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प्राचीन मंदिरों की स्थापत्य कला में स्त्री मनो विनोद का शिल्पांकन

प्राचीनकाल के मंदिरों की भित्ति में जड़ित प्रतिमाओं से तत्कालीन सामाजिक गतिविधियाँ एवं कार्य ज्ञात होते हैं। शिल्पकारों ने इन्हें प्रमुखता से उकेरा है। इन प्रतिमाओं से तत्कालीन समाज में स्त्रियों के कार्य, दिनचर्या एवं मनोरंजन के साधनों का भी पता चलता है।

जिस तरह तेरहवीं शताब्दी के कोणार्क के सूर्य मंदिर में हाईहिल सेंडिल (खड़ाऊ) पहने युवती की प्रतिमा दिखाई देती है, यह उस जमाने बड़ी बात है। तेरहवीं सदी में स्त्री द्वारा ऊंची एड़ी की खड़ाऊ धारण करना क्रांतिकारी ही माना जाएगा। अभी तक तो पुरुषों द्वारा ही खड़ाऊ धारण की जाती थी। यह दक्षिण के मंदिरों में भी दिखाई देता है।

पाश्चात्य युरोप के देशों में भी सोलहवीं सदी तक स्त्रियों द्वारा ऊंची एड़ी के जूते धारण करना आरंभ भी नहीं हुआ था। इससे एक बात तो निकल कर सामने आती है कि स्त्रियों को इस सदी तक पुरुषों के समान ही अधिकार प्राप्त थे तथा पुरुष उनके आदेश की अवहेलना नहीं कर सकते थे।

राजा लांगुल नृसिंह देव ने अपने खजाने से सूर्य मंदिर निर्माण करने का आदेश स्वमाता से ही पाया था और उसने मंदिर निर्माण पर अमल भी किया। प्रतिमाओं से एक बात और निकल कर सामने आती है कि स्त्रियों परदा नहीं करती थी। किसी भी प्रतिमा में परदा या घुंघट दिखाई नहीं देता।

प्रतिमा शिल्प की भाव भंगिमा से ज्ञात होता है कि गृहकार्य के पश्चात स्त्रियाँ विविध प्रकारों से मनोविनोद करती थी। पक्षी इस मनोविनोद में प्रमुख सहायक होते थे। जैसे शुक सारिका प्रकरण में बताया गया है कि शुक सर्वाधिक प्रिय पक्षी था। किसी प्रतिमा के हाथ पर शुक बैठा है, तो किसी के कंधे पर।

किसी प्रतिमा में कटोरे में दाने लेकर सारिका को चुगवाए जा रहे हैं। पक्षियों में शुक, सारिका, मयूर, हंस इत्यादि पाले जाते थे। एक प्रतिमा में श्री कृष्ण एवं राधा है, राधा जी के जल कलश में मोर ने चोंच डाल रखी है। बड़ा ही सुंदर चित्रण शिल्पकार ने किया है।

एक प्रतिमा में स्त्री अपने केश धोकर निचोड़ रही है और हंस केशों से टपकती जल की बूंदों को ग्रहण करते दिखाई दे रहा है। शुक सारिका का प्रयोग स्त्रियाँ प्रेम संदेश लाने ले जाने में संवदिया के तौर पर करती हुई दिखाई देती है।

इन शिल्पों में वह कपोत कहीं दिखाई नहीं देता जिसे पत्रवाहक के तौर पर नियुक्त किया जाता था। कामसूत्र कहता है कि भोजनोपरांत शुक को बुलवाना, लावक चिड़ियों, मुर्गे एवं भेड़ों की लड़ाई मनोविनोद के लिए देखनी चाहिए। इन सब का अंकन प्रतिमा शिल्प में दिखाई देता है।

खजुराहो के एक प्रतिमा शिल्प में त्रिभंगी मुद्रा में स्त्री के हाथ में गेंद दिखाई दे रही है, चेहरे के भावों से दिखाई देता है कि वह कंदुक क्रीड़ा का आनंद ले रही है। भुवनेश्वर के मुक्तेश्वर मंदिर समूह के एक अन्य शिल्प में स्त्री के हाथ में टेनिस के बैट जैसी कोई चीज दिखाई दे रही है, उस पर वह गेंद उछाल कर कंदुक क्रीड़ारत है।

इससे स्पष्ट होता है कि तत्कालीन समय में स्त्रियाँ गेंद का प्रयोग मनोरंजन के लिए करती थी। अवदान शतक में पान गोष्ठी में झूल झूलकर मनोविनोद का उल्लेख है। झूला झूलते हुए गीत गाना वर्तमान काल में दिखाई देता है। प्रतिमाओं से स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ शांत प्रकृति के खेल खेलती थी।

इसके अतिरिक्त स्त्रियों के मनोविनोद का आकर्षक अंग वन विहार था। वन विहार के अंतर्गत पुष्प प्रचारिका, दोहद एवं सलिल क्रीड़ा इत्यादि आते हैं। पुष्प प्रचारिका क्रीड़ा में शाल भंजिका का अंकन प्रमुखता से मिलता है। पुष्प तोड़ती प्रसाधिका का उल्लेख भी शिल्पांकन में मिलता है।

काव्य प्रकाश ग्रंथ में वृक्ष में पाद प्रहार करना, आलिंगन करना, अन्य कार्य करना दोहद क्रीड़ा के अंतर्गत आता है। ऐसे मनोरंजन के लिए आम्र, कदम्ब, अशोक एवं ताड़ के वृक्ष उपयुक्त माने जाते थे। इसके साथ यह धारणा भी कि नायिका के बाएँ चरण प्रहार के बिना अशोक वृक्ष पुष्पित नहीं होगा।

सलिल क्रीड़ा में स्त्रियों द्वारा नौका विहार करना, नदी या झरने में स्नान करना तथा जल किलोल करना आता है। इसके लिए राज प्रसादों में पुष्कर्णियों का निर्माण कराया जाता था। तत्कालीन साहित्य में रानी एवं राजकुमारियों द्वारा पुर्णमासी की रात में पुष्करणी स्नान का उल्लेख मिलता है।

वैशाली की नगर वधू में सलिल क्रीड़ा का उल्लेख स्मरण आता है। इसके अतिरिक्त गायन, वादन एवं नृत्य भी मनोविनोद का एक साधन था। प्रतिमा शिल्प में वृक्ष के नीचे वीणा वादन करती स्त्री दिखाई देती है।

इस तरह प्रतिमा शिल्प के माध्यम से हमें तत्कालीन समाज के मनोविनोद के साधनों की जानकारी भी मिलती है। भले ही वर्तमान में मनोविनोद के साधनों में बदलाव आ गया हो परन्तु मनोविनोद आज भी होता है और भविष्य में भी होता रहेगा।

आलेख एवं छायाचित्र

ललित शर्मा इण्डोलॉजिस्ट रायपुर, छत्तीसगढ़

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