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जलियांवाला बाग

कणकाँ दी मुक गई राखी, ओ जट्टा आई बैसाखी

भारत कृषि प्रधान देश है, यहाँ के तीज त्यौहारों के मूल में कृषि कर्म ही दिखाई देता है। कोई त्यौहार फ़सल बोने की खुशी में मनाया जाता है तो कोई फ़सल काटने की। वर्षा होने की खुशी में तो वर्षाजनित रोगों की रोकथाम के लिए भी लोक पर्व मनाया जाता है। इसके साथ ही फ़सल बोने के उपरांत भी त्यौहार मनाने की परम्परा है। कुल मिलाकर बात यह है कि हमारा समाज उत्सवधर्मी है एवं उत्सव मनाने का कोई मौका नहीं छोड़ता।

जलियाँवाला बाग का बलिदान

जब बैसाखी का त्यौहार आता है तो जलियाँवाला बाग के बलिदान को कैसे भुलाया जा सकता है, जब इसी दिन जनरल डायर ने निहत्थी भीड़ पर आँख मूंद कर अंधाधुंध गोलियाँ चलाने का आदेश दिया था। जिसकी निशानी आज भी जलियाँवाला बाग में सहेज कर रखी गई हैं। दीवारों पर गोलियों के चिन्ह आज भी अंग्रेज शासकों की क्रूरता की कहानी स्वयं ही बयान करते हैं।

ऐसा ही कृषि आधारित एक पर्व है बैसाखी, जो पारम्परिक रूप से हर साल 13 या 14 अप्रैल को मनाया जाता है। यह त्यौहार सिख और हिन्दुओं दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। यह अन्य नववर्ष के त्यौहारों के साथ मेल खाता है, जो भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य क्षेत्रों में, जैसे पोहेला बोशाख, बोहाग बिहू, विशु, पुथंडु और अन्य क्षेत्रों में वैसाख के पहले दिन मनाए जाते हैं।

बैसाखी हर्ष और उल्लास का पर्व है। इस दिन वैसाख माह की मेष संक्रांति भी होती है। पंजाब में विशेष रूप से मनाया जाने वाला यह पर्व भारत के अन्य राज्यों में भी मनाया जाता है। इस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है। 13 अप्रैल 1699 को 10वें गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। सिखों के लिए ही नहीं हिंदुओं के लिए भी ये त्योहार खास महत्व रखता है।

क्यों मनाते हैं बैसाखी

अप्रैल माह में रबी फसल कटकर घर आती है। इसे बेचकर किसान धन कमाते हैं। इसलिए भी बैसाखी का यह पर्व उल्लास का पर्व माना गया है। वैसे तो हर साल बैसाखी के दिन पंजाब में कई मेले लगते हैं। लेकिन जब बैसाखी में कुंभ का मेला भी हो तो इस दिन स्नान करने का महत्व और भी बढ़ जाता है।

बैसाखी और खालसा पंथ का संबंध

बैसाखी के दिन ही सिख गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। और आनंदपुर साहब के गुरुद्वारे में पांच प्यारों से वैशाखी पर्व पर ही बलिदान के लिए आह्वान किया गया था। सिख धर्म में वैशाखी को बहुत ही महत्वपूर्ण त्योहार माना गया है।

बैसाखी के दिन रात होते ही आग जलाकर उसके चारों तरफ एकत्र होते हैं और फसल कटने के बाद आए धन की खुशियां मनाते हैं। नए अन्न को अग्नि को समर्पित किया जाता है और पंजाब का परंपरागत नृत्य भांगड़ा और गिद्दा किया जाता है। गुरुद्वारों में अरदास के लिए श्रद्धालु जाते हैं। आनंदपुर साहिब में, जहां खालसा पंथ की नींव रखी गई थी, विशेष अरदास और पूजा होती है।

गुरुद्वारों में गुरु ग्रंथ साहब को समारोह पूर्वक बाहर लाकर दूध और जल से प्रतीक रूप से स्नान करवा कर गुरु ग्रंथ साहिब को तख्त पर प्रतिष्ठित किया जाता है। इसके बाद पंच प्यारे ‘पंचबानी’ गायन करते हैं। अरदास के बाद गुरु जी को कड़ा प्रसाद का भोग लगाया जाता है। प्रसाद भोग लगने के बाद सब भक्त ‘गुरु जी के लंगर’ में भोजन करते हैं।

पद्म पुराण में कहा गया है कि वैसाख माह में प्रात: स्‍नान का महत्‍व अश्‍वमेध यज्ञ के समान है। वैसाख शुक्‍ल सप्‍तमी को महर्षि जह्नु ने अपने दक्षिण कर्ण से गंगाजी को बाहर निकाला था। इसीलिए गंगा का एक नाम जाह्नवी भी है। अत: सप्‍तमी को गंगाजी के पूजन का विधान है।

भगवान बद्रीनाथ की यात्रा की शुरुआत भी इसी माह होती है। वैसाखी बंगाल में ‘पैला (पीला) बैसाख’ नाम से, दक्षिण में ‘बिशु’ नाम से और केरल, तमिलनाडु, असम में ‘बिहू’ के नाम से मनाया जाता है।

सिख समाज वैसाखी के त्योहार को सामूहिक जन्मदिवस के रूप में मनाते हैं। पंजाब और हरियाणा के किसान सर्दियों की फसल काट लेने के बाद नए साल की खुशियां मनाते हैं। इसीलिए यह त्‍योहार पंजाब और आसपास के प्रदेशों का सबसे बड़ा त्योहार और खरीफ की फसल के पकने की खुशी का प्रतीक बताया गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि हिन्दू पंचांग के अनुसार गुरु गोविन्द सिंह ने वैसाख माह की षष्ठी तिथि के दिन खालसा पंथ की स्थापना की थी। इसी दिन मकर संक्रांति भी थी। इसी कारण से वैसाखी का पर्व सूर्य की तिथि के अनुसार मनाया जाने लगा। प्रत्येक 36 साल बाद भारतीय चन्द्र गणना के अनुसार बैसाखी 14 अप्रैल को पड़ती है।

बैसाखी का त्योहार बलिदान का त्योहार है। मुग़ल शासक औरंगज़ेब ने तेगबहादुर सिंह को दिल्ली के चांदनी चौक पर शहीद कर दिया था, तभी गुरु गोविंदसिंह ने अपने अनुयायियों को संगठित कर ‘खालसा पंथ’ की स्थापना की थी।

कहां-कहां मनाते हैं बैसाखी पर्व

वैसे पंजाब ही नहीं, हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भी वैशाखी की धूम रहती है। इसके साथ ही जहां-जहां सिख धर्म पल्लवित है वहां बैसाखी जरूर मनाई जाती है। इस दिन तीर्थों में स्नान का महत्व भी है।

1977 में एक फिल्म आई थी ‘ईमान धरम’। जिसका एक गाना ‘जट्टा आई बैसाखी’ बहुत पॉपुलर हुआ था। आज भी जब कभी यह गाना सुनने को मिल जाता है तो बैसाखी से जुड़ी कई यादें फिर से जहन में ताजा हो जाती हैं।

परन्तु इस दिन अंग्रेजों के जनरल डायर द्वारा किये गये नरसंहार को भी नहीं भूला जा सकता। आज का दिन स्वतंत्रता संग्राम में खेत रही हुतात्माओं को याद करने का भी दिन हैं, उन्हें अपनी श्रद्धाजंलि व्यक्त करें एवं श्रद्धासुमन चढाकर त्यौहार मनाएं।

आलेख

ललित शर्मा इण्डोलॉजिस्ट रायपुर, छत्तीसगढ़

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