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माताओं उठो ! विजय प्राप्त करो !!

महिलाओं को अपना समय व ऊर्जा, गप्पें हांकने में, अफवाहें फैलाने में, दूसरों का दोष निकालने में, भौतिक सम्पदा के लिए मुकाबला करने में, झूठा स्तर बनाए रखने में और घमण्ड इत्यादि में व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। इससे चारों ओर अप्रसन्नता फैलेगी व ईर्ष्या का प्रादुर्भाव होगा। इन सब पर अंकुश लगाने पर ही आध्यात्मिक ऊर्जा बढ़ेगी और अनजाने में हमारे घरों में सामंजस्य और आनन्द की वृद्धि होगी व घर का वातावरण बदल जाएगा।

स्वामी विवेकानन्द का आह्वान था, ‘हे भारत! उठो, और अपनी आध्यात्मिकता से विश्व-विजय करो!!’ परन्तु गत शताब्दी में इस आह्वान की प्रतिक्रिया व्यक्त करने में असफल रहने पर, कम से कम अब हम इस छोटे से घरेलू उपचार से प्रारम्भ करें जिससे हमारे देश को अत्यधिक लाभ होगा। इस उपचार को तैयार करने के लिए हमारे अपने घरों से बढ़कर अन्य कोई कारखाना सुसज्जित नहीं है और बिना किसी मिलावट के इस उपचार को तैयार करने की आशा माताओं से है जो अपने परिवार के निस्तेज होने से व्यथित हैं।

अध:पतन रूपी ऑक्टोपस की भुजाएं चारों ओर से हमें जकड़ती जा रही हैं। हमारे घरों की पवित्रता- जो कुछ उसके अवशेष बचे हैं- भयाक्रांत है। इसके शिकार सर्वप्रथम हमारे बच्चे होंगे, इसके पश्चात् हमारे युवा पुत्र और पुत्रियां होंगे, जिन्हें हमारी सिनेमा-संस्कृति, आयातित चकाचौंध करनेवाली तड़क-भड़क के साथ मिलकर बड़ी सहजता से शिकार कर लेगी। कोई भी इस कामुकता और विलासिता के दबाव के सम्मुख टिक नहीं पाएगा जब तक कि वे इससे अधिक बलवान, अधिक ऊर्जावान और अधिक संतोषप्रद कारण से जुड़े हुए न होंगे। यदि माताएं इस जद को संरक्षित और परिपोषित करने में असफल होती हैं, हमारा परिवार रूपी वृक्ष- वह सर्वोत्कृष्ट किस्म जिसे विश्व ने शायद ही कभी देखा हो- अविलम्ब धराशायी हो जाएगा। इस अवसर पर महिलाओं को उठ खड़ा होना चाहिए और उन मूल्यों का संरक्षण करना चाहिए जो इन जड़ों को संरक्षित और पोषित करें। समय हमारे पक्ष में नहीं है। पहले से ही बहुत देर हो चुकी है।

हमारी माताओं को केवल मामूली, सुन्दर बंदिनी गृहिणी ही नहीं बनी रहना चाहिए। हमारे राष्ट्र के इतिहास के इस संकटपूर्ण समय पर उन्हें अपने राष्ट्रीय उत्तरदायित्व को समझना चाहिए। ज्यों ही हमें यह अनुभव हो जाए कि हम स्वयं इस समस्या के एक अंग हैं। चमक-दमक भौतिकवाद को निष्कंटक प्रवेश करने देने के बजाय हमें हमारे घरों को तो ‘प्रकाशदीप’ बनाना चाहिए जो इस अंधेरे को जड़ से मिटा दें और हमारे साथ ही परिवर्तन प्रारम्भ हो जाना चाहिए। हमारे देश की समस्याओं को सुलझाने में हम अपनी भूमिका निभा सकते हैं।

स्मरणातीत समय से ही, भारत में भौतिकवादी समस्याओं के जो हल हमने ढूंढ़ निकाले हैं वे सदैव हमारी आध्यात्मिक जागरुकता के प्रकाश में ही प्राप्त हुई हैं। हम आज तक हमारी भौतिक शक्ति और सम्पदा पर ही जीवित नहीं रहे हैं, वरन उस विलक्षण अवर्णनीय पर शक्तिशाली आध्यात्मिक शक्ति के भरोसे जीवित हैं जो हम लोगों की शिराओं और स्नायुओं में निरन्तर प्रवाहित थी। यह शताब्दी और यह संकट भी इसके अपवाद नहीं है। वास्तव में यदि हम एक अपवाद की रचना करते हैं तो हम उन महान राष्ट्रों के उदाहरण का ही अनुकरण कर रहे होंगे जो समय के आतंक से नष्ट-भ्रष्ट हो गए।

दुर्भाग्य से एक भी आध्यात्मिक ऊर्जा का विराट स्रोत हमें उपलब्ध नहीं है। वास्तव की अपेक्षा दिखावा करनेवाले अधिक हैं। अतः यह अत्यावश्यक है कि हम छोटे-छोटे कुएं, जितने अधिक और जहां-जहां सम्भव हो, खोदें ताकि उनमें से रिस-रिस कर ऊर्जा अनेकों मार्गों से बहती रहे और हमारे सूखते हुए जीवन में पुनः ऊर्जा का संचार करें। ‘माताएं’ ही वह सर्वोत्कृष्ट स्रोत हैं जहां से हम कुछ अमृत (जीवनदायिनी शक्ति) प्राप्त कर सकते हैं। ईश्वर उन्हें आशीर्वाद प्रदान करें- अभी भी अनेकों प्रेम, त्याग और सेवा की मूर्त रूप हैं, अत्यधिक गहराई तक पैठी आध्यात्मिक शिराओं की बाहरी संकेतक हैं।

आध्यात्मिकता के पुनरुत्थान से यह तात्पर्य नहीं है कि वह उन्हें आवश्यक रूप से धार्मिक कट्टरवादी बनाएं, जिसके प्रति समस्त राष्ट्र एलर्जिक हो रहा है। इसका तात्पर्य सम्पूर्णता की जागरूकता को आगे बढ़ाना व समृद्ध बनाना है, परिस्थितियों की प्रतिक्रियाओं को सम्पूर्ण हृदय से व्यक्त करने योग्य बनाना है, हमारी परम्परा, हमारी संस्कृति और हमारी विरासत की भावना से उन्हें जोड़ना है। यदि हम यह प्राप्त कर सकें तो हम अभी भी हमारे राष्ट्र को बचाने की आशा कर सकते हैं।

‘साधारण, सामान्य व्यक्ति कर सकते हैं और निश्चित रूप से सम्पूर्ण बन सकते हैं। वे कर सकते हैं व निश्चित रूप से उस तरीके से रह सकते हैं जो उनके उच्चतम और अत्यधिक वांछित मूल्यों को प्रकट करें- वे मूल्य जो सम्पूर्ण मानव इतिहास में सार्वभौमिक और सामूहिक रूप से अत्यधिक पुरस्कृत रहे हैं। वे लोग जो सम्पूर्ण बन जाते हैं वे आन्तरिक और बाह्य सम्बन्धों में जानबूझ कर सामंजस्य स्थापित कर ‘सम्पूर्णता’ प्राप्त करते हैं।’ (‘ऑर्डीनरी पिपल एज मोंक्स एण्ड मिस्टिक्स’ – द्वारा मारशा सिनेटर, पॉलिस्ट प्रेस, न्यूयार्क)

यह आश्चर्यजनक है यदि हम आन्तरिक सत्यों को दैनिक जीवन की मांगों के साथ एकाकार कर सकें। क्या इसे प्राप्त किया जा सकता है? हमारी महिलाएं उत्तर प्रदान कर सकती हैं।

आध्यात्मिकता, जो ऐसी वस्तु नहीं है कि जिसे बाहर से आयातित कर सकें, का निर्माण करने के दो तरीके हैं। यह कुछ ऐसी वस्तु है जो हमारे भीतर है और जो बाहर निकलने व प्रस्फुटित होने के लिए प्रतीक्षारत है। इसके लिए सबसे पहले हमें उन बाधाओं को हटाना होगा जो इसको बाहर आने से रोकती हैं और दूसरी बात इसके रिसाव के प्रवाह को बनाए रखना होगा और उसे सभी प्रकार से समृद्ध करना होगा ताकि वह हमारे सांसारिक जीवन की गतिविधियों में खो न जाए। जबकि प्रथम तरीका हमारी मानसिक जागरूकता में आंशिक समायोजन की मांग करता है, दूसरा हमारे दैनिक जीवन को जानबूझकर दैविक बनाने के प्रयत्न की आवश्यकता की मांग करता है। दोनों ही महिलाओं के लिए सरल हैं और वे बिना किसी प्रयत्न के इन्हें कर सकती हैं। इसके साथ वे अपने घरों में बिना किसी प्रकार का विघ्न डाले सामंजस्य बनाते हुए रह सकती हैं। कोई भी व्यक्ति इसे जान भी नहीं पाता क्योंकि दृष्टिकोणों में परिवर्तन मानसिक स्तर पर ही होता है।

पहला नियम है कि निरर्थक भौतिक आवश्यकताओं का अनुसरण करने में समय, सामग्री और ऊर्जा के क्षरण को टाला जाए। समय ही वह एकमात्र मुद्रा है जिसे हम अपने परिवार के लाभ के लिए व अपने स्वयं के सुधार के लिए खर्च करते हैं। प्रातः 4 बजे से रात्रि 10 बजे तक 18 घण्टों तक हम इस ‘सबसे बड़े’ राष्ट्रीय कार्य – हमारे घरों को भौतिक और आध्यात्मिक रूप से प्रसन्न और स्वच्छ रखते हैं। अनेकों महिलाओं ने इस रहस्य को सीख लिया है और फिर भी दूसरों की मदद करने का समय निकाल लेती हैं। उनकी लघु स्तरीय इकाईयां हैं जहां वे अन्य तुलनात्मक रूप से कम भाग्यशाली महिलाओं को रोजगार प्रदान करती हैं। वे बच्चों या वयस्कों के हितार्थ विभिन्न पाठ्यक्रम चलाती हैं, प्रौढ़ शिक्षा कक्षाएं इत्यादि। ये सभी कार्य वे, आजकल जिन विभिन्न व्यवसायों में कार्यरत हैं उनके अतिरिक्त करती हैं। उन्हें केवल इतना ही करना है कि इस चित्र में निष्ठा और उद्देश्य की भावना का समावेश करना है और इसे उस तरीके से करना है जो स्वामीजी ने सिखाया है- ‘आत्मानो मोक्षार्थम् जगत् हिताय च’। उसके पश्चात एक सांसारिक कार्य आध्यात्मिक रंग ग्रहण कर लेता है और हमारे घरों में वह अदृश्य समृद्धि ले आता है।

महिलाओं को अपना समय व ऊर्जा, गप्पें हांकने में, अफवाहें फैलाने में, दूसरों का दोष निकालने में, भौतिक सम्पदा के लिए मुकाबला करने में, झूठा स्तर बनाए रखने में और घमण्ड इत्यादि में व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। इससे चारों ओर अप्रसन्नता फैलेगी व ईर्ष्या का प्रादुर्भाव होगा। इन सब पर अंकुश लगाने पर ही आध्यात्मिक ऊर्जा बढ़ेगी और अनजाने में हमारे घरों में सामंजस्य और आनन्द की वृद्धि होगी व घर का वातावरण बदल जाएगा। इस अवर्णनीय ऊर्जा का आनन्द लेना परिवार के सभी सदस्य सीख जाएंगे।

इन दिनों महिलाएं बहुत से पदार्थ व्यर्थ गंवा रही हैं। सबसे अधिक ‘उपभोक्तावाद’ ने हमारे देश की महिलाओं को प्रभावित कर रखा है। वस्त्र निर्माण सामग्री, खाद्य सामग्री, फैंसी-सजावट सामग्री, आन्तरिक साज-सज्जा में बार-बार परिवर्तन और फर्नीचर में बदलाव आदि। ऐसे बहुत से अमीर लोग हैं जिनके ‘शौक’ हमारे सामाजिक परिवेश में ‘छिद्र’ बनाते जा रहे हैं। घर एक अस्त-व्यस्त बाजार की तरह दिखाई दे रहे हैं। इन महिलाओं के पास, संकट में फंसी एक गरीब बहिन की मदद के लिए पैसा नहीं है, परन्तु व्यर्थ के दिखावे के लिए नाली में बहाने को खूब पैसा है। प्रत्येक बार जब हम ऐसा करते हैं हमारा राष्ट्र अधिक निर्धन हो जाता है और जो व्यक्ति निरन्तर ऐसा करते रहते हैं वे हृदय से निर्धन हो जाते हैं। आध्यात्मिक प्रवाह का विचार ही नहीं आता। ‘शैतान’ अक्षरशः ऐसे परिवारों में प्रवेश कर उनकी प्रसन्नता और कल्याण को नष्ट करता रहता है।

इस ज्वार को रोकने के लिए, हमें हमारे भीतर और हमारे बच्चों के अन्दर ऐसी बातों, विचारों और परम्पराओं को विकसित करना होगा, जो वास्तव में भारतीय हैं। उन्हें ऐसा करना ही चाहिए, दूसरों के प्रति घृणा के कारण नहीं परन्तु उन वस्तुओं के लिए जो उनकी स्वयं की हैं। हमारे अन्दर कोई कमी नहीं है। हमारी कला, संगीत, नृत्य, स्थापत्य कला, साहित्य इत्यादि ने विश्व में अपना स्थान बनाया है, केवल क्षणिक सौन्दर्य और उपयोगिता के लिए नहीं बल्कि उनकी परिपूर्ण विषय-वस्तु के लिए जो मन में गहराई तक छू जाती है, जो मानव-जीवन को उन्नत, उदात्त और समृद्ध बनाती है। हमारी युवा पीढ़ी को हमारी संस्कृति और परम्पराओं से प्रेम करना सिखाकर हम हमारे बच्चों के लिए इन सबका उपहार प्रदान करेंगे और इस प्रकार हमारी विरासत की शान में वृद्धि करेंगे और उसकी निरन्तरता सुनिश्चित करेंगे।

यह तो केवल प्रारम्भ मात्र है, जागरुकता उत्पन्न करने का पहला कदम, हमारी मातृभूमि को स्वस्थ व सक्रिय बनाए रखने का प्रयत्न। क्या भारत की महिलाएं हमारी महान मातृभूमि के लिए कम से कम इतना भी नहीं कर पाएंगी?

आलेख,
डॉ.एम.लक्ष्मीकुमारी दीदी,
विवेकानन्द केन्द्र

  • लेखिका विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी की पूर्व अध्यक्ष, तथा वर्तमान में वैदिक विजन फाउंडेशन निदेशक हैं।

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