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बस्तर की माड़िया जनजाति का गौर नृत्य एवं गौर

बस्तर की संस्कृति में पशु पक्षियों का बड़ा महत्व है, ये तोता, मैना, मुर्गा इत्यादि पक्षियों को का पालन तो ये करते ही हैं, इसके साथ इनके पारम्परिक नृत्यों में गौर के सींग का प्रयोग महत्वपूर्ण है। गौर के सींग का मुकुट बनाकर इसे नृत्य के अवसर पर पहना जाता है।

कई वर्षों से गौर को जानने के लिए वन विहार के दौरान इनके चित्र लेने का क्रम जारी है, परन्तु मादा गौर एवं उसके बच्चे के साथ चित्र लेने का मौका नहीं मिल रहा था।

एक दिन वह अवसर आ ही गया जब जंगल में गौर का समूह मिल गया। सांझ के समय मादा गौर शिशु गौर को दूध पिला रही थी। यह दुर्लभ अवसर था, जब मैंने मादा गौर द्वारा शिशु गौर को दूध पिलाते हुए छाया चित्र लिया।

जब सांझ के समय मैदान में चरते हुए मादा बछड़े को दूध पिला रही थी। अवसर का लाभ उठाते हुए हमने जी भर चित्र लिए। डर भी था कि कहीं मादा हमला न कर दे, क्योंकि गौर अकारण ही हमला कर देते हैं। इनके सामने सावधानी से व्यवहार करना पड़ता है।

दिखते तो आम भैंस जैसे ही है, पर इन्हें गौ-कुल का माना जाता है और इनकी पहचान पैरों में दिखाई दे रही सफ़ेद जुराबें हैं। गौर एशिया महाद्वीप में विशेषकर पाए जाते हैं।

बस्तर अंचल में माड़िया जनजाति के लोग विवाह के अवसर पर गौर सींग का मुकुट धारण कर “गौर नृत्य” करते हैं। यह नृत्य बहुत ही हर्षोल्लास से परिपूर्ण, सजीव एवं सशक्त होता है। यह नृत्य एक प्रकार से शिकार नृत्य प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें जानवरों की उछलने-कुदने आदि की चेष्टाओं को प्रदर्शित किया जाता है।

फिर भी इस नृत्य में सधे हुए ताल के गहन धार्मिक और पवित्र भाव समाहित होते हैं। पुरुष नर्तक रंगीन और विशिष्ट शिरोवस्त्र धारण करते हैं, जिसमें भैंस की दो सींग और उन पर मोर का एक लम्बा पंख-गुच्छ और पक्षी के पंख लगे होते हैं। इसके किनारे पर कौड़ी की सीप से बनी झालर झूलती हैं, जिससे उनका चेहरा थोड़ा-सा ढॅंका रहता है।

महिलाएँ पंखों की जड़ी हुई एक गोल चपटी टोपी पहनती हैं। नृत्य करने वाली नर्तकियाँ अपने साधारण सफ़ेद और लाल रंग के वस्त्र को सौन्दर्यमय बनाने के लिए अनेक प्रकार के आभूषणों को धारण करती है।

एक आन्तरिक गोला बनाकर वे ज़मीन पर लय के साथ डंडे बजाती, पैर पटकती, झूमती, झुकती और घूमती हुई गोले में चक्कर लगाती रहती है।

दूसरी ओर पुरुष नर्तक एक बड़ा बाहरी गोला बनाते हैं और तीव्र गति से अपने क़दम घुमाते और बदलते हुए जोर-जोर से ढोल पीटते हैं। यह नृत्य भरपूर उर्जा से भरा हुआ होता है और गजब के उत्साह के साथ किया जाता है।

इस तरह गौर बस्तर की सांस्कृतिक परम्परा का एक अंग है, माड़िया जनजाति के लोगों का इससे सांस्कृतिक संबंध त्यौहारों एवं पर्व के अवसर पर नृत्य में दिखाई देता है। कभी अवसर मिले तो इस नृत्य का आनंद अवश्य लें और बस्तर की समृद्ध संस्कृति के विषय में जानने का प्रयास करें।

आलेख एवं छायाचित्र

ललित शर्मा इंडोलॉजिस्ट

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3 comments

  1. सर गौर सींग के नीचे मूंछे बहुत जंच रहीं हैं

  2. Vijaya Pant Tuli

    सुंदर लेख नृत्य का तो बहुत सुंदर वर्णन है आंखों के आगे घूम जाता है
    आभार सुंदर जानकारी के लिए ✍️✍️✍️✍️👏👏🙏

  3. सुभाष

    बहुत तथ्य पूर्ण जानकारी. सुन्दर आलेख.

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