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राजिम धाम में मकर संक्रांति की प्राचीन परम्परा

भारतीय संस्कृति में नदियों के संगम पर विभिन्न धार्मिक कार्यों के संपादन की प्राचीन परम्परा रही है। इसी परम्परा में संक्राति पर्वों पर स्नान-दान एवं ध्यान की परम्परा भी है। संक्रांति पर भारत में नदियों के तट पर मेले लगते हैं, हमारा छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नही है। यहाँ भी संक्रांति पर्व पर प्रमुख नदियों के संगम पर मेले लगते हैं। छत्तीसगढ़ के प्रमुख तीर्थ श्री संगम राजिम धाम में मकर संक्रांति से अखंड मेला प्रारंभ होता था जो फाल्गुन पूर्णिमा पर समाप्त होता था। ब्रिटिश काल में इसकी अवधि घटकर एक माह हो गई थी जो अब मात्र 15 दिनों की हो गई है।

रतनपुर राज्य के ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन में आने के बाद नियुक्त सुपरिटेंडेंट सर रिचर्ड जेनकिंस सन 1824 में राजिम की यात्रा की थी । उन्होंने राजिम के पंडे-पुराहितों से जानकारी संकलित कर एशियाटिक सोसाइटी के जर्नल में रिपोर्ट प्रकाशित की थी । इस रिपोर्ट के अनुसार उन्हें पंडों ने बताया था कि भविष्योत्तर पुराण में राजिम का महात्म्य वर्णित है जिसके अनुसार – त्रेता युग में श्रीराम के अयोध्या में राज तिलक होने के बाद अश्वमेध यज्ञ का आयोजन हुआ। तब की परंपरा अनुसार दिग्विजय के लिए चारों दिशाओं में यज्ञ का घोड़ा छोड़ा गया।

दक्षिण दिशा में छोड़े गए श्याम कर्ण घोड़ा की रक्षा के लिए शत्रुघ्न को सेना सहित तैनात किया गया। घोड़ा विचरते हुए महानदी के तट पर पहुंचा तब इस क्षेत्र में राजीव लोचन नामक राजा था। राजा ने घोड़ा को पकड़कर तपस्यारत कर्दम ऋषि के आश्रम में बांध दिया। शत्रुघ्न को घोड़ा के पकड़े जाने और कर्दम ऋषि आश्रम में बंधे होने की सूचना मिलने पर उसने सेना को आक्रमण करने का आदेश दिया।

सेना के आक्रमण से ऋषि का ध्यान टूटा और उसने तपोबल से शत्रुघ्न को सेना सहित भस्म कर दिया। शत्रुघ्न के भस्म होने की सूचना मिलने पर श्रीराम राजिम पधारे। राजा राजीव लोचन श्रीराम के पधारने की सूचना मिलते ही शरणागत होकर अभयदान मांग लिया। श्रीराम कर्दम ऋषि को प्रसन्न करने उनके आश्रम पहुंचे। श्रीराम के आगमन से ऋषि प्रसन्न हुए और श्रीराम के आग्रह पर शत्रुघ्न को सेना सहित पुनर्जीवित कर दिए।

श्रीराम अयोध्या लौटने के पूर्व राजा राजीव लोचन को आदेश दिए कि तुम्हारे राज्य में भगवान नीलकंठेश्वर का भव्य मंदिर बना हुआ है इसलिए तुम यहां मेरा भी मंदिर बनाओ। उस मंदिर में प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के दिन उत्सव का आयोजन करना और मेरे भक्तों को खिचड़ी महाप्रसाद का वितरण करना। वह मंदिर तुम्हारे नाम पर राजीव लोचन मंदिर कहलाएगा। राजा ने श्रीराम के आदेशानुसार भव्य मंदिर का निर्माण कराया और प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के दिन उत्सव का आयोजन करने लगा।

सर रिचर्ड जेनकिंस के रिपोर्ट के अनुसार बिंद्रानवागढ़ राज्य के जुड़ावन सुकुल नामक पंडित ने भविष्योत्तर पुराण का टीका लिखा है। वर्तमान में यह ग्रंथ उपलब्ध नहीं है।

आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के डायरेक्टर जनरल सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने इस कहानी को अमान्य कर पण्डो द्वारा गढ़ी हुई कहानी बताया है। कनिंघम रिपोर्ट के अनुसार राजिम से कुछ ही दूरी पर तुरतुरिया नामक स्थान है जहां महर्षि वाल्मीकि का आश्रम होने और लव-कुश द्वारा श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा पकड़े जाने की कहानी प्रचलित है। इसी तरह सतना जिला के पंचवटी क्षेत्र में वाल्मिकी आश्रम होने और घोड़ा पकड़े जाने की कहानी प्रचलित है। कनिंघम सतना में प्रचलित कहानी को शास्त्र अनुकूल मानते हैं।

छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ इतिहासकार प्रो रमेंद्र नाथ मिश्र अपनी पुस्तक प्राचीन दुर्लभ संदर्भ में उल्लेख करते हैं कि एक बार भगवान जगन्नाथ ने राजिम के मुख्य पंडा को स्वप्न में आदेश दिया कि मकर संक्रांति पर होने वाले खिचड़ी महाप्रसाद के सामूहिक भोज को तुरंत बंद करे क्योंकि चार धाम की यात्रा के लिए संकल्पित अधिकांश श्रद्धालु राजिम में महाप्रसाद ग्रहण कर यात्रा समाप्त कर देते हैं। श्रद्धालुओं के पुरी धाम की यात्रा नहीं करने से यात्रा अधूरी रह जाती है और अपेक्षित पुण्य लाभ नहीं मिलता है। तभी से मकर संक्रांति का प्राचीन उत्सव बंद कर दिया गया है।

इस पूरी घटना क्रम को विद्वान मानते हैं कि पुरी का जगन्नाथ धाम देशी और विदेशी राजाओं के आक्रमण और लुटेरों से अशांत था। लूटपाट की घटनाओं के कारण श्रद्धालु पुरी की यात्रा करने से डरते थे। पुरी के राज दरबार के मादना पंजी में सभी आक्रमणों का विवरण दर्ज है, जिसका संक्षेप इस प्रकार है –

9 वीं से 18 वीं सदी में मध्य भगवान जगन्नाथ के मंदिर में 18 बार आक्रमण हुए थे। जिसका संक्षेप है – 1 – राष्ट्रकूट राजा गोविंदा तृतीय के सेनापति रक्तबाहु ( 839 ई.) 2 – इलियास सुलतान ( 1340 ई ) 3 – फिरोज शाह तुगलक (1360 ई ) 4 – इस्माइल गाजी  (1509 ई )5 – कालापहाड़ (1568 ई ) 6 – सुलेमान (1592ई ) 7 – इस्लाम खान / मिर्ज़ा खुर्रम  ( 1601या 1607 ई  ) 8 – कासिम खान 1609 ई  9 – केशवदास मारु ( 1610 ई ) 10 – कल्याण मल ( 1611 ई ) 11 – कल्याण मल ( 1612 ई ) 12 – मुकरम खान ( 1617 ई ) 13 – मिर्ज़ा अहमद बेग ( 1621ई ) 14 – मिर्ज़ा मक्की ( 1641 ई ) 15 – अमीर फ़तेह /मुत्क्वाह खान ( 1647 ई ) 16 – इकराम खान / मस्तराम ( 1692 ई ) 17 – मुहम्मद तकी ( 1731 ई ) एवं 18 – दशरथ खान ( 1733 ई )।

अंतिम बार जगन्नाथ पूरी में लूटपाट अंग्रेजों के शासन काल में सं १८८१ में ” अलेख पंथ ” के समर्थकों ने किया था जिन्हें पकड़ कर दण्डित किया गया था। यहां यह विशेष उल्लेखनीय है कि ओडिशा सं 1568  से 1751 तक मुस्लिम शासकों के अधीन था। विदेशी आक्रांताओं का आक्रमण सामान्य घटना है किंतु देशी राजाओं के आक्रमण का कारण शोध का विषय है।

विद्वानों का यह भी मत है कि सन 1754 में पुरी में मराठों का शासन स्थापित होने और भग्न मंदिरों का पुनर्निर्माण / जीर्णोद्धार करने उपरांत श्रद्धालु निर्भय होकर पुरी धाम की यात्रा पर जाने लगे थे इसलिए राजिम में मकर संक्रांति पर होने वाले सामूहिक भोज के उत्सव को बंद कर दिया गया। वर्तमान में इस दिन राजिम के मुख्य मंदिर में भक्त भगवान को तिल लड्डू, स्वर्ण एवं कांसे का बर्तन समर्पित करते हैं।

गरियाबंद जिला के देवभोग थाना के दीवाल पर लिखे विवरण के अनुसार लगभग 25 गांवों में उत्पन्न धान का चावल प्राचीन काल से पुरी जाते रहा है और अभी भी पुरी का मंदिर ट्रस्ट उस क्षेत्र से धान खरीदी कर चावल लेकर जाता है। इस तरह राजिम में संक्रांति मेला मनाये जाने की परम्परा प्राचीन काल से ही रही है।

आलेख

डॉ.घनाराम साहू, रायपुर छत्तीसगढ़ी संस्कृति एवं इतिहास के अध्येता


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