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दक्षिण कोसल के शिल्प एवं शिल्पकार : विश्वकर्मा पूजा विशेष

शिल्पकारों ने कलचुरियों के यहाँ भी निर्माण कार्य किया, उनकी उपस्थिति तत्कालीन अभिलेखों में दिखाई देती है। द्वितीय पृथ्वीदेव के रतनपुर में प्राप्त शिलालेख संवत 915 में उत्कीर्ण है ” यह मनोज्ञा और खूब रस वाली प्रशस्ति रुचिर अक्षरों में धनपति नामक कृती और शिल्पज्ञ ईश्वर ने उत्कीर्ण की। उपरोक्त वर्णन से शिल्पकारों की तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक स्थिति का पता चलता है।

सृजन एवं निर्माण का के देवता भगवान विश्वकर्मा है, इसके साथ ॠग्वेद के मंत्र दृष्टा ॠषि भगवान विश्वकर्मा भी हैं। ऋग्वेद मे विश्वकर्मा सुक्त के नाम से 11 ऋचाऐं लिखी हुई है। जिनके प्रत्येक मन्त्र पर लिखा है ऋषि विश्वकर्मा भौवन देवता आदि। यही सुक्त यजुर्वेद अध्याय 17 सुक्त मन्त्र 16 से 31 तक 16 मन्त्रों मे आया है ऋग्वेद मे विश्वकर्मा शब्द का एक बार इन्द्र व सुर्य का विशेषण बनकर भी प्रयोग हुआ है।

शास्त्र कहते हैं – यो विश्वजगतं करोत्य: स: विश्वकर्मा अर्थात वह समस्त जड़ चेतन, पशु पक्षी, सभी के परमपिता है, रचनाकार हैं। महर्षि दयानंद कहते हैं – विश्वं सर्वकर्म क्रियामाणस्य स: विश्वकर्मा सम्यक सृष्टि का सृजन कर्म जिसकी क्रिया है, वह विश्वकर्मा है। इस तरह सारी सृष्टि का निर्माता भगवान विश्वकर्मा को ही माना जाता है।

प्राचीन ग्रन्थों के मनन-अनुशीलन से यह विदित होता है कि जहाँ ब्रहा, विष्णु ओर महेश की वन्दना-अर्चना हुई है, वही भगवान विश्वकर्मा को भी स्मरण-परिष्टवन किया गया है। “विश्वकर्मा” शब्द से ही यह अर्थ-व्यंजित होता है
“विशवं कृत्स्नं कर्म व्यापारो वा यस्य सः।
अर्थातः जिसकी सम्यक् सृष्टि और कर्म व्यापार है वह विश्वकर्मा है। यही विश्वकर्मा प्रभु है, प्रभूत पराक्रम-प्रतिपत्र, विश्वरुप विशवात्मा है। वेदों में- विश्वतः चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वस्पात: कहकर इनकी सर्वव्यापकता, सर्वज्ञता, शक्ति-सम्पन्ता और अनन्तता दर्शायी गयी है।

इस तरह इतिहास में कई विश्वकर्मा हुए हैं, आगे चलकर विश्वकर्मा के गुणों को धारण करने वाले श्रेष्ठ पुरुष को विश्वकर्मा की उपाधि से अलंकृत किया जाने लगा। प्राचीन काल से अद्यतन विश्वकर्मा के अनुयायी या उनके वंशज आज भी विश्वकर्मा उपाधि को धारण करते हैं, जो कि वर्तमान में जाति व्यवस्था में रुढ हो गई। तत्कालीन समय में अभियंता को विश्वकर्मा कहा जाता था।

विश्वकर्मावंशीयों की रचनाओ एवं कृतियों के वर्णन से वैदिक एवं पौराणिक ग्रंथ भरे पड़े हैं तथा वर्तमान में भी परम्परागत शिल्पकारों द्वारा रची गयी आर्यावर्त के कोने कोने में गर्व से भाल उन्नत किए आसमान से होड़ लगा रही हैं। जिसे देख कर आज का मानव स्मृति खो देता है, उन कृतियों को बनाने वाले शिल्पकारों के प्रति नतमस्तक होकर सोचता है कि हजारों साल पूर्व मानव ने मशीनों के बगैर अद्भुत निर्माण कैसे किए होगें?

मानव के सामाजिक एवं आर्थिक विकास का प्रथम चरण वैदिक काल से प्रारंभ होता है। इस काल में अग्नि का अविष्कार एक ऐसा अविष्कार था जिसने मानव के जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन किया। उसे पशु से मनुष्य बनाया। यह अविष्कार मानव का सभ्यता की ओर बढता हुआ क्रांतिकारी कदम था। आज हम इस महान अविष्कार के महत्व को नहीं समझ सकते। जब जंगल की आग दानव की तरह सब कुछ निगल जाती थी, उसे काबू में करके प्रतिकूल से अनुकूल बनाने का कार्य मानव सभ्यता के लिए क्रांतिकारी अविष्कार था। आश्वलायन संहिता में इस कार्य का श्रेय महर्षि अंगिरा को दिया गया है।

सभी मनुष्यों के लिए उपस्करों एवं उपकरणों का निर्माण विकास का दूसरा चरण था। परम्परागत शिल्पकारों ने एक चक्रवर्ती राजा से लेकर साधारण मजदूर किसान तक के लिए उपकरणों का विकास किया गया। यज्ञों के लिए यज्ञपात्रों (जो मिट्टी, काष्ठ, तांबा, कांसा, सोना एवं चांदी के हुआ करते थे) से लेकर यज्ञ मंडप का निर्माण, राजाओं के लिए अस्त्र-शस्त्र, शकट, रथों का निर्माण, किसान मजदूरों के लिए हल, फ़ाल, कुदाल, कुटने, पीसने, काटने के उपकरण बनाए गए।

जिसे हम आज इंडस्ट्री कहते हैं प्राचीन काल में उसे शिल्पशास्त्र कहा जाता था। वायुयान, महल, दुर्ग, वायु देने वाले पंखे, थर्मामीटर, बैरोमीटर, चुम्बकीय सुई (कम्पास), बारुद, शतघ्नी (तोप) भुसुंडि (बंदुक) एवं एश्वर्य की अन्य भौतिक वस्तुओं का वर्णन संक्षेप में न करुं तो पुन: कई ग्रंथ लिखे जा सकते हैं। परम्परागत शिल्पकारों ने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी इतिहास की छाती पर अपने खून पसीने से जो कालजयी इबारतें लिखी हैं वे वर्तमान में भी अमिट हैं। काल का प्रहार भी उन्हे धराशायी नहीं कर पाया।

छत्तीसगढ़ भी शिल्प सृजन की दृष्टि से समृद्ध है, प्राचीन काल में यहाँ के शासकों ने उत्कृष्ट निर्माण कराए, जिन्हें हम सरगुजा से लेकर बस्तर के बारसूर तक देख सकते हैं। भले ही सभी के कालखंड पृथक हों परन्तु शिल्पियों का शिल्प आज भी स्थाई है जो वर्तमान में भी पर्यटकों का मन मोह लेता है। प्रस्तर, काष्ठ, ईष्टिका आदि से निर्मित शिल्प मनमोहक है। भले ही हजार वर्षों में काष्ठ शिल्प नष्ट होने के कारण हमें इन स्मारकों में दिखाई नहीं देता, परन्तु अदृष्य रुप से अवश्य वह उपस्थित है।

सुरंग टीला सिरपुर

सिरपुर के सुरंग टीला के स्तंभों में शिल्पकारों ने अपने हस्ताक्षर छोडे हैं। यहाँ स्तंभों पर ध्रुव बल, द्रोणादित्य, कमलोदित्य एंव विट्ठल नामक कारीगरों के नाम उत्कीर्ण हैं। किसी राज्य या राजा के कार्यकाल की स्थिति का आंकलन हम उसके काल में हुए शिल्प कार्य, निर्माण एवं उसके द्वारा चलाए गए सिक्कों से करते हैं। इनका निर्माण परम्परागत शिल्पकारों के बगैर नहीं हो सकता।

कई शिला लेखों में एवं ताम्रपत्रों में लेखक के नाम का जिक्र होता है। कुरुद में प्राप्त नरेन्द्र के ताम्रपत्र लेख में उत्कीर्णकर्ता के रुप में श्री दत्त का, आरंग मे प्राप्त जयराज के ताम्रलेख में अचल सिंह का, सुदेवराज के खरियार में प्राप्त ताम्रलेख में द्रोणसिंह का, महाभवगुप्त जनमेजय के ताम्रलेख में रणय औझा के पुत्र संग्राम का वर्णन है।

प्रथम पृथ्वीदेव के अमोदा में प्राप्त ताम्रपत्रलेख में वर्णन है कि “गर्भ नामक गाँव के स्वामी ईशभक्त सुकवि अल्हण ने सुन्दर वाक्यों से चकोर के नयन जैसे सुंदर अक्षर ताम्र पत्रों पर लिखे जिसे सभी शिल्पों के ज्ञाता सुबुद्धि हासल ने शुभ पंक्ति और अच्छे अक्षरों में उत्कीर्ण किया।”

रतनपुर के किले का मुख्य द्वार

द्वितीय पृथ्वीदेव के रतनपुर में प्राप्त शिलालेख संवत 915 में उत्कीर्ण है ” यह मनोज्ञा और खूब रस वाली प्रशस्ति रुचिर अक्षरों में धनपति नामक कृती और शिल्पज्ञ ईश्वर ने उत्कीर्ण की। उपरोक्त वर्णन से शिल्पकारों की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक स्थिति का पता चलता है।

इसके साथ ही वाहर के कोसगई में प्राप्त प्रथम शिलालेख के पाठ की पंक्ति 21 एवं 23 में (श्री मन्मन्मथ – सूत्रधारतनयौ श्रीछितकूमाण्डनावास्तां मानसदा तथा सजाक सूत्रधार छितकू मांडनश्च लेखदास:) लेख प्राप्त होता है। सूत्रधार मंडन के तनय ने कलचुरियों के यहाँ अपनी सेवाएं दी। वाहरेन्द्र का विक्रम संवत 1570 का शिलालेख इसका प्रमाण है।

इसी कालखंड में राणा कुंभा ने मेवाड़ में पन्द्रहवीं शताब्दी में कुंभलगढ़ का निर्माण 13 मई 1459 शनिवार कराया था, इस किले को ‘अजयगढ’ कहा जाता था क्योंकि इस किले पर विजय प्राप्त करना दुष्कर कार्य था। इसके चारों ओर एक बडी दीवार बनी हुई है जो चीन की दीवार के बाद विश्व कि दूसरी सबसे बडी दीवार है। इस किले की दीवारे लगभग ३६ किमी लम्बी है और यह किला किला यूनेस्को की सूची में सम्मिलित है।

सिरपुर का ईष्टिका निर्मित लक्ष्मण मंदिर

सूत्रधार मंडन महाराणा कुंभा के दुर्ग का मुख्य सूत्रधार (वास्तुविद) था, काशी के कवींद्राचार्य (17वीं शती) की सूची में मंडन द्वारा रचित ग्रंथों की नामावली मिलती है। इसकी रचनाएँ ये हैं – 1. देवतामूर्ति प्रकरण, 2. प्रासादमंडन, 3. राजबल्लभ वास्तुशास्त्र, 4. रूपमंडन, 5. वास्तुमंडन, 6. वास्तुशास्त्र, 7. वास्तुसार, 8. वास्तुमंजरी और 9. आपतत्व।

आपतत्व के विषय में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। रूपमंडन और देवतामूर्ति प्रकरण के अतिरिक्त शेष सभी ग्रंथ वास्तु विषयक हैं। वास्तु विषयक ग्रंथों में प्रासादमंडन सबसे महत्वपूर्ण है। इसमें चौदह प्रकार के अतिरिक्त जलाशय, कूप, कीर्तिस्तंभ, पुर, आदि के निर्माण तथा जीर्णोद्धार का भी विवेचन है। मंडन सूत्रधार मूर्तिशास्त्र का भी बहुत बड़ा पंडित था।

राजपूताना के मुख्य वास्तुविद की ख्याति हमें वाहरेन्द्र के शिलालेख से भी ज्ञात होती है, इस शिलालेख में सूत्रधार तनयो श्रीछितकूमाण्डनावास्तां मानसदा लेख से ज्ञात होता है कि राजपूताना के शिल्पकारों एवं वास्तुविदों ने तत्कालीन कलचुरियों के यहां भी अपनी सेवाएं दी।

देऊर टिकरा मल्हार, जिला बिलासपुर

छत्तीसगढ़ में राज्य संरक्षित प्रमुख स्थलों में कुलेश्वर मंदिर राजिम, शिव मंदिर चंद्रखुरी, सिद्धेश्वर मंदिर पलारी, चितावरी देवी मंदिर धोबनी, मालवी देवी मंदिर तरपोंगी, प्राचीन मंदिर ईंट नवागांव, प्राचीन मंदिर डमरु, बलौदाबाजार, फणीकेश्वरनाथ महादेव मंदिर फिंगेश्वर, शिव मंदिर गिरौद, आनंदप्रभ कुटी विहार सिरपुर, स्वास्तिक विहार सिरपुर, जगन्नाथ मंदिर खल्लारी, कर्णेनेश्वर महादेव मंदिर समूह सिहावा, भोरमदेव मंदिर कबीर धाम, छेरकी महल चौराग्राम कबीर धाम, मड़वा महल कबीरधाम, शिव मंदिर घटियारी, बजरंगबली मंदिर सहसपुर, शिव मंदिर सहसपुर, नगदेवा मंदिर, नगपुरा, शिव मंदिर नगपूरा, घुघुसराजा मंदिर देवगढ़, प्राचीन मंदिर डोंडीलोहारा, बुद्धेश्वर शिव मंदिर तथा चतुर्भूजी मंदिर धमधा, शिव मंदिर पलारी दुर्ग जिला, शिव मंदिर जगन्नाथपुर दुर्ग जिला, कपिलेश्वर मंदिर समूह बालोद, महामाया मंदिर रतनपुर, प्राचीन शिव मंदिर किरारीगोढी, बिल्हा, देवरानी जेठानी मंदिर ताला, धूमनाथ मंदिर सरगांव, शिवमंदिर गनियारी, गुढियारी शिवमंदिर केसरपाल बस्तर, बत्तीसा मंदिर बारसूर, लक्ष्मणेश्वर मंदिर खरौद, डीपाडीह, मंदिर समूह सतमहला, मंदिर समूह बेलसर हर्राटोला, महेशपुर सरगुजा इत्यादि हैं।

इसके अतिरिक्त भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित स्मारकों में दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा, बस्तर, चंद्रादित्य मंदिर बारसूर, गनेश प्रतिमाएं बारसूर, मामा भांजा मंदिर बारसूर, महादेव मंदिर बस्तर, भैरम देव मंदिर भैरमगढ़, नारायण मंदिर नारायणपाल, कारली मंदिर समलूर, विष्णु मंदिर जांजगीर, शिव मंदिर जांजगीर, मल्हार का किला, महादेव मंदिर पाली, पातालेश्वर मंदिर मल्हार, शिवरीनारायण मंदिर, महादेव मंदिर तुम्माण, शिव मंदिर देवरबीजा, शिव मंदिर देवबलौदा, लक्ष्मण मंदिर सिरपुर आदि प्रमुख स्थल हैं।

शिवरीनारायण का मंदिर, जिला बिलासपुर

इससे ज्ञात होता है कि विश्वकर्मावंशीयों ने दक्षिण कोसल में भी अपनी प्रतिमा एवं शिल्प ज्ञान का लोहा मनवाया, अधिकतर मंदिरों पर उड़ीसा शैली की छाप दिखाई देती है इससे ज्ञात होता है कि कोणार्क का निर्माण करने वाले महाराणाओं के वंशजों ने छत्तीसगढ़ अंचल में भी अपनी सेवाएं दी, उड़ीसा में विश्वकर्मावंशी कारीगर शिल्पकार महाराणा की उपाधि धारण करते हैं।

अगर हम समग्र दृष्टिपात करें तो ज्ञात होता है कि दक्षिण कोसल में राजपुताना (राजस्थान) से लेकर उड़ीसा तक के कारीगरों ने अपनी सेवाएं दी हैं तथा निर्माण कार्य में अपनी सक्रीय भागीदारी निभाई है। इसके साथ यह भी ज्ञात होता है कि तत्कालीन शासकों ने उत्कृष्ट शिल्पकार्य के लिए श्रेष्ठ शिल्पियों को ही आमंत्रित किया, चाहे वे कहीं के भी निवासी हों। इन शिल्पियों की रचनाएं हजारों वर्षों का कालखंड बीतने के बाद हमें आज भी दिखाई देती हैं, उनके हाथों ने ही इन रचनाओं को मूर्त रुप दिया, आज विश्वकर्मा पूजा पर सभी शिल्पकारों को नमन।

आलेख

ललित शर्मा इण्डोलॉजिस्ट रायपुर, छत्तीसगढ़

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One comment

  1. हरि सिंह क्षत्री

    बहुत सुन्दर भैया जी

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