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राष्ट्रीय एकता के महान शिल्पी एवं युग दृष्टा आदि शंकराचार्य

युगदृष्टा शंकराचार्य ने भारत को एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में देखते हुए, इसको और अधिक सुदृढ़ करने की दृष्टि से देश के चार कोनों पर चार मठों की स्थापना की। दक्षिण में ‘शृंगेरीमठ’, पश्चिम में द्वारिका का ‘शारदामठ’, उत्तर में बद्रीनाथ का ‘ज्योतिर्मठ’ तथा पूर्व में जगन्नाथपुरी के ‘गोवर्धनमठ’ के रूप में इनको हम वर्तमान में देखते हैं।

राष्ट्रीय एकता के महान शिल्पी श्री शंकराचार्य के करोड़ों अनुयायियों के साथ ये मठ आज भी विद्यमान हैं। देश के चारों कोनों पर इन चार मठों को स्थापित कर एक ओर वे देश को सांस्कृतिक एवं धार्मिक स्तर पर जोड़ रहे थ|

वहीं उन्होंने संन्यासियों की दस श्रेणियाँ (दशनामी) बनाकर हिन्दू समाज को अनुशासित एवं आवश्यकता पड़ने पर ‘संघर्ष-सिद्ध’ करने का भी स्तुत्य प्रयास किया। यह क्या कोई महज संयोग ही था कि केरल के ‘कालडी’ से यात्रा प्रारम्भ करके श्री शंकराचार्य ने हिमालय की गोद ‘केदारनाथ धाम’ में समाधि लेकर देश की एकता को नया आयाम दे दिया।

21 अपैल 1988, को विज्ञान भवन दिल्ली में भारत सरकार द्वारा आयोजित ‘राष्ट्रीय शंकर जयंती महोत्सव’ के अवसर पर राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण ने आद्यशंकराचार्य द्वारा राष्ट्र की एकता हेतु किए गए उनके उल्लेखनीय योगदान को स्मरण करते हुए भावपूर्ण शब्दों में कहा :

 “a unique personality who gave to Bharat its  identity. The Vishnu Purana describes the country south of the Himalayas and north of the ocean as Bharat. This Puranic ideal of a unified Country has remained with us from time immemorial. The architect who gave shape to this ideal and achieved the cultuarl unity of the country was none other than Sankar Bhagvat pad”.            (Conquest of the four Quaters, Page-1)

निम्नतम जातियों और स्त्रियों के अधिकारों तथा वर्ण के आध्यात्मिक सिता (जिनमें महत्व जन्म का नहीं वरन् आध्यात्मिक स्थिति का है) पर आचार्य शंकर ने जोर दिया। रूढ़िवादी धर्म-सम्प्रदायों के विरोध तथा कुत्सित प्रयासों के बावजूद  आचार्य  शंकर ने एक महान धर्म सुधार का सूत्रपात देश में किया।

सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन ने शङ्कराचार्य के समग्र व्यक्तित्व को शब्दों में बाँधने का प्रयास किया है। वे लिखते हैं : “शङ्कर का अद्वैतवाद, एक महान् कल्पनात्मक  साहस और तार्किक सूक्ष्मताओं का दर्शन है।…अत्यन्त कठोर तर्क के ऊपर जहाँ शंकर को पूर्ण अधिकार प्राप्त है, वहीं दूसरी ओर उन्हें एक उत्कृष्ट तथा सजीव काव्य पर भी उतना ही अधिकार प्राप्त है। …उनकी प्रतिभा की किरणों ने विचारधारा के अन्धकारमय कोनों में भी पहुँचकर उन्हें प्रकाशित किया तथा अत्यन्त निराश हृदयों के दुःखों को भी दूर कर उन्हें सान्त्वना प्रदान की। …शंकर के जीवन में विरोधी भावों का एकत्र संग्रह मिलता है। वे दार्शनिक भी हैं और कवि भी, ज्ञानी पंडित भी हैं और संत भी, वैरागी भी। हैं और धार्मिक सुधारक भी। उनमें इतने भिन्न-भिन्न प्रकार के दिव्य-गुण निहित थे कि यदि हम उनके व्यक्तित्व का स्मरण करें तो भिन्न-भिन्न मूर्त रूप हमारे सम्मुख उपस्थित हो जाते हैं। युवावस्था में वे बौद्धिक महत्वाकांक्षा के आवेश से पूर्ण, एक अदम्य और निर्भय शास्त्रार्थ-महारथी प्रतीत होते हैं। कुछ व्यक्ति उन्हें तीक्ष्ण राजनीतिक प्रतिभा से सम्पन्न मानते हैं, जिन्होंने जनता को एकता की भावना का महत्व समझाया।”                                           – (भारतीय दर्शन, भाग-2, पृ. 383,387)

शंकराचार्य ने सभी मनुष्यों के अन्दर एक आत्मा ‘सर्वात्मैक्य’ के वैदिक सन्देश को उपनिषदों तथा अन्य ग्रन्थों की व्यापक समीक्षा करके पुनः सभी के सम्मुख रखा। तर्क के द्वारा अध्यात्म की मूल बातों को सभी के हृदय में उतारने का उन्होंने प्रयास किया तथा सहिष्णुता को बनाये रखने को वे सदैव उद्यत रहे।

डॉ. राधाकृष्णन उन्हें एक महान समाज सुधारक के रूप में पाते हैं : “एक दार्शनिक तथा तार्किक रूप में सर्वश्रेष्ठ, शांत  निर्णय तक पहुँचने में तथा व्यापक सहिष्णुता में एक मनुष्य के रूप में महान् शंकर ने हमें  सत्य से प्रेम करने, तर्क का आदर करने तथा जीवन के प्रयोजन को जानने की शिक्षा दी।…उन्होंने अनेक रूढ़ियों का, उनके ऊपर उग्र आक्रमण करके नहीं अपितु शान्तिपूर्वक  उनसे अधिक युक्ति-युक्ति क्रियाओं का सुझाव रखकर विनाश किया, और साथ ही साथ यह विधान अधिकतर धार्मिक भी था।

उन्होंने आवश्यक ज्ञान के एक विस्तृत रूप को  तथा क्रियात्मक विचारों को जो कि यद्यपि उपनिषदों में निहित तो अवश्य थे| किन्तु  जिन्हें लोग भूल गए थे,  जन साधारण के मध्य प्रसारित किया और इस प्रकार एक अतीत के प्राचीन काल का हमारे लिए फिर से सृजन किया। वे कोई स्वपनदर्शी आदर्शवादी नहीं थे, वरन् एक कार्यवीर कल्पनाविहारी व्यक्ति थे, दार्शनिक होने के साथ-साथ वे एक कर्मवीर पुरुष थे, जिसे विस्तृत अर्थों में एक सामाजिक आदर्शवादी कह सकते है|”

                                                             (भारतीय दर्शन, भाग- 2, पृ. 577)

सभी के अन्दर ‘एकात्मभाव’ देखने वाले श्री शंकराचार्य के विश्वव्यापी महत्व को स्वीकारते हुए राष्ट्रपति वेंकटरमण कहते हैं कि शंकराचार्य को कालगणना की शताब्दियाँ और सहस्राब्दियाँ बाँध न सकेंगी, उनका दर्शन कालातीत और कालजयी हैः

“Adi Sankar lives in time; but is timeless. He was born in Bharatavarsha; but his vision is universal, all encompassing. And so India, which treats history not in terms of centuries or even millennia but in yugas, prefers to think of Adi Sankara not as one who moved from event to event in life but as one who gave us a vision that trancended all limitations of time. Chronologies lose their significance with one like Sankara.”

                                                   (Conquest Of The Four Quarters, Page-3)

यदि बत्तीस वर्ष की छोटी-सी उम्र में ही श्री शंकराचार्य जी की असामयिक न हुई होती तो दशनामी संन्यासियों तथा चारों मठों के एक साथ प्रारम्भ हुए प्रयासों के फलस्वरूप, समूचे भारत की आध्यात्मिक तथा सामाजिक एकता आगे चलकर,संगठित राजनीतिक चेतना को योग्य दिशा निर्देशन कर, भारत के ऊपर हो रहे बाह्य आक्रमणों  को पराजित करने में निश्चय ही सफल हो जाती। इतिहास इस बात का साक्षी है कि इतना समय बीतने के पश्चात् आज भी आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित इन  व्यवस्थाओं ने राष्ट्रीय एकात्मता हेतु महत्वपूर्ण योगदान किया है।

संदर्भ  पुस्तक भारत की संत परम्परा और सामाजिक समरसता ; लेखकडॉ कृष्ण गोपाल

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