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Tag Archives: शिव कुमार पाण्डेय

बस्तर के जनजातीय समाज की हेशांग जातरा

देव संस्कृति को मानने वाला बस्तर का जनजातीय समाज अपने सभी देव काम को जातरा कहता है। जिस भी देव काम में किसी उपज या वनोपज को जागृत कर देवताओं को अर्पण किया जाता है, उसे साड़ कहता है, इसका हिन्दी में अर्थ देवोत्सव होता है और जातरा देवताओं की …

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जनजातीय संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग : महुआ

आम तौर पर महुआ का नाम आते ही इसका सम्बन्ध शराब से जोड़ दिया जाता है। जबकि यह एक बहुपयोगी वृक्ष है। इस वृक्ष के फल, फूल, पत्ती, लकड़ी, तने की छाल सबका अपना उपयोग है। इस वृक्ष के बहुपयोगी होने के कारण जनजातीय समाज इस वृक्ष को पवित्र मानता …

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बस्तर की वनवासी संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग : साजा वृक्ष

बस्तर में निवासरत विभिन्न जाति एवं जनजाति के लोग प्रकृति आधारित जीवन-यापन करते है। ये लोग आदिकाल से प्रकृति के सान्निध्य में रहते हुये उसके साथ जीने की कला स्वमेव ही सीख लिए हैं। यहाँ के रहवासियों का मुख्य व्यवसाय वनोपज, लघुवनोपज संग्रहण कर उसे बेच कर आय कमाना है। …

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कल्प वृक्ष सल्फी से जुड़े बस्तर के वनवासी आर्थिक – सामाजिक सरोकार

बस्तर के ग्रामीण परिवेश में सल्फी का अत्यधिक महत्व है। यह वृक्ष जिस घर में होता है, उस घर का कुछ वर्षो में आर्थिक रूप से  काया कल्प हो जाता है। प्रकृति के साथ सन्तुलन बनाते हुये बस्तर का ग्रामीण इसे सहेजने की कला स्वमेव सीख गया है। इसलिये अपने …

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बस्तर के जाति एवं जनजाति समाज में जोगनी

दक्षिण कौशल का दक्षिणी भाग बस्तर संभाग कहलाता है, बस्तर में किसी भी नए फसल उपज को सबसे पहले अपने परगना के देवता कुलदेवता इष्ट देवता और पितृ देवता में अर्पण करने की परंपरा है। उसके बाद ही बस्तर का जाति एवं जनजाति समाज उस फसल या उपज को ग्रहण …

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बस्तर की जनजातियों में संस्कार

बस्तर सम्भाग में आदिवासियों की विभिन्न प्रकार की प्रजातियाँ निवास करती हैं जिनमें  मुरिया, माड़िया, अबूझमाड़िया, दंडामी माड़िया, परजा, धुरवा इसी तरह गदबा, मुंडा, हल्बा और भतरा आदि प्रमुख जनजातियाँ प्रमुख हैं। इन जनजातियों की बोली-भाषा, रहन-सहन आदि में काफी समानता है। इन्हें केवल अध्ययन की दृष्टि से अलग किया …

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