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तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रथम एवं द्वितीय सत्र की रिपोर्टिंग

प्रथम अकादमिक सत्र : राम वनगमन मार्ग का भौगौलिक क्षेत्र तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन दिनाँक 29-31 अगस्त, 2020के मध्य हुआ। इस वेबीनार का विषय छत्तीसगढ़ में (दक्षिण कोसल में) रामकथा की व्याप्ति एवं प्रभाव रहा है। लोक साहित्य में छत्तीसगढ़ की संस्कृति राम की भूमि के रूप में …

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बस्तर के जनजातीय समाज में पितृ पूजन

बस्तर संभाग में जनजाति बाहुल्य गांव में और मिश्रित जनजाति के गांव में दो धाराएं स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। एक धारा देव संस्कृति को मानने वाली होती है और दूसरी धारा देव संस्कृति के साथ वैदिक संस्कृति को भी अपने कार्य व्यवहार में समाहित कर लेती है। …

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पितर पूजन का पर्व : पितृ पक्ष

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की कोई तिथि। अभी सूर्योदय में कुछ पल शेष है। छत्तीसगढ़ के एक गाँव का घर। गृहलक्ष्मी रसोईघर के सामने के स्थल को गोबर से लीपती है। उस पर चावल के आटे से चौक पूरती है, पुष्पों का आसन बिछाती है। पुत्र बाल-सुलभ जिज्ञासा से …

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दक्षिण कोसल में रामकथा की व्याप्ति एवं प्रभाव : उद्घाटन सत्र रिपोर्ट

ग्लोबल इनसायक्लोपीडिया ऑफ़ रामायण को तैयार करने के दृष्टिकोण से तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब शोध संगोष्ठी का आयोजन दिनांक 29 अगस्त से 31 अगस्त 2020 तक किया गया। जिसका आयोजन गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर छत्तीसगढ़, अयोध्या शोध संस्थान अयोध्या उत्तर प्रदेश एवं सेंटर फॉर स्टडीज एंड हॉलिस्टिक डेवलपमेंट रायपुर …

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छत्तीसगढ़ के कण-कण में बसे हैं राम, यहां के लोगों की जीवन शैली राममय: सुश्री उइके

राज्यपाल ‘‘दक्षिण कोसल में राम कथा की व्याप्ति एवं प्रभाव’’ विषय पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय वेब शोध संगोष्ठी में हुई शामिल रायपुर, 31 अगस्त 2020/ छत्तीसगढ़ के कण-कण में राम बसे हैं। यहां के लोगों की जीवन शैली पूरी तरह से राममय हैं। उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक की यात्रा …

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बस्तर के जाति एवं जनजाति समाज में जोगनी

दक्षिण कौशल का दक्षिणी भाग बस्तर संभाग कहलाता है, बस्तर में किसी भी नए फसल उपज को सबसे पहले अपने परगना के देवता कुलदेवता इष्ट देवता और पितृ देवता में अर्पण करने की परंपरा है। उसके बाद ही बस्तर का जाति एवं जनजाति समाज उस फसल या उपज को ग्रहण …

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कृषि संस्कृति और ऋषि संस्कृति आधारित त्यौहार : नवाखाई

भारत कृषि प्रधान देश है, यहां की संस्कृति भी कृषि आधारित होने के कारण यहाँ कृषि कार्य से संबंधित पर्व एवं त्यौहार मनाने की परम्परा है। इसमें एक त्यौहार नवान्ह ग्रहण का मनाया जाता है, जिसे नुआखाई या नवाखाई कहते हैं। यह पर्व नई फ़सल आने पर देव, पीतरों को …

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तीजा तिहार का ऐतिहासिक-सामाजिक अनुशीलन

लोक परम्पराएं गौरवशाली इतिहास की पावन स्मृतियाँ होती हैं, जो काल सापेक्ष भी हैं। वर्तमान छत्तीसगढ़ विविधताओं से परिपूर्ण भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का संगम क्षेत्र रहा है इसलिए यहाँ की परम्पराओं में चहूँ ओर की छाप दिखाई देती है। वैष्णव परंपरा में वर्षा ऋतु (आषाढ़, सावन, भादो, कुंआर) को …

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पोला तिहार का मानवीय पक्ष

प्रत्येक प्रांत के अपने विशिष्ट पर्व होते हैं। जिनसे उसका सांस्कृतिक संबंध होता है । खान- पान, रीति-रिवाज, आचार-व्यवहार का संबंध मानवीय भाव भूमि से होता है। जिसे वह किसी न किसी रूप में व्यक्त करता है। यह व्यक्त करने का संबंध मनुुष्य के चेतन प्राणी होने से है। चेतन …

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अन्न बहन-बेटी तथा मां के प्रति सम्मान का लोकपर्व पोला

कहीं भी हो लोक जीवन का आलोक एक विशेष प्रकार की इन्द्रधनुषीय आभा को प्रदर्शित करता है। इस आभा में लोक के रीति-रिवाज और संस्कार की उज्जवलता सर्वाधिक आकृष्ट करती है। क्योंकि इसमें आडम्बर के लिए कोई स्थान नहीं होता। लोक जीवन की सरलता और सहजता ही उसे विशिष्ट बनाती …

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