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छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम 1857 से पूर्व प्रारंभ हुआ : विशेष आलेख

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़वासियों की भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता। वर्तमान छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम 1857 से पूर्व प्रारम्भ हो चुका था, तत्कालीन समय में यह जमींदारी क्षेत्र था तथा कलचुरियों, मराठों एवं अंग्रेजों के अधीन रहा। कभी मराठों से स्वतंत्रता पाने के लिए यहाँ विद्रोह हुआ तो कभी अंग्रेजों से। इस तरह स्वतंत्रता की चाह निरंतर बलवती रही। आज हम इन्हीं घटनाओं पर दृष्टिपात करेंगे।

वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य का छत्तीसगढ़ शब्द विगत लगभग 600 वर्षों से कवियों द्वारा प्रयुक्त होते रहा है। विद्वान अपने विवेकानुसार इस शब्द की सार्थकता की व्याख्या करते रहे हैं। कुछ के अनुसार यह लगभग 1 हजार वर्ष तक रतनपुर राज्य के शासक रहे कलचुरियों से उद्धृत है जो मूलतः चेदि वंश के ही थे यद्यपि उनके राजत्वकाल में 36 से अधिक गढ़ रहे हैं।

छत्तीसगढ़ राज्य का वर्तमान स्वरूप सन 1936 के राज्य पुनर्गठन से उभरकर आया था यद्यपि महासमुंद जिला के कुछ हिस्सों को ओडिशा में जोड़कर संबलपुर जिला के फुलझर ज़मींदारी को शामिल किया गया था। इसके पीछे भी स्वतंत्रता आंदोलन ही बड़ा कारण था। जिस हिस्से को महासमुंद से अलग किया गया वह खरियार ज़मींदारी का क्षेत्र है जो 1930 के जंगल सत्याग्रह में छत्तीसगढ़ के सीमान्त क्षेत्रों के साथ कन्धा से कंधा मिलाकर लड़ रहा था।

राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित परंपरा अनुसार सन 1857 में हुए सैनिक विद्रोह के साथ और इसके बाद हुए आन्दोलनों को स्वतंत्रता आंदोलन कहा जाता है। वर्तमान छत्तीसगढ़ का अधिकांश हिस्सा उस काल में रियासतों और ज़मींदारियों के हिस्से में था और जनता वर्षों से इनके खिलाफ लड़ भी रही थी।

रतनपुर राज्य के 36 गढ़ों में से शिवनाथ नदी के उत्तर के 18 गढ़ों में से एक गढ़ “धमधा” भी था जहाँ विद्रोह की शुरुआत सन 1800 के पूर्व से प्रारम्भ हो चुकी थी। तब भोसलों का शासन था और स्थानीय जानकारों के अनुसार विद्रोही जमींदार/राजा भवानी सिंह को फांसी की सजा दी गई थी।

इस घटना के बाद सन 1817 में धमधा में दूसरा विद्रोह हुआ था तब अंग्रेज अधीक्षक कर्नल एगन्यू रतनपुर राज्य के अधीक्षक नियुक्त हो चुके थे। बताया जाता है कि गोंड़ जमींदार भवानी सिंह के वंशजों के साथ सावंत भारती नामक विद्रोही नेता ने हजारों लोगों को जुटाकर अग्रेजों की व्यवस्था को कुछ दिनों के लिए स्वयं के हाथों में ले लिया था।

प्रचलित ऐतिहासिक विवरण के अनुसार सावंत भारती को अंग्रेजों से आजीवन कारावास की सजा दी थी। धमधा में तीसरा विद्रोह सन 1830 में होरी गोंड़ नामक पुजारी के नेतृत्व हुआ था जिसे अंग्रेजी प्रशासन ने कुचल दिया था। इस विद्रोह के बाद गोंड़ क्षत्रपों का निष्कासन हुआ था या वे वहां से पलायन कर गए थे।

इनमें से एक परउ सिंह थे जिन्होंने महासमुंद तहसील के कौड़िया ज़मींदारी में शरण ली थी। कौड़िया की गोंड़ जमींदार रानी विष्णुप्रिया देवी ने परउ सिंह को जीवन यापन के लिए कुछ गाँव दिए थे तथा परउ सिंह पुत्र द्वय ठाकुर बुढ़ान शाह और जहान सिंह ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे।

रतनपुर राज्य जो नागपुर में भोसलों के अधीन था और रघुजी द्वितीय राजा थे, जिनका देहांत 22 मार्च 1816 में हुआ था। इसके बाद अप्पा जी राजा हुए और इनके तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच संधि हुई थी। जिसके अनुसार राज्य की सुरक्षा का भार कंपनी को था। अप्पाजी संधि से संतुष्ट नहीं थे और पेशवा बाजीराव द्वितीय से गठजोड़ कर विद्रोह कर दिया।

नागपुर के निकट सीताबाल्डी में दोनों सेनाओं के बीच युद्द हुआ जिसमें कंपनी विजयी हुई और 27 नवम्बर 1817 से रतनपुर राज्य में उनका पूर्ण अधिकार हो गया। अप्पाजी और कंपनी के मध्य जनवरी 1818 में पुनः संधि हुई और अप्पाजी को नए शर्तों के साथ रतनपुर का राजा घोषित किया गया। कुछ दिनों बाद अप्पा जी पुनः बाजीराव और गोंड़ राजाओं से सम्बन्ध बनाकर विद्रोह करने लगा फलतः उन्हें 15 मार्च 1818 को कैद कर लिया गया।

सन 1818 में हुए तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध में मराठों की पराजय से अंग्रेज शक्तिशाली हो गए। कंपनी ने 26 जुन 1818 को रघुजी द्वितीय के अवयस्क पोते रघुजी तृतीय को रतनपुर का शासक बनाया। राज्य सञ्चालन के लिए कैप्टेन एडमंड को रतनपुर राज्य का अधीक्षक नियुक्त किया गया, जो 6 माह ही कार्यरत रहे। इस दौरान डोंगरगढ़ के ज़मींदारों ने विद्रोह किया जिसे कुचल दिया गया।

कैप्टन एडमंड के मृत्यु उपरांत कर्नल एगन्यू को अधीक्षक नियुक्त किया गया जो 1825 तक कार्यरत रहे। इन्होने राज्य का मुख्यालय रतनपुर से हटाकर रायपुर में स्थापित किया। इनका कार्यकाल प्रशानिक सुधारों के लिए जाना जाता है। कर्नल एगन्यू के बाद मि सैंडिस, 1828 तक अधीक्षक रहे।

1826 में रघुजी तृतीय के वयस्क होने पर कंपनी के साथ पुनः संधि हुई लेकिन अंग्रेजों का आधिपत्य बना रहा। भोसला शासक द्वारा 1830 में कृष्णराव अप्पा को रतनपुर का जिलेदार नियुक्य किया गया। सन 1830 से 1854 के मध्य 8 जिलेदार नियुक्त किये गए जो क्रमशः 1 कृष्णराव अप्पा, 2 अमृत राव, 3 सदरुद्दीन, 4 दुर्गाप्रसाद, 5 इंटुक राव , 6 सखाराम बापू , 7 गोविन्द राव एवं 8 गोपाल राव थे।

11 दिसंबर 1853 को रघुजी तृतीय के निःसंतान मृत्यु के बाद 3 मार्च 1854 से रतनपुर राज्य ईस्ट इंडिया कंपनी के राज्य में शामिल हो गया। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन (सैनिक विद्रोह) के बाद 1861 में सेंट्रल प्रोविंस का गठन कर छत्तीसगढ़ को शामिल किया गया।

1862 में रायपुर को संभाग का दर्जा देकर सम्बलपुर को सेंट्रल प्रोविंस में शामिल कर लिया गया। रायपुर संभाग को रायपुर, बिलासपुर एवं सम्बलपुर जिलों में विभाजित किया गया लेकिन सन 1936 के राज्य पुनर्गठन में सम्बलपुर को सेंट्रल प्रोविंस से पृथक कर दिया गया।

27 मार्च 1857 को मंगल पांडे के नेतृत्व में सैनिक विद्रोह हुआ जिसका असर छत्तीसगढ़ पर भी पड़ा था। सन 1856 में सोनाखान ज़मींदारी में भीषण अकाल पड़ा था। सोनाखान के जमींदार नारायण सिंह ने व्यापारी के गोदाम से अनाज निकलवाकर जनता में बाँट दिया था।

कंपनी सरकार से नारायण सिंह को गिरफ्तार कर रायपुर जेल में कैद कर दिया था। जहां से वह कुछ सैनिकों की सहायता से 20 अगस्त को फरार हो गए। वे सोनाखान पहुंचकर अपनी सेना को संगठित कर युद्ध की तैयारी करने लगे। नारायण सिंह को पुनः पकड़ने ब्रिटिश सेना स्मिथ के नेतृत्व में 29 नवम्बर को खरौद पहुंचकर नारायण सिंह के रिश्तेदार देवरी के जमींदार के मार्गदर्शन में सोनाखान रवाना हुआ।

2 दिसंबर को दोनों सेना के बीच युद्ध हुआ और नारायण सिंह गिरफ्तार कर लिए गए। 10 दिसंबर को रायपुर के वर्तमान जय स्तम्भ चौक में नारायण सिंह को फांसी पर लटका दिया गया और नारायण सिंह शहीद वीर नारायण सिंह बनकर अमर हो गए।

वीर नारायण सिंह को सहयोग देने वाले सैनिकों ने हनुमान सिंह के नेतृत्व में 18 जनवरी को खुला विद्रोह कर दिया। कंपनी की सेना ने सभी विद्रोहियों को पकड़ लिया लेकिन हनुमान सिंह फरार हो गए। 17 विद्रोही सैनिकों को 22 जनवरी को फांसी पर लटका दिया गया।

शहीद वीर नारायण सिंह के पुत्र गोविन्द सिंह को भी गिरफ्तार किया गया था जिसे 1860 में रिहा किया गया। गोविन्द सिंह सम्बलपुर के विद्रोही वीर सुरेंद्र साय की सहायता से देवरी के जमींदार पर आक्रमण कर अपने पिता की शहादत का बदला लिया।

गोविन्द सिंह, सुरेंद्र सिंह के साथ वर्तमान छत्तीसगढ़-ओडिशा के सीमान्त क्षेत्रों में अंग्रेजों के विरुद्ध छापामार गतिविधियों में 1864 तक सक्रिय रहा। वीर सुरेंद्र सिंह और गोविन्द सिंह 1864 में पकड़ लिए गए और उन्हें असीरगढ़ के किले में कैद कर दिया गया जहां 1884 में वीरगति को प्राप्त हुए। गोविन्द सिंह अंग्रेजों से संधि कर रिहा हो गया और बाद की गतिविधियों की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।

गांधी जी के आगमन पर नवापारा राजिम में प्रकाशित अभिनंदन प्रत्र – श्री संदीप शर्मा जी साभार

1864 के लगभग 40 वर्ष बाद तक स्वतंत्रता आंदोलन से सम्बंधित किसी घटना की सूचना नहीं मिलती है। 1907 में संपन्न राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पं सुंदरलाल शर्मा जी शामिल हुए थे। वे नरम दल का प्रतिनिधित्व करते थे और पं माधव राव सप्रे जी गरम दल को। सप्रे जी हिंदी पत्रिका “केसरी” का संपादन करते थे जिसमें ब्रिटिश सरकार की निंदा लिखी जाती थी। सप्रे जी को राजद्रोह में गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन माफीनामा देने पर रिहा कर दिया गया।

1909 में ठाकुर प्यारेलाल सिंह जी ने राजनांदगांव में सरस्वती पुस्तकालय की स्थापना कर शिवलाल मास्टर, शंकर खरे, छबिराम चौबे, गज्जू लाल शर्मा इत्यादि के साथ युवाओं को राष्ट्रीय आंदोलन के लिए संगठित करने लगे।

1916 में श्रीमती एनीबेसेन्ट द्वारा होम रूल लीग के स्थापना से छत्तीसगढ़ भी जागृत हुआ। मूलचंद बागड़ी, माधवराव सप्रे, लक्ष्मण राव इसमें सक्रिय होकर प्रांतीय सभा का आयोजन किया जिसमें पं रविशंकर शुक्ल, वामन राव लाखे, घनश्याम सिंह गुप्त, ठाकुर मनमोहन सिंह, कुंजबिहारी अग्निहोत्री प्रभृति नेतागण शामिल हुए। पं सुन्दर लाल शर्मा जी किसानों को संगठित करने राजिम में सम्मेलन आयोजित किये।

बिलासपुर जिला में ई राघवेंद्र राव, बेरिस्टर छेदीलाल सिंह, कुंजबिहारी अग्निहोत्री राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख नेता थे। ई राघवेंद्र राव इंग्लैंड में पढ़ाई के दौरान वीर सावरकर की संस्था यंग इंडिया से सम्बद्ध थे। वे गरम दल और नरम दल के बीच मध्यस्थ की भूमिका में थे। प्रसिद्द सेनानी क्रांतिकुमार भारतीय भी बिलासपुर में सक्रिय थे।

सन 1919 में में रॉलेट एक्ट के देशव्यापी विरोध के दौर में ठाकुर प्यारेलाल सिंह जी के नेतृत्व में बी एन सी मिल के मजदूरों ने हड़ताल कर दी जो लम्बी चली। ठाकुर साहब को राजनांदगांव से निष्काशित कर दिया गया किन्तु गवर्नर ने उस आदेश को रद्द कर दिया था।

सन 1920 में प्रारम्भ असहयोग आंदोलन का छत्तीसगढ़ में विशेष प्रभाव पड़ा था। वर्तमान धमतरी जिले के कंडेल गाँव से बाबू छोटे लाल श्रीवास्तव, पं सुंदरलाल शर्मा, पं नारायण राव मेघवाले के नेतृत्व में नहर सत्याग्रह चला जो लोक में प्रसिद्द हुआ।

नहर सत्याग्रह की सफलता के बाद महात्मा गांधी का 20 दिसम्बर को रायपुर आगमन हुआ और गांधी चौक में उनका आमसभा हुआ था। 21 दिसंबर को वे कुरुद और धमतरी गए जहां उनका भव्य स्वागत हुआ था। गांधी जी की अपील का पूरे राज्य में व्यापक प्रभाव पड़ा।

सन 1921 में रायपुर में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने रैली आयोजित हुआ। कई स्थानों में खादी वस्त्रों की प्रदर्शनी लगाई गई।

सन 1922 में असहयोग आंदोलन की कड़ी में ब्रिटिश सरकार के वन अधिनियम का विरोध सिहावा-नगरी के जंगल से शुरू हुआ जो कालांतर में “जंगल सत्याग्रह” के नाम से राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बनकर प्रतिष्ठित हुआ।

इस अधिनियम में वनों के बड़े भाग को सुरक्षित वन घोषित कर वनवासियों का प्रवेश निषेध कर दिया गया था जिससे वनवासियों की निस्तारी के साथ-साथ आजीविका का संकट पैदा हो गया था। वनवासियों से वन अधिकारी बेगारी भी लेते थे। जंगल सत्याग्रह के नेता श्याम लाल सोम, विसंभर पटेल, पंचम सिंह, हरक राम सोम सहित 32 नेताओं को गिरफ्तार कर कैद की सजा दी गई। सैंकड़ों सत्याग्रहियों को सार्वजनिक पिटाई एवं अर्थदंड दिया गया था।

1922 में ही रायपुर में कांग्रेस का राजनीतिक सम्मेलन हुआ जिसमें पं रविशंकर शुक्ल जी को गिरफ्तार किया गया था।

अंग्रेजो द्वारा दिए गए राष्ट्रीय परिषद् में कांग्रेस की भागीदारी को लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व में मतभेद उत्पन्न हुआ था। देशबंधु चितरंजन दास जी परिषद् में भागीदारी के पक्षधर थे और उन्होंने अपने समर्थकों का “स्वराज दल” गठित किया था। उनके स्वराज दल में छत्तीसगढ़ से पं रविशंकर शुक्ल जी एवं ई राघवेंद्र राव जी शामिल हुए थे।

1923 में नागपुर में झंडा सत्याग्रह घोषित हुआ जिसमें छत्तीसगढ़ से श्यामलाल सोम, परदेशी राम ध्रुव, विसंभर पटेल जी रायपुर से नागपुर पैदल यात्रा कर शामिल हुए थे।

स्वतंत्रता आंदोलन में सन 1930 का विशेष महत्व है क्योंकि अनेक स्थानों पर महिला, तरुण युवाओं की भागीदारी और शौर्य ने छत्तीसगढ़ को प्रतिष्ठित किया था। महात्मा गांधी 12 मार्च 1930 को ऐतिहासिक डांडी मार्च पर निकले थे, इसे नमक सत्याग्रह भी कहा जाता है।

छत्तीसगढ़ के कुछ बड़े नेता इस सत्याग्रह में शामिल होने गए और कुछ यहीं नमक बनांते हुए गिरफ्तार किये गए थे। जुलाई माह (25 जुलाई) में सवनाही तिहार के दिन महासमुंद के तमोरा गाँव के कुछ मवेशी आरक्षित वन में चारा चरने में चले गए थे जिसे वन विभाग के कर्मचारियों ने पकड़ा और मवेशी मालिक किसानों पर जुर्माना लगाया।

किसानों ने जुर्माना भरने से इंकार कर दिया जिससे वन विभाग ने मवेशियों को जब्त कर लिया। किसान इस कार्यवाही के विरुद्ध महासमुंद के तहसीलदार के समक्ष याचिका प्रस्तुत किये। मामले की जांच के बाद फैसला किसानों के पक्ष में आया। इसी दौरान तत्कालीन बरार के यवतमाल में गांधीवादी नेता बापू जी अणे ने जंगल सत्याग्रह आयोजित किया जिसमें आरएसएस के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार अपने साथियों के साथ शामिल हुए।

सत्याग्रहियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया और डॉ हेडगेवार को 9 माह कारावास का दंड दिया गया। इसके विरोध में सेंट्रल प्रोविंस और बरार में अनेक स्थानों पर विरोध में सभाएं एवं प्रदर्शन हुए थे। तमोरा के किसानों से भी सितम्बर के प्रथम सप्ताह में जंगल सत्याग्रह प्रारम्भ कर दिया।

छत्तीसगढ़ के धमतरी के निकट रुद्री, राजिम के निकट कौंदकेरा, पिथोरा के निकट कौड़िया, खरियार रोड के निकट सलिहा (तब यह क्षेत्र महासमुंद तहसील में शामिल था), सारंगढ़, कोरबा, बांधाखार इत्यादि में सत्याग्रह होने लगे। रुद्री सत्याग्रह में दो युवा मींधु कुम्हार और रतनु यादव तथा कौड़िया में लक्ष्मी नारायण तेली शहीद हो गए थे।

इस स्थानों से पं सुंदरलाल शर्मा, पं नारायण राव मेघावाले, यति यतनलाल, ठाकुर बुढ़ान शाह, शंकर लाल गनोदवाले, पं मिलऊ दास कोसरिया सहित लगभग 200 सत्याग्रहियों को गिरफ्तार कर 6 माह से 2 वर्ष तक कैद का दंड दिया गया। सैंकड़ों लोगों को आर्थिक दंड लगाया गया।

तमोरा सत्याग्रह में युवा आदिवासी महिला दयावती ने नेतृत्व में महिला सत्याग्रहियों के जत्था ने अभूतपूर्व शौर्य का प्रदर्शन करते हुए पुरुष सत्याग्रहियों की जान बचाई थी क्योंकि अंग्रेजी पुलिस सत्याग्रहियों पर गोली चलाने तत्पर थी लेकिन महिला सत्याग्रहियों के बीच में आ जाने के कारण नहीं चला सकी थी।

इन सभी बंदियों को 1931 में ” गांधी इरविन” समझौता के अंतर्गत रिहा किया गया था। छत्तीसगढ़ में जंगल सत्याग्रह एक मात्र आंदोलन था जिसमें हजारों लोगों की प्रत्यक्ष भागीदारी थी जो जुलाई माह से प्रारम्भ होकर 30 सितम्बर तक चला था।

नवम्बर 1933 में महात्मा गांधी का पुनः छत्तीसगढ़ आगमन हुआ था इस दौरान वे रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, बलौदाबाजार, राजिम इत्यादि में सभा किये थे। राजिम की सभा 24 नवम्बर को त्रिवेणी संगम में संपन्न हुई थी। महात्मा गांधी पं सुंदरलाल शर्मा जी को अछूतोद्धार कार्यक्रम को लेकर अपना “गुरु” मानते थे।

सन 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह में पं रविशंकर शुक्ल, महंत लक्ष्मीनारायण दास, यति यतनलाल, मौलाना रउफ इत्यादि को गिरफ्तार किया गया था।

सन 1942 का आंदोलन रायपुर षडयंत्र मामला के नाम पर प्रसिद्द हुआ था। युवा सेनानी परसराम सोनी जी ने सुधीर मुखर्जी, रणवीर सिंह शास्त्री, क्रांतिकुमार भारतीय इत्यादि युवा साथियों के साथ बम और हथियार बनाने का प्रयास किये थे।

इस प्रकार स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में पं सुंदरलाल शर्मा, पं नारायण राव मेघावाले, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, पं माधव राव सप्रे, बेरिस्टर छेदीलाल, बाबू छोटे लाल श्रीवास्तव, नत्थूजी जगताप, यति यतनलाल, महंत लक्ष्मीनारायण दास, गुरु अगमदास, मगनलाल बागड़ी, डॉ खूबचंद बघेल जैसे जननेता हुए थे। जिनके नेतृत्व में छत्तीसगढ़ की जनता ने स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी सक्रिय भागीदारी दी एवं महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आलेख

डॉ.घनाराम साहू, रायपुर छत्तीसगढ़ी संस्कृति एवं इतिहास के अध्येता

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