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सुआ नृत्य

छत्तीसगढ़ का लोक साहित्य एवं वाचिक परम्परा

छत्तीसगढ़ नवोदित राज्य है। किन्तु हाँ की लोक संस्कृति अति प्राचीन है। यहाँ बोली जाने वाली भाषा छत्तीसगढ़ी है, जो अपनी मधुरता और सरलता के लिए जग विदित है। अर्द्ध मागधी अपभ्रंश से विकसीत पूर्वी हिन्दी की एक समृद्ध बोली है छत्तीसगढ़ी, जो अब भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है। जिसकी लिपी नागरी लिपी है। भाषा मानव सभ्यता के इतिहास की सबसे बडी खोज है। इसके पूर्व मनुष्य संकेतों के माध्यम से अपने अनुभव को व्यक्त करता था। मनुष्य जो अनुभव करता है उसे अभिव्यक्त भी करता है। अपनी सभ्यता के आरंभ काल से ही मनुष्य ने अपने अनुभवों को सम्प्रेषित करने के लिए भाषा का अविष्कार कर लिया था। यही भाषा उसकी उत्तरोत्तर प्रगति का माध्यम बनी। भाषा संचार का आदिम उपकरण है। अपनी आदिम अवस्था से वर्तमान इलेक्ट्रानिक युग तक आते-आते मनुष्य ने अपने भाषा संचार को और अधिक पुख्ता किया है। पहले साहित्य दो रूपों में पाया जाता था।

(1) अलिखित साहित्य, जो लोक साहित्य कहलाता है।

(2) शिष्ट साहित्य, जिसका स्वरूप लिखित होता है। और अब तीसरा स्वरूप भी हमारे सामने है, वह है इलेक्ट्रानिक रूप।

            किसी भी क्षेत्र का लोक साहित्य हो वह आज भी वांचिक परम्परा के माध्यम से जनमानस में संरक्षित है। और अवसर पाकर लोक कंठ से निर्झर की तरह प्रभावित हो जाता है। लोक साहित्य के विषय में देवराज उपाध्याय का यह कथन दृष्टव्य है – ‘‘लोक साहित्य लोक की मौखिक अभिव्यक्ति है। यह व्यक्ति से व्यक्ति के पास वाणी के माध्यम से सतत प्रवाह मान रहती है।’’ मौखिक साहित्य किसी व्यक्ति विशेष की अभिव्यक्ति न होकर समूह या समुदाय की अभिव्यक्ति है। यह पुरातन काल से ही चली आ रही है। डॉ. श्याम परमार का कथन इस संदर्भ में उल्लेखनीय है- ‘‘लोक साहित्य किसी व्यक्ति विशेष द्वारा निर्मित नही होता है। उसके पीछे परम्परा होती है, जिसका संबंध समाज से भिन्न नही है। उसकी अभिव्यक्ति सामूहिक है। व्यक्तित्व से रहित समान रूप में समाज की आत्मा को व्यक्त करने वाली अभिव्यक्तियाँ लोक साहित्य की श्रेणी में आती हैं। कहने का आशय यह कि जो वाचिक परम्परा में है, वह लोक साहित्य है और जो लोक साहित्य है, वह वाचिक है। वाचिक शब्द को परिभाषित करते हुए जय प्रकाश जी लिखते हैं- ‘‘वाचिक शब्द का इतिहास लगभग उतना ही पुराना है, जितना खुद सभ्यता का इतिहास। जब मानव जाति ने लिखना नही सीखा था। तब उसकी अभिव्यक्ति का अकेला माध्यम ‘वाचिक’ शब्द था। लेखन के आविष्कार के साथ लिखित शब्द का आविर्भाव हुआ। भाषिक ध्वनि का अक्षर-संस्कृति में अवतरण हुआ। कालान्तर में मुद्रण कला का विकास होने पर अक्षर-संस्कृति का तीव्र गति से प्रसार हुआ। मुद्रित पुस्तक ज्ञान के संग्रहण और संचार का माध्यम बन गयी।‘‘

           लोक में आज भी उसका ज्ञान, उसका साहित्य और उसकी संस्कृति वाचिक परम्परा के माध्यम से ही जीवन्त होती है। छत्तीसगढ़ लोक साहित्य का आगार है। छत्तीसगढ़ी लोकगीत, लोककथा, लोकगाथा, लोकनाट्य, लोकोक्तियाँ और पहेलियां आदि आज भी जन-जन के कंठ में विराजित है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी कंठानुकंठ मुखरित होकर लोकमानस को आंनदित कर रही है। वाचिक परम्परा की श्रृंखला में पहली चर्चा छत्तीसगढ़ी लोकगीतों पर ही केंद्रित करते हैं। लोकजीवन में लोकगीतों का सर्वत्र एकछत्र साम्राज्य है। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत लोक में लोकगीतों की उपस्थिति दिखाई पड़ती है। लोकगीतों के उद्गम के संन्दर्भ में देवन्द्र सत्यार्थी का कथन दृष्टव्य है- ‘‘कहां से आते हैं इनके लोकगीत? स्मरण-विस्मरण की आँख मिचैली से, कुछ अट्टहास से, कुछ उदास हृदय से। जीवन के खेत में ये गीत उगते हैं। कल्पना भी अपना काम करती है, रागवृति भी, भावना भी और नृत्य का हिलोरा भी।’’ छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में रचे-बसे लोकगीतों का वर्गीकरण इस तरह से किया जा सकता है-

(1) संस्कारगीत -सोहरगीत, बिहावगीत, मृत्युसंस्कार।

(2) पर्व/उत्सव (धार्मिक) गीत-भोजली, गौरागीत, मातासेवा, छेरछेरा गीत, फाग गीत।

(3) ऋतुगीत -बरखागीत, बारहमासी गीत।

(4) श्रमगीत या मनोरंजक गीत-ददरिया, करमा, नचैड़ी।

(5) खेलगीत-अटकन-मटकन, कबड्डी, खो-खो, फुगड़ी, घोर-घोर रानी, कहां जाबे डोकरी

(6) अन्यगीत-लोकभजन, पंथी, देवार गीत, बसदेवा गीत।

(1)

(1) संस्कार गीत:- संस्कार मानव जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। सच पूछा जाय तो संस्कारों से ही जीवन में शुचिता आती है। भारतीय जीवन में सोलह संस्कारों का विधान है। छत्तीसगढ़ी लोकजीवन में मुख्यतः तीन ही संस्कार प्रमुख हैं (1) जन्म संस्कार (2) विवाह संस्कार (3) मृत्यु संस्कार। इन अवसरों पर छत्तीसगढ़ में लोकगीत गाने की समृद्ध परम्परा है, जो लोक की वाचिक अभिव्यक्ति है।

(अ) सोहरगीत:- नवजात शिशु के आगमन पर उल्लास मय वातावरण में सोहर गीत गाया जाता है। सोहर गीतों में सामान्यतः रामकृष्ण से संबंधित गीत गाये जाते हैं-

                                                            काखर भये सिरिरामे

                                                            काखर भये लछमन हो।

                                                            ललना काखर भरत भुवाले

                                                            सोहर पद गावव हो।

(ब) विवाह गीत:– भारतीय संस्कृति में विवाह एक प्रमुख संस्कार है। विवाह के माध्यम से बंधन में बंधकर दो अपरिचित, दो आत्माएँ एक हो जाती हैं। छत्तीसगढ में विवाह के समय जो गीत गाए जाते हैं उसे बिहाव गीत कहते हैं। गड़वा बाजा अर्थात सींग, दफड़ा, टिमकी, मोहरी और मंजीरा-झुमका इन लोक वाद्यों के साथ लोकमंगल की भावना से गीतों के स्वर मन को आनंदित करते हैं।

विवाह – तेल चघ्घी

छत्तीसगढ़ी विवाह में मंगनी, चुलमाटी, मड़वा, देवतेला, तेलचघ्घी, हरदाही, चिकट, लाल भाजी, कुंवर-कलेवा, टिकावन, भाँवर, बिदा, आदि प्रमुख नेंग है। इन नेंगों में अलग-अलग गीत गाए जाते हैं- विवाह गीतों में भडौनी गीतों का अलग ही आकर्षण होता है। एक भडौनी गीत की बानगी-

बने-बने तोला जानेंव समधी

मड़वा म डारेंव बास रे।

जाला-पाला लुगरा लाने

जरगे तोर नाक रे।

नदिया तीर के पटुवा भाजी

उल्हवा-उल्हवा दिखथे रे

आय हे बरतिया तेमन

बुढवा-बुढवा दिखथे रे।

(स) मृत्यु संस्कार के गीत:-

मृत्यु जीवन का शाश्वत सत्य है। जो आया है वह जायेगा ही। छत्तीसगढी लोक जवन में मृत्यु संस्कार के समय कबीर पंथी समुदाय में गीत गाने की परम्परा है। हमारे संत महात्माओं ने इस शरीर को नश्वर तथा आत्मा को अनश्वर बताया है। इन गीतों में शरीर की क्षण भंगुरता और आत्मा की अनश्वरता का बखान होता है।

                                       बंगला अजब बने रे भाई बंगला अजब बने रे भाई

                                        ये बंगला के दस दरवाजा पवन चलावे हंसा,

                                         हाड जाम के ईटा बनाए, लहू रकत के लोहा ,

                                         रोवा केंस के छानी बने हे, हंसा रहे सुख सोंवा।

(2) पर्व/उत्सव (धार्मिक) गीत:-

 मनुष्य प्राचीन काल से उत्सव प्रिय रहा है। लोक में पर्व और उत्सव धर्म से जुड़े होते हैं। छत्तीसगढ़ में ऐसे धार्मिक पर्वो और उत्सवों की बाहुल्यता है। जिनमें वाचिक परम्परा का सुदर्शन स्वरूप दिखाई प़ता है।

(अ) भोजली गीत:-

भोजली पर्व छत्तीसगढ में किशोरियों व महिलाओं का विशेष पर्व है। यह श्रावण मास की सप्तमी से पूर्णिमा तक मनाया जाता है। किशोरियां टोकरी में गेहॅू के दाने बोकर उसे जल से सिंचित कर प्रतीक रूप में प्रकृति का पूजन करती हैं। इस अवसर पर गाया जाने वाला गीत भोजली गीत कहलाता है-

भोजली

                        देवी गंगा देवी गंगा लहर तुरंगा

                        हमर भोजली दाई के भीजे आठों अंगा।

                        ओऽ ओऽ ऽऽ देवी गंगा।

                        आ गईस पूरा बोहा गईस मलगी

                        हमर भोजली दाई के सोने सोन के कलगी

(ब) सुवागीत:-

छत्तीसगढ़़ी लोकगीतों में सुवागीत का विशिष्ट स्थान है। यह नारी हृद्य की अभिव्यक्ति है। रंग-बिरंगे परिधानों में सजी छत्तीसगढ़ी महिलाऐॅ टोकरी में मिट्टी का सुवा (तोता) रखकर उसके वृत्ताकार तोते की तरह फुदक-फुदक कर नृत्य करती हैं। ताली बजाकर महिलाएं गीत गाती हैं, तब दृश्य बड़ा मनोरम होता है।

सुआ नृत्य

            तरि हरि-नाहना मोर नहा नरि ना ना,कदम तरी मोंगरा के झाड़े

            येदे झाड़े रे सुवना, कदम तरी मोंगरा के झाड़े।

            सबकर बेटी मैहर जाथे रे, सुरजा गइन ससुरारे

            ससुरारे रे सुवना, कदम तरी मोंगरा के झाड़े।

            रांध दाई रांध दाई घिंवहि कलेवना ओ- सुरजा लेवन बर जइहौं

            ये जराहौं रे सुवना, कदम तरी मोंगरा के झाड़े।

(स) गौरागीत:

गौरा पर्व में गाये जाने वाला गीत गौरा गीत कहलाता है। दीपावली के समय गौरा अर्थात पार्वती और ‘‘इसर‘‘ अर्थात शंकर के विवाह का पर्व है। जिसे छत्तीसगढ में पूरे वैवाहिक नियमों के साथ संपन्न किया जाता है। पार्वती व शिव की मिट्टी की मूर्ति बनाकर सनपना (चमकदार कागज) चिपकाया जाता है। फूल कुचरना, करसा परघाना, गउरा जगी, चाऊॅर चढ़ाना, स्तुति, देवता चढ़ना, डढै़या झूपना, गौरा सुताना व गौरा विसर्जन के साथ अलग-अलग गीत गाने की परम्परा है। सींग, दफड़ा, मोहरी, टिमकी, मंजीरा व झुमका लोक वाद्यों के साथ गीतों की उर्जा से लोक मन आहलादित हो जाता है- गौरा गीत की एवं बानगी-

गौरा पूजन

                        गउरा सुतय मोर गउरी सुतय ओ सुतय ओ सहर के लोग

                        बाजा सुतय मोर बजनिया सुतय ओ सुतय गवइया लोग

                        बइगा सुतय मोर बैगिन सुतय ओ सुतय सहर के लोग।

(द) माता सेवा जस गीत:

छत्तीसगढ़ मातृशक्ति का आराधक रहा है। इसलिए यहाॅ जन-जन में मातृ भक्ति का भाव दिखाई पड़ता है। चैत्र मास में रामनवमी पक्ष व क्वांर मास में दशहरा के पूर्व नवरात्रिका अनुष्ठानिक पर्व मनाया जाता है। इस पर्व में नौ दिनों तक अखंड ज्योति जलाकर तथा जॅवारा बोकर शक्ति व प्रकृति की उपासना दी जाती है। स्थानीय मंदिरों व देवस्थलों में जॅवारा पर्व की धूम रहती है। जन-जन के हृदय से मातृ वंदना के भाव छलकते हैं। इस पर्व में गाया जाने वाला गीत जस गीत कहलाता है। नौ दिनों तक ‘सेवक‘ (गीत गाने वाली भजन मंडली) माँ की सेवा करते है। जिसमें माँ के  श्रृंगार, उसकी महिमा और भक्ति का बखान होता है।

माता सेवा – जसगीत

रन-बन, रन-बन हो …………….

                        तुम खेलव दुलरवा, रन-बन रन-बन हो।

                        काखर पूत हे बाल बरम देव, काखर पूत गौंरैया

                        काखर पूत हे बन के रक्सा, रनबन, रनबन हो।

                        बाम्हन पूत हे बाल बरम देव, अहिरा पूत गौंरैया

                        धोबिया पूत हे बन के रक्सा, रनबन रनबन हो।

(3) ऋतुगीत/बारहमासी:-

छत्तीसगढ़ी लोक गीतों में बड़ी विविधता है। कुछ ऐसे भी गीत हैँ जिनमें ऋतुओं का वर्णन है। इनमें साल के बारह महिनों की विशिष्टता का चित्रण है। अतः ये बारहमासी गीत हैं। बारहमासी का अर्थ बारह महिनों गाए जाने वाले गीत से भी ध्वनित होता है। पर बारहमासी का अर्थ बारह माह के बर्णन से है। बारहमासी गीत फाग, डंडा, जंवारा व सुवा गीतों में मिलता है-

                                    फागुन महाराज, फागन महाराज      

                                    अब के गाए ले कब अइ हो।

                                    कोन महिना हरेली, कब तिजा रे तिहार ?

                                    कोन महिना दसेरा, कब उडे़ रे गुलाल ?

                                    सावन महिना हरेली, भादो तीजा रे तिहार

                                    कुॅवार महिना दसेरा, फागुन उड़े रे गुलाल।

(4) श्रमगीत या मनोरंजक गीत:

छत्तीसगढ़ मेहनत कस इंसानों की धरती है। इसलिए श्रम के साथ गीत-संगीत भी जुड़ा हुआ है। श्रम परिहार के लिए गाए जाने वाले गीत श्रमगीत कहलाते हैं। कृषक-मजदूर खेतों में जुताई, निंदाई, मिसाई करते, जंगलों में तेदू पत्ता तोडते या बैलगाड़ी हाँकते ददरिया गीत गातें  हैं। शरीर की थकान मिटाने के लिए करमा गीत के साथ नृत्य भी करते हैं। डंड़ा गीत व नृत्य की परम्परा छत्तीसगढ़ में प्रचलित है। ये सभी गीत वाचिक परम्परा के माध्यम से ही जनमानस में रचे-बसे है। ददरिया गीत का एक उदाहरण

                                    ले जा लान दे जंवारा, कोदो के मिरचा हो ले जा लान दे

                                    आमा ल टोरे खाहुँच कहिके ,

                                    मोला दगा म डारे आहुँच कहिके

                                    ले जा लान देबे ……………..

                                    बासी ल खाए अढ़ई कौरा,

                                    तोला बइठे ला बलाएवँ बढ़ई चैंरा।

                                    ले जा लान देबे।

(5) खेलगीत:-

बच्चे नाना प्रकार के खेल खेलते हैं। ये खेल मनोरंजन के साथ-साथ शरीर को स्वस्थ और सुदृढ़ बनाते हैं। छत्तीसगढ़ी खेलों की विशेषता है कि इनमें गीत भी शामिल हैं। खुड़वा (कबड्डी), खो-खो अटकन-मटकन, फुगड़ी, डाँडी-पौहा, घोर-घोर रानी, कहाँ जाबे डोकरी, आती-पाती आदि खेलों कों बच्चे गीतात्मक रूप में खेलते है। खेल गीत की एक बानगी-

फ़ुगड़ी खेल

                        कहाँ जाबे ओ डोकरी, लाठी धरे एक मोटरी ?

                        बड़हर मन के खोवा, जलेबी हमर गरीब के ठेठरी

                        कहाँ जाथस डोकरी ? महुवा बिने ला

                        हमु ल लेगबे का ? तोर दाई ल पूछ आ।

                        घुस-घुस ले मोटाये, डोकरी कूदे जस चिंगरी मछरी

                                                                                    (5)

(6) अन्य गीत:-

छत्तीसगढ में लोक गीतों की बडी लम्बी श्रृंखला है। ये गीत विविध रंगी है। इनकी आभा इन्द्रधनुष की तरह शोभायमान है। ऐसे गीतों में देवारगीत, बसदेवा गीत, लोकभजन, पंथी गीत, आदि सभाविष्ट हैं। पंथी गीत और नृत्य की तो पूरे विश्व में प्रसिद्धि है। छत्तीसगढ के महान संत गुरू बाबा घासीदास जिन्होने ‘‘मानव-मानव एक समान‘‘ का संदेश देकर सतनाम का प्रकाश फैलाया। पंथीनर्तक देवदास बंजारे ने पंथी नृत्य को अपने नृत्य कौशल से विश्व शिखर तक पहुँचाया। गुरू घासीदास की चरण वंदना में समर्पित रहता है पंथीगीत-

                        ये गिरौद जाबो ग, ये भंडारा जाबो न

                        अपन गुरू के दर्शन पाबो न।

                        माता अमरौतिन, पिता माहंगू दास हे

                        गिरौदपुरी म जनम लिए, बाबा घासीदास हे।

राऊत दोहे:- छत्तीसगढ़ में यादव जाति के लोग निवास करते हैं। इनका मुख्य कार्य गो पालन व गो चारण है। दीपावली के यादव जाति के लोग राऊत नृत्य करते हैं। राऊत नृत्य शौर्य का प्रतीक हैं। नृत्य के साथ ये दोहे का उच्चारण करते हैं। ये दोहे तुलसी, कबीर के दोहो की तरह छत्तीसगढ़ी लोक जीवन से जुडे रहते है। राऊत दोहे हजारों की संख्या में हैं और वाचिक परम्परा के माध्यम से आज भी दीपावली के समय घर-घर मुखरित होते हैं। राऊत दोहे का एक उदाहरण –

राऊत नाचा

            वृंदावन के कुंज गलिन में, ऊॅचा पेझ़ खजूर।

जा चढ देखे नंद कन्हैया, ग्वालिन कतका दूर।।

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            अरसी फूले घमाघम भइया, मुनगा फूले सफेद।

बालकपन में केंवरा बदेंव, जवानी में होगे भेंट।।  

छत्तीसगढी लोककथा:-

छत्तीसगढ़ी लोक जीवन में मनोरंजन के लिए लोककथा का स्थान सर्वोपरि है। दरअसल लोक कथाएँ लोक समाज को शिक्षा देती हैं। उसका मार्ग प्रशस्त करती है। आबाल-वृद्ध लोक कथा को सुनने के लिए सदैव आतुर रहते हैं। इन लोक कथाओं में धार्मिक कथाएं, व्रत संबंधी कथाएँ, पशुपक्षियों से संबंधित कथाएँ शामिल होती हैं। लोक कथाएँ वाचिक परम्परा की सर्वाधिक आनंददायी  निर्झरणी है। डुंड़ी रक्सीन, सतवंतीन, कोलिहा अउ हाथी, चल रे तुमा बाटे-बाट, चुरकी-मुरकी जैसी सैकड़ों मनोरंजक व शिक्षाप्रद लोक कथाएँ वाचिक परम्परा के माध्यम से लोक में आज भी जनरंजन के साधन हैं।

छत्तीसगढ़ी लोकगाथा:-

लोकगाथा को कथा गीत भी कहा जाता है। क्यांेकि इसमें लम्बी कथा को गीत के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। डॉ. कृष्ण देव उपाध्याय के अनुसार ‘‘ लोकगाथा वह कथा है जो गीतों में कही गयी हो। ‘‘ डॉ. सत्येद्र भी लोकगाथा में कथा और गेयता दोनों को ही प्रधानता देते हैं।

                                                                        (6)

लोक नाट्य नाचा

छत्तीसगढ़ की वाचिक परम्परा में लोकगाथा की सुदीर्घ परम्परा है। छत्तीसगढ़ी लोकगाथा पंडवानी ने तो विश्व स्तर पर प्रसिद्धि प्राप्त की है। पद्मश्री तीजनबाई, झाडू राम देवांगन, पूनाराम निषाद, ऋतु वर्मा आदि पंडवानी कलाकारों ने अपनी गायन प्रतिभा से सबको सम्मोहित किया है। भरथरी, दसमतकैना, लोरिक चंदा (चंदैनी) ढोला मारू, गोपी चंदा गुजरी गहिरिन, कुंवर रसालू, हीरा-मारा, फूलबासन, अहिमन रानी, राजा वीरसिंह, कल्याणसाय आदि अनेक लोकगाथाएं जनमानस में लोकप्रिय हैं। लोकगाथाओं में गीत-संगीत और अमिनय की त्रिवेणी बहा करती है, जिसमें लोक अगाहन करता है। पंडवानी का एक उदाहरण –

पंडवानी, तिीजन बाई

                        लडे़ के बेरा समझ लेगे ग।

                        तैं लड़े के बरा समझ लेबे।

                        तोला जानेंव बलवान, लड़े के बेरा समझ लेबे।

                        कुंती के मै पुत्र कहावंव, अर्जुन हे मोर नाम।

                        युधिष्ठिर के छोटे भाई, करवं तोर ले संग्राम।

                        तोला जानेंव बलवान, लड़े के बेरा समझ लेबे

भरथरी गायन का उदाहरण-

भरथरी गायन

घोड़ा रोये घोड़सार म घोड़सार म ओ

हाथी रोवय हाथीसार म

मोर रानी ये ओ, महलों म रोवय

मोर राजा रोवय दरबार म दरबारे म भाई ये देजी।    

बोंये म सोना जामे नहीं, मोती लुरे न डार।

बार-बार हीरा तन नई आय, खोजे मिले न उधार।

छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियाँ व पहेलियाँ:-

                        लोकोक्तियों को छत्तीसगढ़ी में हाना कहा जाता है। जब किसी व्यक्ति विशेष की उक्ति को लोक की स्वीकृति मिल जाती है। तब वह उक्ति लोकोक्ति बन जाती है। वाचिक परम्परा में संरक्षित लोकोक्तियाँ लोक के संचित अनुभव और ज्ञान का कोश हैं। छत्तीसगढ़ी में हाना भाषा के सोन्दर्य को बढाता है। साथ ही साथ भाषा की प्रभावोत्पादकता भी बढ़ती है। एक अनपढ व्यक्ति भी अपनी भाषा में हाना का प्रयोग कर जन सामान्य को प्रभावित कर लेता है। कुछ छत्तीसगढी लोकोक्तियाँ-

                                    खीरा चोर जोंधरी चोर, धीरे-धीरे सेंध फोर

            अर्थात पहले बच्चा गांव की बाड़ी से ककड़ी, भुट्टा आदि की चोरी करता है।यदि उस पर अंकुश नही लगाया गया तो वह आगे चलकर, सेंध मार कर चोरी करता है।

                                    जइसे-जइसे घर दुवार, तइसे-तइसे फइरका।

                                    जइसे-जइसे दाई ददा, तइसे -तइसे लइका।।

जैसा जिसका घर होता है, उसमें उसी तरह के दरवाजे लगते हैं। और जैसे माँ-बाप होते हैं वैसा ही उसका बच्चा होता है। दुर्गुणों या सदगुणों का विकास बच्चों में माता-पिता के आचरण को देखकर होता है।

                                                                        (7)

            छत्तीसगढ़ी लोकोक्ति (हाना) की तरह ही पहेली भी वाचिक परम्परा में है। छत्तीसगढ़ी में पहेलियों को ’जनौला’ भी कहा जाता है। ये पहेलियाँ बुद्धि मापन के साथ-साथ मनोरंजन का भी साधन होती हैं। आधुनिक युग में मनोरंजन के अनेक साधन उपलब्ध हो जाने के कारण पहेलियाँ अब कम बूझी जाती हैं। पर लोक जीवन में इसकी वाचिक परम्परा में उपस्थिति है। एक जनौला-

एक सींग के बोकरा, मेरेर मेरेर नरियाय।

                                    मुंह डहर चारा चरे, बाखा डहर पगुराय।।

                                                                                    (उत्तर – च्क्की)

                                    खोड़ोर-खोड़ोर खोड़री, छः आंखी तीन बोडरी

                                                            (उत्तर – हल चलाता किसान)

छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य:-

लोकनाट्य लोक जीवन का आईना कहलाता है। लोक नाट्यों में स्थानीय लोक जीवन की परम्पराओं, उनके रहन-सहन, रीति-रिवाजों और क्रिया-व्यापारों की स्पष्ट छवि दिखाई पड़ती है। लोक जीवन में जो कुछ भी घटित होता है। अच्छा-बुरा, उतार-चढाव, हानि-लाभ, दुख-सुख यही सब लोक नाट्य के कथानक बनते हैं। लोक अपने परिवेश में जो देखता है, उन दृश्यों व घटनाओं को, हॅसी-खुशी के लिए जो सपने बुनता है उन आशाओं और विश्वासों को लोकरंग में साकार करता हैं। अभिनय और संवादो के माध्यम से जो मर्म लोकमंच पर स्थापित होता है। वही कहलाता है लोकनाट्य।

लोक नाट्य नाचा

                                    अन्य लोकांचलों की तरह छत्तीसगढ़ में भी लोकनाट्यों की परम्परा आज भी वाचिक है। यहां के लोकनाट्यों में रहस, चँदैनी, भतरानाट और नाचा की अपनी-अपनी पृथक पहचान है। ‘नाचा’ छत्तीसगढ़ का सर्वाधिक लोकप्रिय लोकनाट्य है। नाचा में गीत-संगीत, नृत्य और अभिनय का सुन्दर समन्वय मिलता है। नाचा में आज भी नारी पात्र की भूमिका पुरूष कलाकार ही निभाते हैं। नाचा की कोई स्क्रीपट नही होती। नाचा के कलाकार किसी घटना या कथा को परस्पर आपसी विचार-विमर्श से गम्मत या प्रहसन के रूप में प्रस्तुत करते है। लोक नाट्य नाचा वाचिक परस्पर का सबसे बढ़िया उदाहरण है- नाचा में नचैड़ी गीत की बानगी जिसमें वर्तमान व्यवस्था पर कटाक्ष किया गया है-

            मुसवा मगन भइगे, बासी रोटी खाके,

            मुसवा मगन भइगे, बासी रोटी खाके,

            ओमन खाथे दार भात, घी ल चुहा के

            हमन खाथन रूक्खा सुक्खा, करम ल ठठाके।

            मुसवा मगन भइगे, बासी रोटी खाके।

                       छत्तीसगढ़ी नाचा कलाकारों ने दुनिया भर में नाम कमाया है। श्री हबीब तनवीर का छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य चोर चरन दास व गाँव के नाव ससुरार मोर नाँव दमाद आदि लोक नाट्य को नाट्य जगत में ने देखा व सराहा है। 

आलेख –

डॉ. पीसी लाल यादव
‘साहित्य कुटीर’
गंडई पंड़रिया
जिला राजनांदगांव(छ.ग.)
मो. नं. 9424113122
ईमल:- pisilalyadav55@gmail.com

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