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Tag Archives: जनजाति

छत्तीसगढ़ की भुंजीया जनजाति और उनका रामायणकालीन संबंध

प्राचीन काल से ही भारत में जनजातियों का अस्तित्व रहा है। प्रागैतिहासिक काल से लेकर ऐतिहासिक काल और आधुनिक काल में वर्तमान समय तक जनजातीय संस्कृति की निरंतरता दिखाई देती है। आरण्यक जीवन, फिर ग्रामीण संस्कृति और कालांतर में नगरीय सभ्यता का उद्भव इन सबका एक क्रमिक विकासक्रम दिखाई देता …

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बकरकट्टा के बैगा और उनका देवलोक

बस्तर और सरगुजा के बीहड़ वन प्रांतरों से आच्छदित छत्तीसगढ़ का पश्चिमी भाग भी वनों से आच्छादित है, जो मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र प्रदेशों से लगा हुआ है। राजनांदगाँव जिला छत्तीसगढ़ का पश्चिमी भाग है। इसी राजनांदगाँव जिले के छुईखदान विकासखंड में बैगा जनजाति का निवास है। जिला मुख्यालय से लगभग …

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स्वतंत्रता आंदोलन में छत्तीसगढ़ के जनजातीय समाज का योगदान

भारत में स्वतंत्रता आंदोलन का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि छत्तीसगढ़ अंचल में स्वतंत्रता के लिए  गतिविधियाँ 1857 के पूर्व में ही प्रारंभ हो चुकी थी। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध क्रांति की ज्वालाएं शनै-शनै जागृत होती जा रही थी। स्वतंत्रता के अनेक पक्षधर पूर्ण साहस, वीरता, ज्वलन्त उत्साह …

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दक्षिण कोसल में लौह उत्पादन का केन्द्र

मानव सभ्यता के एक सोपान के रुप में “लौह युग” महत्वपूर्ण स्थान रखता है। लोहे की उत्पत्ति मानव सभ्यता के लिए क्रांतिकारी अविष्कार माना गया है। इस युग में मनुष्य ने मिट्टी में लोहे की पहचान की और उसे मिट्टी से पृथक करने एवं परिष्कृति करने विधि विकसित की। फ़िर …

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राजगोंड़ समाज में राम

गोंड़ समाज में राम इस प्रकार व्याप्त हैं, जैसे हनुमान जी के अंदर श्री राम बसते है। अगर कोई अंतर है तो यह कि जिस प्रकार हनुमान जी श्राप के कारण अपनी याददास्त भूल जाते थे उसी प्रकार गोंड़ समाज श्रीराम को धारण करते हुए ही जीवन जीता है। पर …

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भारतीय आदिवासियों में शिक्षा का प्रसार एवं वर्तमान स्थिति

जनजातियां विश्व के लगभग सभी भागों में पायी जाती है, भारत में जनजातियों की संख्याअफ्रीका बाद दूसरे स्थान पर है। प्राचीन महाकाव्य साहित्य में भारत में निवासरत विभिन्न जनजातियों जैसे भारत, भील, कोल, किरात, किन्नरी, मत्स्य व निषाद आदि का वर्णन मिलता है। प्रत्येक जनजाति की अपनी स्वयं की प्रशासन …

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बस्तर की माड़िया जनजाति का गौर नृत्य एवं गौर

बस्तर की संस्कृति में पशु पक्षियों का बड़ा महत्व है, ये तोता, मैना, मुर्गा इत्यादि पक्षियों को का पालन तो ये करते ही हैं, इसके साथ इनके पारम्परिक नृत्यों में गौर के सींग का प्रयोग महत्वपूर्ण है। गौर के सींग का मुकुट बनाकर इसे नृत्य के अवसर पर पहना जाता …

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