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भारत माता के बहादुर लाल : लाल बहादुर शास्त्री

बात वर्ष 1928 की है, एक 24 वर्षीय नवयुवक का विवाह होने जा रहा था। नवयुवक था अत्यंत आदर्शवादी। अपने तत्वों के अनुसार जीवन जीने वाला। समाज में समानता स्थापित हो इसलिए उसने अपना उपनाम का भी त्याग कर दिया था। काशी विद्यापीठ से स्नातक पदवी प्राप्त करने के पश्चात् वही उसका नामाभिधान बन गया।

विवाह के समय कन्या के माता-पिता को एक अनोखी समस्या का सामना करना पड़ा। वे वर-दक्षिणा देना चाहते थे, और वर ऐसा था कि-जो मानता ही नहीं। अंततः एक पर्याय ढूंढ़ लिया गया। एक चरखा तथा कुछ खादी के कपड़े स्वीकार कर वर विवाह के लिए राजी हो गया। वह युवक थे – लाल बहादुर शास्त्री, जो स्वतंत्र भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बनें।

लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ। उनके पिता शारदा प्रसाद श्रीवास्तव एक शिक्षक थे। माता रामदुलारी देवी एक सात्विक एवं धर्मपरायण महिला थी। जब लाल बहादुर डेढ़ वर्ष के ही हुए थे तब दुर्भाग्य से उनके पिता की मृत्यु हो गई। माता बच्चों को लेकर अपने पिता के घर मिर्जापुर लौट गई। वहीं पर लाल बहादुर ने प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की। तत्पश्चात पढ़ाई करने के लिए उनको वाराणासी भेजा गया।

बचपन से उनको अभावग्रस्त परिस्थिति का सामना करना पड़ा। परन्तु वे हार माननेवाले नहीं थे। मीलों तक चल कर तथा तैर कर नदी पार करते हुए वे विद्यालय पहुँचते थे। पाठ्य-पुस्तकें खरीदने की स्थिति नहीं थी, इस विपरीत परिस्थिति में भी उन्होंने कभी पढ़ाई से छुटकारा नहीं चाहा। मित्रों से पुस्तक लेकर वे स्वयं उसको लिख लेते थे और फिर पुस्तक वापस कर देते थे। काशी विद्यापीठ से उन्होंने ‘शास्त्री’ पदवी प्राप्त की और यही उपाधि सदा के लिए उनका उपनाम बन गई। 1928 में उनका विवाह ललिता देवी से हुआ।

बचपन से ही वे महात्मा गांधीजी से प्रेरित हुए थे। उनके आह्वान के प्रतिसाद के रूप में वे पढ़ाई छोड़कर असहयोग आन्दोलन में सहभागी हुए थे। तब से लेकर जीवन पर्यंत वे देश के सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय रहे। नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आन्दोलन में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। अनेक बार उन्हें कारावास भी भुगतना पड़ा। वे इंडियन नैशनल कांग्रेस के सदस्य बने और फिर कुछ समय पश्चात् इलाहाबाद कांग्रेस समिति के अध्यक्ष बने।

स्वतंत्रता के पश्चात् उन्होंने कांग्रेस दल में तथा राज्य एवं केन्द्र सरकार में विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के वे महासचिव भी रह चुके थे। 1952,1957 तथा 1962 के चुनावों में कांग्रेस को बहुमत से विजयी बनाने में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। जब वे उत्तर प्रदेश के पुलिस एवं परिवहन मंत्री थे तब पहली बार भीड़ को हटाने के लिए लाठी चार्ज के बदले पानी की बौछार का उपयोग शुरू किया गया।

बाद में वे केन्द्र सरकार में रेल मंत्री बने। उनके कार्यकाल में महिलाओं की संवाहक (कंडक्टर) के रूप में नियुक्तियों की शुरुवात हुई। वे जब रेल मंत्री थे तब तमिलनाडु में एक बड़ी रेल दुर्घटना हुई थी। रेल मंत्री होने के नाते उन्होंने सारा दायित्व स्वयं पर लेते हुए अपने मंत्री पद का त्याग कर दिया। वे भारत के गृह मंत्री भी रह चुके थे।

पंडित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के पश्चात् शास्त्रीजी प्रधानमंत्री बने। वे एक क्षमतावान तथा शीलवान नेता थे। उनके ‘जय जवान जय किसान’ के उद्घोष ने देशवासियों को एक नए उत्साह और जिम्मेदारी से भर दिया। अन्न-धान्य की कमी, बेरोजगारी तथा गरीबी जैसी समस्याओं को सुलझाने की दिशा में उन्होंने अनेक उपाय किये।

देशवासियों को उन्होंने सप्ताह में एक दिन उपवास का मंत्र दिया। प्रत्येक व्यक्ति यदि सप्ताह में एक दिन एक समय का भोजन नहीं करेगा तो जहाँ आवश्यकता है वहाँ पर यह अन्न-धान्य भेजा जा सकता है, ऐसा उनका विचार था। समाज ने उनके इस आह्वान को उत्स्फूर्त प्रतिसाद दिया। अनेक परिवारों में सोमवार का व्रत शुरू हो गया। इतना ही नहीं तो उपहार-गृह भी सोमवार शाम को बंद रहने लगे। सबको बताने से पहले उन्होंने स्वयं के परिवार में इसका पालन शुरू कर दिया था।

कृषि क्षेत्र के विशेषज्ञों को उन्होंने दीर्घकालीन योजनायें बनाने के लिए प्रोत्साहित किया। बाद में भारत में जो ‘हरित क्रान्ति’ देखी गई, उसका आरम्भ इन्हीं योजनाओं के माध्यम से हुआ था। नैशनल डेरी डेवलपमेंट बोर्ड की स्थापना कर दुग्ध-उत्पादन के क्षेत्र में ‘श्वेत क्रान्ति’ की नींव भी शास्त्रीजी ने रखी।

शास्त्रीजी के सक्षम नेतृत्व में 1965 के भारत-पाक युद्ध में भारत विजयी हुआ। इस घटना के बाद भारतीय जनमानस का आत्मविश्वास फिर से ऊँचा हो गया जो कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के कारण कम होने लगा था। विश्व ने भी यह देख लिया कि सामर्थ्यशाली नेतृत्व और प्रचण्ड पराक्रमी सेना के संयोग से भारत कैसा क्षमतावान बन सकता है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह घटना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

उच्च अधिकार पद पर होते हुए भी उनका जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण था। वे एक सरल, चरित्रवान तथा सच्चे गांधीवादी नेता थे। देश के प्रधानमंत्री होने पर भी उनके पास अपनी कार नहीं थी। कार की कीमत तब रु. 12,000/- हुआ करती थी। उनके पास पर्याप्त राशि नहीं थी। तब उन्होंने बैंक से ऋण लेकर कार खरीदी थी। दुर्भाग्य से ऋण चुकाने से पूर्व ही उनकी मृत्यु हो गई। परन्तु सरकार के ऋण से छूट देने के पर्याय को न मानकर उनकी पत्नी ललिता देवी शास्त्री ने अपने पेंशन से वह ऋण चुकाया।

कन्याकुमारी स्थित विवेकानन्द शिला स्मारक के निर्माण कार्य में शास्त्रीजी का विशेष महत्त्वपूर्ण योगदान है। 1963 में कांग्रेस दल को देश के प्रत्येक राज्य में प्रभावशाली बनाने के लिए ‘कामराज योजना’ के अंतर्गत काम शुरू हुआ था। तब शास्त्रीजी के पास किसी मंत्रालय का पदभार नहीं था। विवेकानन्द शिला स्मारक समिति के संगठन सचिव माननीय एकनाथजी रानडे जब दिल्ली में रहते थे तब अनेक बार उनसे मिलते थे।

स्वामी विवेकानन्द के प्रति शास्त्रीजी के मन में प्रगाढ़ श्रद्धा थी। विवेकानन्द शिला स्मारक, कन्याकुमारी समुद्र स्थित विवेकानन्द शिला पर ही हो ऐसा वे चाहते थे। वे शान्ति से एवं दृढ़ता से कार्य करनेवाले व्यक्ति थे। विवेकानन्द शिला स्मारक के लिए अनुमति पाने की दिशा में सारे राजनीतिक दलों के सांसदों से सम्पर्क के विषय में वे माननीय एकनाथजी से सहमत थे।

जब माननीय एकनाथजी 323 सांसदों के (जिसमें कांग्रेस के साथ ही सारे राजनीतिक दलों के सांसद सम्मिलित हुए थे) हस्ताक्षर लेकर उनके पास पहुंचे तो वे आश्चर्यचकित रह गए। अत्यंत आनंद और संतोष भाव से उन्होंने कहा, “मुझे लगा आप विरोधी पक्ष के कुछ 10-20० सांसदों के हस्ताक्षर जुटा पाओगे। परन्तु इसमें तो सभी है; मेरे पक्ष के तो लगभग सभी हैं। आपने आपका काम अच्छी तरह से किया है। अब मेरी बारी है। अब आप निश्चिन्त हो जाइए। विवेकानन्द शिला स्मारक का निर्माण अब हो कर रहेगा।” और फिर उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ भी बात की। दुर्दैववश शिला स्मारक के उद्घाटन के समय वे नहीं रहे।

जीवन के विविध क्षेत्रों में अपना मौलिक योगदान देनेवाले भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री भारतरत्न श्री लाल बहादुर शास्त्री से हम देशवासी सदैव प्रेरणा पाते रहेंगे।

आलेख

प्रियम्वदा दीदी

जीवनव्रती कार्यकर्ता,
विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी

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