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भगवान श्री राम की ऐतिहासिकता

भगवान राम की एतिहासिकता को लेकर लम्बे समय समय से एक दीर्घकालिक बहस विद्वानों के बीच होती रही है और राम मंदिर तथा राम सेतु जैसे मुद्दों ने इस चर्चा को व्यापक बनाने का काम किया है। किंतु आम जन-मानस को भगवान राम की ऐतिहासिकता जैसे विषयों से बहुत सरोकार नहीं रहा लेकिन उसे कभी भी लोकव्यापी मर्यादा पुरुषोत्तम दशरथि राम की ऐतिहासिकता में कोई संशय भी नहीं रहा।

भगवान राम की ऐतिहासिकता के संदर्भ में ना केवल प्रचुर मात्रा में साहित्यिक बल्कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक प्रमाण भी उपलब्ध हैं। यहाँ पर भगवान राम की ऐतिहासिकता के संदर्भ में उपलब्ध साहित्यिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों के प्रतिनिधि उदाहरणों का विवेचन आज के परिप्रेक्ष्य में आवश्यक लगता है।

फ़ोटो- ललित शर्मा, रामगढ़ सरगुजा, छत्तीसगढ़

यद्यपि ऋग्वेद में विस्तृत रामकथा तो प्राप्त नहीं होती किंतु इक्ष्वाकु, दशरथ, राम, जनक अश्वपति तथा पृथ्वी देवी के रूप में सीता जैसे शब्दों के उल्लेख से अनुमान है कि तत्कालीन समय में लोग इन नामों से परिचित थे।

प्रसंगवश यह उल्लेखनीय है कि पूरी दुनिया के विद्वान ऋग्वेद को दुनिया का प्राचीनतम ग्रंथ स्वीकार करते हैं। भारतीय युग परम्परा से भी यह तथ्य प्रमाणित होता है की सतयुग के बाद त्रेतायुग और उसके पश्चात द्वापर युग हुआ और यह सामान्य रूप से माना जाता है कि त्रेता में राम और द्वापर में कृष्ण का जन्म हुआ। अर्थात् कृष्ण से पूर्व राम हुए अतः महभारत में राम का उल्लेख प्राप्त होना चाहिए और ऐसा हुआ भी है।

महाभारत के द्रोणपर्व, आरण्यकपर्व तथा शांतिपर्व में रामकथानक एवं रामोपाख्यान का विवरण मिलता है जिससे यह ज्ञात होता है कि महाभारत काल में भी भगवान राम के बारे में पर्याप्त जानकारी लोगों को थी। सामान्य रूप से हम में से किसी को भी भगवान बुद्ध तथा महावीर स्वामी, की ऐतिहासिकता में संदेह नहीं होता किंतु हम में से कई लोग भगवान राम की ऐतिहासिकता में संदेह व्यक्त करते हैं जबकि स्वयं बौद्ध जातक कथाएँ यथा दशरथ जातक में राम कथा का उल्लेख मिलता है।

यहाँ यह जानना आवश्यक है कि भगवान बुद्ध का काल 6ठी सदी ईसा पूर्व स्वीकार किया जाता है और जातक कथाएँ भगवान बुद्ध के पूर्व जन्म से सम्बंधित मानी जाती हैं जो की ऋग्वेद आदि की ही तरह ही श्रुत परम्परा में संग्रहित की गई और बाद में पांडुलिपियों के रूप में में हमारे सामने आयी।

फ़ोटो – ललित शर्मा, विष्णु मंदिर जांजगीर छत्तीसगढ़

अतः सामान्य रूप से पुनः यह ज्ञात होता है की भगवान बुद्ध के समय में भी राम के बारे पूर्ण जानकर्री उपलब्ध थी। इसी प्रकार जैन परम्परा में पउमचरिय सहित अनेक ग्रंथों में राम कथा का व्यापक रूप से उल्लेख मिलता है। और इसी प्रकार दक्षिण भारत के संगम साहित्य विशेषकर “पुर नानुरु” में भी राम कथा की कतिपय घटना का वर्णन किया गया है।

उपरोक्त तथ्यों से यह प्रमाणित होता है कि ईस्वी सन से पहले ही अर्थात् परमेश्वर यीशु से बहुत पहले ही राम का ऐतिहासिक चरित अस्तित्व में था। जिसकी पुष्टि भाषा वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन के आधार पर की है। इसी क्रम में वाल्मीकि कृत संस्कृत रामायण के रचनाकाल के संदर्भ में ए श्लेगल तथा जी ग्रोशिये जैसे विद्वान इसका तिथिक्रम 11-12वीं सदी ईसा पूर्व अनुमानित करते हैं वहीं डॉ वेबर एवं जी टी व्हीलर आदि विद्वान इस पर रोम-बौद्ध प्रभाव मानते हैं और उसे इतना प्राचीन नहीं मानते हैं।

वहीं मैकडोनाल्ड, मोनीयर विलियम्स, विंटरनिट्ज, यकोबी तथा सी वी वैद्य आदि रामायण/रामकथा का रचनाकाल 1-5वीं-8वीं सदी ईसा पूर्व निर्धारित करते हैं। अर्थात् भगवान राम से सम्बंधित ऐतिहासिक कथानक आज से लगभग दो हज़ार पाँच सौ वर्ष पूर्व ही लिपिबद्ध किए जा चुके थे।

कालांतर में तो केवल अन्य क्षेत्रिय भाषाओं इसका रूपांतर हुआ है और तुलसी कृत रमचरित मानस ने तो इसे लोकप्रियता के शिखर पर अधिष्ठित कर दिया।

फ़ोटो-ललित शर्मा, विष्णु मंदिर जांजगीर, छत्तीसगढ़

साहित्यिक प्रमाणों के बाद रामायण में घटी घटनाओं के पुरात्तत्विक प्रमाणों के पक्ष-विपक्ष में विद्वानों में सर्वाधिक चर्चा हुई है। कतिपय विदेशी और स्वदेशी विद्वान तो रामायण के यथेष्ट प्रमाण होते हुए भी उसे नकारने का ही प्रयास करते रहे हैं।

हाँ यह अवश्य है की रामायण में घटी घटनाएँ अपने मूल स्वरूप में वैसी नहीं थी जैसी आज दिखाई देती है क्योंकि रचनाकारों ने इतिहास और धार्मिक तथ्यों को आपस में मिलकर ऐसा आभामंडल निर्मित कर दिया जो की आभासी दिखाई देने लगा और इतिहास का एक नायक काल्पनिक लगने लगा, ठीक उसी प्रकार जैसा की अन्य धर्मों के प्रवर्तकों में दिखाई देता है।

सामान्यतः रामायण में घटी घटनाओं का पारम्परिक तिथिक्रम लगभग सात हज़ार वर्ष पूर्व स्वीकार किया जाता है और यह असम्भव भी नहीं लगता क्योंकि रामायण में घटी घटनाओं का मुख्य केंद्र स्थल गंगाघाटी में हुए पुरातात्विक अनुसंधानों से ऐसा लगता है कि लगभग दस हज़ार वर्ष पूर्व वहाँ पर मानवीय गतिविधियाँ संचालित होती थी।

यही नहीं बल्कि महाभारतकाल के उत्खनन में मिलने वाले गैरिक मृदभांडो से जोड़ा जाता है। अभी हाल ही में हरियाणा के सोनौली नामक ग्राम में हुए पुरातात्विक उत्खनन में प्राप्त हुआ रथ कर्ण के रथ के नाम से मीडिया की सुर्ख़ियों बना था। इसके पीछे भी यही कारण था कि वहाँ से महाभारतकालीन गैरिक मृदभांड पात्र परम्परा प्राप्त हुई थी जिसकी थी लगभग 1900 ईसा पूर्व ज्ञात हुई है अर्थात् आज से लगभग 4000 वर्ष पहले।


फ़ोटो-ललित शर्मा, देऊर मंदिर मल्हार, छत्तीसगढ़

इस आधार पर यह तो कह जा सकता है कि भले ही वह रथ कर्ण का हो या ना हो पर महाभारतकाल से सम्बंधित अवश्य था और महाभारत की तिथि तो रामायण से बाद में आती है अतः निर्विवाद रूप से रामायण की तिथियाँ इसके पूर्व की होनी चाहिए।

इसी प्रकार रामायण के पुरातात्विक प्रमाणों की खोज के लिए सुविख्यात पुराविद प्रो बी बी लाल ने 1977-86 के मध्य रामायणक़ालीन स्थलों, अयोध्या, भारद्वाज आश्रम, चित्रकूट, ऋंगबेरपुर आदि का पुरातात्विक अन्वेषण कार्य किया है जिसके तथ्य सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं।

जब भी कोई पुरातत्वविद साँची, भरहुत आदि स्तूपों का भ्रमण करता है तो वहाँ पर अंकित भगवान बुद्ध की कथाओं को उनके जीवन की की वास्तविक घटना के रूप में स्वीकार करता है किंतु जब भगवान राम से सम्बंधित घटनाओं को प्राचीन देवालयों अंकित देखता है तो उसे स्वीकार करने में हिचकिचाहट महसूस करता है।

जबकि यह स्वीकार्य तथ्य है कि भगवान बुद्ध, महावीर स्वामी आदि से सम्बंधित घटनायें वास्तविक रूप से उनके समय में घटी अथवा नहीं किसी को ज्ञात नहीं है परंतु उनका भी अंकन ठीक उसी प्रकार से बाद में किया गया है जैसा की रामायण में वर्णित घटनाओं का। उल्लेखनीय है कि रामायण में घटी घटनाओं के भी पुरातात्विक प्रमाण अभिलेखों, सिक्कों और प्रस्तर फलकों के रूप में मिलते हैं।

रामकथा से सम्बन्धित प्राचीनतम दृश्य फलक द्वितीय-प्रथम सदी ईसा पूर्व का है जिसमें रावण द्वारा सीता के हरण का दृश्य अंकित है यह टेराकोटा (पकी हुई मिट्टी) का बना हुआ है तथा कोशांबी उत्तरप्रदेश से प्राप्त हुआ था और वर्तमान में इलाहबाद संग्रहालय में प्रदर्शित है।

इसी प्रकार प्रथम सदी ईस्वी की भगवान राम की एक अन्य टेराकोटा प्रतिमा है जिस पर ब्राह्मी में राम अभिलेख उत्कीर्ण है और यह प्रतिमा लॉस एंजिल्स के कंट्री आर्ट संग्रहालय में संरक्षित है।

इसी क्रम में नागार्जुनी कोंडा आंध्र प्रदेश से प्राप्त भरत मिलाप का परस्तर फ़लक भी महत्वपूर्ण हैं जो की तीसरी सदी ईसवी का है। इसी शृंखला में नाचरखेड़ा हरियाणा से प्राप्त तीन अभिलखित टेराकोटा का उल्लेख किया जा सकता है जिसमें राम, लक्ष्मण की जटायु से भेंट, सुवर्ण मृग तथा हनुमानजी द्वारा अशोक वाटिका उजाड़ने का दृश्य अंकित है और इनकी तिथि लगभग चौथी सदी ईस्वी है।

इसी प्रकार मध्यप्रदेश के नाचना कुठारा से प्राप्त पाँचवी सदी ईस्वीं का प्रस्तर फलक जिसमें रावण द्वारा सीता से भिक्षा माँगने का कथानक अंकित है, अत्यंत महत्वपूर्ण है।

फ़ोटो-ललित शर्मा, हजार राम मंदिर, हम्पी कर्णाटक

इसके अतिरिक्त पापनाथ मंदिर पट्टदकल, कर्नाटक में अंकित सातवीं सदी ईस्वी के प्रस्तर फलक में सेतु बंधन का अंकन ऐतिहासिक दृष्टि से उल्लेखनीय है तथा इससे भी महत्वपूर्ण रोचक तथ्य यह है कि इसी मंदिर के समकालीन महाराष्ट्र के औरंगाबाद ज़िले में स्थित एलोरा के कैलाशनाथ गुफा मंदिर में तो लगभग सम्पूर्ण रामायण का ही उत्कीर्णन किया गया है।

इसके साथ ही भगवान राम के उल्लेख वाले अभिलेख भी ज्ञात होते हैं और ऐसा माना जाता है की दक्षिण भारत में भगवान राम से समन्धित अभिलेख ज्ञात नहीं होते हैं किंतु पल्लव शासक नंदीवर्मन का कासा कुडी ताम्रपत्र (752-53 ईस्वीं) में भगवान राम की लंका विजय का उल्लेख मिलता है और सातवी सदी ईसवीं के बाद तो पूरे देश भर के प्राचीन देवालयों में इस प्रकार के अंकन मिलने लगते हैं।

इसी क्रम में कर्नाटक के शिमोगा ज़िले के अमृतापुरा स्थित शिव मंदिर, जो कि 11-12 वीं सदी ईस्वी में होयसला काल में निर्मित किया गया था, में तो रामायण के लगभग सम्पूर्ण कथानक बाह्य भित्तियों पर नामांकन के साथ उत्कीर्ण हैं।


फ़ोटो-ललित शर्मा, देऊर मंदिर मल्हार, छत्तीसगढ़

इसी कालखंड के एक अन्य प्राचीन देवालय का भी उल्लेख किया जाना आवश्यक लगता है जो कि छत्तीसगढ़ के जांजगीर में कल्चुरि शासकों द्वारा विष्णु मंदिर निर्मित किया गया था जिसकी जगती/सोपानभित्ति मे राम कथानक के अनेक दृश्य, सुग्रीव-बाली, राम द्वारा बाली वध ताड़ भेदन आदि अंकित हैं और पन्द्रहवीं सदी ईस्वी का हम्पी स्थित हज़ार राम मंदिर तो राम कथानक के अंकन के लिए ही विश्वविख्यात है।

प्रसंगवश यहाँ पर यह भी उल्लेखनीय है कि मुग़ल शासक अकबर ने तो भगवान मर्यादा पुरूषोत्तम राम से प्रभावित होकर “सीय-राम” स्वर्ण सिक्का भी जारी किया था जिसे आज भी देखा जा सकता है।

यह तो राम के ऐतिहासिक होने की एक बानगी भर है लगभग सभी भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त दक्षिण पूर्व एशियाई देशों एवं उनकी भाषाओं में राम कथानक प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।

इसके अतिरिक्त राम सेतु की व विभिन्न स्रोतों द्वारा जारी तिथियाँ, प्लेनिटोरियम सोफ्टवेयर द्वारा निर्धारित की गई भगवान राम की जन्मतिथि जैसे तथ्य भी भगवान राम की ऐतिहासिकता को ही प्रमाणित करते हैं बस इसको देखनें का नज़रिया बिना किसी पूर्वाग्रह के होना चाहिए।

(लेखक देश के जाने-माने पुरातत्ववेत्ता है)

आलेख

डॉ शिवाकांत बाजपेयी
पुरातत्वविद, भारत

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One comment

  1. कृष्णा राम चौहान

    सुंदर अति सुंदर

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