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पारधी जनजाति की शिल्पकला आधारित जीवन शैली

पारधी जनजाति मूल रूप से एक खानाबदोश शिकारी, खाद्य संग्राहक घुमंतू जनजाति है। इनका मुख्य कार्य शिकार करना है। जीविकोपार्जन के लिए पारधी जनजाति के लोग शिकार करते हैं। वर्तमान में शिकार पर प्रतिबंध होने के बाद भी ये तीतर, बटेर, घाघर, खरगोश, सियार, लोमड़ी आदि का चोरी छुपे शिकार कर लेते हैं। पुरुष लोग सुबह से फ़ंदे लेकर शिकार खेलने निकल जाते हैं और स्त्रियाँ माला-मुंदरी के साथ जड़ी बूटी बेचने का काम करती हैं। भंवरी फ़ल एवं रीठा की दो तरह की माला बेचते है। घुमंतू पारधी जनजाति की पहचान शिकारी जनजाति के रूप में रही है, शासन द्वारा शिकार पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद वर्षों से इनकी छिंद वृक्ष के पत्तों की शिल्प कला अब इनकी विशिष्ट पहचान है।

पारधी जनजाति की शिल्प कला :

छत्तीसगढ़ में शिल्प-कला राज्य के लाखों लोगों के जीवकोपार्जन का मुख्य साधन है, साथ ही राज्य अपने शिल्पकारों की निपुणता के माध्यम से पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। प्रत्येक शिल्प-कला की विशेषता इतिहास और समकालीन प्रभावों के बीच समन्वय को दर्शाती है। लकड़ी पर नक्काशी का कार्य, बांस की बनी वस्तुएं/फर्नीचर, कांसा धातु से बने शिल्प, मृदुभांड की मूर्त्तियां, जनजाति लोगों के आभूषण और पत्तों की शिल्प कला छत्तीसगढ़ राज्य की कुछ विशेषताएं हैं। पर्यावरण की विपुलता ने अपनी सम्पूर्ण सूक्ष्मता के साथ उन शिल्पकारों की कल्पनाशीलता पर अमिट छाप छोड़ी है। शिल्पकारों ने सभी उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों की उपयोग किया गया है। ऐसे ही पारधी जनजाति के छिंद के पत्तों की विशिष्ट शिल्प कला है, जो विश्व प्रसिद्ध है।

पत्ता शिल्प के अंतर्गत छिंद के पत्तों से विभिन्न वस्तुओं का निर्माण:

पत्ता शिल्प, पेड़ पौधों के विभिन्न आकारों से मिलने वाले पत्तों के लिए मनुष्य का मन आदि काल से ही आकर्षित रहा है मनुष्य ने इन पत्तों में कला के आयाम ढूंढे हैं छिन्द पत्तों से कलात्मक खिलौने चटाई आसन, दूल्हा-दुल्हन के मौर आदि बनाए जाते हैं पत्तों की कोमलता के अनुरूप उन्हें विभिन्न कला अभिप्राय को बनने में पारधी घुमंतू जनजाति के पारंपरिक कलाकार आज भी अपनी विरासत को सम्हाले हुए है।

लोक जीवन में जन्म संस्कार से लेकर मृतक संस्कार तक छिंद के पत्तों की शिल्पकला का महत्व:

छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में छिंद के वृक्ष का विशेष महत्व है। छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल राज्य होने के कारण यंहा के विभिन्न संस्कारों में प्राकृतिक वस्तुओं की निकटता दिखाई पद्धति है। यंहा जन्म से लेकर मृत्यु तक के विभिन्न अवसरों पर प्राकृतिक वस्तुओं का ही उपयोग किया जाता है। जन्म संस्कार से लेकर मृतक संस्कार तक एवं सुख-दुख के विविध अवसरों पर छिंद का किसी ना किसी स्वरूप में अवश्य उपयोग किया जाता है। छत्तीसगढ़ में छिंद की पत्ता शिल्प कला लोक जीवन एवं संस्कृति का अभिन्न अंग है।

जन्म संस्कार में छिंद के पत्ता शिल्प कला:

छत्तीसगढ़ में किसी बच्चे का जन्म होना ईश्वरीय कृपा एवं पूर्वजों का आशीर्वाद माना जाता है। छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में जन्म संस्कार का विशेष महत्व है। प्रत्येक जातिओं एवं जनजातियों में जन्म संस्कार करने की परंपरा है। जन्म संस्कार में जन्म होने के छठवें दिन विशेष शुद्धि कर बच्चे का नामकरण किया जाता है। इस अवसर पर जाति एवं जनजातीय समाज के परिवारजन जन्म बच्चे के लिए विविध प्रकार के खिलौने लाते है। जिसमें छिंद के पत्तों से बने प्राकृतिक खिलौने भी शामिल होते है। छिंद के पत्तों से झुनझुना, फिलफिली, चिड़िया, मछली आदि खिलौने बनाए जाते है। छिंद के बीज ग्रामीण क्षेत्रों में जायफल, बादाम, हरड एवं हल्दी के साथ मिलाकर जन्म घुट्टी की दिया जाता है। जिससे बच्चों का पाचन तंत्र दुरुस्त होता है।

विवाह संस्कार में छिंद के पत्ता शिल्प कला: छत्तीसगढ़ के जातीय एवं जनजातीय समाज में विवाह संस्कार बड़े ही धूम धाम से किया जाता है। वन आच्छादित प्रदेश होने के कारण विवाह के अवसर पर विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों के प्रयोग किया जाता है। यहाँ तक की आभूषण के तौर पर छिंद के पत्तों से बने अंगूठी तथा दूल्हा दुल्हन मुकुट के मौर(सेहरे) में भी छिंद के पत्तों से बने मौर का ही उपयोग किया जाता है। शादियों में इस्तेमाल होने वाले सेहरे को स्थानीय बोली हल्बी में मउड़ कहा जाता है। जिसका हिंदी में शाब्दिक अर्थ मुकुट या मौर होता है। इस मौर का विवाह के अवसर पर विशेष महत्व है।

इसे बनाने हेतु छिंद के पीले पत्तों का प्रयोग किया जाता है, पारधी समाज के शिल्पकार छिंद के पिले सुनहरे रंग के एक आकार के पत्तों को लेकर उसके आवश्यकता अनुसार एक रूप में जोड़ते जाते है। जब मौर(सेहरा) तैयार हो जाता है, तब उसे हल्दी के घोल में डुबोने से यह और भी दमक उठता है। इसके बाद इस मौर के बीच में देवी देवताओं की तस्वीर के साथ सजावट हेतु चमकीली झिल्ली से सजाया जाता है। इस सेहरे का उपयोग दूल्हा दुल्हन अपने मुकुट में करते है।

विवाह संस्कार कई चरणों में पूर्ण होता है। जिसमे कई रस्म (नेग) होते है। एक रस्म तेल- हल्दी (हरदीयाही) लगाने का होता है, इस दिन लाए हुए छिंद के मौर को तेलमौरी कहते है, इसे दूल्हा-दुल्हन के सिर पर लगाया जाता है। मंगरोहन, मड़वा, करसा, देवतला और “मौर सौपने” के रस्म के समय घर की महिलाएं भी अपने सिर पर बांधे हुए रहती है। विवाह संस्कार के दौरान पूजा के कलश पर भी छिंद के पत्तों से बने एक प्रकार के माले का उपयोग भी किया जाता है। “टिकावन” के समय पुरुष अपने सांफे में, कोई अपने जेब में छिंद के मौर को लगाते है।

मृतक संस्कार में छिंद के पत्ता शिल्प कला:

मृतक संस्कार के दौरान भी छिंद के पत्तों से बने वस्तुओं का उपयोग किया जाता है। वैदिक कालीन मानव का जीवन सोलह संस्कारों में विभक्त था एवं उसी के अनुसार उनके कार्य और व्यवहार थे। जनजातीय समाज मुख्य रुप से जन्म, नामकरण, विवाह और मृत्यु संस्कार को मानता है। बैगा जनजाति द्वारा भी यह संस्कार किए जाते हैं।

मृत्यु के बाद कई संस्कार किए जाते है, नौवें दिन नहावन (मांदी नहावन) का कार्यक्रम किया जाता है। जिसमे छिंद के पत्तों से बनी एक मुंदरी (अंगूठी) रखी रहती है, पत्ते के पास ही विधवा बैठती है और गांव की अन्य महिलाएं उस पर पानी के थपेड़े मारती है। पानी के थपेड़े में कोई जीव जन्तू आ जाए तो समझ लो मृतक को स्त्री से अत्यधिक प्यार था। छिंद के पत्तों से बनी अंगूठी को वही पानी मे विसर्जित कर दिया जाता है, इसका अर्थ है मृतक से विधवा का अब कोई सम्बद्ध नही है।

घरेलू आवश्यक वस्तुएँ (टोकरी,झाड़ू, चटाई) बनाने में: बस्तर में छिंद वृक्षों की अधिकता है, यंहा के छिंद पेड़ों के बड़ी पत्तियों से घरेलू वस्तुओं में झाड़ू, चटाई, टोकरी आदि बनाए जाते है। यह पेड़ उपजाऊ से लेकर बंजर मैदानी भूमि में, सामान्य से लेकर अत्यंत सूखे मैदानी भागों में, सभी तरह की मिट्टी में आसानी उग जाता है। इसके धारीदार तने और उस पर पत्तियों का ताज धारण करने के बाद यह किसी आकर्षण से कम प्रतीत नहीं होता है। यंहा के ग्रामीण इलाकों में छिंद के पत्तों से सुंदर टोकरियाँ, झाड़ू, चटाई इत्यादि बाजारों में आसानी से मील जाते है।

छिंद के पत्तियों से झाड़ू निर्माण: सबसे पहले पारधी लोग अपने आस पास में उपलब्ध छिंद के पेड़ का चयन करते है। आज कल अपने गाँव के आस पास के अन्य लोगों के छिंद के पेड़ों को ठेके पर भी लेते है। छिंद के पेड़ का चयन पत्तियों के आकार के आधार पर घर का बड़ा/कुशल व्यक्ति करता है। तत्पश्चात पेड़ से पत्तों को कट कर घर पे आते है। इसके पश्चात एक समान आकार के पत्तियों को उनके द्वारा प्रयुक्त औजार का प्रयोग कर एक एक कर पत्तियों में बहुत सारे रेशे का निर्माण कर लेता है। अब पत्तियों में कई रेशे या शाखा नजर आने लगते है। इन पत्तियों को अपने घर या बाड़ी में सूझने के लिए छोड़ दिया जाता है। जब पत्तियां अच्छी तरह सुख जाती है। तब आवश्यकता अनुसार 4-5 छिंद की पत्तियों को इकट्ठा कर रस्सीयों से अच्छी तरह बांध कर मढ़ाई की जाति है। आज कल प्लास्टिक की पाइपों का भी प्रयोग किया जाने लगा है।

घर के अंदर तथा बाहर उपयोग करने वाली 3 तरह की झाड़ू बनाए जाते है। 1.घर के अंदर उपयोग वाली 2.बाहर उपयोग वाली 3. जाला झाड़ू घर के सीलिंग के उपयोग हेतु। छींद की पत्तियों से बने झाड़ू काफी मजबूत और किफायती होते हैं। झाड़ू बनने के बाद पारधी पुरुष/महिला इसे बाजारों में बेचने भी जाते है।

छिंद के पत्तियों से चटाई, टोकरी निर्माण:

पारधी लोग पेड़ से पत्तों को कट कर घर लें आते है। इसके पश्चात एक समान आकार के पत्तियों का चुनाव कर प्रत्येक डाल से पत्तियों को अलग कर लिया जाता है। चटाई एवं टोकरी निर्माण हेतु चौड़े पत्तों का उपयोग नहीं किया जाता है। अलग किए पत्तियों को पुनः बीच से दो भागों में बात लिया जाता है। इसके बाद इसे धूप में सुखाया जाता है। सूखे हुए पत्तों की बुनाई घर की महिलाएं करती है। बुनाई करके चटाई का निर्माण कर लिया जाता है। बुनाई किए हुए लंबे चटाई को आवश्यकता अनुसार छोटे-छोटे भागों में काट कर, उसके किनारों को पुनः छिंद के पत्तों से बुनाई कर एक चटाई तैयार कर लिया जाता है। इसी तरह बुनाई करते हुए बीच-बीच में बांस की पतली लकड़ियों को लगा कर टोकरी की संरचना तैयार कर लिया जाता है।

“छिंद ग्रामीण भारत के लिए अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख साधन भी है, इसकी पत्तियों से निर्मित झाड़ू मजबूती, कार्य क्षमता और टिकाऊपन के मामले में ग्रामीण भारत की पहली पसंद है। वहीं इसके फलों की मजबूत डंठलों का झुंड खेत खलियान की सफाई के लिए झाड़ू की तरह काम करता है। ग्रामीण भारत में इसकी लंबी संयुक्त पत्तियों से बड़े-बड़े टाट तैयार किये जाते है, जो बैलगाड़ी को चारों ओर से घेरने के काम आते हैं। ग्रामीण झोपड़ी और जानवरों के अस्तबल कोठे (पशुओं के रहने की जगह) आदि इन्हीं से बनाते हैं। शिक्षा स्तर इनमें निम्नतर है, पूरे कबीले के सिर्फ़ चार बच्चे ही स्कूल में पढ़ने के लिए जाते हैं। सरकार के द्वारा सारी सुविधा मिलने पर भी शिक्षा इनके द्वार नहीं पहुंच पाई है। परन्तु ये अपने परम्परागत कार्य माहिर हैं।

आलेख

वेद प्रकाश सिंह ठाकुर
एम. ए. (प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व) रायपुर छत्तीसगढ़ .

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