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एक बेल जो जंगल में राह भूला देती है

दुनिया अजब गजब है, इस धरती पर इतने रहस्य छुपे हुए हैं, जिनकी कल्पना नहीं की जा सकती। भले ही आज मानव चाँद पर पहुंचकर मंगल ग्रह पर बस्ती बसाने का प्रयत्न कर हो, पर धरती के रहस्य उसे अचंभे में डाल ही देते हैं। छत्तीसगढ़ प्रदेश भी कुछ ऐसा ही है, यहाँ की मान्यताएं, किवदन्तियाँ संस्कृति का भिन्न अंग हैं तथा रहस्यमयी एवं रोमांचक भी।

छत्तीसगढ़ के वन औषधियों से भरपूर हैं, गाँव के बैगा (पारम्परिक चिकित्सक) इन वनौषधियों से प्रत्येक व्याधियों की चिकित्सा कर लेते हैं। वनौषधियों का सेवन प्राण शक्ति को बढ़ाता है, कुछ वनौषधियाँ ऐसी हैं जिनके सेवन का परिणाम मनुष्य को आश्चर्य में डाल देता है इसके साथ ही कुछ वनौषधियाँ ऐसी है जिनका स्पर्श ही मनुष्य को भ्रमित कर देता है। यह औषधि वन में लोगों को रास्ता भी भूला देती है, भटका देती है।

एक बार की बात है, मुझे मुरब्बे एवं चव्यनप्राश के लिए आंवलों की आवश्यकता थी, हम आंवला तोड़ने के लिए वन में पहुंच गए। मेरे साथी अलग वाहन पर थे और मैं अपनी बुलेट मोटर सायकिल पर। मैंने वन में एक स्थान पर बुलेट छोड़ दी और पैदल ही आवंला के वृक्षों की ओर चल पड़ा। पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि मुझे साथियों की आवाज सुनाई दे रही थी पर मैं उन तक नहीं पहुंच पा रहा था। एक घंटा हो गया और घबराहट बढ़ती जा रही थी।

भूलन बन, भूलन जड़ी – फ़ोटो – मनोज वर्मा

सोचा कि बुलेट मोटर सायकिल के पास चलूं, परन्तु विपरीत दिशा में भी जाने के बाद मैं अपनी मोटर सायकिल नहीं ढूंढ पाया। सारी जगह एक सी दिखाई दे रही थी, जैसे यहीं बाइक खड़ी कर के गया होऊं और शायद कोई ले गया हो। जब मैं बहुत देर तक साथियों के पास नहीं पहुंचा तो वे मुझे ढूंढने निकले और मैं उन्हें मिल गया। वे मुश्किल से डेढ दो सौ मीटर की दूरी पर ही थे। एक साथी ने कहा – महराज तैं भूलन खूंद डरे होबे, तेखरे सेती रद्दा भुला गेस।” (महाराज, आपके पैरों के नीचे भूलन आ गया होगा तभी आप रस्ता भूल गये।

हाँ तो आज चर्चा कर रहा हूँ भूलन की। हमारे यहाँ मान्यता है कि जंगल में एक ऐसी बेल या पौधा होता है, जिस पर पैर पड़ने के बाद व्यक्ति जंगल में रास्ता भूल जाता है और खो जाता है। उस बेल या पौधे को, भूलन जड़, भूलन बन या भूलन कांदा कहते हैं। स्थान परिवर्तन के साथ नाम में परिवर्तन हो जाता है, पर इसका काम पथिक को रास्ते से भटकाना है।

छत्तीसगढ़ी में बन का अर्थ खरपतवार होता है, भूलन को भी खरपतवार ही माना जाता है। इसके सम्पर्क में आने के बाद आदमी जंगल में भटकते रहते है और रास्ता नहीं मिलता। आखिरकार ये चरवाहों के सम्पर्क में आते हैं और रास्ता मिल जाता है क्योंकि चरवाहे जंगल के प्रत्येक हिस्से के जानकार होते हैं और भूलन से भटका हुआ व्यक्ति आखिरकार सांझ तक इनके या अन्य किसी किसान राही के सम्पर्क में आ ही जाता है।

निर्माता निर्देशक मनोज वर्मा एवं केशकाल के वैद्यराज रघुराम

ग्रामीणों से जब भूलन बन को पहचानने की बात की जाती है, उन्हें पता नहीं होता कि यह कौन सा पौधा है या बेल है। मैंने कई वनांचल में कई लोगों से पूछा था, पर कुछ लोग इसको पहचानते हैं। उन तक मेरा पहुंचना नहीं हुआ। पर भूलन पर पैर पड़ने से रास्ता भूलने की कहानियाँ लोक में बहुत सारी सुनाई देती हैं।

इस भुलन पर श्री संजीव बख्शी ने उपन्यास लिखा “भूलन कांदा।” मूल मुद्दे पर आता हूँ कि 2018 में निर्देशक मनोज वर्मा इस पर भूलन द मेज डाक्युमेंट्री बना रहे थे तो एक दिन उन्होंने भूलन की फ़ोटो अपनी फ़ेसबुक वाल पर शेयर की तथा लिखा था कि केशकाल के वैद्यराज रघुराम के साथ जंगल में जाकर भूलन की पहचान की। यह बेल के रुप में होती है। वैद्यराज रघुराम ने बताया कि इसका औषधीय प्रयोग मलेरिया के इलाज में किया जाता है।

मल्हार बिलासपुर के श्री राजाराम राजभानू कहते हैं – कहावत है कि जो अमरबेल है वह उसकी बेल है और जड़ याने कादा जमीन मे होता हो जो दिखाई नही पड़ता। चाहे जो भी हो दिशा भुलने का कोई न कोई तत्व है और वह जंगलों मे ही ज्यादा होता है चाहे कितने भी विज्ञान के जानकार हों वे भी भुलन के प्रभाव मे कुछ समय के लिये आ ही जाते हैं।

इस तरह भूलन के विषय में भिन्न-भिन्न मान्यताएं एवं कहावतों के साथ कहानियाँ भी जुड़ी हुई हैं। आलेख में जो फ़ोटो भूलन बेल की है, वे श्री मनोज वर्मा की वाल से ली गई है। पहचान लीजिए भूलन बन को। जंगल में अब कभी यह दिखी तो इस पर पैर नहीं पड़ना चाहिए वरना रास्ता भूल जाएंगे। हाँ जब भी अवसर मिला मैं इस बेल जो पहचानने जंगल अवश्य जाऊंगा।

चित्र – निर्देशक मनोज वर्मा की फ़ेसबुक वाल से साभार

आलेख

ललित शर्मा इण्डोलॉजिस्ट रायपुर, छत्तीसगढ़

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