छत्तीसगढ़ी लोक पर्व हरेली तिहार

आषाढ़ मास में माता पहुचनी के बाद श्रावण कृष्ण पक्ष अमावस्या को किसान अपना द्वितीय पर्व ‘हरियाली’ मनाता है। किसान अपने खेती में इस प्रकार हल जोतता है मानों अपने कंधा रूपी हल से धरती माँ के केशों को सवांर रहा हो मांग निकालता है, जिसे किसानी भाषा में कुंड़ …

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छत्तीसगढ़ का हरेली त्यौहार एवं लोक प्रचलित खेलों की परम्परा

लोक संस्कृति का वैभव लोक जीवन के क्रिया-व्यवहार में परिलक्षित होता है। यदि समग्र रूप से समूचे भारतीय लोक जीवन को देखें तो आँचलिकता व स्थानीयता के आधार पर, चाहे व पंजाब हो, या असम हो, कश्मीर हो या केरल, महाराष्ट्र हो या पश्चिम बंगाल, गुजरात हो या राजस्थान, उत्तरप्रदेश …

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हिन्दू पंथों के समन्वय का प्रतीक संघाट प्रतिमाएँ

प्राचीन काल से भारतवासी धर्मानुसार आचरण करते हैं, धर्म के अनुसार चलना, धर्म के अनुसार जीवन में व्यवहार करना। इस प्राचीन हिन्दू धर्म में प्रमुख ग्रंथ चतुर्वेद हैं। कालांतर में हिन्दू धर्म में कई सम्प्रदाय हुए जिनमें वेद और पुराणों से उत्पन्न 5 तरह के संप्रदाय माने जा सकते हैं:- …

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सर्व अनिष्ट से ग्राम रक्षा का लोक पर्व सवनाही बरोई

छत्तीसगढ़ की कृषि आधारित संस्कृति, रीति-रिवाज और पर्व अनूठे हैं। यहां पर प्रचलित लोक पर्वों में लोक मंगल कामना सदैव रहती है। यहां जड़-चेतन सभी उपयोगी संसाधनों की विभिन्न लोक पर्वों में पूजा की जाती है। चाहे वह कृषि का औजार हो या जीव-जंतु या प्रकृति देव। छत्तीसगढ़ में चौमासा …

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केशकाल के प्राचीन शिवालय : सावन विशेष

छत्तीसगढ़ अंचल में सरगुजा से लेकर बस्तर प्राचीन शिवलिंग पाये जाते हैं। यह वही दण्डकारण्य का क्षेत्र है जो भगवान राम की लीला स्थली रही है तथा बस्तर में उत्तर से लेकर दक्षिण तक प्राचीन शिवालयों के भग्नावशेष पाए जाते हैं। श्रावण मास में बस्तर की हरियाली देखते ही बनती …

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ग्रामीण संस्कृति का अविभाज्य अंग वनवृक्ष साल

वृक्ष हमारी संस्कृति एवं जीवन का अभिन्न अंग है, इनके बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। जब हम लद्धाख के वृक्ष विहीन पर्वतों एवं भूमि को देखते हैं तो लगता है किसी दूसरे ग्रह पर पहुंच गए, जहां जीवन नहीं है। इन वृक्षों में जीवन का सार …

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उड़न खटोले पर बैठी दक्षिण कोसल की एक प्राचीन प्रेम कथा

तत्कालीन दक्षिण कोसल एवं वर्तमान छत्तीसगढ़ की एक ऐसी अमर प्रेम कथा जो पूरे देश भर में सुनी सुनाई जाती है। कामकंदला की प्रेम गाथा को अपने समय के दिग्गज विद्वानों ने लिखा। लोक गाथाओं में रची बसी माधवनल और कामकंदला की प्रेम कथा जनमानस में आज भी छाई हुई …

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सरगुजा अंचल स्थित प्रतापपुर जिले के शिवालय : सावन विशेष

सरगुजा संभाग के सूरजपुर जिला अंतर्गत प्रतापपुर से महज 5 किलोमीटर की दूरी पर पूर्व दिशा में पहाड़ों की पीठ पर ग्राम पंचायत शिवपुर में शिवपुर तुर्रा नामक स्थल प्रसिद्ध है। यहीं शिव मंदिर के अंदर जलकुण्ड में अर्द्धनारीश्वर शिवलिंग विराजमान हैं। इस शिवलिंग में शिव एवं पार्वती दोनों के …

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गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का महान पर्व गुरु पूर्णिमा

“गुरु परम्परा से निरन्तर जो शक्ति प्राप्त होते आयी है, उसी के साथ अपना संयोग स्थापित करना होगा, क्योंकि वैराग्य और तीव्र मुमुक्षुत्व रहने पर भी गुरु के बिना कुछ नहीं हो सकेगा। शिष्य को चाहिए कि वह अपने गुरु को परामर्शदाता, दार्शनिक, सुहृदय और पथप्रदर्शक के रूप में अंगीकार …

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दक्षिण कोसल की स्थापत्य कला में नृत्य एवं वाद्यों का शिल्पांकन

ऐसा कौन अभागा है, जिसे गायन, वादन, नृत्य दर्शन एवं संगीत श्रवण न रुचता होगा। प्रकृति में चहूं ओर संगीत भरा पड़ा है, कहीं शुन्यता नहीं है। इसी संगीत से मनुष्य ने भी स्वयं को जोड़ा एवं विभिन्न ध्वनियों के लिए वाद्य निर्मित किए एवं स्वयं को उसकी लय-ताल में …

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