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लिंगई माता आलोर

पौराणिक देवी-देवताओं की वनवासी पहचान : बस्तर

पुरातन काल से बस्तर एक समृद्ध राज्य रहा है, यहाँ नलवंश, गंगवंश, नागवंश एवं काकतीय वंश के शासकों ने राज किया है। इन राजवंशों की अनेक स्मृतियाँ (पुरावशेष) अंचल में बिखरे पड़ी हैं।

ग्राम अड़ेंगा में नलयुगीन राजाओं के काल में प्रचलित 32 स्वर्ण मुद्राएं प्राप्त हुई थी। नलवंशी राजाओं का बस्तर में राज्य काल सन 350 ई. से सन 900 ई. के आस-पास तक माना जाता है।

हिंगन देई माता – विष्णु

केशकाल क्षेत्र के अनेक गांवों में आज भी प्रस्तरयुगीन अवशेष (पत्थर से बने छैनी आदि औजार) गुफाओं झरनों के आस-पास शैलचित्र, 5वीं 6वीं शताब्दी में निर्मित ईंटे, भग्न मृदा पात्र, एवं मूर्तियाँ बिखरी पड़ी हैं।

पौराणिक देवी देवताओं की इन मूर्तियों को स्थानीय परिवेश के अनुरुप नाम देकर ग्रामीण जन, पारंपरिक आदिवासी विधान से पूजा अर्चना करते हैं। ये माटी की पूजा करते हैं, अनगढ़ पत्थर एवं वृक्षों की पूजा करते हैं, इसलिए इनके देवी-देवता मिट्टी से बने हाथी, घोड़े, बैल और लकड़ी से बने आंगा, डोली, काष्ठस्तंभ आदि में बसते हैं।

स्वभाविक है कि ग्रामीण  प्रस्तर प्रतिमाओं के पौराणिक नामों से अनभिज्ञ हैं, इसलिए गाँव के आस-पास जंगलों, पहाड़ों में मिलने वाली इन प्रस्तर प्रतिमाओं को जनजातीय परिवेश में नाम देकर अपनी परम्परा के अनुसार पूजा -अर्चना करते हैं। तथा पुरुष देवताओं को भी माता के नाम से ही सम्बोधित करते हैं।

ग्राम खेतरपाल में भगवान नरसिंह की आकर्षक प्रंस्तर प्रतिमा है, इसे लोग बम्हनीन माता के नाम से जानते हैं, तथा घाट मुंड (भंगाराम) जातरा एवं पारम्परिक तीज त्यौहार में सामूहिक पूजा करते हैं।

ग्राम आलोर की पहाड़ी में गुफा के अन्दर स्थित शिवलिंग को ग्रामीण जन लिंगई माता कहते हैं। यह प्राकृतिक गुफामंदिर वर्ष में एक दिन खुलता है। पर्याप्त प्रचार-प्रसार के कारण अब यहाँ बाहरी दर्शनार्थियों की भीड़ बढ़ने लगी है, पर आदिवासी परम्परा के अनुसार शिवलिंग की पूजा लिंगई माता के रुप में ही होती है।

ग्राम पिपरा में भगवान नरसिंह की भव्य प्रतिमा है, ग्रामीण जन भगवान नरसिंह को भैरव बाबा के नाम से जानते हैं। तथा विभिन्न अवसरों पर यहाॅ पारम्परिक पूजा सम्पन्न करते हैं।

केशकाल नगर पंचायत क्षेत्र में स्थित ग्राम गढ़सिलयारा में षष्ट भुजी महिसासुर मर्दिनी की मूर्ति है, जिसे ग्रामीण शीतला माता बताते हैं। माता पहुँचानी के दिन महिषासुर मर्दिनी की पूजा शीतला माता के रूप में होती है।

ग्राम नवागढ़ के जंगल में अनेक मूर्तियाॅं लावारिस बिखरी पड़ी हैं, यहाँ गलबहियाॅ डाले, ललितासन की मुद्रा में बैठे ऊमा-महेश्वर को नकटी-नकटा देव कहते हैं, तथा वर्ष में एक बार स्थनीय मंडई के अवसर पर फूल-पान अर्पित कर देते हैं।

ग्राम भोंगापाल में बौद्ध कालीन चैत्यगृह के अवशेष हैं, यहाॅं पद्मासन की मुद्रा में बैठे गौतम बुद्ध की विशाल प्रतिमा है। गौतम बुद्ध को आदिवासी जन गांडादेव के नाम से सम्बोधित करते हैं। सांसारिक माया मोह से विरक्त गौतम बुद्ध की प्रतिमा को क्षे़त्र के आसक्त युवक खरोंच-खरोंच कर विकृत कर रहे हैं।

किसी युवती को (जिसके प्रति वह आसक्त है) पान या अन्य किसी खाद्य पदार्थ में मिलाकर खिला दे तो वह युवती आसक्त होकर स्वयं खिलाने वाले युवक के पास चली आती है। यही नुस्खा युवतियाॅं भी युवक के लिए (जिसे वह चाहती है) आजमाती हैं।

चैत्यगृह के पास एक ही प्रस्तर फलक पर उकेरी गई सप्तमातृका देवी (सत बहनियाॅं ) की मूर्ति है, इन सप्त मातृकाओं को ग्रामीण जन गांडादेव (गौतम बुद्ध) की सात पत्नियाँ बताते हैं। ज्ञातव्य है गौतम बुद्ध की एक ही पत्नी थी यशोधरा जिसे विरक्त गौतम बुद्ध ने त्याग दिया था।

बम्हनिन माता – नृसिंह

शंख, गदा, पद्म,चक्र धारण किए हुए भगवान विष्णु की भव्य प्रतिमा ग्राम बदवर में स्थापित है। ग्रामीण जन भगवान विष्णु को हिंगनदेई माता के नाम से जानते हैं, तथा हिंगनदेई माता के नाम पर वर्ष में एक बार यहाँ पारम्परिक जातरा का आयोजन किया जाता है।

ग्राम अमोड़ा में प्राचीन शिवलिंग है, आमा जोगानी, भाजी जोगानी, शादी-ब्याह के अवसर पर ग्रामीण जन इस शिवलिंग की पूजा बम्हनीन माता के रूप में करते हैं। भगवान विष्णु हों, भगवान शिव हों, या नरसिंह भगवान, यहाँ सभी पौराणिक देवताओं की पूजा माता के रूप में ही होती है।

 

आलेख

 

घनश्याम सिंह नाग
ग्राम-पोस्ट बहीगांव
जिला- कोण्डागांव छ.ग.

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