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भारतवर्ष का शाश्वत प्रतीक – स्वामी विवेकानन्द

“मेरा विश्वास आधुनिक पीढ़ी में है, युवा पीढ़ी में है, इन्हीं में से मेरे कार्यकर्ता निकलेंगे जो सिंह की तरह हर समस्या का समाधान कर देंगे।” – स्वामी विवेकानन्द

स्वामी विवेकानन्द ‘आयु में कम, किन्तु ज्ञान में असीम थे’। मात्र 39 वर्ष के अपने जीवन काल में स्वामीजी ने विश्वभर के विद्वानों और जन सामान्य के हृदयों में अद्वितीय स्थान प्राप्त किया, यह कोई सामान्य बात नहीं है। स्वामीजी का व्यक्तित्व, उनके विचार और सन्देश ही भारत का जीवन और संदेश है। इसलिए विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर (टैगोर) कहते हैं, “यदि आप भारत को समझना चाहते हैं, तो विवेकानन्द का अध्ययन कीजिए, उनमें सब कुछ सकारात्मक है, नकारात्मक कुछ भी नहीं।”

इस कड़ी में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का यह कथन भी उल्लेखनीय है। दिनकर ने अपने ग्रंथ ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में लिखा कि, “अभिनव भारत को जो कुछ कहना था, वह विवेकानन्द के मुख से उद्गीर्ण हुआ। अभिनव भारत को जिस दिशा की ओर जाना था उसका स्पष्ट संकेत विवेकानन्द ने किया। विवेकानन्द वह सेतु है, जिस पर प्राचीन और नवीन भारत परस्पर आलिंगन करते हैं। विवेकानन्द वह समुद्र है, जिसमें धर्म और राजनीति, राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता तथा वेदांत और विज्ञान सबके सब समाहित हो जाते हैं।”

स्वामीजी की प्रखर शिष्या भगिनी निवेदिता कहती हैं, “भारत ही स्वामीजी का महानतम भाव था। भारत ही उनके हृदय में धड़कता था, भारत ही उनकी धमनियों में प्रवाहित होता था, भारत ही उनका दिवा-स्वप्न था और भारत ही उनकी सनक थी। इतना ही नहीं, वे स्वयं भारत बन गए थे। वे भारत की सजीव प्रतिमूर्ति थे। वे स्वयं ही – साक्षात् भारत, उसकी आध्यात्मिकता, उसकी पवित्रता, उसकी मेधा, उसकी शक्ति, उसकी अन्तर्दृष्टि तथा उसकी नियति के प्रतीक बन गए थे।”

उपर्युक्त विवेचनों से यह प्रमाणित होता है कि स्वामी विवेकानन्द के विचारों में ही भारत की राष्ट्रीय चेतना, भारत का गौरव, भारत का अध्यात्म, भारत की संस्कृति और भारत की आत्मा का रहस्य विद्यमान है। अतः स्वामीजी के विचारों के महत्त्व और प्रासंगिकता को रेखांकित करना आवश्यक है।

वर्तमान चुनौतियों का स्वरूप

आज मानव-जाति अनगिनत संकटों का सामना करने के लिए विवश है। इसका मूल कारण है संकुचितता। केवल ‘मैं और मेरा’ के लिए मानव-जाति संघर्ष कर रहा है। मेरा पंथ और जिसे मैं ईश्वर मानता हूँ, वही सर्वश्रेष्ठ है- इस मानसिकता ने मानव-जाति के बीच अलगाव की बड़ी खाई बना दी है। अपने-अपने ईश्वर, अपने-अपने पंथ या सम्प्रदाय की श्रेष्ठता को लेकर परस्पर होड़ मची है। अनेक देश अपनी सीमा और अधिकारों के विस्तार के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं।

इतिहास साक्षी है कि स्वामीजी के विचारों का अनुसरण नहीं करने के कारण 1914 में प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध 1939 का भयंकर परिणाम विश्व के अनेक देशों को झेलना पड़ा। अभी भी अमेरिका, रूस, चीन आदि देशों के शक्ति प्रदर्शन और इस्लामिक देशों में निरन्तर हो रहे हिंसात्मक उथल-पुथल बहुत अधिक चिन्ताजनक है। साइबर युद्ध और जैविक युद्ध की सर्वत्र चर्चा हो रही है। फरवरी, 2019 से कोरोना संक्रमण के कारण मृत्यु, भय और चिन्ता के दुष्परिणाम से अभी तक दुनिया उभरी भी नहीं है और विश्व युद्ध जैसा वातावरण दिखाई देने लगा है।

इसी तरह भारत का राष्ट्रीय परिदृश्य का आकलन करने से ज्ञात होता है कि एक ओर समग्र देश भारतभक्ति के सम्बन्ध में एकजुट है, वहीं दूसरी ओर विभिन्न राजनीतिक दलों और साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा राजनीतिक स्वार्थ की सिद्धि के लिए पूरे समाज और पंथों को बांटने का भरपूर षड्यन्त्र दिखाई देता है। अलगाववादी आसुरी शक्तियां आज एकजुट होकर सज्जन शक्ति को चुनौती देने में एडी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। श्रमजीवियों और बुद्धिजीवियों अथवा धनिकों के बीच एक बड़ी खाई बन गई है। राजनीतिक दल न्याय दिलाने की बात कहकर श्रमजीवियों को धनिकों के विरुद्ध उकसाते हैं।

स्वामी विवेकानन्द कम्युनिस्ट देशों की तरह भारत में हिंसक परिवर्तन नहीं चाहते थे। स्वामीजी ने कहा था कि वे ऊपरवालों को गिराना नहीं, अपितु नीचेवालों को उठाना चाहते है। अर्थात वे चाहते थे कि श्रमजीवियों को इतने अधिक अवसर प्रदान किए जाएँ कि वे भी बुद्धिजीवियों के स्तर तक पहुँच जाएँ। प्रयत्न यही होना चाहिए कि सक्षम व्यक्ति असक्षम व्यक्ति के उत्थान का दायित्व ले।

धर्म – भारत का प्राण

विकसित भारत की बातें तो सर्वत्र होती हैं, पर भारत के विकास का आधार क्या होगा इसपर चर्चा कम ही होती है। व्यक्ति हो या राष्ट्र वह अपने स्वभाव के अनुरूप विकसित होता है। वर्तमान दौर में धर्म का अर्थ बदल गया है। सम्प्रदायों और मजहबों को धर्म कहकर सम्बोधित किया जाता है। अध्यात्म के महत्त्व को सभी स्वीकार भी करते हैं पर अबतक इस भाव को धारण करने के प्रति समाज में भयंकर उदासीनता है। पूजा-पद्धति और कर्मकांड को ही धर्म मान लिया गया। बढ़ती अराजकता, हिंसा, आतंकवाद, नशाखोरी तथा पर्यावरण की हानि आदि समस्याओं के कारण समस्त मानव जाति को अपनी सभ्यता और संस्कृति के समक्ष अस्तित्व का संकट दिखाई दे रहा है। अतः स्वामीजी द्वारा प्रतिपादित ‘धर्म की अवधारणा’ को सही परिप्रेक्ष्य में समझने की आवश्यकता है।

स्वामीजी ने कहा था, “मैं धर्म को शिक्षा का अंतरतम अंग समझता हूं।…सबका मूल धर्म है, वही मुख्य है। (शिक्षा में) धर्म ही भात के समान है, शेष सब वस्तुएं सब्जी-चटनी जैसी हैं। केवल सब्जी और चटनी खाने से अपच हो जाता है; और केवल भात खाने से भी वैसा ही होता है।”3 स्वामीजी यह भी कहते हैं, “धर्म-प्रचार के बाद उसके साथ-साथ लौकिक विद्या तथा अन्य आवश्यक विद्याएं आप ही आ जाएंगी; पर यदि तुम बिना धर्म के लौकिक विद्या ग्रहण करना चाहो, तो मैं तुम्हें स्पष्ट बता देता हूं कि भारत में तुम्हारा यह प्रयास व्यर्थ सिद्ध होगा, वह लोगों के हृदय में स्थान नहीं बना सकेगा।”4

स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, “प्रत्येक राष्ट्र का लक्ष्य विधाता के द्वारा पूर्व-निर्धारित है। प्रत्येक राष्ट्र के पास संसार को देने के लिए कोई न कोई संदेश है। प्रत्येक राष्ट्र को किसी विशेष संकल्प की पूर्ति करनी है। अत: प्रारम्भ में ही हमें अपनी जाति के जीवन लक्ष्य को समझ लेना होगा। उसे कौन-सा दैवी लक्ष्य पूर्ण करना है, विभिन्न राष्ट्रों के अभियान में उसे कहाँ और कौन-सा स्थान ग्रहण करना है, जातियों के सम्मिलित संगीत में उसे कौन-सा स्वर मिलाना है?”5

यह स्वर कौन सा है? 27 जनवरी, 1900 को अमेरिका के पॅसडेना में स्वामीजी ने “मेरा जीवन तथा ध्येय” नामक व्याख्यान में बताया, “वह स्वर होगा ईश्वर, केवल ईश्वर का। भारत उससे कठोर मृत्यु की तरह चिपटा हुआ है। इसलिए वहाँ अभी आशा है।”6 स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कि प्रत्येक राष्ट्र के जीवन में एक मुख्य प्रवाह रहता है। भारत में वह धर्म है। उसी को प्रबल बनाओ – बस, दोनों ओर के अन्य प्रवाह उसी के साथ चलेंगे।7

त्याग और सेवा : भारत के राष्ट्रीय आदर्श

स्वामी विवेकानन्द ने राष्ट्र के विकास के लिए तीन स्तरों, पर कार्य करने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि ”त्याग और सेवा” यही भारत के राष्ट्रीय आदर्श हैं। स्वामीजी ने तीन प्रकार की सेवा की बात कही है :- (1) मनुष्य की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करना। भोजन, वस्त्र और निवास की व्यवस्था उपलब्ध कराना, प्रथम प्रकार की भौतिक सेवा। (2) अपनी भौतिक आवश्यकताओं की दृष्टि से मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाना, दूसरी प्रकार की सेवा है। (3) “मैं कौन हूँ, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?” – इस बात का बोध कराने में सहयोग देना, यह आध्यात्मिक सेवा सर्वोच्च है।

इन तीन सेवाओं के माध्यम से स्वामीजी ने दलित-पीड़ित-शोषित समाज के उत्थान के लिए कार्य करने की बात कहते हैं। वे कहते हैं, “नया भारत निकल पड़े – हल पकड़कर, किसानों की कुटी भेदकर, मछुए, माली, मोची, मेहतरों की कुटीरों से। निकल पड़े बनियों की दुकानों से, भुजवा के भाड़ के पास से, कारखाने से, हाट से, बाजार से। निकल पड़े झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से।”8

मनुष्य निर्माण की शिक्षा

स्वामीजी का पूरा जोर मनुष्य-निर्माण पर ही था, क्योंकि सही प्रकार के मनुष्य उपलब्ध हों, तो कोई भी समस्या असाध्य नहीं है। वे कहा करते थे कि मनुष्य निर्माण ही मेरा जीवनोद्देश्य है। यह सच है कि किसी भी राष्ट्र का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी जनता कितनी अच्छी, बुद्धिमान तथा सुयोग्य है। विवेक और समझ के अभाव में सज्जन या दुर्जन, सही या गलत, उचित-अनुचित के मध्य श्रेष्ठ का चयन नहीं किया जा सकता।

इसलिए स्वामी विवेकानन्द कहते थे – “मनुष्य, केवल मनुष्य भर चाहिए। शेष अपनेआप हो जाएगा।“ और वह मनुष्य कैसा होगा? तो स्वामीजी कहते हैं – आवश्यकता है वीर्यवान, शौर्यवान, श्रद्धासम्पन्न, दृढ़ विश्वासी और निष्कपट नवयुवकों की। जो मृत्यु से आलिंगन करने का, समुद्र को लांघ जाने का साहस रखते हों!!

वर्तमान सन्दर्भ में शिक्षा को लेकर बातें बहुत होती हैं पर वह अपने आदर्शों पर खरी नहीं उतरती। शिक्षा सर्वसुलभ और उत्तम होनी चाहिए, पर निजी शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए भारी राशि का वहन करना पड़ता है। लगभग सभी शिक्षा संस्थान अक्षर ज्ञान तो ठीक से दे रहे हैं किन्तु देश के प्रति विद्यार्थियों में कर्तव्य भावना और चरित्र-निर्माण के प्रति वे पर्याप्त उदासीन दिखाई देते हैं। विकास की इस यात्रा में मनुष्य ने शिक्षा प्रणाली के मानवीय आधारभूत मूल्यों की अनदेखी की।

स्वामी विवेकान्द शिक्षा में किसी भी प्रकार के भेदभाव के विरुद्ध थे। वे इस सत्य को भली-भांति जानते थे कि यदि शिक्षा ग्रहण करने का अवसर यदि कुछ लोगों तक ही सीमित हो या फिर किसी भी कारण से समाज का बड़ा वर्ग शिक्षा की प्राप्ति से वंचित रह गया तो देश का सम्पूर्ण विकास नहीं हो पाएगा। वे शिक्षा को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाना चाहते थे। स्वामीजी की प्रसिद्ध उक्ति उल्लेखनीय है, “यदि गरीब लोग शिक्षा के निकट नहीं आ सकते, तो शिक्षा को ही उनके पास खेत में, कारखानों में और सर्वत्र पहुंचना होगा।”9

अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय

स्वामी विवेकानन्द का हृदय भारत की निर्धनता को देखकर व्यथित था। स्वामीजी चाहते थे कि विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में ही इस समस्या का समाधान निहित है। स्वामीजी पश्चिमी देशों की भौतिक समृद्धि से प्रभावित थे, परन्तु उन्होंने यह भी देख लिया था कि इस भौतिक समृद्धि ने किस प्रकार उनके नैतिक दृष्टिकोण को भोथरा कर दिया था। पश्चिम के लोगों में इन्द्रिय-सुखों के प्रति एक तरह का पागलपन था। इसलिए स्वामीजी चाहते थे कि भारत भौतिक समृद्धि प्राप्त करे, परन्तु साथ ही नैतिक आदर्शों के प्रति अपने लगाव को बनाए रखे। निर्धनता के विरुद्ध संघर्ष में भारत पश्चिमी देशों का अनुसरण करे, परन्तु अन्य किसी भी क्षेत्र में वह पश्चिम की नकल न करे, ऐसा स्वामीजी का स्पष्ट कहना था। वे भारत में भौतिक समृद्धि और गहन नैतिक संवेदनशीलता का समन्वय देखना चाहते थे।

नारी शक्ति का जागरण

आज एक ओर स्त्रियों की शिक्षा, स्वतंत्रता और विकास के लिए समूची दुनिया में चर्चा चल रही है। स्त्री चेतना के नाम पर अनगिनत पुस्तकें लिखीं जा रहीं हैं। वहीं दूसरी ओर बाजारवाद, उपभोक्तावाद, स्त्री स्वतंत्रता, करियर और फैशन के नाम पर नारी समाज का एक प्रकार का शोषण ही हो रहा है। प्रतिदिन स्त्रियों से दुराचार के समाचार प्राप्त होते हैं। यद्यपि शिक्षा, विज्ञान, तकनीकी आदि क्षेत्रों में स्त्रियों ने उत्तरोत्तर प्रगति की है तथा गृहस्थ जीवन के आदर्श को उन्होंने अक्षुण्ण बनाए रखा है।

स्वामीजी ने नारी जाति, विशेषत: भारतीय नारी की महिमा को विश्वपटल पर प्रतिष्ठित किया है। उन्होंने कहा, “स्त्रियों की दशा सुधारे बिना जगत के कल्याण की कोई सम्भावना नहीं है। पक्षी के लिए एक पंख से उड़ान सम्भव नहीं है।” स्वामीजी ने सीता, सावित्री और दमयन्ती को भारतीय नारी का आदर्श बताया है। स्त्रियों की शिक्षा के सम्बन्ध में स्वामीजी का कथन है कि स्त्रियों को इस प्रकार की शिक्षा मिलनी चाहिए कि स्त्रियाँ अपनी समस्याएं स्वयं ही हल लें। स्वामीजी के अनुसार स्त्री को बहादुर भी बनाना होगा झाँसी की रानी की तरह। स्वामीजी इस बात पर भी जोर दिया कि हमें स्त्री-पुरुष में भेद का विचार नहीं करना चहिए। केवल यही चिन्तन करना चाहिए कि हम सभी मानव हैं और परस्पर एक दूसरे के प्रति सदाचार और सहायता करने के लिए उत्पन्न हुए हैं।

विश्वगुरु भारत

स्वामी विवेकानन्द के लिए भारत का उत्थान और विश्व का कल्याण ये दोनों बातें अलग-अलग नहीं है। स्वामीजी पूछते हैं, “क्या भारत मर जाएगा?” और फिर स्वयं उत्तर देते हैं- “यदि ऐसा हुआ तो संसार से सारी आध्यात्मिकता का समूल नाश हो जाएगा। सारे सदाचारपूर्ण आदर्श जीवन का विनाश हो जाएगा। धर्म के प्रति सारी मधुर सहानुभूति समाप्त हो जाएगी, सारी भावुकता का भी लोप हो जाएगा, और उसके स्थान पर कामरूपी देव और विलासितारूपी देवी राज्य करेंगे। धन उनका पुरोहित होगा। छल, पाशविक बल और प्रतिद्वंद्विता, ये ही उनकी पूजा-पद्धति होगी और मानवात्मा उनकी बलि-सामग्री हो जाएगी।”

स्वामीजी आगे कहते हैं, “नहीं…नहीं…ऐसी दुर्घटना कभी हो नहीं सकती! वह भारत जो प्राचीनकाल से सभी उदात्तता, नीति और आध्यात्मिकता का जन्म स्थान रहा है, वह देश जिसमें ऋषिगण विचरण करते रहे हैं, कभी मर नहीं सकता।”10 स्वामीजी के इस संदेश में मानवता की दृष्टि से भारत के अस्तित्व का कितना महत्त्व है, यह पता चलता है। अतः विश्व के कल्याण के लिए, मानवता की रक्षा के लिए भारत को जीवित रहना है; यही उसकी नियति भी है, यही भारत राष्ट्र का उद्देश्य भी है।

स्वामीजी भारत को विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहते थे और उन्होंने इस दिशा में पूर्ण योजना के साथ कार्य को आगे बढ़ाया। वे मनुष्य के लिए केवल धर्म को ही नहीं, वरन विज्ञान, कला, साहित्य, इतिहास और राजनीति को भी महत्त्वपूर्ण मानते थे। सभी विषयों पर उनके विचार युगान्तरकारी हैं। स्वामी विवेकानन्द का स्पष्ट मत था कि सम्पूर्ण देशवासियों तक आध्यात्मिक ज्ञान पहुँचे। उन्होंने कहा भी था, “हे भारत, उठो और अपनी आध्यात्मिकता से विश्वविजयी बनो।”

अपने व्याख्यानों, लेखों और पत्रों के माध्यम से स्वामीजी ने धर्म की अवधारणा, हिन्दू तथा हिन्दुत्व की संकल्पना, भारत के जीवन ध्येय, योग की व्याख्या, नारी-जाति के उत्थान, शिक्षा की अवधारणा आदि को स्पष्ट किया। उन्होंने दलितों-शोषितों-पीड़ितों की सेवा अर्थात दरिद्रनारायण की सेवा, शिव भाव से जीव सेवा का मंत्र दिया। स्वामीजी ने देशवासियों से भारत से प्रेम करने और भारत के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने का आह्वान किया। उन्होंने भारतवर्ष को जाग्रत कर उन्हें एकात्मता के सूत्र में जोड़ने का प्रयत्न किया।

स्वामीजी की प्रेरणा से अनुप्राणित होकर परवर्ती राष्ट्रनायकों और मनीषियों ने भारत की स्वतंत्रता और उत्थान के लिए कार्य किया। इसी का परिणाम है कि आज एक सामर्थ्यवान और संवेदनशील राष्ट्र के रूप में भारत की विश्व में पहचान है। दुनिया के अनेक छोटे देश ही नहीं विकसित देशों की सामान्य जनता से विद्वान लोग भारत की ओर बड़ी आशा से देख रहे हैं। आइए, हम स्वामीजी के सपनों का भारत के निर्माण में अपना योगदान दें और स्वामीजी के इस कथन को सदैव स्मरण रखें कि, “भारत तभी जागेगा, जब विशाल हृदयवाले सैकड़ों स्त्री-पुरुष अपने भोग-विलास और सुख की सभी इच्छाओं को त्याग कर उन करोड़ों भारतीयों के कल्याण के लिए सचेष्ट होंगे, जो दरिद्रता तथा मूर्खता के अगाध सागर में निरन्तर नीचे डूबते जा रहे हैं।”

आलेख

लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’, वरिष्ठ पत्रकार एवं अध्येता नागपुर

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