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भगवान राजीव लोचन एवं भक्तिन राजिम माता : विशेष आलेख

राजिम दक्षिण कोसल का सबसे बड़ा सनातन तीर्थस्थल के रूप में चिन्हित रहा है क्योंकि यह नगर तीन नदियों उत्पलेश्वर (चित्रोत्पला) (सिहावा से राजिम तक महानदी) प्रेतोद्धारिणी (पैरी) एवं सुन्दराभूति (सोंधुर) के तट पर बसा है।

प्रेतोद्धारिणी की महत्ता महाभारत काल से पितृकर्म के लिए प्रतिष्ठित, चिन्हित रही है जिसका वर्णन “कपिल संहिता” में मिलता है। कहा जाता है कि राजिम नगर का नामकरण नारायण (विष्णु) भक्त महिला राजिम के पुण्य स्मरण में हुआ था। इस महिला के विषय में अनेक कहानियां लोक में प्रचलित हैं।

चित्रोत्पला गंगा (महानदी)

अर्वाचीन काल में राजिम की पहली यात्रा अंग्रेज अधीक्षक सर रिचर्ड जेंकिन्स ने सन 1824 में की थी। जिसका प्रतिवेदन एशियाटिक रेसर्चेस जर्नल जिल्द 15 में सन 1825 में प्रकाशित हुआ था। इस रिपोर्ट के अनुसार जुड़ावन सुकुल नामक पंडित ने भविष्योत्तर पुराण का हिंदी अनुवाद किया था जिसमें राजिम का महात्मय वर्णित है।

राजिम लोचन मंदिर के निर्माण के सन्दर्भ में इस प्रतिवेदन में वर्णित है – “भगवान रामचंद्र के काल में इस क्षेत्र में राजू लोचन नामक राजा का राजत्व था जिसने रामचंद्र के अश्वमेध के श्यामकर्ण घोड़ा को पकड़कर, महानदी के तट पर स्थित कर्दम ऋषि के आश्रम में बाँध दिया था। घोड़ा का पीछा करते हुए शत्रुघन सेना सहित आकर कर्दम ऋषि आश्रम पर आक्रमण करते हैं और ऋषि के शाप से भस्म हो जाते हैं।

राजीवलोचन मंदिर

यह समाचार सुनकर रामचंद्र का आगमन होता है और राजा राजुलोचन शरणागत हो जाते हैं। रामचंद्र के आदेशानुसार राजुलोचन उनका एक मंदिर का निर्माण करते हैं जो राजुलोचन मंदिर कहलाता है।| रामचंद्र के आग्रह पर कर्दम ऋषि शत्रुघ्न और सेना को पुनर्जीवित कर देते हैं।”

कालांतर में मंदिर में स्थापित रामचंद्र की मूर्ति गुम हो जाती है जो चमत्कारिक ढंग से तेली जाति की महिला को मिलती है। जिसका उपयोग वह अपनी घानी में भार बढ़ाने वाले पत्थर के रूप में करती है। इस क्षेत्र के राजा जगतपाल को स्वप्न में इस पत्थर के बारे में ज्ञात होता है और वह उसे प्राप्त कर मंदिर में पुनः स्थापित कर देता है। इस रिपोर्ट में तेली जाति की महिला के नाम का उल्लेख नहीं है।

भगवान राजीव लोचन राजिम

सन 1869 में अंग्रेज पुरातत्ववेत्ता जे डी बेग्लर राजिम की यात्रा करते हैं जिसका प्रकाशन सन 1878 में रिपोर्ट ऑन टूर इन बुन्देखण्ड एंड मालवा 1871-72 एंड इन सेंट्रल प्रॉविन्सेस 1875-76 जिल्द 7 में हुआ था। इनकी रिपोर्ट में उल्लेखित है कि “राजम का नामकरण राजब नामक तेलिन से हुआ है जो नारायण की उपासक थी। 12 वर्ष की उपासना के दौरान नारायण उन्हें प्रतिदिन दर्शन देते हैं और अंत में वरदान माँगने कहते हैं। राजब नारायण से उनके पास सदैव के बिराजने और उनके नाम के आगे अपना नाम जोड़ने का वरदान मांगती है। तब से नारायण राजिबलोचन कहलाये।”

रिपोर्ट में यह भी लिखा गया है कि इस मंदिर में खिचड़ी प्रसाद का वितरण बिना किसी जातिगत भेदभाव के सामूहिक होता था लेकिन एक बार मंदिर के मुख्यपण्डा को भगवान् जगन्नाथ स्वप्न में सामूहिक भोज को बंद करने का आदेश देते हैं क्योंकि श्रद्धालुओं की यहीं मनोकामना पूर्ण हो जाने से वे पूरी की यात्रा बंद कर देते हैं। तब से सामूहिक भोज की परंपरा बंद है।

आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के डायरेक्टर जनरल सर एलेग्जेंडर कन्निंघम सन 1881-82 में राजिम की यात्रा कर रिपोर्ट लिखते हैं जो “रिपोर्ट ऑफ़ अ टूर इन सेंट्रल प्रॉविन्सेस” जिल्द 17-1884 में प्रकाशित होता है। इस रिपोर्ट में उल्लेखित है कि “राजू या राजिब नामक चांदा की विधवा तेल व्यापारी थी जिसके पास काले रंग का पत्थर था। इस पत्थर का उपयोग तेल बेचने में वजन मापने के लिए करती थी।

राजा जगतपाल को स्वप्न में उस पत्थर को प्राप्त कर मंदिर निर्माण का आदेश होता है। राजा जगतपाल राजिब तेलिन के समक्ष पत्थर के वजन के बराबर सोना लेकर सौंपना प्रस्तावित करते हैं जिसे राजिब अस्वीकार कर देती है। अंत में राजिब रानी के नाक की बाली और अपना नाम मंदिर के साथ जोड़ने की शर्त के साथ पत्थर देना स्वीकार लेती है।

इसी रिपोर्ट में दूसरी कहानी के अनुसार राजिब राजा जगतपाल से पत्थर के भार के बराबर सोना की मांग करती है तब राजा के पास उतना सोना नहीं होता है। तब उसकी रानी झंकावती अपने नाक की बाली एवं अन्य गहने देकर पत्थर को तौलती है लेकिन पत्थर का भार अधिक निकलता है।

राजिम मेले का विहंगम दृश्य

राजा जगतपाल भगवान की प्रार्थना करते हैं तब गहनों का भार अधिक हो जाता है। राजा जगतपाल उस पत्थर को प्राप्त कर मंदिर का निर्माण कर पत्थर को स्थापित करते हैं। इसके बाद राजिब तेलिन चांदा से राजिम आ जाती है और मंदिर के सामने रहने लगती है। उसी स्थान पर राजिम तेलिन भक्तिन मंदिर निर्मित है।

राजिम के सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी पं सुंदरलाल शर्मा जी सन 1898 में “श्री राजीव क्षेत्र महात्मय” नामक पद्य ग्रन्थ की रचना करते हैं जो सन 1915 में प्रकाशित हुआ था। इसमें उल्लेखित है कि एक बार कांकेर के कंडरा राजा जगन्नाथपुरी की यात्रा कर वापसी में राजिम में नारायण का दर्शन करते हैं और मूर्ति के सौंदर्य से मोहित हो जाते हैं।

राजा मूर्ति को कांकेर ले जाने संघर्ष करते हैं और जलमार्ग से नाव में प्रस्थान करते हैं लेकिन नाव रुद्री (धमतरी के निकट) भंवर में फंसकर डूब जाती है। मूर्ति बहकर राजिम पहुंचती है जो राजिम भक्तिन को मिलती है। इसी मूर्ति को राजा जगतपाल प्राप्त कर मंदिर में स्थापित करते हैं। पं शर्मा जी के अनुसार बहकर आने के कारण मूर्ति घिसकर साधारण पत्थर सदृश्य हो जाती है।

सन 1915 में फिंगेश्वर के शासक दलगंजन सिंहदेव, पं चंद्रकांत पाठक से “श्रीमद्राजीवलोचनमहात्मय” नामक संस्कृत ग्रन्थ हिंदी टीका सहित प्रकाशित करवाये थे। इस ग्रन्थ में राजीवलोचन मंदिर के निर्माता सतयुग के राजा जगतपाल को बताया गया है जो नारायण (विष्णु) के भक्त थे। इस ग्रन्थ में राजिम / राजिब नामक किसी भक्त महिला का कोई उल्लेख नहीं है।

लोक में वर्तमान में प्रचलित कहानी के अनुसार राजिम भक्तिन माता स्थानीय तेल व्यापारी की पुत्री थी जो बचपन से नारायण (विष्णु) की भक्त थी। उसे विष्णु की प्रतिमा महानदी में मिली थी जो आँखों के समान गोलाकार थी इसलिए वह प्रतिमा को लोचन भगवान पुकारती थी।

राजिम विधवा न होकर सध्वा थी और उसके पति तेल व्यवसाय में सहभागी थे। राजिम भगवान प्रतिमा को अपने घानी में स्थापित कर रखी थी जिसके कारण उसकी घानी दिन-रात बिना बैल जोते चलती थी। तेल के अधिक उत्पादन से परिवार समृद्ध था।

राजिम की भक्ति से भगवान प्रसन्न होकर वरदान माँगने कहते हैं तब राजिम दो वरदान मांगती है – 1- भगवान उसे पुत्र रूप में दर्शन दे और 2- भगवान के नाम के आगे उसका भी नाम चले। कालांतर में राजा जगतपाल राजिम भक्तिन से भगवान प्रतिमा को प्राप्त कर राजिमलोचन मंदिर का निर्माण करते हैं और नगर का नाम भी कमलक्षेत्र-पद्मपुर से बदलकर राजिम रखते हैं।

जगपाल देव के शिलालेख का हिन्दी रुपांतरण

इन सभी कहानियों में राजा जगतपाल का नाम आता है जिसकी तुलना इतिहासकार कलचुरी सामंत जगपाल देव से करते हैं जिसने कलचुरी सम्वत 896 को माघ शुक्ल पक्ष अष्टमी (रथ अष्टमी) दिन बुधवार को एक शिलालेख उत्कीर्ण कराकर लोकार्पित किया था। यह शिलालेख राजीवलोचन मंदिर की दीवाल में मिला है।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह शिलालेख मूलतः रामचंद्र मंदिर का है जिसका निर्माण सामंत जगपाल देव ने कराया था तथा राजीवलोचन मंदिर का जीर्णोद्धार भी। यह तिथि ग्रेगेरियन कैलेंडर के अनुसार 3 जनवरी 1145 माना गया है, सन 1991-92 में राजिम में “राजिम माता जयंती” का प्रारम्भ 7 जनवरी को किया गया था तभी से प्रतिवर्ष 7 जनवरी को जयंती समारोह आयोजित होता है।

इस तिथि को छत्तीसगढ़ शासन द्वारा स्वीकार कर ऐच्छिक अवकाश स्वीकृत करती है। बुजुर्गों के अनुसार पूर्व में बसंत पंचमी के दिन साहू समाज के लोग पितईबंद के अमरैया में एकत्र होकर राजिम भक्तिन माता की शोभायात्रा निकालते थे जो आज़ादी के पहले से बंद है।

आलेख

घनाराम साहू, रायपुर
छत्तीसगढ़ी संस्कृति एवं इतिहास के अध्येता

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