Home / पर्यटन / प्राकृतिक सुषमा से आच्छादित जिला जशपुर : पर्यटन

प्राकृतिक सुषमा से आच्छादित जिला जशपुर : पर्यटन

पर्यटन की दृष्टि से जशपुर जिला नैसर्गिक वातावरण से समृद्ध है, अगर निस्रर्ग के समीप कुछ दिन व्यतीत करना है तो आप जशपुर का चयन कर सकते हैं। जशपुर में सुंदर पाटों (पठारों) के वन एवं प्राकृतिक झरनों के साथ मंदिर देवाला भी हैं, जो कि पुरातात्विक महत्व के हैं, जिनकी चर्चा हम इस लेख में कर रहे हैं।

श्री बालाजी मंदिर

जशपुर के हृदय स्थल पर बालाजी मंदिर स्थित है। यह स्थान जशपुर जिले के आस्था का केंद्र है। धार्मिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से इस स्थान का विशेष महत्व है। इस स्थल की प्राचीनता के बारे में यह तथ्य प्रचलित है कि लगभग ढ़ाई से तीन सौ वर्ष पूर्व यहां पर एक साधू बाहर से आए और डोगी तालाब के निकट साधना करने लगे। बताया जाता है कि साधना के दौरान उनको भगवान विष्णु के दर्शन हुए और ऐसा निर्देश मिला कि वर्तमान बालाजी मंदिर के पास खुदाई कर वहां से मूर्ति को निकाले और वहीं पर पूजा अर्चना प्रारंभ करें। तत्पश्चात खुदाई से भगवान विष्णु के रूप में प्राप्त मूर्ति को बालाजी मंदिर में स्थापित किया गया तथा विष्णु देव के रूप में उसी दिन से वहां पूजा अर्चना प्रारंभ कर दी गई। प्रारंभ में यह मूर्ति चतुर्भूज रूप् में थी। राजपुरोहित पंडित रामचंद मिश्रा के अनुसार इसका तात्पर्य राम कृष्ण विष्णु तथा जगन्नाथ से है। प्रारंभ में यह मंदिर घास- फूस से बना हुआ था, जिसे बाद में जशपुर रियासत के राजा विष्णु प्रताप सिंह के शासन काल के दौरान भव्य रूप् में बनाया गया। इस मंदिर में चारों देवताओं की पूजा संयुक्त रूप से की जाती है। बालाजी भगवान को जशपुर रियासत के शासको का इष्ट देव भी माना जाता है। जशपुर निवासी अपने हर कार्य का प्रारंभ भगवान बालाजी की पूजा अर्चना कर प्रारंभ करते है, वहीं विभिन्न त्योहारों पर भी यहां विशिष्ट पूजा, अर्चना होती है।

शिवमंदिर जशपुर

शिव मंदिर भी जशपुर के हृदय स्थल में छोटे तालाब व वृक्ष गंगा के पास स्थित है। जन समुदाय की मान्यता के मुताबिक यह मंदिर लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व का है। लोगो की मान्यता है कि यहां स्थित शिव मंदिर भी यहां पर खुदाई से प्राप्त हुआ था। इसकी सूचना जब शासक विष्णु प्रताप सिहं को दी तो उन्हे विधि विधान से पूजा, अर्चना कर यहां पर मंदिर का निर्माण कराया गया। वर्तमान में नगरवासियों की यहां अटूट आस्था है। सोमवार और शनिवार के दिन यहां विशेश पूजा होती है तथा शिवरात्रि के दिन यहां सबसे अधिक भक्त पूजा करने आते हैं।

काली मंदिर जशपुर

जशपुर के मुख्य मार्ग में तालाब के पास ही सिद्ध पीठ काली मंदिर स्थित है। यह हिन्दूओं का प्रमुख धार्मिक स्थल है। मंदिर के इतिहास के संबंध में यह मान्यता है कि जब राजा सुजान राय ने डोम राजाओं को पराजित कर वर्तमान राजवंश की स्थापना की थी, उस समय में नरायणपुर के इब नदी के तट पर डोम राजाओं का गढ़ था। वहां से वर्तमान राजवंश जब स्थांतरित होकर जशपुर में रहने आये तो मां काली के मर्ति को भी अपने साथ लेते आये तथा इस स्थान पर स्थापित किया गया। यह जशपुर रियासत का सिद्धपीठ के रूप् में जाना जाता है तथा विभिन्न रीतियों से यहां पूजा की जाती है। प्राचीन समय में काली मदिर खैर से बना हुआ था। बताया जाता है कि 1940-41 के समय में यहां आग लग गई थी। बाद में इसका पुर्ननिर्माण रियासत के शासक विष्णु प्रताप सिंह के द्वारा नए सिरे से कराया गया। मंदिर की प्राचीनता दो से तीन सदी पूर्व बताई जाती है। मंगलवार व शनिवार को यहां श्रद्धालु विशेष रूप् से पूजा में शमिल होते हैं। मान्यता है कि यहां मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। नवरात्र पर यहां विशेष अनुष्ठान किया जाता है।

बंगुरकेला टोंगरी टोला

जशपुर नगर के दक्षिण में दुलदुला कस्तुरा मार्ग पर ग्राम बंगुरकेला में गोंड जनजाति का आराध्य स्थल गोंडवाना बड़देव स्थित है। इस स्थान को टोंगरी टोला के नाम से भी जाना जाता हैं इस टोला के अधिकतर परिवार गोंड जनजाति के हैं तथा यहां की मूर्तियों के प्रति अगाध श्रद्धा रखते हैं। ग्रामिण मान्यता है कि गांव के विदूर राम को कुछ वर्ष पूर्व स्वपन आया था। तब से गांव वालो के द्वारा इन प्राचीन मूर्तियों को टोंगरी टोला बस्ती के किनारे रखा गया है। ग्रामिण ने इसे लकड़ी से चारों ओर घेर कर सुरक्षा के इंतजाम किये हैं। यहां अधिक मात्रा में मूर्तियां है, जो पुरातात्व्कि महत्व की है। ग्रामीणों को पता चला कि पच्चीस पूर्व यहां की मूर्तियां उड़ीसा के कुछ लोग चोरी करके ले गए थे। बाद में मूर्तियों से आवाज सुनाई देने पर मूर्ति ले जाने वाले ने मूर्तियों को वापस लाकर रख दिया। मूर्तियां कहां से आई और पूजा पाठ कब से की जा रही है, इसपर ग्रामिणों का कहना है कि प्राचीन काल से ही यहां पर पूजा, अर्चना की जाती रही है। धार्मिक दृष्टि से यह स्थान गोंड जनजाति के लोगो के लिये काफी महत्वपूर्ण है। प्राचीन काल से ही यहां पूजा पाठ की जाती है। यहां प्राप्त देवी, देवताओं एंव पशुओं की मूर्तियां अत्यंत प्राचीन है जो काले पत्थरों से निर्मित है। इन मूर्तियों की उत्कृष्ठ कलाकृति परीलक्षित होती है।

ब्रम्हदेवी की मूर्ति धरधरी   

ब्रम्हदेव की मूर्ति धरधरी जशपुर से आस्था मुख्य मार्ग पर धरधरी से एक किलोमीटर दूर वनो से अच्छादित पहाड़ी पर ब्रम्हदेवी की मूर्ति स्थित है। इस स्थल के इतिहास के बारे में बुजूर्ग बताते हैं कि यहां पूजा पाठ बैंगाओं के द्वारा प्राचीन समय से की जा रही है। इस स्थान में मूर्ति स्वमेव ही निकली है। इस स्थान पर खुदाई नहीं हुई है। मूर्ति प्राचीन काल से ही एक पेड़ के नीचे है। उसको चारो ओर प्राचीनकाल ईंटों से चबुतरा बना हुआ है। धार्मिक दृष्टि से इस स्थान को सिद्ध स्थल माना जाता है। प्रतिवर्ष शिवरात्रि और रामनवमी पर यहां मेले का आयोजन किया जाता है। इस स्थान के प्रति लोगों की अटूट आस्था है। आसपास के लोगों दर्शन करते आते हैं। पत्थर से निर्मित ब्रम्हदेवी की मूर्ति अत्यंत प्राचीन और सुंदर है। मूर्ति के चारो ओर गोल चबुतरे में प्रयुक्त ईंट पत्थर की है, जो कि सामान्य ईंटो से बड़ी और एक ही आकार की है। मान्यता है कि पत्थर की यह ईंट मानव निर्मित नहीं है। पुरातत्व विभाग के द्वारा खुदाई से यहां महत्वपूर्ण पुरातात्विक जानकारी मिल सकती है।

दमेरा

जशपुर नगर के दक्षिण में जशपुर पनचक्की मार्ग में जशपुर से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बढ़ईखाना नामक ग्राम के पास दमेरा स्थित है। यह स्थल पर्यटन की दृष्टि से विख्यात है। झरने, नदी, पहाड़िया यहां आकर्षण के केंद्र हैं, वही इस स्थान का धार्मिक एवं एतिहासिक दृष्टिकोण से भी महत्व है। यहां नदी के तट पर बजरंग बली का मंदिर है। इस स्थान पर प्रतिवर्ष रामनवमी एंव कार्तिक पूर्णिमा के दिन मेला लगता है, जिसमें हजारों की संख्या में लोग शामिल होने जाते हैं। रियासतकाल में जशपुर में पोलिटिकल एजेंट आया करते थे और उस समय उनका निवास स्थान पनचक्की में था। रियासतकाल कालीन जानकार लोगों का मानना है कि तत्कालीन समय में सड़क मार्ग न होने के कारण लोगों का आना जाना इसी मार्ग से होता था। पनचक्की से चलकर यह मार्ग चरईडांड मंदिर के पास मुख्य मार्ग से मिलता था। जानकारो का मानना है कि सन 1939 में जब द्वितीय विष्वयुद्ध प्रारंभ हुआ तथा जर्मनी द्वारा इंगलैंड प्रभावित क्षेत्रों पर आक्रमण तीव्र गति से होने लगा था तब इस मार्ग की उपयोगिता अधिक बढ़ गई थी आज भी उस मार्ग के अवशेष उपलब्ध है। सड़क के किनारे बांई ओर पहाड़ में एक टूटा हुआ पत्थर का घर आज भी मौजूद है। वह पत्थर के प्रथम के व द्वितीय घेरे से घिरा हुआ है, जिसे देखकर यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि वह मंदिर नहीं था वरन सामरिक व सुरक्षात्मक दृष्टि से उसका निर्माण किया गया होगा। यहां एक रोलरनुमा पत्थर आज भी देखा जा सकता है, जिसे इतिहास से जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि यह पत्थर शत्रुओं को कमजोर करने के लिये उपयोग में लाया जाता था, वहीं कुछ लोगों का यह भी कहना है कि सड़क निर्माण में भी ऐसे रोलरनुमा पत्थरों का उपयोग पहले किया जाता था।

रानीदह

जशपुर आरा मार्ग पर लगभग 18 किलोमीटर अंदर की ओर रानीदह नामक स्थान स्थित है। पहाड़ों व पाठों से अच्छादित यह स्थल गिरमा नदी के किनारे है जो वहां एक छोटी से झील बनाती है जो लगभग चार सौ फीट गहरी है। रानीदह के संबंध में कोई लिपिबद्ध जानकारी उपलब्ध नहीं है और बस किवंदितियां ही प्रचलित है। प्राचीन समय में राजगांगपुर जिला उड़ीसा के राजा की कन्या शिरोमणि थी। उसके पांच भाई थे। राजा अपनी लड़की का विवाह उसकी इच्छा विरूद्ध करना चाहता था, जिस कारण पिता से नाराज होकर शिरोमणि तत्कालीन छोटा नागपुर के जशपुर रियासत के पूर्व दिशा की ओर पहाड़ो पर जहां गिरमा नदी झील बनाती है, वहीं आकर कूद कर अपनी प्राण दे दी। इसलिये इस स्थान का नाम रानीदह पड़ा। शिरोमणि की एक सहेली दह के किनारे खड़ी होकर शिरोमणि को कूदते देख रही थी, वो पत्थर हो गई, जिसका बूत आज भी देखने को उसे ढूढ़ते हुए यहां तक आये, इसी समय शिरोमणि के श्राप से दह के कुछ पहले ही वे पांचो भाई पत्थर बन गये, जिसे पंच भैया “ कहा जाता है। यह स्थल ऐतिहासिक व पुरातात्विक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है। रानी दह के पास ही एक पहाड़ी स्थित है, जिसे लव हाइट या सुसाइड प्वाइंट कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि अपने प्यार को पाने की मन्नत के साथ जो भी व्यक्ति रानीदह की सीधी पहाड़ी पर चढ़ता है, उसकी मन्नत अवश्य पूरी होती है। नववर्ष, मकर संक्रांति सहित कई धार्मिक व समाजिक, राजनीतिक अवसरों पर यहां हजारो की संख्या में लोग पहुंचते हैं। जिला मुख्यालय में कम दूरी पर स्थित यह स्थान काफी लोकप्रिय है।

शिवमंदिर सरकरडीह

जशपुर सन्ना मार्ग पर ग्राम टेम्पू से 10 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम सकरडीह है। यहां अत्यंत प्राचीन मंदिर स्थित है। ग्रामीणों की मान्यता है कि प्राचीनकाल से ही यह शिवलिंग यहां पर स्थित है। स्थानीय लोगों को यह जानकारी विरासत में प्राप्त हुआ। मान्यता है कि यह शिवलिंग स्वमेव ही यहां प्रकट हुआ था। इस स्थान पर लगभग 50 वर्ष पूर्व कलकत्ता निवासी श्री विनन्दी लाल चौधरी द्वारा अपने पितामह और पिता की स्मृति में इस स्थल का जरर्णोद्धार करते हुए एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया गया था, जो वर्तमान में ध्वस्त हो गया है। इस मंदिर में पूजा अर्चना बैगा के द्वारा की जाती है। ग्रामीणों में इस देवस्थल के प्रति अगाध श्रद्धा है। महाशिवरात्रि व रामनवमी के दिन यहां विशेष पूजा की जाती है। यहां दर्शन  के लिये श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं। इस स्थान का वास्तविक इतिहास जानने के लिये पुरातत्व विभाग के द्वारा खुदाई किये जाने की आवश्यकता है।

राजा रानी एंव ब्राह्मण ब्राह्मणी

जशपुर नगर के पूर्व में स्थित ग्राम आरा के गढ़ पहाड़ में गोल आकार के दो पत्थर दो स्थान पर रखे हुए हैं। उन्हें राजा रानी और ब्राह्मण-ब्राह्मणी के नाम से जाना जाता है। ग्रामीण यहां पूजा पाठ करते हैं और इस स्थान को सुरक्षित रखने के लिये पत्थर से गुफानुमा दो छोटे छोटे घर बना दिये हैं। इस स्थान पर पूजा बैगा द्वारा कराइ जाती है। विशेष रूप  से यहां नारियल और पूल के द्वारा पूजा की जाती है। यहां बलि प्रथा पूर्णताः प्रतिबंधित है।

जगन्नाथ मंदिर कस्तुरा

जगन्नाथ मंदिर जिला मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां जिले के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। उड़ीसा सीमा के लगे ग्राम लावाकेरा के एक उड़ीसा ब्राहमण परिवार में भगवान जगन्नाथ की मूर्ति थी। ज्ञातव्य है कि भगवान जगन्नाथ उड़ीसा के लोगों के आराध्य माने जाते है। लावा केरा के ब्राहमण परिवार के द्वारा इनकी पूजा की जाती थी। इस बात की सूचना जब तक्कालिक जशपुर रियासत के राजा के मिली तो उस परिवार से देवताओं की मूर्तियों को जशपुर लाया गया। संबंधित परिवार को इसके एवज में लावाकेरा ग्राम में जमीन दे दिया गया। इन मूर्तियों को राजा के आदेश पर बालाजी मंदिर में रखा गया। बताया जाता है कि लगभग 6 वर्ष के बाद तीनो मूर्तियां गायब हो गई। राजा जब मूर्तियों को ढूढ़ने लगे, तब उन्हें एक रात ऐसा स्वपन आया कि हम सब कस्तुरा के एक जल स्त्रोत में हैं और कस्तुरा में ही रहना चाहता हैं। तत्पष्चात राजा ने स्वपन के अनुरूप कस्तुरा जाकर जल स्त्रोत से मूर्तियों को निकलवा कर कस्तुरा में स्थापित किया गया। इसके लिये यहां पर विशेष मंदिर का निर्माण कराया गया। जगन्नाथ मंदिर में प्रतिवर्ष रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है। दूर-दूर से भक्तगण इस आयोजन में शमिल होने आता हैं। रियासत के वंशज इस पूजा में विशेष रूप से शमिल होते हैं और रथ यात्रा की अगुवाइ करते हैं। रथ यात्रा में हजारों की संख्या में भीड़ होती है और भव्य मेले का भी आयोजन किया जाता हैं। आसपास के ग्रामीणों के साथ ही जिला मुख्यालय सहित पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी संख्या में यहां श्रद्धालुओं का आना होता है। एक ओर जहां श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां अर्चना के लिये आते हे, वहीं यहां लगने वाले भव्य मेले में बड़ी संख्या में व्यापारी भी षामिल होते हैं। विशेष अवसरों पर यहां के युवा समिति बनाकर स्वयं सेवक के रूप् में व्यवस्था बनाये रखने सेवा देते हैं, वहीं पुलिस प्रषासन के द्वारा भी व्यवस्था बनाये रखने सहयोग किया जाता रहा हैं।

धाजाटूकु

ग्राम आरा के पास ही गढ़ पहाड़ में एक स्थान को धाजाटूकु के नाम से जाना जाता हैं। इस पहाड़ी में एक पेड़ है, जिसकी टहनी में चांदी का रिंग लगा हुआ हैं। ग्रामीणों की मान्यता है कि यह प्राचीन काल से ही ऐसा है, जैसा अभी दिखाइ देता हैं। इसकी सबसे खास बात यह है कि वर्षो बाद भी पेड़ की टहनी के मोटा होने पर यह पेड़ में समाहित नहीं हुआ। रामनवमी सहित अन्य अवसरों पर बड़ी संख्या में आस्था रखने वाले ग्रामीण यहां धार्मिक ध्वज लेकर आते हैं और पूजा अर्चना करते हैं।

काड़ा मारा सरना

जशपुर नगर के पूर्व में स्थित ग्राम आरा में काड़ामारा सरना स्थित है। इसे महादान देवता भी कहते हैं। प्राचीन काल से ही जनजातीय संस्कृति में सरना का अपना एक विशिष्ट महत्व रहा है। आज आधुनिकीकरण के बाद भी सभी ग्रामों में सरना विद्यमान है। ग्रामीणों की मान्यता है कि काड़ामार सरना में पूजा आरा जमींदारी में पीढ़ी परिवर्तन के दौरान की जाती रही है। जब पीढ़ी परिवर्तन होता है, उस समय बैगा काड़ा, भेड़ा व बकरा की बलि देकर पूजा अर्चना करते थे। इसे स्थानिय संबोधन में परिया पूजा के नाम से संबोधित किया जाता है। काड़ामारा सरना के बाहर दरवाजे के पास गोरिया देवता की पूजा की जाती है। गोरिया देवता का तात्पर्य भंवर पूजा से है। वस्तुतः यह शक्ति की पूजा है। इस दौरान सुअर की बलि देने की भी परंपरा रही है। काड़ामारा सरना के एक पेड़ में प्राचीन समय से ही दो चाकू लगे हुए हैं। इस सरना का धार्मिक के साथ-साथ ऐतिहासिक महत्व भी है। ग्रामीणों में इस सरना के प्रति अगाध भक्ति परिलक्षित होती है।

बाघपांज का इतिहास

जशपुर केतार मार्ग पर आरा बस्ती के उत्तर में अवस्थित पहाड़ी पर बाघपांज नामक स्थान स्थित है। प्राप्त जानकारी के अनुसार महाकाव्य युग में वनगमन के समय भगवान राम इस क्षेत्र में आये थे। इस पहाड़ी क्षेत्र में एक बाघ था, जिसे कहा जाता है कि लक्ष्मण ने राम रेखा नामक स्थान से तीर चलाकर मारा था। बाघ उस स्थान से भाग निकला, लेकिन उसके पैर के निशान वहीं बने हुए रह गये। इस कारण उस स्थान को बाघ पांज कहते हैं। यह भी मान्यता है कि उस समय रौतिया जमींदारों के द्वारा इस स्थान को शक्ति स्थल मानकर पूजा की जाती रही है। यहां भी बैगा के द्वारा पूजा की जाती हैं।

छूरीपाट

जशपुर ब्लाक के ग्राम आरा के उत्तर में स्थित है छूरी पाट, जिसे गाढ़ पहाड़ के नाम से भी जाना जाता है। पहाड़ के उपर चारों ओर से घिरे गुफा को छूरी पाट के नाम से संबोधित किया जाता है। ग्रामीण मान्यता है कि आज से करीब 60 साल पूर्व यहां के जमींदार परिवार तथा उनसे संबंधित विधवा महिलायें छुरी पाट दर्शन के लिये जाते थे। वहां पहुंचकर महिलायें अपने आंचल फैलाकर जब यह कहती थीं कि दर्शन करने आए हैं तो वह छूरी कहीं भी आसपास नजर आने लगता था। दर्शन के बाद जब बोला जाता था कि दर्शन हो गया, तो छूरी वापस चली जाती थी। इस स्थान को देव स्थान के रूप में पूजा जाता था। आज भी उक्त स्थान में छूरी देखा जा सकता है, जिसकी विशेष अवसर पर पूजा की जाती है।

बुढ़ा महादेव बरटोली

जशपुर से दमेरा मार्ग पर अवस्थित बरटोली में एक प्राचीन शिव मंदिर स्थित है, जो धार्मिक एंव एतिहासिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है। इस मंदिर की प्राचीनता से संबंधित कइ किंवदंतियां प्रचलित है। अतित में इस स्थान पर गूंजा की खेती होती थी। कालांतर में एक बार एक कृशक के हल से एक मूर्ति टकराई और कहा जाता है कि उस मूर्ति से दूध और खून निकलने लगा। इस रहस्यमय घटना की सूचना तत्कालीक षासक विष्णु प्रताप सिहं को दिया गया। षासक के निर्देशानुसार मूर्ति को निकालने का असफल प्रयास किया गया। अतंतः हार मानकर राजा ने प्रार्थना की, कि यदि शिवलिंग को यहां। स्थापित होना है तो वे स्वयं अवतरित होंगे। अगले दिन जब सभी वहां पहुंचे तो देखा कि उक्त स्थल पर शिवलिंग निकला हुआ है। बाद में राजा विष्णु प्रताप के निर्देश पर मंदिर निर्माण कराया गया। इस आराध्य स्थल को दुधवा बाबा व कालांतर में बूढ़ा महादेव के नाम से जाना जाने लगा। इस मंदिर के प्रति यहां के निवासियों में अटूट आस्था है और शिवरात्रि सहित विभिन्न अवसर पर सैकड़ों की संख्या में यहां श्रद्धालु पूजा, अर्चना करने पहुंचते हैं। नियमित रूप से भी यहां श्रद्धालु पूजा अर्चना करते हैं।

कमरू बछेरा टेंपू

यह जशपुर से सन्ना मार्ग पर जिला मुख्यालय से लगभग 14 किलो मीटर की दूरी पर ग्राम टेंपू के पास स्थित है। यहां पर पुरातात्विक एंव ऐतिहासिक महत्व का बछड़ा की मूर्ति स्थित है। इस स्थल की ऐतिहासिक से संबंधित स्पष्ट प्रमाण का अभाव है, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि उनके जन्म से कई पीढ़ी पूर्व से ही इस स्थान पर मूर्ति थी और सभी की इस स्थान के प्रति अटूट आस्था है और पूर्वजों के समय से इस स्थान पर ग्राम देवता के रूप में पूजा करने लोग जुटते हैं। ग्रामीण इस स्थान कमरू बछेरा के नाम से संबोधित करते हैं। पूजा, अर्चना का कार्य बैगा के द्वारा किया जाता है।

देवडोंगरी शिव मंदिर नारायणपुर

जशपुर से नरायणपुर मार्ग में नारायणपुर से दो किलोमीटर की दूरी पर यह स्थित है। यहां शिव जी की प्राचीन मंदिर है। जशपुर रियासत प्रारंभिक इतिहास अधंकारमय रहा है। उपलब्ध साहित्य स्त्रोत के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस अंचल के अतित में डोम राजाओं का षासन था। जशपुर रियासत के क्षेत्र पाटों व पहाड़ों पर सुनसान एंव सघन वनों के मध्य स्थित होने के कारण बाहरी आक्रमण से स्वार्थमुक्त रहा। यही डोम राजाओं के शासन काल में नरायणपुर मुख्य केंद्र व राजधानी के रूप में जाना जाता था। बताया जाता है कि नरायणपुर से नवागढ़ तक का क्षेत्र डोम राजाओं के अधीन था। यहां जीण-षीर्ण ध्वस्त किले के अवशेष इसके साक्ष्य हैं। समय के प्रवाह में व समुचित देखरेख के अभाव में यहां स्थित मंदिर आज भी जर्जर अवस्था में है, लेकिन इसके समीप बिखरे अवशेष उसके उत्कृष्ठ वास्तुकला व वैभव की याद दिलाते हैं। डोम राजाओं के पतन के बाद भी देवडोंगरी के शिवमंदिर की महत्ता वर्तमान में यथावत है।

शिवमंदिर चरईडांड़

यह स्थान जशपुर से कुनकुरी मार्ग में जिला मुख्यालय से तीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। वर्तमान में यह ग्राम चरईडांड़ की सीमा में आता है। जनसमुदाय की मान्यता के अनुसार यह मंदिर लगभग चार सौ वर्ष पूर्व की है। मूर्ति के संबंध में यह प्रचलित है कि आज जहां पर मंदिर स्थित है, वहां स्थापित शिवलिंग खुदाई से प्राप्त हुई। यहां जब शिवलिंग मिलने की बात तत्कालिन रियासत के शासक प्रताप नारायण सिंह को मिली, तब विधि विधान से उन्होंने प्राण प्रतिष्ठा कराते हुए मंदिर का निर्माण कराया। इस शिवलिंग अपने आप क्रमिक रूप से बढ़ रहा है। प्रतिवर्ष शिवरात्रि के दिन यहां मेला लगभग है। सावन के माह में यहां कावंरियों के द्वारा विशेष रूप से जल चढ़ाया जाता है। दूर-दूर से दर्शनार्थी यहां दर्शन के लिये आते हैं।

आलेख

श्री जितेन्द्र ‘जीत’ जशपुर

समस्त छायाचित्र – ललित शर्मा

About hukum

Check Also

अंधेरे में प्रकाश की किरण: सिरती लिंगी

सनातन की जड़ें बहुत गहरी हैं, ईसाईयों का तथाकथित प्रेम का संदेश एवं औरंगजेबी तलवारें …

One comment

  1. Nice coverage