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राष्ट्र की उन्नति में गौधन का विशेष योगदान : गोपाष्टमी विशेष

गाय विश्व की माता है (गावो विश्वस्य मातर:), वैदिक काल से ही गाय पूजनीया मानी जाती रही है। गाय भावनात्मक या धार्मिक कारणों से पूजनीया नहीं है, अपितु इसे मानव समाज की अनिवार्य आवश्यकता के कारण पूज्या माना गया है। गोउत्पाद की चर्चा वेदों में की गई है। परवर्ती काल में कृषि, वाणिज्य तथा भारतीय अर्थ व्यवस्था का सशक्त माध्यम गाय बनी। इसके बिना स्वस्थ एवं स्मृद्ध राष्ट्र की कल्पना करना भी असंभव था।

आज गोपाष्टमी पर्व है, गोपाष्टमी पर्व यानि गायों की रक्षा, संवर्धन एवं उनकी सेवा के संकल्प का ऐसा महापर्व जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि को पोषण प्रदान करने वाली गाय माता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु गाय-बछड़ों का पूजन किया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने जिस दिन से गौचारण शुरू किया वह शुभ दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी का दिन था। इसी दिन से गोपाष्टमी पर्व का प्रारम्भ हुआ।

गौ माता की उत्पति की कथा समुद्र मंथन से सुरु होती है | कहते है जब समुद्र मंथन हुआ तो मंदिरांचल पर्वत को समुंद्र मथने के लिए बुलाया गया और श्री हरी विष्णु जी ने कश्यप (कछुआ) बन कर इस पर्वत को अपनी पीठ पर धारण किया और फिर समुद्र मंथन किया गया

मातरः सर्वभूतानां गावः सर्वसुखप्रदाः।

समुद्र मंथन करने से समय वहां से अनेका अनेक बहुमूल्य रतन निकले, ऐसा मन गया है की समुद्र मंथन से ३ प्राणी रत्न निकले जिसने साथ सूंध वाला ऐरावत हाथी, सप्तमुखी उच्सर्वा घोडा, और ५ कामधेनु रूपी गौ माता, नंदा, सुभद्रा, सुरभि, सुशीला, और भौरा. इन पांचो गौ माताओं की सेवा हेतू पांच ऋषियों को चुना गया.

सनातन धर्म में जिस प्रकार तीर्थों में तीर्थराज प्रयाग हैं उसी प्रकार देवी-देवताओं में अग्रणी गोमाता को बताया गया है। ‘ब्रह्मावैवर्तपुराण’ में कहा गया है-

गवामधिष्ठात्री देवी गवामाद्या गवां प्रसूः।गवां प्रधाना सुरभिर्गोलोके सा समुद्भवा।

अर्थात्‌ गौओं की अधिष्ठात्री देवी, आदि जननी, सर्व प्रधाना सुरभि है। समुद्र मंथन के समय लक्ष्मी जी के साथ सुरभि (गाय) भी प्रकट हुई थी। ऋग्वेद में लिखा है-

‘गौ मे माता ऋषभः पिता में

दिवं शर्म जगती मे प्रतिष्ठा।’

गाय मेरी माता और ऋषभ पिता हैं। वे इहलोक और परलोक में सुख, मंगल तथा प्रतिष्ठा प्रदान करें।

गौ सेवक के रुप में भगवान कृष्ण का लीला अवतार जगत के सम्मुख आता है तथा गौपालक एवं गौसेवी स्वयं को भगवान कृष्ण का अनुयायी मानते हैं और गौसेवा को पवित्र एवं पुण्य का कार्य जानकर गौसेवा का कार्य करते हैं। इस विषय में एक आख्यान श्रीमद भागवत पुराण में आता है-

श्रीमद भागवत पुराण के अनुसार श्री कृष्ण जब पांच वर्ष के हो गए और छठे वर्ष में प्रवेश किया तो एक दिन यशोदा माता से बाल कृष्ण ने कहा-मइया! अब मैं बड़ा हो गया हूँ। अब मुझे गोपाल बनने की इच्छा है मैं गोपाल बनूं? मैं गायों की सेवा करूं? मैं गायों की सेवा करने के लिए ही यहां आया हूं। यशोदाजी समझाती हैं कि बेटा शुभ मुहूर्त में मैं तुम्हें गोपाल बनाउंगी। बातें हो ही रहीं थी कि उसी समय शाण्डिल्य ऋषि वहां आए और भगवान कृष्ण की जन्मपत्री देखकर कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि को गौचारण का मुहूर्त निकाला।

बाल कृष्ण खुश होकर अपनी माता के ह्रदय से लग गए। झटपट माता यशोदा जी ने अपने कान्हा का श्रृंगार कर दिया और जैसे ही पैरों में जूतियां पहनाने लगीं तो बाल कृष्ण ने मना कर दिया और कहने लगे मैया यदि मेरी गायें जूती नहीं पहनतीं तो मैं कैसे पहन सकता हूं और वे नंगे पैर ही अपने ग्वाल-बाल मित्रों के साथ गायों को चराने वृन्दावन जाने लगे। अपने चरणों से वृन्दावन की रज को अत्यंत पावन करते हुएआगे-आगे गौएं और उनके पीछे -पीछे बांसुरी बजाते हुए श्याम सुन्दर तदंतर बलराम, ग्वालबाल तालवन में गौचारण लीला करने लगे।

भगवान कृष्ण का अतिप्रिय ‘गोविन्द’ नाम भी गायों की रक्षा करने के कारण पड़ा था क्योंकि भगवान श्री कृष्ण ने गायों और ग्वालों की रक्षा के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर रखा था। आठवें दिन इंद्र अपना अहम त्यागकर भगवान कृष्ण की शरण में आए। उसके बाद इंद्र की कामधेनू गाय ने भगवान का अभिषेक किया और इंद्र ने भगवान को गोविंद कहकर सम्बोधित किया। एक अर्थ में गोविंद का अर्थ जगत को जानने वाला भी होता है।

गाय एक माता की तरह मनुष्य का पालन करती है इसलिए इसे अवध्या माना गया तथा गौ हत्या करने पर तत्कालीन राजाओं ने भिन्न भिन्न तरह के दण्ड विधान की व्यवस्था की। ॠग्वेद के पांचवें मंडल 5.3.9 – उभे सुश्चंद्र सर्पिषो दर्वी श्रीणीश आसनि मंत्र प्राप्त होता है। जिसका अर्थ है कि विद्वान धृत का सेवन करने के लिए इतना उत्सुक होता है कि यज्ञाहुति देने वाली करछी मुंह में डाल लेता है। अर्था धृत का सेवन प्रमुखता से किया जाता था।

ॠग्वेद में ही एक स्थान पर धृत का अंजन लगाकर आनंद से परिपूर्ण हो पत्नियाँ अपने पति के यज्ञशाला में पहुंचने के पूर्व ही पहुंचने का उल्लेख मिलता है। ॠग्वेद के 3.21.4 मंत्र में अध्रिगु की संज्ञा दी गई है। अर्थात गो पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। ॠग्वेद में तो गो को इतना महत्वपूर्ण बताया गया है कि गोरक्षार्थ अनेक मंत्र दृष्ट हुए हैं यथा-

0 – गौ की चोर से रक्षा

0 – गायों के लिए युद्ध

0 – गौ एवं गौ दुग्ध चोर को दंड

0 – दुष्ट एवं असमाजिक तत्वों से गौ की रक्षा

0 – गाय पालने वाले गौ रक्षक

0 – गौ का माता एवं बहन के रुप में वर्णन

0 – गौ रक्षा का अत्युत्तम साधन, गौ न बेचना तथा सत्पात्र को देना।

0 – अर्थववेद में तो घी की नदियों का वर्णन मिलने लगता है, विविध प्रकार के गौ औषधोपचार, गौ को तीन बार दूहने का वर्णन मिलता है।

गौ की महिमा का गुणगान वैदिक काल से लेकर वर्तमान तक हो रहा है, व्यक्ति, समाज, राष्ट्र की उन्नति में गौ को महत्वपूर्ण योगदान है इसे मानव समाज सदा स्वीकार करता आया है, वर्तमान में गौसंवर्धन एवं गौपालन में कमी आई है, जिसे दूर करना आवश्यक है। इसलिए गौ सेवा का संकल्प हर हिन्दू के लिए अनिवार्य है। गोपाष्टमी की शुभकामनाएं।

आलेख

ललित शर्मा (इण्डोलॉजिस्ट) रायपुर, छत्तीसगढ़

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