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ग्रामीण संस्कृति का केन्द्र पीपल चौरा

पीपल का वृक्ष मौन रहकर भी अपने अस्तित्व के साथ गाँव का इतिहास, भूगोल और सम्पूर्ण सामाजिकता को समेटे हुये रहता था। गाँव का इतिहास इस वृक्ष के साथ बनता रहा था। गाँव का भूगोल यहाँ से प्रारम्भ होकर यहीं खत्म होता था, यहाँ की सामाजिकता का यह वृक्ष गवाह था, उसका एकाएक गिरना आघात से कम नहीं था। इस पेड़ में सदियों से घोंसला बनाकर रहने वाले पक्षियों का दर्द भी इसमें शामिल है। पुरातात्विक दृष्टि से इसका महत्व नगरी के लिये बहुत मायने रखता था उतना ही देवकाम काम के लिये भी यह महत्वपूर्ण था यह वृक्ष गांव के कितने ही अभियान का साक्षी रहा है। ग्रामवासी इसके बिना अपने अस्तित्व की कल्पना नहीं कर सकते हैं।

नारायणपुर को पूरे क्षेत्र में पूर्वकाल से सबसे बड़ा गाँव होने का गौरव प्राप्त है। यह सात पारा का एक सबसे बड़ा गाँव था। एक समय तो मध्य प्रदेश का यह सबसे बड़ा ग्राम पंचायत था। पारा मोहल्ला दूर-दूर होने के बाद भी किसी कार्य को करने से पहले यही एक स्थान था, जहाँ अहम बैठक आयोजित किया जाता था। इसी जगह पर वह पीपल का पेड़ था, यह कहना चाहिये कि इस पेड़ के यहाँ होने से सब इस जगह एकत्रित होते थे। यह गाँव का चौपाल होने के साथ-साथ यह जगह गाँव की हर गतिविधि का केन्द्र था। लोग फुर्सत के समय यहाँ बैठकर बतियाते थे। सुबह सब इसी जगह से खेत में काम करने जाते थे। शाम को बैठकर अपने मवेशियों का यहीं इन्तजार करते थे और यहीं से अपने घर लेकर जाते थे। इसके महत्व को रेखांकित करते हुए श्री कृष्ण जी ने गीता में कहा है, वृक्षों में पीपल वृक्ष मैं हूँ।

यह वृक्ष चौराहा स्थित माता मावली का प्रभाव क्षेत्र माना जाता है। इस स्थान से दक्षिण दिशा में कुछ ही दूरी पर माता मावली का एक भव्य मंदिर स्थापित है। यह स्थान आदमियों का ही नहीं देवताओं का भी पसन्द की जगह है। तभी तो जब ग्रामवासियों ने गढ़िया बाबा से उनके मंदिर के लिये जगह दिखाने का निवेदन किया था, तब उन्होंने इस वृक्ष के पूर्व में कुछ दूरी पर एक स्थान अपने मंदिर के लिये चिह्नित किया था, जहाँ ग्रामवासियों ने उनका मंदिर बनाया था। वर्तमान में गढ़िया बाबा का मंदिर इस चिह्नित स्थान पर स्थापित है। इस पेड़ वाले स्थान के पश्चिम में माता शीतला का भव्य मंदिर निर्मित है। इस वृक्ष के करीब बाबा भंगाराम का मंदिर है। बाबा भंगाराम लोग जीवन में स्वास्थ्य के देवता माने जाते हैं। यही सब कारण है कि यह वृक्ष और यह स्थान श्रद्धा का केन्द्र बना है।

इस पेड़ ने अपनी शीतल छाया तले इस गाँव को आबाद होते देखा था। धीरे-धीरे यह गाँव कस्बा का रूप ले लिया था और आज नगर के रूप में विकसित हो रहा है। पुराने समय में भी यह वृक्ष इस नगर की सारी गतिविधियों का केन्द्र था और आज भी नगर के क्रिया-कलाप इस पेड़ से ही संचालित होती है। नगर के सात पारा से आने का मार्ग यहाँ आकर समाप्त होता है या यह कहिये कि सातों पारा जाने के लिये यहीं से मार्ग प्रारमभ होता है। यह स्थान गाँव का चौपाल भी था, गाँव वालों ने इस स्थान पर मिट्टी का बहुत बड़ा चबूतरा भी बनाया था। जिसमें गोबर लिपाई करके बैठके आयोजित की जाती थी। इस मिट्टी के चबूतरे के पास ही अपने आप एक पत्थर आकार लेने लगा, इसे निकालने के लिये बहुत खुदाई की गई, मगर अन्त नहीं मिला। धार्मिक ग्रामीण जनता ने इसमे भगवान का वास मानकर लाली से तिलक लगा दिया और यह पत्थर बजरंग बली के रूप में पूजा जाने लगा। मिट्टी और घास-पूस से एक मंदिर बनाया गया। एक स्थानीय कलाकार स्व. लच्छूसिंह बघेल ने सीमेन्ट से इस पत्थर को हुनमान जी का रूप दिया। तबसे इसे महावीर चौक कहा जाने लगा। पहले इस मंदिर के स्थान पर पक्का ईंट का मंदिर माता प्रसाद पाण्डेय ने बनाया था। वर्तमान में गाँव के लोगों ने व्यापारियों के सहयोग से एक भव्य मंदिर बनाया गया है। यह मंदिर दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।

नगर के सात पारा (मोहल्ले) के लोग इस स्थान को भले ही विविध नाम दिया है, मगर इस स्थान को बुधवारी बाजार के नाम से जाना जाता है। इस जगह बुधवार के दिन एक छोटा सा बाजार भरता है। इसे स्थानीय भाशा में “हटरी” कहा जाता है। इस स्थान पर हटरी भरने के पीछे भी एक कहानी है। जब 1938 में नारायणपुर को तहसील का दर्जा दिया गया था, उस समय नारायणपुर का विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक मावली मेला यहाँ भरा करता था। इसी वर्ष नारायणपुर के ऐतिहासिक बँधुआ तालाब का निर्माण हुआ। मेले में आने वाले के निस्तार सुविधा को ध्यान में रखकर इस स्थान से मेले को देवज्ञा से तालाब के पार स्थानान्तरित कर दिया गया। इस स्थान पर बुधवार को लगने वाला साप्ताहिक बाजार को भी तालाब के पार रविवार को लगाने का निर्णय लिया गया, तब गाँव के लोगों ने बुधवार को साप्ताहिक बाजार की स्मृति को बनाये रखने के लिये इस स्थान पर हटरी लगाने का निर्णय लिया, तबसे इस जगह पर हटरी निरन्तर लग रही है और इस स्थान को बुधवारी बाजार कहा जाने लगा।

बस्तर के चौथे क्रम के राजा पुरुषोत्तम देव ने रथपति की उपाधि मिलने के बाद से बस्तर में रथयात्रा प्रारम्भ हुआ, इन्होंने ही माड़पाल में बसतर में होलिका दहन की शुरूआत की थी। नारायणपुर की राजभक्त जनता ने तब अपने ग्राम में भी होलिका दहन किये जाने का निर्णय लिया था। जिस प्रकार राजतंत्र की राजधानी जगदलपुर में मावली मंदिर के सामने दो होलिका दहन किया जाता है, उसी तर्ज पर इसी स्थल पर दो होलिका जलाई जाती है। मुख्य होली शीतला माता के पुजारी के द्वारा और दूसरी होलिका मावली माता के पुजारी द्वारा जलाई जाती है। इन होलिका दहन में गाँव की सामाजिक समरसता स्पष्ट देखी जा सकती है। होलिका दहन के लिये लकड़ी हर घर से मुखियाओं के द्वारा लाया जाता है। जिससे दो होलिका बनाई जाती है। माटी माता (धरती माता) की पूजा करने के बाद पुजारियों के द्वारा होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन के बाद पुजारियों के द्वारा सभी उपस्थित वरिष्ठ लोगों को गुलाल का तिलक करके रंग खेलने की शुरूआत की जाती है। होलिका में निछावर करने लोग अपने साथ चावल लेकर आते हैं, जलती होलिका में चावल छिड़कते हुये उपस्थित लोग होलिका की परिक्रमा करते हैं और अपने तथा अपने परिवार के मंगल की कामना करते है। इस तरह होलिका दहन भी इसी स्थान पर किया जाता है।

यह ऐतिहासिक महत्व का स्थान, शहर का भूगोल भी तय करता है। वर्तमान जिला नारायणपुर को जनजातीय समाज दस परगने में बाँटकर सामाजिक व्यवस्था का संचालन करता है। इन परगनों में तीन परगने का यह स्थान केन्द्र बिन्दु है। यही से करंगाल परगना, दुगाल परगना और बाराजोड़ियान परगना की शुरूआत होती है। इस पीपल के वृक्ष के पूर्व दिशा में बारा जोड़ियान परगना आता है। जो बखरूपारा से एड़का होते हुये आगे चला जाता है। इस परगना का मुख्य देवता “होचेमुत्तो” हैं। इस वृक्ष के उत्तर में नारायणपुर को बाँटते हुये जगदीश मंदिर के आगे गुरिया, बिंजली, होते हुये बूढ़ादेव के स्थान खड़कागाँव तक दुगाल परगना आता है। इस परगना का मुख्य देवता बूढ़ादेव हैं। इसी तरह नारायणपुर के गढ़पारा, कुम्हारपारा बाकुलबाही कोकोड़ी, करगांल परगना के अन्तर्गत आता है। इस परगना का मुख्य देवता “कोकोड़ मुदिया हैं। यहाँ इनकी पत्नी प्रभावशाली देवी राजटेका के नाम से विख्यात है। तीनो परगने के देवी देवता अलग-अलग हैं। तीनो परगना का प्रारम्भ यहीं से होता है। यह पेड़ परगनों की स्थिति भी स्पष्ट करता था।

इस वृक्ष की ऐतिहासिकता को एक घटना रेखाकिंत करती है। इस कहानी को सभी जाति जनजाति के लोग कहते हैं। जब वनवासी समाज की सामाजिक व्यवस्था का निर्माण नहीं हुआ था। यह घटना उस समय की है। यह क्षेत्र मावली माता के प्रभाव वाला क्षेत्र था। यहाँ पर कहीं से आकर तीन भाईयों ने इसी वृक्ष के नीचे डेरा बनाया था। यहाँ बसने के लिये माता मावली ने उन्हें अनुमति और आशीर्वाद दिया था। इसमें सबसे बड़े भाई बप्पे हिड़मे, मंझले थे नूले हिड़मे और सबसे छोटे भाई हाड़े हिड़में थे। इन लोगों ने माता मावली की आज्ञा से उनके आश्रित रहकर सुखपूर्वक जीवन-यापन करने लगे। दोनों बड़े भाई बप्पे हिड़मे और नूले हिड़मे अपने छोटे भाई हाड़े हिड़में को रखवाली सौंप कर खाद्य सामाग्री जुटाने के लिये, जंगल पारद खेलने और फल, कन्द मुल के लिये निकल जाते थे और छोटा भाई घर की रखवाली करता करता था। इस प्रकार कितने ही दिन बीत जाते हैं। कुछ दिन के बाद बड़े भाईयों को मालूम होता है कि छोटा भाई मावली माता की लड़की से प्यार करता है। दोनों भाईयों को अपने छोटे भाई का कृत्य सुनकर बहुत दुःख होता है। दोनों उसे समझाते हैं कि जिनके आश्रय रहकर हम जीवन-यापन कर रहे हैं, उनकी पुत्री के साथ ऐसा करना शोभा नहीं देता है। अपने भाईयों के समझाने पर छोटा भाई हाड़े हिड़मा मान जाता है।

कुछ दिन तो सब ठीक चलता है, पर प्यार फिर से परवान चढ़ता है। इस बार भी बड़े भाई अपने छोटे भाई को समझाते हैं, पर वह मावली माता की पुत्री राजेश्वरी से प्यार करना नहीं छोड़ता है, तब दोनों भाई अपने छोटे भाई का त्याग कर उस स्थान से अलग-अलग चले जाते हैं। छोटे भाई भी राजेश्वरी से विवाह करके उस स्थान को छोड़कर ग्राम कोकोड़ी चले जाते हैं। तीनों भाई कालान्तर में प्रभाव पूर्ण देवता बनते हैं और अपने-अपने परगने का निर्माण करते हैं। बड़े भाई उस स्थान से उत्तर दिशा में खड़कागाँव चले जाते हैं और दुगाल परगना का निर्माण करके अपने रिश्तेदारों को एक-एक गाँव आबंटित करते हैं। बड़े भाई बप्पे हिड़मा बूढ़ादेव के नाम से वनवासी और अन्य समाज में आराध्य देव कहलाते हैं। नूले हिड़मा पूर्व दिशा में जाकर बेनूर परगने का निमार्ण करके मटावंडिया के नाम से विख्यात होते हैं। इसी तरह हाड़े हिड़मा मावली माता के पुत्री से विवाह करके करगांल परगना का निर्माण करके कोकोड़ मुदिया और राज टेका के नाम से विख्यात होते हैं। इस तरह एक समय में यह वृक्ष वनवासी समाज के तीन आराध्य देवों का आश्रय स्थल रहा है।

जनजातीय समाज में देवता सम्बघित कार्य अपने परगने के हिसाब से किया जाता है। परगने के मुख्य देवता का जातरा सभी परगनों में आयोजित करना होता है, तब परगने भर के लोगों की एक बैठक आयोजित की जाती है। इसी बैठक में दो-तीन आदमियों की दो, तीन टोली बना दी जाती है। ये टोलियाँ देवता का प्रतीक लेकर निर्धारित गाँवों से तोड़ी (तुरही) बजाते हुये निकलती है। यह देव निमंत्रण होता है। इन टोलियों को “पेन जोड़िंग” कहा जाता है। “पेन” का अर्थ देवता और “जोड़िंग” का अर्थ निमंत्रण होता है। इस तरह करगांल परगना, दुगाल परगना और बारा जोड़ियान परगना की पेन जोड़िंग मुख्य रूप से तीन समय निकाली जाती है। एक समय जब मुख्य देवता का जातरा होता है तब और दूसरा समय नवाखानी का होता है। एक अन्य अवसर पर भी निकलती है। इन परगनों की पेन जोड़िंग दल का इस वृक्ष तक आना अनिवार्य होता है। नवाखानी के अवसर पर निकली पेन जोड़िंग दल कभी-कभी एक साथ इस स्थान पर पहुँचती है, तब विचित्र स्थिति निर्मित हो जाती है। कभी-कभी तो दोनों पक्षों में लड़ाई तक होती है। इसे “अपटापाड़ी” होना कहा जाता है। दोनों पक्ष गुथ्मगुथ्था हो जाते हैं। जिन्हें मुश्किल से छुड़ाया जाता है।

यह लड़ाई एक घोड़े को लेकर होती है। कहा जाता है कि दुगाल परगना के मुख्य देवता बूढ़ादेव और कररगांल परगना के मुख्य देवता कोकोड़ मुदिया दोनों आपस में भाई होते हैं। एक दिन छोटा भाई कोकोड़ मुदिया अपने भाई से मिलने के लिये उनके गाँव जाता है। वहाँ उनकी मुलाकात बड़े भाई से नहीं होती है। उनकी भाभी बताती है कि किसी काम से वे बाहर गये हैं। कोकोड़ मुदिया देखते हैं पास में ही एक सुन्दर घोड़ा चर रहा है। घोड़े के विषय में वे अपनी भाभी से पूछते हैं। वह उन्हें बताती है कि यह घोड़ा बूढ़ादेव का है, इस पर वे खुद सवारी करते हैं, किसी और को इस पर बैठने नहीं देते। कोकोड़ मुदिया अपनी भाभी से इस पर सवारी करने की इच्छा जाहिर करते हैं, जिसे वे मना करती हैं। फिर भी वे जबरदस्ती उस पर सवारी करते हैं। घोड़ा उन्हें इतना पसन्द आता है कि वे उस पर सवार होकर अपने गाँव लेकर जाते हैं। बूढ़ादेव जब वापस लौटते हैं तब अपने घोड़े को न पाकर अपनी पत्नी के ऊपर बहुत नाराज होते हैं। वे अपने भाई से घोड़ा वापस माँगते हैं। भाई देने से इंकार करता है। यहीं से उनके मध्य दुश्मनी बढ़ती है और एक-दूसरे का मुँह देखना भी पसन्द नहीं करते हैं। यह झगड़ा देवकाम में भी दिखाई देता है। जहाँ करगाल परगना के देवता होते हैं वहाँ दुगाल परगने के देवता नहीं जाते हैं। इसलिये उनके अनुयायी भी इस दुश्मनी को निभाते हैं।

इस वृक्ष के नीचे एक बार और सामाजिक समरसता देखने को मिलती है, जब माता पहुँचानी के समय गाँव भर की महिलायें अपने कलश के साथ इस जगह इकठ्ठा होती हैं। बहुत ही पवित्र माहौल होता है। देव बाजा बजते रहता है। इस समय सभी सिरहाओं को देवता की सवारी आती है। देव बाजा में सभी अपने-अपने धुन पर खेलते रहते हैं। देवताओं का अपना एक खास धुन होता है, जिसे देव पाड़ कहा जाता है। इसी समय माता मंदिर से सोनकुवँर आँगा बाबा आते हैं और माता मावली के मंदिर में जाते हैं, यहाँ से वे माता के खप्पर के साथ इस वृ़क्ष तक आते हैं, इस वृक्ष से माता जी के खप्पर की अगवानी में कलश यात्रा माता शीतला मंदिर तक जाती है। यही है माता पहुँचानी का आशय, माता को मंदिर तक पहुँचाना।

इस स्थान को देवता समबन्धित लोग देव कोठार के नाम से जानते हैं। कोठार खेत से लाये गये धान या अन्य उपज को रखने के स्थान को कहा जाता है। देव कोठार से आशय है कि देवताओं का एकत्रित होने का स्थान। इस स्थान पर जब भी नगर में देवता सम्बधित काम होता है, किसी भी अभियान से पहले सब देवता यहाँ इकठ्ठा होते हैं। इस स्थान पर देवताओं के सिरहाओं को सिर चढ़ता है और इस स्थान पर बजने वाले देव बाजा में वे अपने धुन पर खेलते हैं। बहुत ही पवित्र माहौल रहता है। सिरहाओं पर देवताओं की सवारी आती है, वे अपने धुन पर खेलते हैं और उनके अनुयायी जनता लाली से तिलक लगाकर, फूल माला पहना कर अपने देवताओं का सम्मान करती है। यह स्थान विश्व प्रसिद्ध, ऐतिहासिक मावली मंड़ई (मेला) के समय दर्शनीय होता है। इस स्थान पर सभी देवताओं के सिरहा एकत्रित होकर यहीं से मेला परिक्रमा के लिये जाते हैं। इस स्थान से बुधवारी बाजार रोड होते हुये मेनरोड से मेला स्थल जाकर वहाँ दो परिक्रमा के बाद आधा परिक्रमा करके लौट जाते हैं और मावली मंदिर में देवताओं की विदाई होती है। इतना महत्वपूर्ण वृक्ष अपने साथ नगर नारायणपुर के इतिहास, भूगोल और नगर के आस्था, विश्वास को समेटे दिनांक 13 अगस्त 2022 को लगातार पानी गिरने से रात्रि के समय धरासायी हो गया। अब केवल कहानियाँ ही रह गई।

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