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माँझीनगढ़ के शैलचित्र एवं गढ़मावली देवी जातरा

भारतीय ग्राम्य एवं वन संस्कृति अद्भुत है, जहाँ विभिन्न प्रकार की मान्यताएं, देवी-देवता, प्राचीन स्थल एवं जीवनोपयोगी जानकारियाँ मिलती हैं। सरल एवं सहज जीवन के साथ प्राकृतिक वातावरण शहरी मनुष्य को सहज ही आकर्षित करता है। ऐसा ही एक स्थल छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिला मुख्यालय से 60 कि.मी.की दूरी पर राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर स्थित केशकाल से 22 कि.मी. की दूरी पर बिश्रामपुरी और बिश्रामपुरी से महज 8 कि.मी.की दूरी पर है मांझीनगढ है।

पर्यटन स्थल मांझीनगढ -यह स्थल भौगौलिक विशिष्टता एवं प्राकृतिक सौंदर्यता के कारण पर्यटकों का और रोचक रहस्यमय रोमांचकारी किंवदंतियों, कहानियों, पुरावशेषों तथा आदिमानवों द्वारा निर्मित शैलचित्रों के चलते पुरातत्ववेत्ताओं, इतिहासकारों तथा शोधकर्ताओं के लिए आकर्षंण का केंद्र बनते जा रहा है। यहाँ निर्मित शैलचित्रों से ज्ञात होता है कि यहाँ प्राचीनकाल से ही मनुष्य अपने धार्मिक क्रिया कलाप सम्पन्न करता था।                                             

मांझीनगढ़ का प्राकृतिक सौंदर्य

समुद्र सतह से लगभग 3200 फ़ुट से अधिक ऊंचाई वाले पहाड़ पर लगभग 11-12 कि.मी.से अधिक क्षेत्र में फैले मांझीनगढ आदिमानवों एवं बौने प्रजाति के ” उईका ” लोगों का कभी गढ़ था। उईका लोगों के उत्पात आतंक से बड़ी बहादुरी से मुक्ति दिलाने वाले जांबाज बहादुर “मांझी” के नाम पर इस स्थान का नाम मांझीनगढ पड़ने की रोचक रोमांचकारी कहानी सामने आती है।

मांझीनगढ़ के उईका – ग्रामीण अपने पुरखों की कहानी को याद करते बताते हैं कि उईका बहुत छोटे कद के (बौने) हुआ करते थे पर वो बहुत बलिष्ठ हुआ करते थे। उईका लोगों का कान बड़े होते थे और वो तालाब खुदाई करने में परांगत थे। मांझीनगढ में खोदे गये तालाबनुमा गड्ढे के बारे में बताते हैं कि ये तालाब उईका लोगों ने खोदा था।

उईका तालाब मांझिनगढ़

उईका लोगों के बारे में किंवदंती है कि वे मनुष्य को मारकर खा जाया करते थे। मांझीनगढ के पूर्व दिशा में चट्टानी गुफा है जिसमें पंजे के निशान हैं जिसके बारे में यह बताया जाता है कि जब उईका किसी इंसान को मारकर खाते थे उसके खून से सने हांथ का यंहा निशान लगा दिया करते थे।

खूनी पंजा बनाम शैलचित्र-  मांझीनगढ के गुफा में उकेरे गये जिस चिन्ह को गांव वाले खूनी पंजा बताते हैं उसके बारे इतिहास पुरातत्व एवं शैल चित्र के जानकार इसे हजारों वर्ष पुराना शैलचित्र बताते हुए इसे सुरक्षित रखते संरक्षित करना जरूरी बताते हैं।                    

मांझीनगढ़ के प्राचीन शैलचित्र

मांझीनगढ पहाड़ के तीन तरफ गहरी खाई है और दूर दूर तक केवल हराभरा जंगल और पहाड़ियाँ दिखाई देती है। शहर के दमघोंटू प्रदूषित माहौल, भीड़भाड़ और वाहनों के कोलाहल से दूर निर्जन वनक्षेत्र में आकर जंगल में मंगल की अनुभूति करने मांझीनगढ पंहुचने वालें यंहा आकर अल्हादकारी अविस्मरणींय आनंद की अनुभूति को संजोकर लौटते हैं। मांझीनगढ से लौटकर यही कहता है की बहुत अच्छा देखने के लायक जगह है ” मांझीनगढ “।                         

धार्मिक आस्था का स्थल भी है मांझीनगढ- बाहर के प्रकृतिप्रेमी पर्यटकों के लिए मांझीनगढ महज एक सुंदर मनोरम पर्यटन स्थल हो सकता है पर इस अंचल के लोगों के लिए यह एक पवित्र धार्मिक आस्था का स्थल भी है क्योंकि यहां पर गढ़मावली माता का स्थल भी है। ज़हां समय-समय पर क्षेत्र के लोग अगाध आस्था लिए पूजा पाठ करने तथा मनौति चढौति चढ़ाने आते हैं।                       

गढ़मावली देवी स्थल पर पूजन

भादों मास में होता हैं भादों जातरा- मांझीनगढ के गढ़मावली के दर पर प्रतिवर्ष भादों मास के कृष्णपक्ष में शनिवार को जातरा होता हैं जिसे भादों जातरा कहा जाता है। भादों जातरा में मांझीनगढ के आसपास के गांव के सभी देवी देवता और देवी देवता के साथ साथ उनके पुजारी सिरहा गांयता मांझी मुखिया एवं ग्राम के प्रमुख जन व गांव वाले भी आते हैं।

गांव वाले अपने सुख शांति समृद्धि के लिए सेवा पूजा चढौति लेकर आते थे वंही दैहिक दैविक आपदा एवं अनिष्ट से बचाये रखने के लिए रवाना लेकर आते हैं। भादों जातरा का आस्था एवं विश्वास के नजरिये से अपना खास महत्व होता है वंही देखने जानने समझने पंहुचने वालों के लिए बहुत आकर्षक भी होता है। इसलिए प्रकृतिप्रेमी पर्यटकों के सांथ सांथ धार्मिक आस्था रखने वाले श्रद्धालु जन जातरा पर खासतौर पर पधारते हैं। आज मांझीनगढ़ में जातरा पर्व मनाया जा रहा है।

आलेख

श्री कृष्ण दत्त उपाध्याय वरिष्ठ प्रत्रकार केशकाल, बस्तर

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