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ऐसा भव्य जलप्रपात जिसके सामने बाहूबली भी लगता है बौना

प्रकृति ने बस्तर में जी भर कर अपना सौंदर्य लुटाया है, अद्वितीय प्राकृतिक खुबसूरती ने बस्तर को पर्यटकों का लाडला बनाया है। यहाँ की हरी-भरी वादियाँ, गगनचुम्बी चोटियाँ, खूबसूरत झरने किसी भी व्यक्ति का मनमोह लेते हैं। बस्तर में दंतेवाड़ा जिला भी पर्यटन स्थलों के मामले में अग्रणी  है।

 दंतेवाड़ा में जहाँ घने जंगलो में ऊँची पर्वत चोटी पर गणेश जी विराजित हैं, वहाँ प्रकृति एवँ इतिहास का अनूठा संगम दिखाई देता हैं, इसके साथ ही विशाल, भव्यतम झरना हांदावाड़ा जाने का मार्ग भी दंतेवाड़ा से ही जाता है। बस्तर के युवाओं में और बस्तर को करीब से जानने वालों लोगों में ढोलकल के बाद हांदावाड़ा जाने की इच्छा देखने को मिलती है। 

 

 कुछ दिनों पूर्व यहां पर बाहूबली-2 के फ़िल्मांकन की बात चली थी जिसके फलस्वरूप पर्यटकों में  हांदावाड़ा जलप्रपात को देखने की इच्छा अधिक हो गई। अपनी इसी इच्छा के कारण स्थानीय लोगों ने इस जलप्रपात के सौंदर्य को करीब से निहारा है। हर सप्ताह यहां स्थानीय पर्यटको का मेला सा लगने लग गया था।

 

यह जलप्रपात बाहुबली फिल्म के जलप्रपात की विशालता के तुलना में  किसी भी तरह से कम नहीं हैं। पास के गांव हांदावाड़ा के कारण यह हांदावाड़ा जलप्रपात के नाम से जाना जाता हैं, परंतु इसके साथ बाहूबली फ़िल्मांकन का नाम जुड़ने एवँ बस्तर का विशाल झरना होने के कारण स्थानीय युवाओं में यह बाहूबली जलपर्वत के रूप में प्रचारित है। 

 

हांदावाड़ा जलप्रपात नारायणपुर जिले के ओरछा विकासखण्ड में आता हैं। जिला मुख्यालय दंतेवाड़ा से 20 किलोमीटर की दूरी पर ऐतिहासिक नगरी बारसूर स्थित है। बारसूर से 04 किलोमीटर की दूरी पर मूचनार नामक ग्राम में बस्तर की जीवनदायिनी इन्द्रावती बहती हैं।

 

इंद्रावती नदी के पार लगभग 25 से 30 किलोमीटर की दूरी पर अबूझमाड़ में हांदावाड़ा नाम का  छोटा सा ग्राम है। इस ग्राम से ०4 किलोमीटर की दुरी पर धारा डोंगरी की पहाड़ी में गोयदेर नदी लगभग 350 फीट की ऊँचाई से गिरकर बहुत ही खूबसूरत एवं चरणबद्ध विशाल जलप्रपात का निर्माण करती है।

 

 बांस के झुरमुटों से निकलते ही पर्यटकों को हांदावाड़ा झरने की विशालता एकदम से अचंभित कर देती है। इसकी विशालता के सामने मुख से धीमी आवाज में बस एक शब्द निकलता है “अदभूत।” झरने खूबसूरती में पर्यटक इतना रम जाता है कि उसे वहाँ से हटने का मन ही नहीं करता है। बस एकटक इस झरने की विशालता को देखते रहो। बहुत ही रोमांचक एवं मन को आनंदित करने वाला यह दृश्य कई दिनों तक आँखों के सामने घुमता रहता है।

 

जलप्रपात तक पहूँचने के लिये चार किलो मीटर के घने जंगल में  पैदल चलना पड़ता है। जंगल बेहद घना एवँ डरावना हैं। गांव वालो की मदद के बिना यहां जाना असंभव एवँ खतरनाक हैं। जलप्रपात की विशालता , अप्रतिम सुन्दरता चार किलोमीटर की पैदल थकान दूर कर देती है। झरने की फुहारें तन-मन को पुनः ताजा कर देती है।   

 

इस जलप्रपात के  ऊपर एक छोटा सा झरना भी है। झरना छोटा है आस-पास की कुश की झाडियां के कारण वह काफी सुन्दर लगता है। झरने के ऊपर से घाटी में चारों तरफ फैली हरियाली एवं नीचे गिरते पानी की कल-कल ध्वनि मन को रोमांचित कर देती है।

 

इस झरने की आवाज 4 किलोमीटर की दुरी पर स्थित बस्ती में  साफ साफ सुनाई देती है। बरसात के दिनों में यह जलप्रपात अपने विशाल रूप को पा लेता है। गर्मी के दिनों में नदी में पानी कम होने के कारण इसकी भव्यता थोड़ी कम हो जाती है। वर्षाकाल में इन्द्रावती नदी अपने उफान पर होती है। इसलिए उस समय यहाँ पहुचना बहुत ही कष्ट दायक होता है।

 

नवम्बर से मार्च तक के समय  में इस झरने का पर्यटन का किया जा सकता है। यहाँ पहुंचने के लिये पैदल ही जाना  पड़ता है । माओवाद से प्रभावित क्षेत्र होने के कारण नदी के उस पार सड़क नहीं है।  पतली पगडण्डी में चलते हुए यहाँ पंहुचा जा सकता है।

दोपहिया वाहन से अगर जाना हो तो मूचनार में इन्द्रावती नदी पार कर जाना पड़ता है। डोंगी से बाईक समेत नदी पारकर हांदावाड़ा जा सकते है।  यहाँ जाने के लिए किसी जानकार व्यक्ति को साथ ले जाना ही उचित है अन्यथा कई दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। 

 

आलेख एवं फ़ोटो

ओम सोनी
गीदम, दंतेवाड़ा बस्तर
छत्तीसगढ़

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