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बनमावली जातरा में सिरहा को साबूत अंडा खिलाते हुए

छोटे डोंगर परगना की आराध्या देवी बनमावली

छत्तीसगढ़ के दक्षिण में स्थित बस्तर सम्भाग सात जिले में विभक्त है। इसका एक जिला नारायणपुर है, जिला मुख्यालय से ओरछा (अबुझमाड़) मार्ग के पैंसठ किमी पर ग्राम धनोरा स्थित है। यहाँ से पूर्व दिशा में लगभग दस किमी पर ग्राम मडमनार है। यह गाँव केसुरमेटा पहाड़ी की तराई में बसा छोटा शांत एवं सुंदर गाँव है।

केसुरमेटा आमदई पहाड़ी शृंखला का एक भाग है। केसुरमेटा गोड़ी भाषा के शब्द का अर्थ है केसुर का साग और मेटा का पहाड़। पहले के लोग बताते थे कि इस पहाड़ में पारद (शिकार) खेलने जाने पर शिकार अवश्य मिलता था। इसलिए इस पहाड़ को केसुरमेटा अर्थात साग मिलने की पहाड़ी कहा जाता है।

इस पहाड़ी की तराई में बसे गाँव मड़मनार के तीन किमी बाद एक छोटी सी टेकरी को बनमावली डोंगरी कहते हैं। यहीं पर एक आम के झाड़ के नीचे विराजमान है छोटे डोंगर परगना की आराध्या देवी बनमावली। मावली माता बस्तर की सर्वमान्य देवी है। इन्हें उनके स्थान या उनके चमत्कार का नाम देकर पुकारा जाता है। बीहड़ वन में होने के कारण इन्हें यहाँ बनमावली कहा गया है।

बनमावली का जातरा तीन साल में एक बार मनाया जाता है। एक बार इस बनमावली डोंगरी पर दो साल आमदई पहाड़ी की तराई में स्थित कोटेन पखना (धान कूटने का पत्थर) है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ राजघराने का धान कूटने वाला पत्थर रखा हुआ था, जो आज भी मौजूद है। पास में दो वृक्ष जिसे आज भी लोग करन एवं नारंगी के नाम से पुकारते हैं। ये नाम राजा और रानी के हैं। उनकी याद में ये वृक्ष आज भी मौजूद हैं। इन वृक्षों में संतरे के जैसे फ़ल लगते हैं, इन्हें खाने में उपयोग नहीं करते हैं।

बनमावली देवी का विग्रह

कहा जाता है कि किसी जमाने में राजा करन सिंह एवं रानी नारंगी देवी का राज था। राजा करन सिंह ने यहाँ गढ़मावली की स्थापना की थी। यह उनके राज्य की आराध्या देवी थी और आज इन्हें छोटे डोंगर परगने के लोग पूजते हैं। छोटा डोंगर परगना में चौरासी गाँव आते हैं। आमदई पहाड़ी शृंखला के दोनो ओर ये चौरासी गाँव आबाद हैं। एक ओर के लोग जब कोटेन पखना में दो वर्ष जब माता का जातरा होता है तब अपने देवी देवताओं के साथ भाग लेते हैं और तीसरे वर्ष बनमावली डोंगरी में जातरा होता है। तब दूसरे ओर के लोग अपने देवी देवताओं के साथ भाग लेते हैं।

जातरा का अर्थ विशेष सामुहिक पूजा है, विशेष पूजा से तात्पर्य है, जिस पूजा में उसे देवी या देवता के अंतर्गत आने वाले देवी देवताओं की सामुहिक पूजा की जाती है। जब देवी या देवता अपने गढ़ की स्थापना करते हैं तब वे अपने अंतर्गत आने वाले देवताओं को एक-एक गाँव देकर उस गाँव में अधिसंख्यक गोत्र के लोगों को उनका सेवादार बनाते हैं।

इसी गोत्र के लोग उस माटी गायता (समाजिक धार्मिक कार्य सम्पन्न कराने वाला) पुजारी (देवी या देवता का सेवादार) पटेल (गाँव का प्रशासनिक मुखिया) बनाए जाते हैं। ये तीन पद गाँव की सर्व सम्मति से चुने जाते हैं। मगर सिरहा (जिसके ऊपर देवता की सवारी आती है) का चुनाव देवता स्वयं करता है। गढ़ के प्रधान देवता द्वारा गाँव देने के समय इस गांव के लोगों के द्वारा एक कराड़ (करार) किया जाता है जिसे वे विशेष पूजा के समय पूरा करते हैं। इस तरह प्रधान देवता के अंतर्गत आने वाले देवताओं की सामुहिक विशेष पूजा को जातरा कहा जाता है।

जातरा का अर्थ देवी देवताओं की विशेष पूजा है, जातरा शब्द का प्रयोग देवियों की विशेष पूजा के लिए किया जाता है। अन्य देवताओं की विशेष पूजा के लिए अन्य नाम है। जैसे मंडा देव (मंडप के देवता) या गोत्र देवता के विशेष पूजा को ककसाड़ या खरसाड़ कहा जाता है। आदिवासी समाज साल में एक बार अपने देवताओं की सामुहिक पूजा अवश्य करता है।

उसका मानना है कि उसके जीवन में आने वाले सुख दुख देवता की प्रसन्नता और नाराजगी का प्रतिफ़ल है। उसके देवता जितने प्रसन्न होंगे, उतनी उसके जीवन में सुख समृद्धि आएगी और उनके किसी कार्य व्यवहार से नाराज होंगे तो उनके जीवन में नाना प्रकार के कष्ट आएंगे। जिसका निदान भी उनके देवताओं के पास है। वे उन्हें प्रसन्न करने के लिए नाना प्रकार के उपाय करते हैं। वाद्य बजाकर नाचते हैं, गाते हैं, पूजा करते हैं, बलि देते हैं।

युवाओं का समूह ढोल नृत्य

देवताओं को भी प्रसन्न करके नचाया जाता है। मान्यता है कि देवता जितना प्रसन्न होकर आंगन में खेलेंगे उतनी गाँव में सुख समृद्धि आएगी। यह सब जातरा के अंतर्गत किया जाता है। हम कह सकते है कि विशेष पूजा में देवताओं को प्रसन्न करने के लिए गायन, वादन और नृत्य किया जाता है उसे जातरा कहा जाता है।

बनमावली का जातरा प्रत्येक तीसरे साल में उनके स्थान पर बनमावली डोंगरी में मनाया जाता है। इस जातरा का समय बस्तर की 93 दिनों तक चलने वाले विश्व प्रसिद्ध दशहरा के बाद पहली फ़ुरसत का है। दशहरा मनाकर लौटने के बाद आदिवासी समाज पहुंचनी या बोहरानी मनाता है तत्काल बाद चरु और दिवाड़ मनाता है। फ़िर इस बनदेवी मावली मात्रा का जातरा मनाता है। \

हर दो वर्ष में आमदई पहाड़ी की तराई में मनाने के बाद तीसरे वर्ष यहाँ जातरा मनाया जाता है। इस तरह दो स्थान पर जातरा मनाने के पीछे यह तर्क दिया जाता है कि राजा करन सिंह के द्वारा गढ़मावली की स्थापना अपने स्थान कोटेन पखना के पास की थी। इसलिए इस स्थान पर माता मावली का जातरा मनाया जाता है। राजा का राज्य नहीं रहने के बाद भी साल में एक बार यह जातरा आयोजित होते रही है।

तीसरे वर्ष बनमावली डोंगरी में जातरा मनाने की कहानी ऐसी है। आमदई पहाड़ की तराई के गांव एक-एक करके वीरान हो रहे थे। कारण था शेर खोरी। शेर खोरी को गोंडी में उरपायना कहते हैं। शेर खोरी से तात्पर्य है जब शेर या किसी हिंसक जंगली जानवर द्वारा आदमी या पालतु पशु को गाँव में लगातार मारकर खाना। इसे आम तौर पर गाँव बिगड़ना भी कहा जाता है।

आदिवासी समाज का मानना है कि जब ऐसी घटना लगातार हो रही है तो अवश्य उनसे प्रकृति का कोई नियम भंग हुआ है। परिणामस्वरुप ऐसी घटना घट रही है। उपाय के रुप में नाराज देवी देवताओं को मनाने का प्रयास किया जाता है। जब इससे भी काम नहीं बनता तब सामुहिक रुप से उस क्षेत्र को छोड़ देते हैं और गाँव वीरान हो जाता है। ऐसे ही एक-एक करके आमदई पहाड़ के तराई में बसे गाँव वीरान हो रहे थे।

इसी समय गढ़मावली के पुजारी बरन सिंह बेलसरिया जी को सपने में आकर माता जी ने बताया कि मैं आमदई पहाड़ी की शृंखला के कोसुरमेटा पहाड़ की तराई में एक आम के झाड़ के नीचे प्रकट हुई हूँ, जाओ मेरी वहाँ सेवा करो, मैं सबके कष्ट दूर कर दूंगी। बरन सिंह बेलसरिया ने अपने सपने की बात गढ़मावली के अनुयायी सभी लोगों को बताया। सभी लोग वीरान गाँव के लोगों को साथ लेकर माता की खोज किये, मिलने पर उनकी सेवा कर उन्हें प्रसन्न किया गया और वीरान गाँव फ़िर से आबाद होने लगे।

देवी देवताओं को मनाने के लिए नृत्य करते हुए युवतियां

आबाद वीरान गाँव के लोगों ने माता से अनुमति लेकर विशाल जातरा का आयोजन इसी स्थान पर किया। वीरान गाँवों को माता ने फ़िर से अपने चमत्कार से आबाद किया था, इस बात की पुष्टि हल्बा जनजाति से अलग दूसरी जनजाति के लोग भी करते हैं। माता की आज्ञा से हर तीसरे साल में यहाँ जातरा करने की अनुमति दी गई है। तब से यहाँ हर तीसरे साल जातरा का आयोजन होता है।

बनमावली की सेवा का अधिकार बरन सिंह को दिया गया। वर्तमान में पुजारी लिखराम बेलसरिया के पूर्वज थे बरन सिंह बेलसरिया। माता मावली का मंदिर छोटे डोंगर में है। जिसे आज दंतेश्वरी माता कहा जाता है। मगर माता का जातरा दो बार कोटेन पखना में और तीसरी बार बनमावली पहाड़ी पर आयोजित किया जाता है।

चुंकि बनमावली का स्थान छोटे डोंगर से पच्चीस किमी दूर है और यहाँ पर माता की साक्षात मूर्ति प्रकट हुई है इसलिए इस स्थान पर सप्ताह में दो दिन सेवा करना अनिवार्य है। छोटे डोंगर से पुजारी सप्ताह में दो दिन नहीं आ सकते इसलिए यहाँ सप्ताह में सेवा करने का भार मडमनार के सकरु और जमदर के परिवार को दिया गया है। मुख्य पुजारी लिखराम बेलसरिया है।

बनमावली पहाड़ी जाने के लिए नारायणपुर से ओरछा मार्ग से ग्रांम धनोरा (पैंसठ किमी) के बाद सकरी पगडंडी से गुजरकर छ: किमी मडमनार पहुंचना पड़ता है। इसके बाद तीन किमी का पैदल रास्ता है। अंत में छोटी सी पहाड़ी पर पहुचने पर माता जी का स्थान है। यहाँ पहुंचना बहुत ही दुष्कर है।

पगडंडी में दो पहिया वाहन तो जा सकता है मगर मेडनार से उद्भुत पुल विहीन माड़ीन नदी को छ: बार पार करना पड़ता है। सारी बाधाएं पार करने के बाद जब यहां पहुंचने पर मन को शांति मिलती है। बहुत मनोहारी स्थान है, लगता है कि प्रकृति की गोद में आ गये हैं।

ऊंचे ऊंचे वृक्षों के नीचे यह स्थान स्थित है। पास में अबुझमाड़ से निकलकर एकमात्र माड़ीन नदी बहती है। पास ही एक झरना है, जिसे कुकुर घुमर कहा जाता है। झरने को हल्बी और गोंड़ी भाषा में घुमर कहा जाता है। आमदई पर्वत शृंखला से घिरा हुआ स्थान केसुरमेटा (पहाड़) की तराई में स्थित है।

बनमावली देवी जातरा में देवी को अर्पण करने के लिए पुष्पाहार बनाता माली समुदाय

यहाँ प्रागट्य बनमावली की मूर्ति संभवत: नल काल या नाग काल की है। यह बहुत ही छोटी मूर्ति है, इसकी ऊंचाई लगभग दस बारह अंगुल की ही होगी। यह एक विशाल आम्र वृक्ष के नीचे विराजमान है। इसके चारों ओर अन्य प्रजातियों के वृक्ष हैं। जिनमें महुआ, सल्फ़ी, साल, साजा के वृक्ष प्रमुख हैं।

यह स्थान नवबेल की लताओं से आच्छादित है। नवबेल को बस्तर में बहुत ही पवित्र बेल माना गया है। यह मनुष्य के शरीर के रोग व्याधि उतारने के काम में आती है। बस्तर के ग्रामीण क्षेत्र में आज जादू टोना-टोटका जैसे अंधविश्वास प्रचलित है। प्रचलित मान्यता के अनुसार जब किसी व्यक्ति को यह महसूस होता है कि उसके ऊपर जादू टोना किया गया है। तब वह किसी वैद्य या रिहा के पास जाता है। वह जानकार व्यक्ति इसी नवबेल से उस व्यक्ति को झाड़ता है।

बस्तर की आराध्या माता जिसे बत्तीस बहना के नाम से जाना जाता है। जो दूर्गा माता के बत्तीस स्वरुप ही है, यह नवबेल इन माताओं की पहली पसंद है। यह पवित्र बेल का बनमावली माता के स्थान पर होने पर इस स्थान पर लोगों की आस्था दुगुनी हो जाती है। इस बेल को चाहे कहीं भी उगे लोग अपनी गृहशांति के लिए अवश्य लेकर जाते हैं और अपने घर की शांति करते हैं।

बनमावली का जातरा मनाने के लिए तीन साल में एक बार इस बनमावली डोंगरी पर इस देवी को मनाने वाले एकत्रित होते हैं और इस देवी के अंतर्गत आने वाले देवी देवताओं को मनाने वाले अपने देवताओं के साथ एक दिन पूर्व ही ग्राम मडमनार आने लगते हैं। दिन ढलने के बाद सभी लोग मडमनार के घोटुल में इकट्ठा हो जाते हैं और अपने साथ लाये दाल-चावल को पकाकर खाते हैं।

इस घोटुल से लगभग तीन किमी दूर यह बनमावली पहाड़ी है, जहाँ खाना खाने के बाद अपने देवताओं के साथ पहुंचते हैं। बनमावली के मुख्य पुजारी लिखराम बेलसरिया सभी आगत देवताओं का सम्मान कर उचित आसन में विराजमान करते हैं। सभी के सामने दीप जलाकर विधिवत पूजा करते हैं।

देवता खेलाते हुए

फ़िर आस-पास गांव से आये लड़के लड़कियां अपने देवताओं के सम्मान में ढोल नृत्य करते हैं। लड़के ढोल बजाकर नृत्य करते हैं तो लड़किया रेला नृत्य करते हुए आगत देवताओं का गीत के माध्यम से यशोगान करती है। यह नृत्य रात भर सुबह होने तक चलता है।

आगत देवताओं के सिरहाओं को भी देवताओं की सवारी आती है और वे भी इस दल में सम्मिलित होकर नाचते हैं। जातरा मनाने का आशय भी यही होता है कि आदिवासियों के देवी देवता आंगन में जितनी प्रसन्नता से खेलेंगे गांव में उतनी सुख समृद्धि आएगी।

यह बनमावली का स्थान जिला नारायणपुर, जिला कोण्डागाँव एवं अबुझमाड़ के सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित है। इस जातरा में सभी क्षेत्र लोग जाते हैं। इस जातरा में तारागाँव, धनोरा, टेकानार, रायनार, झोरी, पेरमापाल (कोण्डागाँव) रेंगा बेड़ा, इतपुल्ली, कुंदोली, पदमनार सभी अबुझमाड़ के लोग अपने देवी देवताओं के साथ आते हैं।

इस जातरा में सम्मिलित होने वाले प्रमुख देवी देवता हैं, मुन्दी (छोटे डोंगर), बैहा (झोरी), दुड़कोला (कुंदोली), कुडुमटोला (कुंदोली), पुगांरटी (झोरी), बनमावली (मडनार) जलनी बूढी (पेरमपाल) डारपुंगटोला (टेकानार) परदेशिन (मडमनार) और भी देवी देवता इस जातरा में भाग लेते हैं। पर प्रमुख रुप से इन्हे ही माना जाता है। इस जातरा में सामाजिक समरसता देखने को मिलती है।

तारागाँव के माली समाज के लोग अपने साथ लाये फ़ूलों की माला बनाकर देवताओं को पहनाकर सम्मान करते हैं। धनोरा से कुम्हार दिया धूपनी लाते हैं। टेकानार से राऊत समाज के लोग तेल और घी की पूर्ति करते हैं। इस जातरा को मावली माता के अंगरक्षक कुडुमटुल्ला बाबा छोटे डोंगर सम्पन्न कराते हैं।

इस जातरा का पूजा विधान अन्य जातराओं से अलग है। अन्य जातराओं में मुख्य जातरा के दिन दोपहर के बाद पूजा होती है। यहाँ सुबह आठ बजे से पूजा आरंभ होकर दस बजे तक समाप्त हो जाती है। सुबह एक बार फ़िर ढोल नाच होता है। यहाँ देव नंगाड़ा भी बजाया जाता है, यह नंगाड़ा माता जी को चढाया हुआ नंगाड़ा है इसे कोई भी बजा सकता है। वैसे देव नंगाड़ा बजाने का अधिकार गान्डा अन्दकुरी समाज को ही है।

मुख्य पुजारी कुकुरघूमर से नहाकर आते हैं और अपने सहयोगियों के साथ माता जी की सेवा की तैयारी करते हैं। माता बनमावली के सिरहा पर माता जी का सिर चढता है। वह माता जी की मूर्ति के सामने बैठ जाता है। बनमावली माता जहाँ विराजमान है, वहाँ एक खुला स्थान है। प्राकृतिक संरचना है। यहीं मूर्ति का प्रागट्य हुआ है। अब सेवाकारी लोग एक एक करके उस सिरहा की गोद में बैठकर अपने साथ लाये नारियल, अगरबत्ती, चाँवल, फ़ूल सिरहा को देते हैं।

सिरहा मनौती सुनने के बाद माता जी को इंगित कर बताता है और सेवा सामग्री मुख्य पुजारी को देता है। जिसे वे पूजा करने के बाद माता जी को अर्पित कर देते हैं। इस सारे प्रक्रिया के दौरान कुडुमटुल्ला बाबा माता जी के सामने मौजूद रहते हैं। यह क्रम चलते रहता है। साथ ही लड़के-लड़कियाँ और देवतागण ढोल की थाप पर गीत गाते खेलते रहते हैं।

सेवा समाप्त होने के बाद पूजा किये जाने की घोषणा होती है और नाचने वालों के अलावा सभी लोग माता जी की पूजा में सम्मिलित होने के लिए स्थान में आ जाते हैं। इस पूजा की विशेषता है कि इसमें वैदिक पूजा के जैसे घंटा एवं पुजारी के द्वारा घंटी बजाई जाती है। शंख के स्थान पर तोड़ी बजाई जाती है। तोड़ी, डुडुम्भ जैसा ही वाद्य है।

पुजारी द्वारा पंडित के जैसे मंत्र नहीं बोला जाता, पर पूजा सामग्री अर्पित करने के समय घंटी अवश्य बजाई जाती है। माता जी की पूजा समाप्त होने के बाद सभी आगत देवताओं की पूजा होती है। इसके बाद बकरे की बलि दी जाती है। वध्य पशु का जैसे ही खून गिरता है वहाँ उपस्थित सभी सिरहाओं के ऊपर देवताओं की थोड़ी देर के लिए सवारी आती है और वे अपने-अपने स्थान पर जमीन में लोटने लगते हैं। इन्हें संभालने के लिए लोग पहले से तैयार रहते हैं। बताते हैं कि वध्य पशु में अपने भाग को पाने के लिए देवतागण आते हैं। थोड़ी देर में देवताओं को शांत करा लिया जाता है।

यह जातरा हर तीसरे वर्ष होती है, इस बीच देवताओं के पुजारियों का अवसान हो गया होता है। इस पूजा के बाद कुडुमटुल्ला बाबा से नया पुजारी बनाने का अनुरोध किया जाता है। इसके लिए वह परिवार ज्यादा उत्सुक होता है जिसके घर के पुजारी का अवसान हो चुका होता है। कुडुमटुल्ला बाबा के सामने उस परिवार के पुरुष लोग बैठ जाते हैं।

बाबा एक एक करके सबका परीक्षण करते हैं और किसी एक व्यक्ति का चयन करते हैं। उसके बाद सभी देवी देवताओं को विदाई दी जाती है। सभी पुन: तीन किमी वापस मडमनार के घोटुल में आते है। दिन का खाना यहीं पकाकर खाते हैं और अपने गाँव लौट जाते हैं। इस प्रकार सम्पन्न होता है प्रकृति की देवी बनमावली का जातरा।

आलेख

शिवकुमार पाण्डेय
नारायणपुर, बस्तर

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