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बस्तर अंचल में रामलीला मंचन की परम्परा

वर्तमान बस्तर अंचल को रामायण काल में दण्डकारण्य क्षेत्र के नाम से संबोधित किया जाता था। तब का दण्डकारण्य ओड़िसा जैपुर स्टेट, आंध्रप्रदेश का गोदावरी, महाराष्ट्र का चांदा, भण्डारा छत्तीसगढ़ का सिहावा, नगरी और कांकेर से वर्तमान बस्तर तक विस्तृत फैला हुआ था। इस महाअरण्य में ऋषि-मुनि तपस्या करते थे। विभिन्न पौराणिक साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि चौदह वर्ष के वनवास काल में भगवान श्रीराम का दण्डकारण्य में आगमन हुआ था। उन्होने घूम-घूम कर दण्डकारण्य में विचरण करने वाले सूर्पणखा, खर, दूषण, ताड़का आदि राक्षसों का वध कर ऋषि-मुनियों को भय से मुक्त किया था।

प्रभु राम ने बाल्यकाल से जीवन में जो कौतुक या खेल किया उसे रामलीला कहते हैं। उनकी लीला को प्रकट रूप में आम जन देख सके इसलिए रामलीला का मंचन प्रारंभ हुआ। रामलीला की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। देश के अनेक क्षेत्र में रामलीला मण्डली गठित कर मनोरंजन के लिए रामलीला का मंचन  किया जा रहा है, साथ ही धनोपार्जन एवं जीविकोपार्जन भी किया जा रहा है। दशहरा के दिन रावण वध की परंपरा है इसलिए रामलीला का मंचन ज्यादातर क्वार नवरात्रि के अवसर पर किया जाता है और रावण वध के साथ समापन किया जाता है।

बस्तर अंचल में रामलीला के इतिहास पर दृष्टि डालें तो पता चलता है कि ईस्वीं सन् 1890 में लक्ष्मण दास उत्तर प्रदेश से बस्तर आये हुए थे जो तपस्वी बाबा के नाम से चर्चित थे। उन्होंने प्रबुद्ध एवं जागरुक लोगों के सहयोग से रामलीला मण्डली की स्थापना की थी। कुछ वर्षों तक रामलीला का मंचन उत्साह से किया गया किन्तु बाद में उनकी मण्डली निष्क्रिय हो गई।

सन् 1913 में बनारस से एक रामलीला मण्डली राजधानी जगदलपुर आई थी। मंडली ने कई दिनों तक राजमहल में रामलीला का मंचन किया। इससे प्रभावित हो कर सन् 1914 में राजा रुद्रप्रताप देव ने एक रामलीला मंडली की स्थापना की। राजा रुद्रप्रताप देव के शासन काल में दशहरा (क्वांर नवरात्रि) एवं चैत्र नवरात्रि के समय जगदलपुर नगर में रामलीला का मंचन होता था। इस आयोजन में आने वाले खर्च का वहन राजमहल की ओर से किया जाता था। कालान्तर में इस आयोजन से प्रेरित हो कर अनेक गांवो तक रामलीला का विस्तार हुआ और पीढ़ियों से भक्तिभाव के साथ मनोरंजन के लिए यह आयोजन अनेक गांवों में आज तक जारी है।

महर्षि बाल्मीकि द्वारा रचित रामायण को आधार बना कर रामलीला की शुरुआत हुई। सोलहवीं शताब्दी के पश्चात तुलसीकृत रामचरित मानस रामलीला का मुख्य आधार बना तथा मंचन की व्यापकता बढ़ी। क्षेत्र में संचालित अनेक रामलीला मंडली से संपर्क करने पर यह ज्ञात हुआ कि तुलसीदास रचित रामचरित मानस के चौपाई से उद्धृत कर रामलीला के लिए संवाद का चयन किया जाता है। किन्तु अब संवाद का चयन ”रामलीला रामायण” से भी करने लगे हैं।

मंडली का गठन करने वाला व्यक्ति ही प्रायः संचालक एवं निर्देशक होता है।  व्यास गद्दी में बैठ कर मंडली का संचालन करता है इसलिए व्यास भी कहलाता है। वह प्रसंगानुकूल चौपाई का पाठ करता है तथा यथा योग्य पात्रों को निर्देशित भी करता है। पात्रों का चयन व्यास करता है, पात्र चयन में यह ध्यान रखा जाता है कि वह शारीरिक रुप से भी अनुकूल हो। जैसे रावण की भूमिका निभाने वाला व्यक्ति दिखने में दबंग हो, उनकी आवाज में कठोरता हो, सीता के लिए कोमलांग एवं आवाज में मधुरता हो, सूर्पणखा का कद ऊंची हो आदि। पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। रामलीला के मंचन में महिलाओं की कोई भूमिका नहीं होती। सीता मंदोदरी सूर्पणखा आदि स्त्री पात्रों की भूमिका पुरूष ही निभाते आ रहे हैं।

रामलीला का मंचन वर्षो से चली आ रही पारंपरिक शैली में करते हैं। गांव के किसी छोर पर या गांव के मध्य खुले मैदान (ओपन थिएटर) में यह आयोजन होता है। शुरुआती दौर में जब संसाधन उपलब्ध नही थे तब आयोजक एवं कलाकार मिल कर स्थानीय स्तर से संसाधन जुटा लेते थे। लकड़ी को छील कर तलवार, पुआल एवं कपड़ा लपेट कर गदा, बांस से तीर-धनुष आदि सामग्री का निर्माण कर लेते थे। स्थानीय लुहार से बनवाया गया लोहे का धनुष भी कहीं-कहीं प्रचलन में है। सभी सामग्री अब बाजार में रेडीमेड मिल जाती है। शेरवानी, मुखौटा, परदे आदि कुछ जरूरी सामग्री कांकेर, नगरी, उमरकोट (ओड़िसा) के बाजार से खरीदते हैं। फिर भी अधिकांश सामग्री की व्यवस्था ग्रामीण स्थानीय स्तर पर कर लेते हैं।

खुले मंच में रोशनी की कोई व्यवस्था नही थी तब मसाल जला कर मंच में उजाला करते थे। दर्शक अंधेरे में बैठ कर अपना भरपूर मनोरंजन करते थे। मंच के नजदीक बैठने के लिए बाकायदा बोरा बिछाकर पहले ही अपने लिए जगह आरक्षित करना पड़ता था। रात्रि में दूर-दूर के गांव से भी चलकर लोग रामलीला देखने के लिए उमड़ पड़ते थे। पहले लगातार चौदह दिनों तक रामलीला का मंचन किया जाता था। बाद में एक सप्ताह और अब तीन दिन में सिमट कर रह गया है। टी. वी. चेनल, मोबाइल आदि इलेक्ट्रानिक माध्यमो के कारण दर्शकों की संख्या में कमी अवश्य आई है,  बावजूद आज भी गांवो में रामलीला का महत्व कम नहीं हुआ है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में रामलीला देखने लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है।

रामलीला में नृत्य या गीत,  संगीत आदि का उपयोग न के बराबर होता है। रामबाजा (हारमोनियम) तबला और मंजीरा ही मुख्य वाद्ययंत्र होता था। (हारमोनियम को ग्रामीण क्षेत्रों में रामबाजा कहा जाता था) अब बेंजो, केसियो आदि अनेक आधुनिक वाद्ययंत्रो का उपयोग भी रामलीला में होने लगा है। ध्वनि पिस्तारक यंत्र तो अब अनिवार्य ही हो गया है। पहले रामलीला प्रदर्शन के लिए अनेक गांवों से आमंत्रण आता था। प्रायः सभी मंडलियां दूसरे गांवो में जाकर रामलीला का मंचन कर चुके हैं, अब यह परंपरा भी लगभग समाप्ति की ओर है।

बस्तर की रामलीला मंडलियों में आंचलिकता का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। रामलीला के सफल अयोजन के लिए सूत्रधार द्वारा सर्व प्रथम विघ्नहर्ता गणेश जी एवं वाणी की देवी मां सरस्वती की पूजा आराधना की परंपरा रही है। बस्तर के गांवों में लोक देवी-देवताओं का अपना अलग महत्व एवं विशेष स्थान है। यहां रामलीला आयोजन के पूर्व देव बिठाया जाता है और ग्राम देवता से अनुमति मिलने के बाद ही रामलीला का मंचन किया जाता है। कहीं-कहीं रामलीला मंच में शीतला माता के प्रतीकात्मक स्वरुप को स्थापित किया जाता है। रामलीला आरंभ करने के पूर्व मुखौटा आदि साजो सामान की पूजा की जाती है। ग्रामीणों में यह आशंका बनी रहती है कि किसी भी पात्र पर जादू-टोना किया जा सकता है। शीतला माता जादू-टोना के दुश्प्रभाव से कलाकारों की रक्षा करती है। जादू-टोना से संबंधित अनेक घटनाओं के किस्से भी ग्रामीण बताते हैं।

रामलीला के पात्रों को अनुशासन में रह कर, अभिनय के लिए एक निर्धारित सीमा एवं मर्यादा का पालन करना पड़ता है। अभिनय की प्रभावोत्पादकता को बढ़ाने के लिए विदूषक (सह कलाकार) भी होते हैं। ये हास्य कलाकार जोकर होते हैं तथा बीच-बीच में उटपटांग हरकत कर दर्शकों को हंसने के लिए मजबूर कर देते हैं। इनकी भाषा स्थानीयता के आधार पर गोंडी,  हल्बी या बस्तरी होती है।

रावण भाठा में रावण वध के साथ रामलीला का समापन होता है। गांवों में समापन की अपनी अलग-अलग परंपरा होती है, कहीं रावण वध के बाद मंच में वापस आकर राम का राज्याभिषेक किया जाता है। कहीं रावण वध के बाद राम, लक्ष्मण, सीता सहित हनुमान एवं वानर सेना गांव का भ्रमण करते हैं। प्रत्येक घर में पद प्रक्षालन कर इनकी पूजा की जाती है तथा आरती उतारी जाती है।

एक गांव की ऐसी परंपरा है जहां रावण का वध तो किया जाता है किन्तु पुतले को जलाया नही जाता, क्योंकि रावण के नाभी में अमृत कुंड होता है। रावण वध के बाद नाभी में स्थित कुंड से अमृत तत्व की लूट (छिना-झपटी) होती है, सभी उपस्थित जन अमृत का टीका अपने माथे पर लगाते हैं। लोक विश्वास है कि अमृत का टीका लगाने से मानसिक एवं शारीरिक व्याधि दूर होती हैं। अन्त में यह भी उल्लेख करना समीचीन प्रतीत होता है कि बस्तर में कुछ लोग अब रावण वध एवं हिन्दू देवी-देवताओं के विरोध पर उतर आये हैं। किन्तु सामाजिक सौहार्द्र के प्रतीक रामलीला में कथित जनजातीय समुदाय के लोग भी राम,  लक्ष्मण, विभीषण आदि की भूमिका निभाते रहे हैं। कई गांवों में तो रामलीला की शुरुआत ही इन्हीं वर्ग के लोगों ने की थी।

आलेख

श्री घनश्याम सिंह नाग
ग्राम पोस्ट-बहीगाँव जिला कोण्डागाँव छ.ग.

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