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तीजा तिहार का ऐतिहासिक-सामाजिक अनुशीलन


लोक परम्पराएं गौरवशाली इतिहास की पावन स्मृतियाँ होती हैं, जो काल सापेक्ष भी हैं। वर्तमान छत्तीसगढ़ विविधताओं से परिपूर्ण भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का संगम क्षेत्र रहा है इसलिए यहाँ की परम्पराओं में चहूँ ओर की छाप दिखाई देती है। वैष्णव परंपरा में वर्षा ऋतु (आषाढ़, सावन, भादो, कुंआर) को कर्मकांडी अनुष्ठानों के लिए अनुपयुक्त मानकर एक स्थान में ठहरकर चौमासा के नाम पर व्यतीत किया जाता है।

इसका सीधा सम्बन्ध भूगोल और जलवायु से है और ऐसा प्रतीत होता है कि वैष्णव परंपरा का उद्भव एवं विकास नगरीय सभ्यता के दायरे में हुआ होगा। इसी काल में शैव एवं साक्त परंपरा के अनेक पर्व वनों एवं पहाड़ों में समृद्ध हुए हैं। तीजा / हरितालिका/हरतालिका छत्तीसगढ़ का प्रमुख पर्व है जो भगवान शिव-पार्वती एवं नारी सम्मान को समर्पित है।

इस त्यौहार के पूर्व सावन मास के षष्ठी के दिन माताएं कमरछट/हलषष्ठी का व्रत रखकर संतानों की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। इस पर्व में महुआ की पत्तियों से बने पत्तल, महुआ की डाली से बने चम्मच, महुआ के फूल और भैंस के दूध का अनुष्ठान में उपयोग होता है जो वैष्णव परंपरा में निषिद्ध माना जाता है। अभी भी ग्रामीण समाज में महुआ के वृक्ष का रोपण निषिद्ध है यद्यपि इसके अन्य व्यावहारिक कारण हैं।

पूजा में इन सामग्रियों का उपयोग इस व्रत का शैव-साक्य परम्परा से सम्बन्धित होने का प्रमाण है। भाद्रपद अमावस्या के दिन पोला का त्यौहार मनाया जाता है जिसमें भगवान शिव के नंदी की मूर्ति की पूजा के साथ किसान अपने बैलों को सजा-संवारकर शक्ति प्रदर्शन के लिए “बैला-दौड़” का आयोजन करते हैं। भाद्रपद तृतीया के दिन विवाहित एवं अविवाहित नारियां भगवान शिव-पार्वती की पूजा करती हैं। इस पर्व की कुछ लोकथाएँ अंचल में प्रचलित हैं।

ऐतिहासिक सन्दर्भ- पौराणिक लोककथाओं के अनुसार माता पार्वती ने बाल्यकाल में ही भगवान शिव को वरण करने 14 वर्षों तक वन में पत्तियों और फूल खाकर कठोर तपस्या की थी। जब वह विवाह योग्य हुई तब उसके पिता राजा हिमवान एवं माता मैना ने नारद ऋषि की सलाह पर भगवान विष्णु से विवाह करना निश्चय किया।

माता पार्वती इस निर्णय से असहमत होकर गृह त्यागकर पहाड़ की गुफा में जाकर 36 घंटों का निर्जला-निराहार व्रत धारण कर भगवान शिव का आव्हान करती है और शिव प्रकट होकर उन्हें पत्नी वरण करना स्वीकार करते हैं। इसी प्रसंग के पुण्य स्मरण में विवाहित नारियां अपने पति के दीर्घायु एवं सामर्थ्यवान होने तथा अविवाहित कन्यायें शिव जैसे पति पाने की कामना के साथ 36 घंटे का व्रत रखती हैं |

कुछ विद्वान् इस कथा को आर्य-द्रविड़ संघर्ष से जोड़ते हैं। छत्तीसगढ़ की विदूषी साहित्यकार डॉ सत्यभामा आडिल के अनुसार आर्यों ने द्रविण स्त्रियों का वरण किया था किन्तु उन स्त्रियों को ससुराल में द्रविड़ के देवता शिव-पार्वती की उपासना करने की स्वतंत्रता नहीं थी इसलिए द्रविण स्त्रियां अपने मायके में आकर अपने पारम्परिक देवता शिव-पार्वती की व्रत रखकर पूजा करती हैं।

मेरी दृष्टि में यह आर्य-द्रविड़ संबंधों का न होकर शैव-वैष्णव संबंधों का पर्व है। इस पर्व का सम्बन्ध बौद्ध परंपरा से भी जुड़ा होना संभावित है। 8वीं – 9वीं सदी को इतिहासकार छत्तीसगढ़ के लिए अंधकार का युग मानते हैं। लोककथाओं एवं बौद्ध ग्रंथों के अनुसार 8वीं सदी में वर्तमान छत्तीसगढ़ दक्षिण कोसल था और महानदी के उत्तर एवं दक्षिण दो राज्यों में बंटा था।

उत्तर राज्य का मुख्यालय रतनपुर और दक्षिण राज्य का मुख्यालय संभल (वर्तमान सम्बलपुर) था। दक्षिण राज्य को उड्डियान कहा जाता था और इसके राजा इंद्रभूति थे। राजा इंद्रभूति ने महायान संप्रदाय के अंतर्गत वज्रयान का प्रणयन किया था। राजा इंद्रभूति की बहन / शिष्या लक्ष्मींकरा थी जिसने वज्रयान को संशोधित कर सहजयान का प्रणयन किया था।

सहजयान में देवताओं की प्रतिमा के समक्ष उपासना करने के स्थान पर मानव शरीर की उपासना पद्धति विकसित की गई थी। वज्रयानियों एवं सहजयानियों के बीच मन्त्र-तंत्र को मानने वाले भी प्रतिष्ठित रहे हैं जिन्हें तंत्रयानी या मन्त्रयानी भी कहते है तथा इन सभी के इष्ट या गुरु महादेव और पार्वती ही हैं।

इन तांत्रिकों के साधना स्थल में कोई स्थायी मूर्ति प्रतिष्ठित नहीं होती है। इस प्रकार बौद्ध मतावलम्बियों एवं शैव-साक्त मतावलम्बियों में इष्ट या गुरु को लेकर अद्भुत समानताएं प्रकाशित एवं प्रमाणित होती है। इसी काल में आदि शंकराचार्य हुए जिनके गुरु स्वामी गौड़पाद माने जाते हैं जो महायानी थे। संभवतः शंकराचार्य इसी संबंधों के कारण ” प्रच्छन्न बौद्ध ” भी कहलाये जो बाद शैव प्रतिष्ठित हुए थे |
कोन भईया जावे रतनपुर
कोन भईया जावे उड़ीयान
छोटे भईया जावे रतनपुर
बड़े भईया जावे उड़ीयान
कोन भईया लावे लाल चुनरिया
कोन भईया जावे लावे रंग छीट |

छत्तीसगढ़ में प्रचलित इस सुआ गीत में रतनपुर और उड्डियान का स्मरण है जो तीजा तिहार से भी जुड़ा हुआ है। वर्तमान छत्तीसगढ़-ओडिशा के सीमान्त क्षेत्रों में तांत्रिकों के इष्ट देवता शिव और पार्वती ही हैं जिनको साक्षी मानकर तंत्र-मन्त्रों की सिद्धि करते हैं। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि महायान सम्प्रदाय से निकले मन्त्रयान एवं तंत्रयान में मानव अंगों की पूजा प्रचलित रही है। तीजा की तिहार में शिव-पार्वती की पूजन से शैव-बौद्ध परम्परा के अन्तर्सम्बन्धों की पुष्टि भी होता है।

पूजन विधि- प्रचलित परंपरा अनुसार विवाहित स्त्रियों को मायके पक्ष से पिता या भाई अपनी बहन/ बेटियों को लिवाने ससुराल पोला तिहार के पूर्व या पश्चात् जाते हैं। भाद्रपद द्वितीया की रात्रि में करेला-खेक्सी के साथ भात खाते हैं जिसे “करू-भात” खाना कहते हैं।

परिजनों के घरों से भी तीजहारिनों को करू-भात खाने का निमंत्रण मिलता है जिसे “ज्योनार” कहते हैं। करेला खाने के पीछे वैज्ञानिक तर्क दिया जाता है कि इससे प्यास नहीं लगती है। दूसरे दिन प्रातः नीम, तरपोंगी या सरफोंक की दातून कर, डोरी ( महुआ फल) या तिल की खली, हल्दी एवं सरसों तेल का उबटन लगाकर मौन रहकर तालाब या नदी में स्नान करती हैं जिसे ” मौनी स्नान ” कहते हैं।

दोपहर में पकवान / ब्यंजन बनाती हैं जिसमें ठेठरी-खुरमी, सिंघाड़ा, तिखुर, मड़िया या सूजी का पकवान प्रमुख होता है। इस अवसर पर इड़हर (कोचई/अरबी के पत्तों को उड़द दाल के आटा से लपेटकर दही में पकाया जाता है) की सब्जी बनाई जाती है। संपन्न परिवारों में पाटा को धोकर लाल कपड़ा बिछा देते है और उसमें मिटटी या रेत से शिव-पार्वती की मिटटी की मूर्ति बनाकर केला और छिंद की पत्तियों फूलों से सजाया जाता है जिसे ” फुल्हेरा ” कहते हैं।

फुल्हेरा के शिव-पार्वती की मृर्ति में नए वस्त्र, सुहाग की सभी सामग्रियां तथा 5 प्रकार के मौसमी फूलो का अर्पण किया जाता है। पूरी रात कथा-कहानी, भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करती हैं। दूसरे दिन प्रातः स्नान उपरांत नया वस्त्र तथा शृंगार कर फुल्हेरा को तालाब / नदी में विसर्जन कर करती हैं। जो फुल्हेरा नहीं सजा सकती हैं वे तालाब / नदी घाट में रेत से शिव-पार्वती की प्रतीकात्मक मूर्ति बनाकर पूजन करती हैं।

स्नान उपरांत मायके की ओर से भेंट किये गए नए वस्त्र – आभूषण को धारण कर या सोलह श्रृंगार कर शिव-पार्वती का स्मरण करते हुए व्रत तोड़ती हैं। व्रत तोड़ने के लिए फलाहार एवं पिछले दिन में बने ब्यंजन का उपयोग किया जाता है जिसे “बासी खाना” कहते हैं। इस दिन भी परिजनों से ज्योनार के लिए निमंत्रण मिलता है।

कांकेर क्षेत्र में तीजा के अवसर पर मिटटी से बने नंदी बैल का पूजन किया जाता है, बस्तर में यह पर्व 15 दिनों तक “धनकुल जगार/तीजा जगार” के रूप में मनाया जाता है।

तीजा में खेलकूद, मनोरंजन

सामाजिक सरोकार – भारतीय जीवन पद्धति में नारियों का तीन-चौथाई जीवन सीमित दायरे में गृहस्थी के प्रबंधन में व्यतीत होता है जिसके कारण बाह्य दुनिया की अद्यतन स्थिति की जानकारियां भी सीमित होती है। छत्तीसगढ़ में तीजा एकमात्र तिहार जिसमें सभी संपन्न-विपन्न परिवारों की विवाहित नारियां मायके के निमंत्रण में एकत्र होती हैं।

अलग-अलग क्षेत्रों की भिन्न-भिन्न बिरादरियों की साझीदार होने के कारण कुछ दिनों की भेंट एवं सत्संग के दौरान परस्पर संवाद में ज्ञान का आदान-प्रदान होता है जिससे सामाजिक सरोकारों से सम्बंधित विषयों का प्रसार होता है। यद्यपि अब ग्रामीण समाज में शहरी आत्मकेंद्रित जीवन प्रणाली का घुसपैठ होने लगी है।

संपन्न परिवारों की स्त्रियां बचपन की गरीब परिवारों की सखियों से मिलने से कतराती हैं, फिर भी ऐसी नारियां भी हैं जो सहृदयता का परिचय देती हैं। निःसंदेह यह तिहार सामाजिक समरसता का सन्देश वाहक की भूमिका में रहा है। छत्तीसगढ़ के आखिरी पायदान का व्यक्ति भी इस तिहार में अपनी बहन-बेटियों का सत्कार करता है नारी अस्मिता को स्थापित करता है।

सन्दर्भ ग्रन्थ –
१ – कला परम्परा – संपादक डॉ दी पी देशमुख
२ – छत्तीसगढ़ गौरव गाथा – संपादक हरिठाकुर
३ – बौद्ध धर्म दर्शन – आचार्य नरेन्द्रदेव

आलेख

डॉ.घनाराम साहू, रायपुर छत्तीसगढ़ी संस्कृति एवं इतिहास के अध्येता

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