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भारत के ईंटो से निर्मित प्राचीन मंदिर

भारत में गुप्तकाल से मंदिर-देवालय निर्माण कार्य में भव्यता दिखाई देने लगती है। इस काल में प्रस्तर निर्मित मंदिरों की बहुलता दिखाई देती है। कुछ स्थानों पर ईष्टिका निर्मित मंदिर भी हैं, जो कि निर्माण कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। पकी लाल ईंटों से निर्मित ये मंदिर शिल्पकारों की कार्यकुशलता को प्रदर्शित करते हैं।

ये ईंटों से बनाये मंदिर, प्रस्तर मंदिरों से टक्कर ले रहे हैं तथा एक सहत्राब्दी से अक्षुण्ण दिखाई देते हैं। इन ईंटों को इस तरह पकाया गया है कि मौसम की मार का असर इन पर हजार वर्षों में भी कम ही दिखाई देता है। ईष्टिका निर्मित मंदिर भारत में बिरले ही हैं, जिनमें हमें छत्तीसगढ़ में ईष्टिका निर्मित कई मंदिर दिखाई देते हैं। हिंदू धर्म या सनातन धर्म सदियों पुराना है, परन्तु मंदिरों का निर्माण 2000 वर्ष के आस-पास ही माना जाता है।

भीतर गाँव कानपुर का मंदिर

प्रारंभ की पांच छह शताब्दियों तक ऊँचे पहाड़ों की गुफाओं को ही मंदिर के रूप में इस्तेमाल का चलन रहा है। भारत में मानव निर्मित ईंटों से जो मंदिर बना, वह उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जिलान्तर्गत आने वाला भीतरगाँव का मंदिर है। यह कानपुर शहर से लगभग 20 मील दूर स्थित है। ईंटों के बने इस गुप्तकालीन मंदिर को भी अलेक्जेंडर कनिंघम ने खोजा था।

भीतरगांव कानपुर का ईंटों से निर्मित मंदिर

ईष्टिकाओं से निर्मित इस मंदिर का निर्माण 6 वीं 7 वीं शताब्दी में भारत के स्वर्णिम गुप्तकाल के दौरान हुआ था। भीतरगाँव मंदिर को प्राचीन हिन्दू पवित्र स्थान माना जाता है जिसमें ऊंची छत या शिखर है। यह मंदिर अपनी सुरक्षित तथा उत्तम साँचे में ढली ईटों के कारण विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसकी एक-एक ईट सुंदर एवं आर्कषक आलेखनों से खचित थी।

सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर

छत्तीसगढ़ के सिरपुर में महारानी वासटा द्वारा भी ईष्टिका निर्मित मंदिर का निर्माण कराया गया। यह ईष्टिका निर्मित मंदिर अपने काल की अनुपम कृति है। भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर का निर्माण महारानी वासटा ने अपने पति हर्ष गुप्त की स्मृति में 635-640 ई. में कराया था। मंदिर की प्राचीनता को लेकर मुझे भीतरगांव एवं सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर एक ही काल के दिखाई देते हैं।

सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर का विहंगम दृश्य

सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर के द्वार पट पर दशावतार का अंकन दिखाई देता है। मंदिर बाहरी भित्ति में छद्म गवाक्ष एवं द्वारों का निर्माण किया गया है तथा मौर्यों के प्रतीक मयूरों का अंकन भी इस मंदिर की भित्तियों में दिखाई देता है। ईष्टिका निर्मित इस मंदिर की भित्तियों पर की गई शिल्पकारी अनुपम है। यहाँ से प्राप्त ताम्र पत्र के अनुसार इस मंदिर के सुचारु रुप से संचालन के लिए महारानी वासटा ने कई गांव दान किये थे।

सिरपुर का राम मंदिर

सिरपुर का राम मंदिर

सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर के सामने ही ईष्टिका निर्मित राम मंदिर के अवशेष हैं, यह मंदिर भग्न है एवं जंघा तक ही दिखाई देता है। उच्च अधिष्ठान पर निर्मित यह मंदिर किस देवता को समर्पित था यह कहना कठिन है, परन्तु स्थानीय लोग इसे राम मंदिर के नाम से उच्चारित करते हैं। इसका निर्माण काल भी लक्ष्मण मंदिर के समकालीन दिखाई देता है।

पलारी का सिद्धेश्वर मंदिर

छत्तीसगढ़ की रायपुर से बलोदाबाजार रोड पर 70 कि॰मी॰ दूर स्थित पलारी ग्राम में बालसमुंद तालाब के तटबंध पर यह शिवालय स्थित है। इस मंदिर का निर्माण लगभग ७-८वीं शती ईस्वी में हुआ था। ईष्टिका निर्मित यह मंदिर पश्चिमाभिमुखी है। मंदिर की द्वार शाखा पर नदी देवी गंगा एवं यमुना त्रिभंगमुद्रा में प्रदर्शित हुई हैं। प्रवेश द्वार स्थित सिरदल पर शिव विवाह का दृश्य सुन्दर ढंग से उकेरा गया है एवं द्वार शाखा पर अष्ट दिक्पालों का अंकन है।

पलारी का सिद्धेश्वर मंदिर

गर्भगृह में सिध्देश्वर नामक शिवलिंग प्रतिष्ठापित है। इस मंदिर का शिखर भाग कीर्तिमुख, गजमुख एवं व्याल की आकृतियों से अलंकृत है जो चैत्य गवाक्ष के भीतर निर्मित हैं। विद्यमान छत्तीसगढ़ के ईंट निर्मित मंदिरों का यह उत्तम नमूना है। जनश्रुतियों के अनुसार इस मंदिर एवं तालाब का निर्माण नायकों ने छैमासी रात (विशेष मुहूर्त) में किया गया।

मुंगेली के नारायणपुर ग्राम का मंदिर

यह ईष्टिका निर्मित मंदिर जिला मुख्यालय मुंगेली से नवागढ़ मार्ग पर 15 किमी की दूरी पर नारायणपुर ग्राम में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण काल तेरहवीं शताब्दी का बताया जाता है। इस मंदिर की विशेष बात यह है कि यहाँ भीतरी भित्तियों पर मिथुन शिल्प का अंकन है। जो भारत के अन्य कहीं मंदिरों में दिखाई नहीं देता।

नारायणपुर मुंगेली का मंदिर (फ़ोटो-साभार)

मंदिरों में मिथुन शिल्प का अंकन बाहरी भित्तियों में किया जाता है, परन्तु इस मंदिर में भितरी भित्तियों में किया गया है, इसलिए यह ईष्टिका निर्मित मंदिर भारत में विशेष स्थान रखता है। यह मंदिर तालाब के किनारे स्थित है, इससे प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में इस मंदिर बड़ी मान्यता रही होगी तथा यहाँ मेला आदि का भी आयोजन होता रहा होगा। इसका निर्माण किसने कराया यह इतिहास के गर्भ में है।

नवागांव का मंदिर

राजधानी मुख्यालय रायपुर से राष्ट्रीय राजमार्ग पर चौदह किमी की दूरी पर ग्राम नवागांव में तालाब की पाल पर यह ईष्टिका निर्मित मंदिर स्थित है। ऊंचे अधिष्ठान पर निर्मित इस पूर्वाभिमुखी मंदिर में गर्भगृह, अंतराल एवं मंडप है। इस मंदिर का गर्भगृह रिक्त है, इससे ज्ञात नहीं होता कि इसका निर्माण किस देवता के निमित्त किया गया था।

नवागांव रायपुर का मंदिर (फ़ोटो-साभार)

विद्वान इस मंदिर को 16 वीं 17 वीं शताब्दी का मानते हैं। इस मंदिर की प्रस्तर निमित द्वार शाखा एवं शिलापट की निर्माण शैली से 12 वीं 13 वीं शताब्दी का होना प्रतीत होता है, परन्तु विशेष निरीक्षण से ज्ञात होता है कि यह द्वार शाखा एवं शिलापट अन्य किसी भग्न मंदिर की इस मंदिर में स्थापित की गई है।

इस तरह हमें ज्ञात होता है कि दक्षिण कोसल (वर्तमान छत्तीसगढ़) में ईष्टिका निर्मित मंदिरों के निर्माण की परम्परा प्राचीन काल से ही रही है तथा भारत में सबसे अधिक ईष्टिका निर्मित मंदिर छत्तीसगढ़ में ही प्राप्त होते हैं। छत्तीसगढ़ से बाहर सिर्फ़ भीतरगांव के ही ईष्टिका मंदिर के निर्माण की जानकारी मिलती है।

आलेख

ललित शर्मा इंडोलॉजिस्ट

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One comment

  1. बहुत रोचक जानकारी.

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