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तंत्र की देवी वैनायकी : पौराणिक साहित्यिक संदर्भ में

वैदिक परंपराओं को मानने वालों में सर्वदेवो में अग्रगण्य, प्रथम पूज्य, गौरीनंदन गणेश को बाधाओं को हरने वाले पुरुष देवता के रूप में लोकप्रियता प्राप्त हैं और उनसे सम्बंधित अनेकानेक कथाएँ भी मिलती है जिनसे प्रायः हम सभी परिचित है किंतु दूसरी तरफ भारतीय तंत्र विद्या में गणेश जी के नारी रूप का अधिक महत्व है। उनका महिला स्वरूप ‘विनायकी’ भारतीय तांत्रिकों के बीच प्राचीन समय से ही बहुत प्रचलित एवं प्रसिद्ध रहा है।

‘स्त्री-गणेश’,’वैनायकी,’ ‘गणेशानी’, ‘विघ्नेश्वरी’ या ‘गजानना’,’गजमुखी- देवी’आदि नामों एवं उसके रूप का वर्णन सर्वप्रथम हमारे पुराणों एवं उपपुराणों में मिलता है। गजानना या वैनायकी का वर्णन भारतीय पुराणों में सर्वप्रथम सर्वप्राचीन ‘मत्स्य- पुराण’ जो लगभग 550 ई पू का है में एक कथा के साथ ‘मातृका देवी’ के रूप में मिलता है।

मातृका पूजन की परंपरा को वैदिक काल और सिंधु घाटी सभ्यता से आज तक सर्वमान्य रही है। वैसे ऋग्वेद में सप्त मातृकाओं का ही वर्णन मिलता है जिनकी देखरेख में सोम की तैयारी होती है। साथ ही पांचवीं शताब्दी तक इन सभी मातृका-देवियों को तांत्रिक देवियों के रूप में रूढ़िवादी हिंदू धर्म में स्थान मिलता गया। प्रायः मातृकाओं को अनार्य परंपरा की ग्राम्य देवियां माना गया है जिनकी पूजा किसी गंगोद्यापन जैसे अनुष्ठान में आज भी भैरव पूजा के साथ अनिवार्य रूप से किया जाता है।

यह धारणा भी है कि यक्ष परंपरा से प्रेरित होकर मातृकाओं का उद्भव हुआ। हिन्दू आर्ष ग्रंथो में कहीं सप्त, कहीं अष्ट तो कभी कहीं कहीं पर षोडश मातृकाओ का वर्णन मिलता है और प्रायः इन मातृकाओं की पूजा तंत्र के सन्निकट करने का ही विधान है। वैनायकी भी इन्ही मातृकाओं में से एक रही होगी।

वैनायकी का पौराणिक एवं साहित्यिक संदर्भ हमारे भारतीय आर्ष ग्रंथों के साथ बौद्ध साहित्य में मिलते है। मत्स्य पुराण, वायु पुराण, अग्नि पुराण, स्कंद पुराण, हरिवंश पुराण, लिंग पुराण एवं कूर्म पुराण में भी विनायकी या नारी गणेश का वर्णन विविध रूप एवं आख्यानों के साथ मिलता है। धर्मोत्तर पुराण में विनायकी के रूप का उल्लेख किया गया है।

इसके अलावा ‘वन दुर्गा उपनिषद’ में भी गणेश जी के स्त्री रूप का वर्णन मिलता है, जिसे ‘गणेश्वरी’ का नाम दिया गया है। ‘मत्स्य -पुराण’ में सर्वप्रथम इनका वर्णन ‘गजस्य -मुखा’ एक शक्ति के रूप में किया गया है जिसका सृजन अंधकासुर- शिव युद्ध में महादेव ने अंधकासुर को पराजित करने के लिए किया था।

प्राप्त कथानुसार असुरासुर हिरण्याक्ष का पुत्र अंधकासुर वरदान प्राप्त कर मद में चूर हो गया था। उसने शिव की अर्धांगिनि पार्वती के रूप पर मुग्ध हो कर उन पर कुदृष्टि डाली। देवी पार्वती के बार बार समझाने पर भी जब वह नही समझा और उन्हें अपनी जबरन पत्नी बनाने की ज़िद पर अड़ा रहा।

जब अंधकासुर ने जबरन पार्वती को पकड़ने की कोशिश की तो देवी पार्वती ने अपने पति शिव का आह्ववान किया। उनकी पुकार सुनकर शिव अपना त्रिशूल उठाकर अंधक का वध करने प्रस्तुत हुए किंतु अंधकासुर को मिले एक वरदान के चलते शिव जब भी त्रिशूल चलाते अंधक के शरीर से गिरने वाली लहू की हर बूंद से एक नया अंधक पैदा हो जाता था।

ऐसे में अंधक को मारने का सिर्फ एक ही तरीका था कि जब शिव अपने त्रिशूल से अंधका का वध करें तो उसके खून की एक भी बूंद ज़मीन पर न गिरे। देवी पार्वती को यह बात ज्ञात थी कि हर दैवीय शक्ति पुरुष और स्त्री के स्वरूपों का मिश्रण होती है। पुरुष स्वरूप मानसिक क्षमता को दर्शाता है जबकि उन्ही का नारी स्वरूप मूर्त या भौतिक शक्ति को माना जाता है अतः परिस्थितियों को देख कर पार्वती ने सभी देवताओं की शक्तियों का आह्वान किया।

देवी पार्वती के आह्वान पर सभी देवताओं ने अपने नारी स्वरूप भेज दिए ताकि वे धरती पर गिरने से पहले ही अंधक के लहू की बूंदे पी सकें। इसके बाद युद्ध भूमि पर सभी तरह के देवताओं के स्त्री स्वरूप दिखाई देने लगे। इंद्र की शक्ति इंद्राणी के रूप में, विष्णु की शक्ति वैष्णवी और ब्रह्मा की शक्ति ब्राह्मणी के रूप में युद्ध भूमि में पहुंच गईं और उन्होंने अंधकासुर की देह से गिरने वाली खून की बूंदों को पी लिया।

किंतु इस सबसे से भी अंधक के रक्त को खत्म करना संभव नहीं हो रहा था। तब अंत में भगवान गणेश जी अपने स्त्री रूप ‘विनायकी’ में प्रकट हुए और उन्होंने अंधक का सारा रक्त’ ग्रहण कर गए। इस तरह अंधका का अंत संभव हुआ।मत्स्य पुराण और विष्णु धर्मोत्तर पुराण में इस युद्ध में सम्मिलित रही सभी देवियों के साथ गणपति के महिला स्वरूप का ‘गजस्य-मुखा’ -‘गजानना’ का भी वर्णन मिलता है।

अग्नि पुराण वो पहला पुराण है जो इन वैनायकी या स्त्री गणेश की शक्ति का वर्णन करता है। लिंग पुराण में भी विनायकी शक्ति का वर्णन है। ‘विनायकी’ का उल्लेख मत्स्य पुराण में विनायक या गणेश की शक्ति के रूप में है जिसमें विनायकी देवी को मातृकाओं में से एक बताया गया हैं जो गणेश की शक्ति से अधिक शिव की शक्ति की द्योतक हैं। सप्त मातृकाओं के बाद अष्टम मातृका विनायकी लगती है।

गणपति के इस स्त्री स्वरूप का वर्णन ‘वनदुर्गा- उपनिषद ‘में भी मिलता है। हमारे एक प्रमुख उप-पुराण ‘देवी पुराण’ में गणेश की शक्ति के रूप में गणनायिका या विनायकी का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। देवी पुराण में कहा गया है कि वे गजमुख शीश वाली एक देवी जो भगवान गणेश की तरह विघ्नों को दूर करने की क्षमता रखती है और उन्हें नौवीं मात्रिका के रूप में शामिल किया गया है।

हांलाकि प्रायः मूर्तियों और साहित्य में मात्रिकाओं की संख्या सात ही दर्शाई गई है, फिर भी पूर्वी भारत में नौ मात्रिकाएँ अधिक लोकप्रिय हैं। शास्त्रीय सप्त मातृकाओं के अलावा आठवीं और नौंवी मात्रिका के रूप में क्रमश: महालक्ष्मी या योगेश्वरी और गणेशणी गणेशा या वैनायकी को भी शामिल किया गया है।

मध्यकालीन नाटक ‘गोरक्षसंहिता’ में विनायकी को गजमुखी, तोंदयुक्त, तीन आँखों और चार भुजाओं वाली देवी बताया गया है जिनके हाथ में परशु और मोदकों की थाली है। श्रीकुमार की सोलहवीं सदी की मूर्तिभंजक शोध प्रबंध पुस्तक ‘शिल्परत्न’ में भी गणेश (गणपति) के स्त्री रूप का वर्णन मिलता है। इसमे उन्हें ‘शक्ति-गणपति’ कहा गया गया है जो विंध्य में निवास करती हैं।

इस देवी का सिर हाथी के जैसे है और दो सूंड वाली है। उनका शरीर युवती सा एवं रंग सिंदूरी लाल और दस भुजाओं वाली बताया गया है है। उनके रूप वर्णन के अनुसार उनकी छोटी तोंद ,विस्तारित उभार और सुंदर श्रोणियाँ है। यह सम्भवतः हिन्दू देवी की पूजा करने वाली धारा, शक्तिवाद से संबंधित देवी हो सकती है। दो सूंडों के कारण इस रूप को भी गणेश और उनकी शक्ति का ही संयोजन माना जाता है।

सर्वशक्तिशाली श्रीविद्या साधना में “वांछा कल्पलता” नाम से एक उच्चतम साधना होती है जिसमे श्रीगणेश जी के स्त्री रूप साधना की जाती है। यह जो स्त्री शक्ति गणेश्वरी है, विघ्नों को दूर करने वाली देवी है। श्रीगणेशी को विघ्नेश्वरी, गजाननी, गजमुखी भी कहते हैं।

श्रीविद्या साधना क्रम में जो छ आम्नाय है अर्थात शिव के छह मुख होते है उनमें से एक इसी ‘विनायकी’ का होता है इस को शिव के एक मुख्य ” ईशान ” भगवान की पुत्री बताया गया है। श्रीविद्या साधना में ‘श्रीललिता त्रिपुरसुंदरी’ का एक स्त्री गणेश रूप है, उसे ” श्रीगणेशी त्रिपुरसुंदरी ” भी कहते हैं।

श्रीविद्या साधना का आरंभ पहले श्रीललिता के गणपति ” क्षीप्रा ” से ही होता हैं। इसका पूजन महागणपति रूप में करते हैं । उनकी दस भुजाएं है। जैसे कोई भी विधान गणपति के बिना अधूरा है, वैसे ही श्रीविद्या साधना अंतर्गत श्रीमहागणपति को आवाहन करना पड़ता है। श्रीमहागणपति का कमर तक का भाग ओर श्रीललिता का कमर से पैर तक का भाग ले कर इन दोनों के संमिश्रण से इस तत्व का उद्भव हुआ है। इसी को श्रीविद्या में ‘वांछा कल्पलता विद्या’ भी कहते है जो एक गोपनीय विद्या है।

”श्रीगणेशी त्रिपुरसुंदरी ” के हाथ में अनार का फल बताया गया है। अनार के अंदर जो दाने है, वो एक-एक दाना एक-एक ब्रम्हांड का प्रतीक होता है। यह देवी ऐसे सभी ब्रम्हांडों को अपने हाथो में रखती है। अनार ब्रह्मांड का प्रतीक है। इससे देवी के ब्रह्मांडीय शक्ति का प्रभाव दिखता है।

“कल्पलता ” का अर्थ किसी व्यक्ति अथवा उसके कुल की शक्ति निर्जीव हो चुकी है, उसको पुनः अंकुरित करने वाली देवी के रूप में हुआ है। यह श्रीललिता कि महासंजीवनी विद्या है। इसी महासंजीवनी विद्या के कारण, श्रीललिता का श्रीयंत्र रूपी चक्र में अवस्थित अरबों अरबों छोटी से छोटी ओर बड़ी से बड़ी सभी अनुचरी शक्तियाँ प्रफुल्लित रहती हैं। इस प्रकार श्री विद्या साधना में भी ‘वैनायकी’ की साधना अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

विनायकी की पूजा तंत्र विद्या में भी की जाती है, क्योंकि स्त्री को शक्ति की जननी माना जाता है। भारत में प्राचीन लम्बे समय से विनायकी का तंत्र मंत्र से पूजन होता आ रहा है, ऐसे प्रमाण मिलते है। जैन और बौद्ध धर्म में भी इनको एक अलग देवी के रूप में पूजा जाता है।

तंत्र साधना में भी विनायकी देवी की महत्ता थी इसका प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण है कि कई जगह इनको चौसठ योगिनियों में एक के रूप में दर्शाया गया है। इसका एक साक्ष्य मध्य प्रदेश के भेड़ा घाट में मिलता है जहां प्रसिद्ध चौसठ योगिनियों में ४१ वें नंबर की मूर्ति ‘विनायकी’ देवी की है। यहाँ इस देवी को श्री-ऐंगिनी कहा जाता है। यहाँ इस देवी के झुके हुए बाएँ पैर को एक हाथीमुखी पुरुष, संभवत: श्री गणेश ने सहारा दिया हुआ है।

दक्षिण भारत मे भी स्त्री गणेश की पूजा का प्रचलन रहा है। तमील लोग इस देवी की सदियों से पूजन करते आ रहे हैं। कन्याकुमारी का थानुमलायन मंदिर इस स्त्री शक्ति के प्रमाण को अपने में समेटे हुए है। यह देवी विनायकी हैं जो श्रीगणेश की ही तरह विनय, बुद्धि और सिद्धि की देवी हैं। तिब्बत में ‘व्याघ्रपाद गणपति’ के नाम से इसे जाना जाता है।

बुद्धिस्ट में भी स्त्री रूप गणेशी का पूजन होता है। बौद्ध ग्रंथों में उन्हें ‘गणपतिह्रदया’ कहा गया’ है। विनायकी’ देवी बौद्धों की गज मुखी देवी हैं। बौद्ध साहित्य के महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘आर्यमंजुश्रीमुलकल्प’ में इस देवी को विनायक की सिद्धि कहा गया है । उनमें गणेश के कई अंतर्निहित अभिलक्षण से युक्त बताया गया हैं।

ये गणेश की तरह ही वे विघ्नों की दूर करती हैं, उनका सिर भी हाथी के जैसा है और एकदंत है। उन्हें भगवान शिव का ही एक रूप औऱ भगवान पशुपतिनाथ के ईशान मुख देव की बेटी भी बताया गया है। गणेशनी की इन मूर्तियों को काशी और उड़ीसा में भी पूजा जाता है इनके हाथ में अक्सर युद्ध की कुल्हाड़ी या परशु होता है। आज भले ही वैनायकी की मूर्तियां प्रायः नही बनाई जाती परन्तु आज भी वह तंत्र की एक प्रमुख देवी है।

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