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प्रसिद्ध मिजारू, किकाजारू, इवाजारू नामक बुद्धिमान बंदर

बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो की उक्ति को परिभाषित करते हुए तीन बंदर गांधी जी के कहलाते हैं। सहज बोल-चाल में गांधी जी के बंदर कह दिए जाते हैं। प्रश्न यह आता है कि गांधी जी के बंदरों के नाम से प्रसिद्ध वे तीन बंदर किसके हैं और कहां से आए?

छत्तीसगढ़ के संग्रहालय में बुद्धिमान बंदर

यह प्रश्न मेरे मन में भी प्रकट हुआ। प्रकट होने का कारण यह था कि रायपुर में पुरातत्व विषयक कार्यशाला के दिन महंत घासीदास संग्रहालय के संग्रहालयाध्यक्ष डॉ प्रताप पारख मुझे संग्रहालय की नयी व्यवस्था दिखाने साग्रह ले गए। मेरी नजर गैलरी में शीशे के भीतर बैठे सेंड स्टोन से निर्मित 16 वीं शताब्दी के तीन बंदरों पर पड़ी। बस जिज्ञासा यहीं से प्रारंभ हो गई। 

जब ये तीनों बंदर सोलहवीं शताब्दी से छत्तीसगढ़ में दिखाई दे रहे हैं तो बापू के बंदर कैसे कहलाए? भले ही बापू के बंदर न हों पर इनको प्रसिद्धी बापू से ही मिली। चित्र में दिखाए गए तीनों बंदर राजनांदगांव के भूतपूर्व शासक महंत घासीदास के निजी संग्रह से संग्रहालय को प्राप्त हुए। महंत घासीदास को कहाँ से प्राप्त हुए यह पता नहीं, परन्तु इनका पालन पोषण गांधी जी के पास हुआ।

महात्मा गांधी के पास चीन से पहुंचे बुद्धिमान बंदर

महात्मा गांधी के पास देश-विदेश से लोग सलाह लेने के लिए आते थे, कहा जाता है कि इन्हीं सलाह लेने वालों के माध्यम से ये तीनों बंदर बापू के पास चीन से पहुंचे। एक दिन चीन का एक प्रतिनिधिमंडल उनसे मिलने आया। बातचीत के बाद उन लोगों ने गांधी जी को एक भेंट देते हुए कहा कि यह एक बच्चे के खिलौने से बड़े तो नहीं हैं लेकिन हमारे देश में बहुत ही मशहूर हैं।

गांधी जी ने तीन बंदरों के सेट को देखकर बहुत खुश हुए। उन्होंने इसे अपने पास रख लिया और जिंदगी भर संभाल कर रखा। इस तरह ये तीन बंदर उनके नाम के साथ हमेशा के लिए जुड़ गए। माना जाता है कि ये बंदर बुरा न देखो, बुरा न सुनो, बुरा न बोलो के सिद्धांतों को दर्शाते हैं।

बुद्ध की जातक कथाओं के बुद्धिमान बंदर

इन तीनों बंदरों का जापान की संस्कृति में भी महत्वपूर्ण स्थान है। 1617 में जापान के निक्को स्थित तोगोशु की समाधि पर यही तीनों बंदर बने हुए हैं। माना जाता है कि ये बंदर चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस के थे और आठवीं शताब्दी में ये चीन से जापान पहुंचे। उस वक्त जापान में शिंटो संप्रदाय का बोलबाला था। शिंटो संप्रदाय में बंदरों को काफी सम्मान दिया जाता है। जापान में इन्हें ‘बुद्धिमान बंदर’ माना जाता है और इन्हें यूनेस्को ने अपनी वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में शामिल किया है।

वैसे, इन तीन बंदरों के प्यार से नाम भी हैं-मिजारू बंदर : इसने दोनों हाथों से आंखें बंद कर रखी हैं, यानी जो बुरा नहीं देखता, किकाजारू बंदर : इसने दोनों हाथों से कान बंद कर रखे हैं, यानी जो बुरा नहीं सुनता, इवाजारू बंदर : इसने दोनों हाथों स मुंह बंद कर रखा है, यानी जो बुरा नहीं कहता।

जापान में यह तीनों बंदर आठवीं शताब्दी में चीन से पहुंचे अर्थात ये आठवीं शताब्दी से भी पूर्व में उपस्थित थे। अब प्रश्न यह उठता है कि चीन में कहाँ से पहुंचे? हो सकता है कि ये तीनों बंदर चीन में बौद्ध धर्म के साथ भारत से पहुंचे होंगे। क्योंकि बुद्ध की पांच सौ से अधिक जातक कथाओं में से किसी एक के विषय वस्तु होने की संभावना दिखाई देती है।

भारत में पशु पक्षियों के प्रतीकों के माध्यम से शिक्षा देने की प्राचीन परम्परा रही है, जिसमें पं विष्णुदत्त शर्मा का पंचतंत्र उल्लेखनीय है। ये तीनों बंदर मूर्तिकला से माध्यम से सोलहवीं शताब्दी से छत्तीसगढ़ में दिखाई दे रहे हैं। इससे सिद्ध होता है कि दुनिया गोल हैं।

जापान से भी नाता

गांधीजी के इन तीन बंदरों को जापानी संस्कृति से भी जोड़ा जाता है। 1617 में जापान के निक्को स्थित तोगोशु की समाधि पर यही तीनों बंदर बने हुए हैं। माना जाता है कि ये बंदर चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस के थे और आठवीं शताब्दी में ये चीन से जापान पहुंचे।

उस वक्त जापान में शिंटो संप्रदाय का बोलबाला था। शिंटो संप्रदाय में बंदरों को काफी सम्मान दिया जाता है। जापान में इन्हें ‘बुद्धिमान बंदर’ माना जाता है और इन्हें यूनेस्को ने अपनी वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में शामिल किया है।

आलेख एवं फ़ोटो

ललित शर्मा इंडोलॉजिस्ट

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2 comments

  1. Badhiya lekh .

  2. बहुत ही सुंदर जानकारी दिया आपने सर

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