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मल्हार की तपोलीन डिडिनेश्वरी देवी

अरपा, लीलागर और शिवनाथ नदी के बीच में बसी है प्राचीन नगरी मल्हार। कई धर्म, संस्कृतियों की धरोहरों को समेटे हुए यह कलचुरियों का गढ़ रही है। भगवान शिव के उपासक कलचुरि नरेश ने यहां मल्लाषरि, मल्लारी शिव का मंदिर बनवाया था। मल्लासुर दैत्य का संहार करने वाले शिव का एक नाम मल्लारी भी कहा गया है जिनके नाम पर नगर मल्हार कहलाया।

उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर चार सौ वर्ष ईसा पूर्व यहां मौर्य वंश का शासन था जिसके अवशेष महासमुंद जिले के तुरतुरिया, तथा बलौदाबाजार भाटापारा जिले के डमरु में पाए गए हैं इसके बाद सातवाहनों का शासनकाल रहा, इसके समय का काष्ठ स्तंभ बिलासपुर के किरारी ग्राम से प्राप्त हुआ। तीसरी सदी में वाकाटक वंश, चौथी सदी में गुप्त वंश, पांचवी सदी में राजर्षि तुल्य वंश, इस काल में नल वंश का भी शासन रहा। इसके बाद शरभपुरीय वंश एवं पांण्डु वंश और कलचुरि वंश का शासन काल रहा। है। हैहयवंशी कलचुरि कहलाए, इनका शासनकाल सबसे लंबा लगभग 800 वर्ष तक चला।

डिडनेश्वरी देवी का मंदिर यहां का प्रसिद्ध श्रद्धा स्थल है। शिव की आराधना में लीन माता पार्वती का मंदिर मल्हार के पूर्व दिशा में स्थित है, जिन्हें डिडिनेश्वरी देवी, डिडिनदाई के नाम से पूजा जाता है।

देवी मंदिर- देवी का मंदिर कलचुरिकालीन कहा गया है कलचुरि राजवंश की आराध्या भी रही है देवी पार्वती। मान्यता है कि मल्हार को राजा वेणु ने बसाया था। देवी कृपा से राजा वेणु का यश लोकव्यापी हुआ। राजा की यशोगाथा देवलोक तक जा पहुंची और तब राजा वेणु के प्रताप से ही मल्हार में कंचन की बारिश हुई थी।

देवी मंदिर 10 से 11 वीं सदी के मध्य कलचुरि शासकों ने बनवाया था। देवी की मूर्ति कलचुरि संवत 900 की मानी गई है। प्राचीन मंदिर ध्वस्त हो चुका। 1954 में निषाद समाज ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। सन 2000 से मंदिर का नए सिरे से जीर्णोद्धार किया गया।

स्थापत्य कला- प्राचीन मंदिर की दीवारें अब नहीं रही हैं। जीर्णोद्धार के बाद मंदिर के गर्भ गृह में विष्णु के 24 अवतारों में से एक वामन अवतार हैं। आसपास की दीवार में नृत्यरत पार्वती, कुबेर, सरस्वती,नटराज शिव, प्रेमी युगल अप्सराएं एवम् शिव जी की मूर्तियों में कलचुरी काल का वैभव झलकता है। देवी डिडिनेश्वरी- मंदिर के गर्भ गृह में डिडिनदाई की मनोहर मूर्ति प्रतिष्ठापित है ।
डिडिनदाई शब्द का अर्थ छत्तीसगढ़ में कुमारी देवी होता है। कुंवारी रूप शैलसुता शिव को पति के रूप में पाने के लिए तपस्या रत हुई। पद्मासन में विराजित तपोमुद्रा वाली देवी की भव्य गंभीर मुखाकृति है,जिनके नेत्र मूंदे हुए, सौम्य में मुद्रा भाव में लीन,सिंह छाल में विराजित हैं।देवी की ग्रीवा मोतियों की माला से सुसज्जित हैं, भुजाओं में केयूर, कलाई में कंकण,ग्रीवा से उदर तक प्रलंब चक्र को स्पर्श करती हथेलियों में अर्पण के लिए स्थित अर्ध पुष्पित कमल है। कटि में पट्टेदार चौड़ी करधनी और चरणों में चौड़ी पट्टी में नुपूर शोभायमान हैं। देवी के दोनों चरण में तल में कमल खंचित हैं, मानो भगवान शंकर की तपस्या में आकंठ डूबी मां पार्वती डिडिनेश्वरी देवी, प्रतीक्षारत हो। कृष्ण वर्ण की ग्रेनाइट शिला से निर्मित देवी की चार फुट की प्रतिमा ऐसा ही भाव लिए हुए हैं।

पूजा-अर्चना- मां डिडिनेश्वरी देवी सर्वथा, वरधा, सुखदा सिद्ध देवी हैं ।आस्था, भक्ति और श्रद्धा पूर्वक जो देवी की आराधना करता है उनकी अभिलाषा अवश्य पूर्ण होती है । देवी के समक्ष पुत्र कामना के साथ अनुष्ठान करने पर मनोरथ सिद्ध होते हैं। मान्यता अनुसार देवी अंचल की सिद्धि दायिनी शक्ति में माता पार्वती प्रसिद्ध है। वरदा या मनोकामना के लिए महिलाओं को जूड़ा खोलकर, पवित्र परिधान धारण कर देवी के समक्ष अपने सौभाग्य की याचना कर करनी चाहिए।

पर्व व उत्सव-देवी मंदिर में चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान मनोकामना ज्योति कलश प्रज्ज्वलित होते हैं।महाशिवरात्रि पर्व पर मल्हार में 15 दिनों का मेला लगता है। 1985 से हर वर्ष यहां पर मल्हार महोत्सव का आयोजन भी किया जा रहा है। मंदिर की देखरेख के लिए छत्तीसगढ़ शासन द्वारा लोक न्यास ट्रस्ट मां डिडिनेश्वरी मंदिर स्थापित कर दिया है।

दर्शनीय स्थल व पर्यटन-मल्हार में भगवान पातालेश्वर मंदिर,देऊर मंदिर, नंद महल, परधनिया बाबा, के साथ संग्रहालय भी बना है। यहां की प्राकृतिक छटा और नदियों का सौंदर्य भी दर्शनीय हैं। जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं मल्हार की खुदाई में मिली है ।यहीं पर मौर्य कालीन अवशेष ईसा पूर्व 400 से 200 वर्ष तक का इतिहास समेटे हुए हैं। चतुर्भुजी उमा महेश्वर यहां दर्शनी है। मल्हार में शिव पार्वती की अनेक मनोहारी प्रतिमाएं हैं। एक प्रतिमा में उमा शिव की वाम जंघा पर ललितासन मुद्रा में बैठी है। शिव के हाथों में त्रिशूल है नंदी भी है। एक अन्य शिव पार्वती प्रतिमा में शिवजी त्रिशूल और नाग पकड़े हुए हैं और पार्वती के हाथ में दर्पण है ।सभी प्रतिमाएं अलंकृत है। शिव पार्वती की अनेक मनोहारी प्रतिमाएं हैं। देऊर मंदिर के पास एक प्रतिमा में शिव जी का तीसरा नेत्र भी प्रदर्शित किया गया है। गणेश जी की प्रतिमाएं हैं। चतुर्भुजी गणेश, अष्टभुजी गणेश, नृत्य मुद्रा में गणेश की प्रतिमा एवं पंचमुखी गणेश भी यहां पर विराजमान हैं। विभिन्न देवियों की प्रतिमाएं भी यहां पर देखी जा सकती हैं जिसमें महिषासुर मर्दिनी, दुर्गा की प्रतिमा शंख चक्र धारण किए हुए है। पद्मासन में बैठी लक्ष्मी देवी की प्रतिमा, पार्वती देवी की सुंदर प्रतिमा एवं देवी सरस्वती वीणा लिए अपने वाहन में बैठी हैं। नदी देवी देवियों में गंगा यमुना की भी प्रतिमा यहां स्थापित है। एक अष्टभुजी देवी की प्रतिमा है जो चामुंडा देवी के रूप में प्रदर्शित है।

ईसा पूर्व दूसरी सदी की चतुर्भुज विष्णु प्रतिमा मल्हार में पाई गई है जिसे पुराविदों ने देश की सबसे प्राचीन पूज्य प्रतिमा के रूप में मान्य किया है। एक अन्य विष्णु प्रतिमा शेषनाग की सैया पर विराजमान हैं तथा लक्ष्मी उनके पैर दबा रही है। ब्रह्मा भी नाभि कमल पर दर्शाए गए हैं। यह प्रतिमा लाल तथा कुछ पीलापन लिए हुए पत्थरों से बनी है, जिसका संपूर्ण अलंकरण उत्कृष्ट है। कमल के आसन पर एक चतुर्भुज विष्णु प्रतिमा है जो सभी अलंकरणों से युक्त है। विष्णु अवतार नृसिंह की प्रतिमाएं हैं। लगभग 11 वीं सदी की सूर्य की विभिन्न मूर्तियां भी यहां पर है। यहां जैन एवं बौद्ध धर्म से संबंधित कई प्रतिमाएं मिली है इससे पता चलता है कि यहां के शासकों ने धार्मिक सहिष्णुता का परिचय देते हुए सभी धर्मों को संरक्षण दिया था।

मल्हार एक धार्मिक तीर्थ है वही मूर्ति व स्थापत्य कला को देखने का अवसर भी प्रदान करता है। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य भी अद्भुत है, जहां कभी सैकड़ों पर तालाब थे और वहां सोने की बरसात हुई थी ऐसी मान्यता वाला मल्हार आज भी देखने योग्य है। मल्हार में अपने साधन से कभी भी पहुंचा जा सकता है।

पहुंच मार्ग- बिलासपुर से सड़क मार्ग पर 17 किलोमीटर दूर मस्तूरी ।मस्तूरी से जोंधरा मार्ग पर 14 किलोमीटर दूरी पर स्थित है मल्हार। रेल मार्ग में जयराम नगर रेलवे स्टेशन से मल्हार काफी नजदीक है।

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One comment

  1. विवेक तिवारी

    जय डिडिन दाई🙏🙏🙏

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