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नागपंचमी के दिन गुरु मंत्र सिद्ध करने वाले नगमतिहा

छत्तीसगढ़िया लोक समाज में विभिन्न परंपराओं की अद्भुत छटा देखने को मिलती है। यहाँ शैव, वैष्णव और शाक्त मत के अलावा सिद्धों और नाथों का प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है। हरियाली अमावस्या को मनाए जाने वाले पर्व “हरेली” को कृषि यंत्रों की पूजा के साथ गांव देहात में मंत्र दीक्षा की शुरूआत भी होती है और पुराने मंत्र साधक अपने स्थानीय गुरू के समक्ष अपने मंत्र की पुनरावृत्ति करते हैं जिसे जन समाज के लोग मंत्र लहुटाना कहते हैं।

जब गाँवों तक विज्ञान की पहुँच नहीं थी तब खेती किसानी करने वाले लोग इसी लोक विश्वास और जड़ी बूटी आदि स्थानीय औषधियों से अपने आत्मबल के साथ मेहनत मजदूरी करते जाड़ा, घाम और बरसात को झेलते अपने कर्म क्षेत्र में डटे रहते थे। उनके अवचेतन के भय को मंत्र पर उनकी आस्था सम्हाले रहती थी।

चिकित्सा विज्ञान भी यह मानता है कि औषधि से भी अधिक औषधि पर विश्वास काम करता है। इस गहरी बात को छत्तीसगढ़ का लोक समाज गहराई से समझता रहा है। यही वजह है कि अपने आपको मंत्र से अभिरक्षित रखने के लिए इन लोक परंपराओं को गुरूमुखी साधना बनाकर उत्सव का रूप दिया गया है।

हरियाली अमावस्या यानि हरेली के पाँचवे दिन नागपंचमी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन किसान अपने घरों और खेतों में नाग नागिन की पूजा करते हैं और उन्हें दूध लाई (लावा) का प्रसाद अर्पित करते हैं। खेतों में कीड़े मकोड़ों और चूहों को खाकर सर्प फसलों की रक्षा करते हैं। किसानों के मन में जीव जंतुओं के लिए भी आभार की उदात्त भावना है जिनसे उसे विष का भय रहता है। वे फसलों की सुरक्षा के साथ अपने परिवार को भी आपात भय से बचाए रखने की उनसे प्रार्थना करते हैं।

कहते हैं कि साँप न दूध पीते हैं और न लाई खाते हैं। उनका आहार कीट पतंग और छोटे मोटे जीव जंतु ही हैं पर मनुष्य तो जो खाता है वही उसे अपनी श्रद्धापूर्ण भावनाओं के साथ समर्पित करता है। यह भावप्रधान जगत अद्भुत है जहाँ व्यष्टि से समष्टि तक एक मांगलिक अवधारणा की अविच्छिन्न श्रृंखला है। इसी नागपंचमी पर्व पर नगमतिहा गुरू अपने शिष्यों को पीढ़ा – पाठ देते हैं जो सर्पमंत्र की दीक्षा कहलाती है।

नागपंचमी पर मेरे शहर जांजगीर की पुरानी बस्ती के कहरापारा में “नगमत” का आयोजन प्रतिवर्ष किया जाता है। यह परंपरा छत्तीसगढ़ के बहुत से गांवों और कस्बों में अब भी जीवित है। इस दिन “सपहर” मंत्र की दीक्षा नए शिष्यों को नगमत गुरू प्रदान करते हैं। पीढ़े पर नाग नागिन और गुरू के चित्र को वर्तमान पीढ़ा गुरू लेकर बैठता है। यहाँ पीढ़ी या पीढ़ा से आशय पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही परिपाटी से भी है इसलिए इसे पीढ़ा-पाठ कहा जाता है।

साबर मंत्र ही स्थानीय बोली बानी में सपहर मंत्र के रूप में प्रचलित है। चूंकि यह साँप से संबंधित है इसलिए इसे सपहर मंत्र भी कहा जाता है। यानि साँप के विष को हरने वाला मंत्र सपहर, जिसकी अबूझ रचना में इस तरह ध्वन्यात्मकता और प्रवाह है कि इसके रचयिता लोक गुरूओं की प्रतिभा का लोहा मानना पड़ता है। सपहर मंत्र के दौरान झांझ और मांदर की उत्तेजक थाप के साथ लयबद्ध रूप से गुरू महिमा को बखान कर गाये जाने वाले मंत्र की एक बानगी देखिए –
गुरूसत गुरूसत गुरे नीर
गुरूसाय रे शंकर गुरू लछमी
गुरू तंत्र मंत्र गुरू लखे निरंजन
गुरू बिन होमे ल
कोने देवय ओ नागिन
गुरू बिन होमे ल

इस मंत्र के गूढार्थ हैं जिसमें गुरू तत्व की प्रधानता है । गुरूसत यानि गुरू सत्य है, गुरे नीर- गुरू जल की तरह तरल है, गुरूसाय रे शंकर – गुरूशंकर है और प्रमुख है, गुरू लक्ष्मी गुरूतंत्र मंत्र गुरू लखे निरंजन – गुरू ही लक्ष्मी है और निराकार निरंजन को देखनेवाला तथा जाननेवाला है। उसके भीतर प्राणों का होम करने वाला नगमतिहा है। यह इस छोटे से मंत्र का अभिप्राय है जिसे मैंने अपनी दृष्टि से समझने का प्रयास किया है।

इसके अलावा और भी कई मंत्र हैं जिसे आज के दिन गुरू के सामने पढ़कर उसके शब्द के अभ्यास को शिष्यगण जोर जोर से पाठ कर दुहराते तथा कंठस्थ करते हैं और पीढ़े पर बैठा गुरू कहीं कुछ कमी होने पर उसे वहीं दुरूस्त करवाते हैं। मंत्र का प्रभाव जब चढ़ता है तो साधक शिष्य को नाग भरता है और वह तंद्रा में आकर कीचड़ में सराबोर हो नाग की तरह मांदर की ध्वनि पर भूमि लोटता है तब माना जाता है कि उसका सपहर मंत्र सध गया । इसके पश्चात गुरू उसे होम सुंघाते हैं और वह तंद्रा से जागृत होकर अपनी स्वाभाविक चेतना में वापस लौटता है ।

इन सारी क्रियाओं में मुझे शैव मत की छत्तीसगढ़ में प्रधानता स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है । शिव पार्वती की ही लोक मे गुरूपद के रूप से महिमा है और उन्हें नगमतिहा साधक लोग विशेष तौर पर नागपंचमी के इस आयोजन में पूजते हैं । उनके अनगढ़ और अटपटे मंत्र को साबर मंत्र से जोड़ा जा सकता है । रामचरित मानस में भी गोस्वामी तुलसीदास जी ने साबर मंत्र की चर्चा करते हुए लिखा है –
अनमिल आखर अरथ न जापू । प्रकट प्रभाव महेस प्रतापू ।

अर्थात जिसके अक्षरों में न मेल है न ही जिसका कोई अर्थ है और न जिसका जाप ही होता है फिर भी भगवान शंकर के प्रताप से इन साबर मंत्रों का प्रभाव है। इसके साथ ही नगमत की समाप्ति के बाद एक औषधि भी गुरू प्रसाद स्वरूप खिलाया जाता है जो वर्तमान गुरू अपने हाथों से अभिमंत्रित कर सबको प्रदान करता है।

कहते हैं कि इसे खाने से साल भर विष का कोई प्रभाव शरीर पर नहीं पड़ता । मैं भी इसे प्रसाद रूप में ग्रहण कर लेता हूँ । यह इतना कड़ुवा होता है कि इसे मुँह में रखते ही थूकने को जी करता है । पर थूकने की सख्त मनाही होती है । कहा जाता है कि चबाकर निगल जाने पर ही इसका साल भर असर रहता है ।

बहरहाल जो कुछ भी है यह हमारे छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और विरासत का अमूल्य हिस्सा है और मुझे अपने इन सांस्कृतिक मूल्यों और उसके क्रियात्मक उपादानों से बहुत लगाव और प्यार है। इन ठेठ देहाती और मन के साफ सुथरे लोगों के बीच आत्मीयता का जो संस्पर्श पाता हूँ उससे भीतर बाहर तरोताजा हो जाता हूँ।

नागपंचमी पर्व की शाम मैं इन्ही नंगमतिया साथियों के साथ गुजारता हूँ। एक दिन पहले नगमतिहा समाज के कुछ परिचित साथी मुझे नेवता (आमंत्रण) देते हैं। कुछ सालों से उनके बीच जा रहा हूँ और मांदर की धमक के साथ भाव से भरे नगमतिहा साधकों से गुरू की वंदना सुनते हुए आनंदित और विभोर हो जाता हूँ। यह गुरु शिष्य परम्परा से आगे बढ़ता हुआ ज्ञान हमारी सुदीर्घ परम्परा का हिस्सा है।

आलेख

सतीश कुमार सिंह
पुराना कॉलेज के पीछे , बाजारपारा, जांजगीर

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