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बच्चों के मानसिक विकास के लिए मातृभाषा उतनी ही आवश्यक है जितना शारीरिक विकास के लिए माँ का दूध : महात्मा गांधी

अंतर्राष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस विशेष आलेख

मातृभाषा का रिश्ता जन्मदायिनी माता के साथ स्थूल रूप से जोड़ा जाता है, परंतु मातृभाषा से अभिप्राय उस परिवेश, स्थान,समूह में बोली जाने वाली भाषा से है जिसमें रहकर मनुष्य अपने बाल्यकाल में दुनियां के संपर्क में आता है, अर्थात मातृभाषा ही शिशु को मानव समाज की नैतिकता की वाटिका में विहार कराती है।

धार्मिक जीवन के उन्नत शिखर की ओर अग्रसर करती है। सामाजिक जीवन के सागर में नाव बनकर पार उतारती है। साहित्य की मधुर तथा सरस स्रोतधारा प्रवाहित कर जीवन को आनंद से भर देती है। मातृभाषा गहन अनुभूतियों और कला, संस्कृति, जीवन के सभी पक्षों व विषयों को सीखने, समझने की ज्ञान प्राप्ति का सरल माध्यम है।

   निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
   बिन निज भाषा ज्ञान के,मिटत न हिय को सूल।।

अंतर्राष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस 21 फरवरी को मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य भाषाई और सांस्कृतिक विविधता एवं बहुभाषावाद के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। 21 फरवरी 1952 को ढाका विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तत्कालीन पाकिस्तान सरकार की भाषाई नीति के विरोध में अपनी मातृ भाषा के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए विरोध प्रदर्शन किया।

यह प्रदर्शन तब नरसंहार में परिवर्तित हो गया जब पाकिस्तान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियों की बौछार शुरू कर दी, लगातार विरोध के बाद अन्त में सरकार को बांग्लाभाषा को आधिकारिक दर्जा देना पड़ा। भाषाई आंदोलन में शहीद हुए युवाओं की स्मृति में यूनेस्को ने पहली बार 17 नवम्बर 1999 को 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस मनाने की घोषणा की।

काव्यादर्श में कहा गया है-
“इदमन्धुत्तमः कृत्स्नं जाएत भुवन त्रयम
यदि शब्दाह्वयं ज्योतिरात्संसारं न दिप्यते।
अर्थात “यदि शब्द रूपी ज्योति से संसार प्रदीप्त न होता तो तीनों लोकों में अंधकार व्याप्त हो जाता।”

भाषा मानव जीवन का मेरुदंड है। भाषा विचारों की पोषक होती है। मातृ भाषा संस्कारों की संवाहक होती है, इसके द्वारा ही किसी देश की संस्कृति मूर्त रूप प्राप्त करती है।

भारत के लोकप्रिय पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे.अब्दुल कलाम ने स्वयं अपने अनुभवों के आधार पर कहा था कि “मैं अच्छा वैज्ञानिक इसलिए बना क्योंकि मैंने गणित और विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में प्राप्त की थी (धरमपेठ कॉलेज नागपुर)।” आपके द्वारा कहे गए शब्द अक्षरशः सत्य है।

शिक्षा के लिए भाषा अत्यावश्यक है, विश्व में विगत 40 वर्षों में लगभग 150 अध्ययनों के निष्कर्ष हैं कि मातृभाषा में ही शिक्षा होनी चाहिए, क्योंकि बालक को माता के गर्भ से ही मातृभाषा के संस्कार प्राप्त होते हैं। भारतीय वैज्ञानिक सी.वी.श्रीनाथ शास्त्री के अनुभव के अनुसार अंग्रेजी माध्यम से इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त करने वाले की तुलना में भारतीय भाषाओं के माध्यम से पढ़े छात्र, अधिक वैज्ञानिक अनुसंधान करते हैं।

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः ।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ॥
अर्थात – जो अपने बालक को पढाते नहीं, ऐसी माता शत्रु समान और पित वैरी है; क्योंकि हंसो के मध्य बगुले की भाँति, ऐसा मनुष्य विद्वानों की सभा में शोभा नहीं देता।

इसी प्रकार विश्व कवि रविन्द्र नाथ ठाकुर ने कहा है:- ‘‘ यदि विज्ञान को जन-सुलभ बनाना है तो मातृभाषा के माध्यम से विज्ञान की शिक्षा दी जानी चाहिए।’’

महात्मा गांधी का कथन- “विदेशी माध्यम ने बच्चों की तंत्रिकाओं पर भार डाला है, उन्हें रट्टू बनाया है, वह सृजन के लायक नहीं रहे। विदेशीभाषा ने देशी भाषाओं के विकास को बाधित किया है।

भारत के ख्याति प्राप्त अधिकतर वैज्ञानिकों ने अपनी शिक्षा मातृभाषा में ही प्राप्त की है। जिसमें प्रमुख रूप से जगदीश चन्द्र बसु, श्रीनिवास रामानुजन, डॉ अब्दुल कलाम आदि। इसी प्रकार वर्तमान में विभिन्न राज्यों की बोर्ड की परीक्षाओं में उच्च अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी, मातृभाषा में पढ़ने वाले ही अधिक हैं।

शिक्षा के विभिन्न आयोगों एवं देश के महापुरूषों ने भी मातृभाषा में शिक्षा होनी चाहिए, ऐसे सुझाव दिये हैं। महात्मा गांधी ने ठीक ही कहा हैः-‘‘ बच्चों के मानसिक विकास के लिए मातृभाषा उतनी ही आवश्यक है जितना शारीरिक विकास के लिए माँ का दूध’’.

भारतीय संविधान निर्माताओं की आकांक्षा यही थी कि स्वतंत्रता के बाद देश का शासन अपनी भाषाओँ से चले, जिससे आम जनता शासन से जुडी रहेगी ताकि समाज में एकता, सामंजस्य हो। ऐसा होने पर ही देश की प्रगति हो सकेगी। भारत बहुभाषी देश है इसलिए मातृभाषाओं का संरक्षण और संवर्धन उसका प्रमुख उत्तरदायित्व है ।

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के माध्यम से यूनेस्को ने विश्व की समस्त मातृभाषाओं को प्राथमिक शिक्षा, बहुभाषी शिक्षा, समावेशी शिक्षा, साइबरस्पेस, ब्रेल तथा अन्य लिपियों में विकास-मैत्री, संस्कृति, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी, विश्व नागरिकता के लिए स्थानीय भाषाओँ तथा विज्ञान पर बल जैसे विषयों पर महत्वपूर्ण कार्य की पहल की है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार विश्व में बोली जाने वाली भाषाएं लगभग 6900 हैं। इनमें से 90 फीसदी भाषाएं बोलने वालों की संख्या एक लाख से कम है। दुनिया की कुल आबादी में तकरीबन 60 फीसदी लोग 30 प्रमुख भाषाएँ बोलते हैं जिनमे से दस सर्वाधिक बोले जाने वाली भाषाओं में,जापानी, अंग्रेजी, रुसी, बांग्ला, पुर्तगाली, अरबी, पंजाबी, मंदारिन, हिंदी और स्पेनिश हैं।

भारत के संविधान में आठवीं अनुसूची भारतीय भाषाओं से संबंधित है। मूल संविधान में 14 भाषाएँ शामिल थी जो निम्न हैं- कश्मीरी, मलयालम, मराठी, उड़िया, असमिया, बांग्ला, गुजराती, कन्नड़, पंजाबी, हिंदी, उर्दू, संस्कृत, तमिल, तेलगू।

वर्तमान में 22 राजभाषाएं हैं। जिसमे सिंधी को 21 वें संविधान संशोधन से सन 1967 में अनुसूची में शामिल किया गया। 71 वां संशोधन सन1992 में किया गया जिसमें कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली भाषा को शामिल किया गया। 2003 में 92वां संशोधन में बोडो, डोंगरी, मैथिली, संथाली को अनुसूची में शामिल किया गया।

यदि मध्यभारत की बात करें तो हिंदी भाषा सर्वाधिक बोली जाती है। किंतु क्ष्रेत्र विशेष में हिंदी के साथ बुंदेलखंडी, बघेली, निमाड़ी, मालवी, ब्रज, कोरकू, भीली, गोंडी भाषा बोली जाती है ।

मध्यप्रदेश से अलग होकर सन 2000 में छत्तीसगढ़ अस्तित्व में आया। जिसका प्राचीन नाम दक्षिण कोसल था इसे महाकोसल भी कहा जाता था। यहाँ बोली जाने वाली भाषा को कोसली भी कहा जाता था। मागधी भाषा ही अर्धमागधी में परिवर्तित होकर छत्तीसगढी भाषा कहलाई जो पूर्वी हिंदी की प्रमुख बोली और राज्य की प्रमुख भाषा है।

छत्तीसगढ़ की बोलियों के आधार पर तीन भागों में बांटा गया है, आर्य, मुंडा और द्रविड़। उत्तरी भाग में मुंडा भाषा परिवार, दक्षिण क्षेत्र में द्रविड़ भाषा परिवार एवं मध्य में आर्य भाषा परिवार है।

उत्तरी छत्तीसगढ में बघेली,भोजपुरी और कुडुख का प्रभाव दिखता है। इसमें सरगुजिहा प्रमुख है। दक्षिणी छत्तीसगढी समूह में मराठी, उड़िया, गोंडी का प्रभाव इसमे प्रमुख हल्बी है। पूर्वी छत्तीसगढ़ी में उड़िया भाषा का प्रभाव है। इसमें लारिया प्रमुख है। पश्चिमी छत्तीसगढ़ी में बुंदेली व मराठी का प्रभाव दिखता है, खल्टाही प्रमुख है।

छत्तीसगढ़ के आदिवासी समूहों की अपनी अपनी भाषाएं बोलियाँ हैं, जिसमें वे व्यवहार करते हैं। साहित्यकार एवं बस्तर की संस्कृति के जानकार हरिहर वैष्णव बताते हैं बस्तर में 13 बोलियाँ बोली जाती हैं, जिसमें से तो कुछ विलुप्ति के कगार पर हैं। दोरली, हल्बी, भतरी, पारधी, गोंड़ी आदि बोलियां प्रमुख रुप से बोली जाती हैं। वैसे सरगुजा में भी पंडों, कोरवा, पारधी आदिवासी समहों की बोलियाँ अलग हैं।

मातृभाषा के महत्व को समझते हुए, क्षेत्र विशेष में बोली जाने वाली भाषा के संरक्षण और संवर्धन हेतु एन सी आर टी ने छत्तीसगढ़ में बोली जाने वाली प्रमुख बोलियों में छत्तीसगढ़ी समेत कुडुख, हल्बी, गोंडी, सरगुजिया आदि पर पठन सामग्री किताबों में डाली गईं तथा कुछ बोलियों पर एन बी टी ने भी पुस्तकें प्रकाशित की हैं।

28 नवम्बर 2007 को छत्तीसगढ़ी को राज भाषा का दर्जा मिला। 28 नवम्बर को राजभाषा दिवस मनाया जाता है। तत्कालीन सरकार ने राजभाषा आयोग का गठन कर छत्तीसगढ़ की बोलियों, भाषाओं का मानकीकरण करने एवं संवर्धन करने का प्रकल्प स्थापित किया। जिससे छत्तीसगढ़ अंचल की मातृभाषाओं का संरक्षण एवं विकास हो सके।

मातृभाषा से ही मनुष्य के आत्मगौरव में वृद्धि होती है आत्मबल बढ़ता है, जिससे वह ज्ञानार्जन की ओर अग्रसर होता है। सरलता, बोधगम्यता व शैली की दृष्टि से मातृभाषा का महत्वपूर्ण स्थान है। इतना तो तय है कि मातृभाषा दिवस के रुप में लोग वर्तमान में अपनी बोली एवं भाषा के प्रति जागृत हो रहे हैं, जो कि मानव समुदाय के लिए एक शुभ संकेत है।

आलेख

श्रीमती रेखा पाण्डेय
व्याख्याता हिन्दी, अम्बिकापुर सरगुजा, छत्तीसगढ़

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