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बरहाझरिया के शैलाश्रय और उसके शैलचित्र

कोरबा जिला 20°01′ उत्तरी अक्षांश और 82°07′ पूर्वी देशांतर पर बसा है। इसका गठन 25 मई 1998 को हुआ, उसके पहले यह बिलासपुर जिले का ही एक भाग था। यहाँ का क्षेत्रफल 712000 हेक्टेयर है। जिले में चैतुरगढ़ का किला, तुमान का शिव मंदिर और पाली का शिव मंदिर भारत सरकार द्वारा संरक्षित स्मारक है, तो राज्य सरकार द्वारा एकमात्र संरक्षित स्मारक कुदुरमाल की कबीरपंथी साधना एवं समाधि स्थल है। इसके अलावा भी जिले में पूरावैभव एवं प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण अनेक महत्वपूर्ण स्थल हैं जो पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता हैं।

सन् 2001 में जब देवपहरी स्थित आश्रम में बच्चों को निःशुल्क पढ़ाई कराने जाता था, उस समय आदिमानवों के अनेक शैलाश्रयों को देखा था। जिसमें कुछ में शैलचित्रों को भी देखा था पर उन सबको तब आदिवासियों की कलाकृति मानकर ध्यान नहीं देता था। जब राष्ट्रीय संगोष्ठियों में अन्य विद्वानों की शोध आलेखों को देखा और जाना तो अब नए सिरे से जिले के सदस्यों में चित्रों की खोज प्रारंभ की।

अधिकारिक रूप से 8 नवंबर 2012 को कोरबा जिले में पहली बार शैलचित्रों की खोज को प्रकाश में लाया। यह स्थान करतला विकासखंड अंतर्गत सुअरलोट का था। तब पर्यटकों की संख्या वहाँ बढ़ने लगी और कुछ लोग उनको खराब भी करने लगे। तब फिर नए खोज तो करता रहा पर प्रकाश में भी लाने डरता रहा। ऐसा ही एक शैलाश्रय है, जिसको पहली बार 2016 में स्थानीय पहाड़ी कोरवा केंदाराम जी के साथ खोज किया था।

जिले में और भी बहुत सारे शैलाश्रय हैं। पर यह शैलाश्रय कोरबा विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत लेमरू के आश्रित ग्राम छातीबहार जिसे हम गोल्हर के नाम से भी जानते हैं और छातीपाठ के नाम से भी। यहाँ पर अनेक शैलाश्रय हैं। जिनमें कुछ में शैलचित्र भी हैं। इन्हीं में से एक है शैलाश्रय है बरहाझरिया।

बरहाझरिया जिला मुख्यालय कोरबा से बाल्को लेमरू मार्ग पर 35 किलोमीटर दूर सड़क के बाईं ओर स्थित है, छातीबहार ग्राम में है। इसे गोल्हर के नाम से भी जाना जाता है। 22° 33’10″उत्तरी अक्षांश, और 82° 48’55″पूर्वी देशांतर पर 566.17 मीटर समुद्र से ऊंचाई पर यह ग्राम बसा है। यह पहाड़ी कोरवाओं की एक छोटी सी बस्ती है। यहाँ मानघोघर नदी एक नाले के रूप में बहती है, जिसे बरहाझरिया के नाम से जानते हैं।

झरिया ग्रामीण भाषा में पानी का एक स्रोत को कहा जाता है। यहाँ के शैलाश्रय में जंगली सूअर बहुतायत से निवास करते थे। जिसे स्थानीय भाषा में बरहा कहा जाता है। इस तरह इस नदी का इस जगह पर नाम बरहाझरिया पड़ गया। यहाँ के शैलाश्रय में जो शैलचित्र मिले हैं, उसे स्थानीय लोग इसे बरहाझरिया के नाम से जानते हैं। यह शलाश्रय बरहाझरिया के किनारे पर स्थित है।

यहाँ कुछ शैलाश्रयों में आदिमानव निवास करते रहे होंगे, अत्यंत दुर्गम शैलाश्रय है। इनमें से एक शैलाश्रय में शैलचित्र है। जो 15215 फ़ीट माप का शैलाश्रय है। जिसमें शैलचित्र लगभग 3 फीट की ऊंचाई से प्रारंभ होकर 15 फीट तक की ऊंचाई पर बने हुए हैं। यहाँ लगभग 150 से अधिक शैलचित्र बने हुए हैं और भी शैलचित्रों की मिलने की संभावना है।

दुर्गम क्षेत्र घने वन जंगली जानवरों के विचरण क्षेत्र तथा अत्यधिक ऊँचाई पर गुफा निर्मित होने के कारण पहली बार खोज नवंबर 2016 में और दूसरी बार 14/ 12 /2019 को पुनः निरीक्षण के बाद भी संपूर्ण शैलचित्रों की खोज नहीं कर पाया हूँ। फिर भी जितने शैलचित्रों की प्राप्ति यहाँ पर कर पाया हूँ, उनमें 50 हाथ के पंजे जिसे स्टेंसिल तकनीक के सहारे से तात्कालिक आदिमानवों ने रंग को मुंह में भरकर फरकने की तकनीक का उपयोग कर बनाये होंगे।

ज्यामितीय प्रकार के 40, हिरणों की 20 और अन्य प्रकार की शैलचित्रों की संख्या 30 हैं। जब 2016 में यहाँ गया था तो यहाँ और भी शैलचित्र स्पष्ट दिखाई देते थे पर समय के साथ साथ उनमें कुछ शैलचित्र चटककर गिर गए हैं। ये सारे ही चित्र स्थानीय बलवे पत्थर से निर्मित प्राकृतिक स्थल पर निर्मित हैं। ये शैलचित्र लाल गेरवे रंग से बनाए गयें हैं।

यहाँ पर शैलचित्रों में ग्रास क्रापिंग (घास रोपण) के भी शैलचित्र बने हैं। जिससे पता चलता है कि इन चित्रों के निर्माण के समय में संभवतः आदिमानवों ने खेती की ओर कदम बढ़ाए होंगे और उनको हम प्रज्ञमानव भी कह सकते हैं। इस शैलाश्रय में कुछ जगहों पर कम गहरे गोल चित्र भी मानव निर्मित हैं। जिन पर प्रज्ञमानव (आदिमानवों) के द्वारा अनाज कूटने का भी काम किया जाता रहा होगा।

आधुनिक युग में भी आदिवासी और वनवासी महिलाएँ मुसल की सहायता से वनाँचल में धान (अनाज) कुटने का काम करती हैं। यहाँ पर बहुत अच्छे ज्यामितीय शैलचित्र भी बने हैं जो कोरबा के दूसरे शैलाश्रयों में निर्मित शैलचित्रों में भी हैं ।

यहाँ के शैलचित्र दुनिया भर के प्रागैतिहासिक कालीन शैलचित्रों से आश्चर्यजनक रूप से समानताएँ रखते हैं। चित्रों की बनावट और शैली के आधार पर यहाँ के शैलचित्र प्रागैतिहासिक काल के प्रतीत होते हैं। जो महापाषाण काल से लेकर नवपाषाण काल तक के हो सकते हैं।

आदिमानवों ने उबड़-खाबड़ चट्टानों की दीवार को ही अपना कैनवास बनाकर अपने अंतर्मन को व्यक्त किया। लाल रंग और ज्यामितीय चित्रों की रचनाओं से यह स्पष्ट होता है कि यहाँ के शैलाश्रय में निवास करने वाले आदिमानव जिसे हम प्रज्ञमानव भी कह सकते हैं। वे इस स्थल पर प्रसन्नता से सुरक्षित रहते हुए दीर्घ अवधि तक खुशहाली से जीवन व्यतीत करते रहे होंगे।

जहाँ न तो शिकार की ही कमी थी और न ही भोजन के लिए अनाज और कंदमूलों की ही। विद्वानों का अभिमत है कि यहाँ के शैलचित्र 30-40 हजार वर्ष से अधिक प्राचीन भी हो सकते हैं तो ऐतिहासिक काल के भी। जिसकी वैज्ञानिक पद्धति से जांच कराकर ही वास्तविक तिथि पता लगाई जा सकती है।

निष्कर्ष :- प्रागैतिहासिक कालीन इन चित्रों की बनावट आश्चर्य रूप से दुनिया भर में बनी गुफा चित्रकला और शैलचित्रों से समानताएँ रखती हैं। चाहे वह 30000 वर्ष पुरानी स्पेन की अल्टामीरा गुफा हो या उत्तरी ऑस्ट्रेलिया की गुफा, छत्तीसगढ़ के सिंघनगढ़ के शैलचित्र हो या जशपुर के शैलचित्र हों।

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद की गुफाओं के चित्र हो चाहे कश्मीर की गुफाओं में बने पंजे की शैलचित्र हों। इन चित्रों में एकरूपता दिखाई देती है। इनमें जानवरों के तो चित्र स्पष्ट है ही। प्रागैतिहासिक काल के आदिमानव इन प्राकृतिक शैलाश्रयों का उपयोग अस्थाई रूप से आवास के लिए करते थे तथा अपने दैनिक सांस्कृतिक जीवन की कलात्मक प्रस्तुति इन शैलाश्रयों पर चित्रों के रूप में करते थे। जिससे उस काल की संस्कृति पर प्रकाश पड़ता है।

संदर्भ :-
1/- साखलकर, र०वि०, यूरोपीय चित्रकला का इतिहास, राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी जयपुर 2012 पृष्ठ 2-5 एवं 225।
2/- डॉक्टर राजीव मिंज, सहायक प्राध्यापक भारतीय प्राचीन भारत का इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्त्व पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर छत्तीसगढ़, कोसल-11 पृष्ठ 151-155
3/- प्रभात कुमार सिंह एवं प्रवीन तिर्की ,कोशल 11 पृष्ठ 166 से 170
4/- भुवन विक्रम, आर्कियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया, आगरा सर्किल, इंटरप्रिटिंग रॉक आर्ट, कोसल- 3, पृष्ठ 383 से 385 ।
5/ आशिष एस०शेन्डे, विनित गोधल, ज्योति भार्गव-सम साइलेंट फीचर्स आप रॉक आर्ट इन विदर्भ रीजन ऑफ महाराष्ट्र, कोसल -3, पृष्ठ- 374 से 382

आलेख एवं चित्र

हरिसिंह क्षत्री
मार्गदर्शक – जिला पुरातत्व संग्रहालय
कोरबा, छत्तीसगढ़
मो. नं.-9407920525, 9827189845

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