न कंचन होय ।
कतको कपूर चराइये, कागा न हंसा होय ।।
भावार्थ :- जिस प्रकार धोने से नील का नीला रंग नहीं छूटता, उसी प्रकार से कौंऐ के ऊपर कितना भी सफेद कपूर का लेप लगाओ, वह हंस नहीं बन सकता।

कारे छेलना के घीव हरेंव, कपूर लगाये बाती ।
जऊन दिन ठाकुर जनम लिहिन, सोन बरस गय राती ।।
भावार्थ :- कारे छेलना (मिट्टी का काला बर्तन या घड़ा जिसमें घी रखा जाता है) से शुद्ध घी निकालकर और कपूर की आरती बाती सजाई गई क्योंकि जिस दिन भगवान कृष्ण का जन्म हुआ, उस दिन सोने की वर्षा हुई।

आगू कइहो मार-मार, पाछू धनुस चघाय ।
गाय कहौं सुपेता का, बाघ मार कर खाय ।।
भावार्थ :- पहले तो बाघ को देखते ही हिम्मत से ‘मार-मार’, ऐसा कह कर चिल्लाता हूं, और बाद में उसे सचेत कर धनुष में बाण चढ़ाता हूं। परन्तु मेरी सफेद ‘‘धंवरी’’ गैया तो मुझसे भी अधिक हिम्मती है। वह तो बाघ को मार डालती है, तब आराम से घास चरती है जैसे बाघ को मार डालना उसके लिए बाएं हाथ का खेल है।

आवत देवारी लुहलु हिया, जावत देवारी बड़ दूर ।
जा देवारी अपन घर, फागुन उड़ावे धूर ।।
भावार्थ :- दिवाली का सुंदर त्योहार वर्ष भर में एक बार आता है। परन्तु कब आकर और कब निकल जाता है, पता नहीं चलता। और फिर साल भर तक उसका रास्ता देखना पड़ता है। हे दिवाली त्योहार ! अब तुम विदा हो और फागुन को अपनी धूल उड़ाने दो।

लिखनी डोले कागद डोले, पतिया भेजा न जाय ।
सुध न आवे छतिया फटे, अंग अंग महकाय ।।
भावार्थ :- प्रियतम को पत्र लिखने के लिए तैयारी की जाती है। परन्तु उनकी मधुर याद आते ही मन में फटने लगता है, और अंग-अंग में पीड़ा समा जाती है। उस समय कलम व कागज दोनों कांपने लगते हैं, और पत्र नहीं भेजा जा सकता ।

छेना थापे फुटपुटिया, है तोर घुंघरालू केस ।
तैं तो गोरिया अपने सुन्दर, तोर धनी कौन बयेस ।।
भावार्थ :- छेना थापती हुई युवती से कहता है कि तेरे केश सुन्दर घुंघराले हैं और तू गोरी-नारी भी है। परन्तु तेरे पति की उमर (बयेस) क्या है? अकसर अनमेल ब्याह होते रहने के कारण कभी तो पति कम उमर का रहता है या कभी अधिक उमर वाला।

चिरई मा सुन्दर पतरेंगवा, सांप सुघ्घर मतिहार ।
रानी मा सुग्घर कनिका, मोहत है संसार ।।
भावार्थ :- जैसे चिड़ियों में पतरेंगवा पक्षी सुन्दर है, सांपों में मणिधर सर्प सुन्दर है, वैसे ही रानियों में सबसे अधिक सौंदर्य-शालिनी कनिका नाम की रानी है जिसके रूप को देखकर संसार मोहित हो रहा है ।

तेल चिकनियां फूल बंधना, गली चलावै तीर ।
इनकर भरोसा कोनों झन करिहा, एही मंगैया वीर ।।
भावार्थ :- जो सिर में बुलबुल छितराये एवं बालों में तेल लगाये, और उसमें फूल खोंसे हुए गली में से निकलते-निकलते नजरों के तीर चलाते चलते हैं। इन पर कोई विश्वास मत करना, ये तो भिखारियों के सरदार हैं। भीख मांगने के लिए तो दीन स्वरूप व दैन्य भाव चाहिये। परन्तु ये तो नजरों के तीर के बल से भिक्षा मांगने निकले हैं। बड़ी अनूठी कल्पना है।

कोरिया बीने पठोरिया, कोस्टा बीने रंग चीर ।
गढ़े सोनरवा बजनी पैरी, गवना के दिन तीर ।।
भावार्थ :- उसके द्विरागमन अर्थात् गौने के दिन समीप आ गये हैं तभी तो कोरी पठोरिया (रेशम का कपड़ा) तैयार कर रहा है, कोष्टा रंगीन साड़ी बुन रहा है और सुनार झंकार-युक्त पायल तैयार कर रहा है।

माखुर दिहे तमाखुर दिहे, वचन दिहे कठोर ।
काल परों ससुरे जावे, का गुन संवरौ तोर ।।
भावार्थ :- तुमने बड़े प्रेम से मुझे माखुर-तमाखुर (माखुर-तम्बाखु जिसे चोंगी/चिलम में भरकर पीते हैं, तमाखुर-तम्बाखु जिसे चूने के साथ मिलाकर खाते हैं) दिया और कभी प्रेम भरे कठोर शब्द भी कहे। अब दो-एक दिन में तुम ससुराल चली जाओगी, तब तुम्हारे गुणों को कैसे स्मरण करूॅंगा !

दीन दयाल विरीछ के वारौ, माता-पिता परान अधार ।
अंग गोर लला मोर देवर, सांवर कंत हमार ।।
भावार्थ :- जो गोरे रंग के हैं वे मेरे प्यारे देवर हैं तथा जो सांवले रंग के हैं वहीं रघुकुल- रूपी वृक्ष की प्रमुख शाखा है, अपने माता-पिता के प्राणों के आधार तथा मेरे पति हैं। रामायण की ये पंक्तियॉं उभर आती हैं जहॉं ग्राम वधुओं द्वारा पूछने पर सीताजी इशारे से कहतीं हैं ।

राजा जनक के छोकरी, भर लावत है नीर ।
ऐड़ी मांजत, मुख धोवत, निरखें बदन सरीर ।।
भावार्थ :- इस प्रकार बात करते हुए राजा जनक की सुकुमारी कन्या जानकी अपने घड़े में जल भरती हुई, ऐड़ी मांजती हुई, मुख धोती हुई नदी के स्वच्छ जल में अपना प्रतिबिम्ब देखने लगती है। इन पंक्तियों में एक चित्र आंखों के सामने आ जाता है जबकि बनवास के समय सीताजी स्वयं घड़ा लेकर नदी तट पर गई हों, वहां ग्राम वधुओं से भेंट हुई हों,और उनके पूछने पर कि साथ के नर-नाहरों में कौन तुम्हारे पति हैं, बड़ी चतुरतापूर्वक ‘‘सांवर-कंत-हमार’’ कह कर जल भरने में लग जाती हों। ‘‘निरखें बदन सरीर’’ से तो मानों जल में उनका प्रतिबिम्ब उभर कर आ गया हो, ऐसा लगने लगता है ।

कौन कुसल कहौ नाथ के, सुनो भरत बलवीर ।
सुन्दर-बदनि हरन भये, लक्षिमन सिंधु के तीर ।।
भावार्थ :- हनुमान और भरत मिलन का चित्र समक्ष आता है। हनुमानजी कह रहे हैं कि भगवान राम की कुशलता क्या वर्णन करुं अर्थात् कैसे वर्णन करुं? माता सीता का हरण हो गया है। जिसे खोजते-खोजते राम एवं लक्षमण सिंधु के किनारे पहुंच गये हैं।

गय बलरैया भीम बिन, गय अरजुन बिन बान ।
पोथी हेराये सहदेव बिन, राजा करन बिन दान ।।
भावार्थ :- भीम का पराक्रम, अर्जुन की बाण विद्या, सहदेव का शास्त्र ज्ञान एवं राजा कर्ण का दान संसार में प्रसिद्व है। उनके जाते ही उनके गुण भी संसार से विलीन हो गये।

जैसे तै लेहे देहे, वैसे देहौं असीम हो ।
दूधे नहावत पूते फलों, जीवव लाख बरीस हो ।।
भावार्थ :- जो भी आपने दिया-लिया उसे हम संतोषपूर्वक ग्रहण कर आशिर्वाद देते हैं कि आपके यहॉं दूध-दही की नदियॉं बहें, व पुत्र-पौत्र कुल-परिहार से आपका घर भरा रहे और आप लाख-लाख वर्ष तक जीते रहे। रावत अपने दलबल-साथियों के साथ नाचते-गाते हुए अपने मालिक के यहॉं आता है, मालिक उसे जो कुछ भेंट करता है, उसे स्वीकार करते हुए उपरोक्त आशीर्वचन कहता है।

संगत करले साधु के, भोजन करले खीर।
बनारस मां बासा करले, मरना गंगा तीर।।
भावार्थ :- साधु संतो की संगत कर लो और भोजन में खाओ खीर क्योंकि भोजन में खीर को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, उसी प्रकार निवास करना है तो बनारस काशी में रहो और प्राण त्यागो तो गंगा के पवित्र किनारे पर।

कृष्ण बाजत आवय बाँसुरी, उड़ावत आवय धूल।
नाचत आवय कन्हाई, खोंचे कमल के फूल।।
भावार्थ :- कृष्ण जी सुंदर मनमोहक बाँसुरी बजाते आ रहे हैं उनके आने से धूल उड़ रही है। कृष्णजी कमल का फूल खोंचे हुए हैं और नाचते हुए आ रहे हैं। कृष्ण जी के आगमन की सुंदर भावाभिव्यक्ति की गई है।

चित्रकूट के घाट पर, भय सन्तन की भीर हो।
तुलसी दास चंदन घिसय, तिलक लेत रघुबीर हो।।
भावार्थ :- चित्रकूट के घाट पर साधु संतों की भीड़ है वहां पर तुलसीदास जी बैठ कर चंदन घिस रहे हैं जिसका तिलक रघुवीर जी लगा रहे हैं।

कागा कोयली दुई झन भईया,
अउ बइठे आमा के डार हो।
कोन कागा कोन कोयली,
के बोली से पहचान हो।।

भावार्थ :- कौंआ और कोयल दोनों आम के पेड़ पर बैठे हैं, उनमें से कौन कौंआ है और कौन कोयल है इसकी पहचान कैसे होगी, तो वे कहते हैं कि उन दोनों की बोली से उनकी पहचान होगी।

इसी प्रकार राउतों के दोहे इन्द्रधनुषीय छटा युक्त होते हैं। जिनमें लोक मंगल की भावना के साथ-साथ श्रृंगार, प्रेम-विनोद, नीति-दर्शन, हास-परिहास, शौर्य, देशभक्ति, वीरभाव, युगीन संवेदना, पर्यावरण, सम्पन्नता-विपन्नता, पहेलियाँ इत्यादि अन्यान्य विषयक दोहे रचे गये तथा रचे जा रहे हैं, ऐसे ही कुछ और दोहे प्रस्तुत हैं-

  • चन्दरपुर के चन्द्रहासनी ल सुमरौं,
    डोंगरगढ़ बमलाई ल।
    रावणभाठा के बंजारी ल सुमरौं ,
    रायपुर के महाकाली ल।।
  • भरे गांव गितकेरा बाबू ,
    बहुते उपजे बोहार हो।
    पइयां लागव बंसी वाले के,
    झोकव मोरो जोहार हो।।
  • जै जै सीता राम के भैया,
    जै जै लक्षमण बलवान हो।
    जै कपि सुग्रीव के भईया ,
    कहत चलै हनुमान हो।।
  • सबके लाठी रिंगि चिंगी,
    मोर लाठी कुसवा रे।
    नवा नवा बाई लानेंव,
    उहू ल लेगे मुसवा रे।।
  • आगे देवारी तिहार रे भईया ,
    घर घर दिया जलाए हो।
    नवा नवा कपड़ा पहिने ,
    अउ घर आंगन सजाए हो।।
  • जय महामाई मोहबा के भईया,
    अखरा के गुरु बैताले ।
    चौसठ जोगनी जासल के भईया,
    भुजा म हो हौ सहारे।।
  • का संगत करे साधु के,
    दरदर ठोकर खाय।
    संगत करले बाढ़े बेटा के,
    जियत भर कमई खवाय।।
  • इस प्रकार के अनेकानेक दोहे राउत नाच के दौरान पढ़े जाते हैं। छत्तीसगढ़ की राउत जाति विभिन्न नामों से संबोधित की जाती है। यथा- राउत, रावत, ठेठवार, अहीर, यादव, यदु, अहिरा, पहटिया, बरदिहा, ग्वाला, गवली, गोहड़वार आदि। यह जाति अनेक उपवर्गों में विभाविज है जैसे- देशहा, कनौजिया, भेरिया, फूलझरिया, ठेठवार, कोशरिया, अठवारिया, दूधकंवरा आदि। इस वर्ग भेद के बाद भी यह जाति राउत नाचा के पर्व पर एकता और अखण्डता के सूत्र में आबद्ध रहती है तथा छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक वैभव को संरक्षित रखती है।
    जय जोहार जय छत्तीसगढ़

@ #डॉविवेकतिवारीबिलासपुरछत्तीसगढ़
संदर्भ – म.प्र. शासन द्वारा प्रथम ईसुरी पुरस्कार से सम्मानित लोक साहित्यकार पं. अमृतलाल दुबे जी की दुर्लभ कृति ‘तुलसी के बिरवा जगाय’ (1963)
छायाचित्र- रावत नाच महोत्सव, शनिचरी बाजार, बिलासपुर, डॉ विवेक तिवारी।

@डॉ. विवेक तिवारी, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 9200340414

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2 comments

  1. विवेक तिवारी

    सुग्घर प्रस्तुति भईया धन्यवाद सादर आभार🙏🙏🙏

  2. मनोज पाठक

    बेहतरीन आलेख.. विवेक भाई को इसके लिए हार्दिक बधाई अऊ शुभकामनाएँ💐💐

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