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कल्प वृक्ष सल्फी से जुड़े बस्तर के वनवासी आर्थिक – सामाजिक सरोकार

बस्तर के ग्रामीण परिवेश में सल्फी का अत्यधिक महत्व है। यह वृक्ष जिस घर में होता है, उस घर का कुछ वर्षो में आर्थिक रूप से  काया कल्प हो जाता है। प्रकृति के साथ सन्तुलन बनाते हुये बस्तर का ग्रामीण इसे सहेजने की कला स्वमेव सीख गया है। इसलिये अपने आर्थिक महत्व के इस वृक्ष को वह अपने आस-पास घर, बाड़ी में रोपता है। इस वृक्ष को अति संवेदनशील मानते हुये इसकी देख-भाल किसी बच्चे की तरह करता है। इतना ही नहीं इसे वह अपनी धार्मिक आस्था और सामाजिकता से भी जोड़ा हुआ है, ताकि हर समय उसे इस बात का स्मरण रह कि यह वृक्ष उसके आर्थिक उत्थान का कारक है।

ग्रामीण परिवेश में सल्फी को लोक गीतों और लोक कलाओं में स्थान दिया गया है। सल्फी के वृक्ष से निकलने वाला दूध की तरह का रस मादक पेय पदार्थ है, जिसे पीने से पेट भी भरता है और हल्का नशा भी करता है। बस्तर का ग्रामीण, पेज (माड) को पूर्ण आहार मानता है और कई तरह के पेज से पेट भरता है। सल्फी को पेज की तरह विकल्प के रूप में उपयोग करता है, उसके लिये सल्फी भी पूर्ण आहार है और इसे वह बड़े चाव से पीता है। इसके पीने से नशे का हल्का सा शुरूर होने से लोगो की कार्य क्षमता बढ़ जाती है, पेट भी भरता है और मस्ती अलग से।

सल्फी वृक्ष की आयु 60 से 70 वर्ष आँकी गई है। जो अनूमन 15 से 20 वर्ष पश्चात रस देने लगता है। इस रस की तासिर ठन्डी होती है। इसे पीने से पेट भरने के साथ-साथ हल्का नशा होता है। इसलिये ग्रामीणो में सल्फी पीने प्रचलन अधिक है। सल्फी को लोगों नें “बस्तर बीयर” नाम दिया है। गोण्डी में इसे “गोरगा” हल्बी, भतरी, हिन्दी में सल्फी और इसका अंग्रेजी नाम फिसटेल पाम है। यह कोरियेटा यूनेन्स कुल का वृक्ष है। यह बस्तर के प्रायः हर क्षेत्र में पाया जाता है। आंध्र प्रदेश में इसे “ईता जेटलु” और केरल में यह “पना” कहलाता है। केरल में इसके पत्तों को हाथियों को खिलाते हैं।

इस वृक्ष का घर पर होना उस घर की समृद्धि का परिचायक है। इसके रस की बिक्री से प्रति माह 15 से 20 हजार रूपया अनुमानित आय होती है। यही कारण है कि बस्तर के कालजयी साहित्यकार स्व0 लाला जगदलपुरी ने इसे “कमाउ पूत” की संज्ञा से विभूषित किया हैं। सल्फी का वृक्ष जब रस देना प्रारम्भ करता है तो उस घर का आर्थिक रूप से काया कल्प हो जाता है। एक बार इस वृक्ष से रस निकलना प्रारम्भ होता है, तो हर डेढ़ दो वर्ष में एक ठोड़ां (तना जिससे रस निकलता है) फूटता है। इस तरह इस सल्फी के वृक्ष से आठ दस ठोड़ां निकालकर रस देते हैं और इस रस को बेच कर उसका स्वामी आर्थिक रूप से सम्पन्न हो जाता है।

चिपड़ी में सल्फी का रसास्वादन

बस्तर का वनवासी समाज ही नहीं दिगर समाज भी सल्फी वृक्ष को जीवनदायी मानता है। जहाँ इसके रस को बेचने से पैसा मिलता है। वहीं दूसरी तरफ रस निकलने के प्रारम्भ में पेड़ पर बँधी हाण्डी में दानेदार सल्फी जमा होती है। जिसे पेज (माड़ ) की तरह लोग पीतें हैं। जिसे गोण्डी में “गोरगा सितांग” कहा जाता है। वृक्ष जब रस देना बन्द कर देता है, तब वृक्ष को काटकर सूखा लिया जाता है और उसके बीच के भाग में जमे हुये कन्द को निकालकर पीस लिया जाता है। इसे गोण्डी में “गोरगा पिण्डी” कहा जाता है। इस आटे से रोटी बनती है और पेज भी बनाकर पीया जाता है।

सल्फी का रस सूर्य निकलने से पूर्व एक गिलास प्रतिदिन पीया जाय तो पेट सम्बन्धित कई प्रकार की बीमारी दूर होती है। इस प्रकार एक गिलास रस पान पथरी का शर्तिया ईलाज है।  इस तरह यह बहु उपयोगी वृक्ष बस्तर के ग्रामीण समाज का आर्थिक आधार तो है ही, साथ में औषधीय गुण होने से जीवनदायी भी है। सल्फी रस को सुरक्षित रखने के लिये तुमा का उपयोग किया जाता है। तुमा लौकी का हल्बी नाम है। लौकी को सुखाकर उसके बीज और अन्य भाग को निकालकर उसे पात्र के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस तुमा पात्र को सल्फी, पेज, शहद, तेल आदि रखने के काम में लाया जाता है।

सल्फी के वृक्ष को बस्तर के ग्रामीणों ने अपनी सामाजिकता से भी जोड़ कर रखा है। जब इस वृक्ष से रस निकलने वाला ठोंडा (तना )फूटता है तब रस निकालने की प्रक्रिया आरम्भ की जाती है। जिस व्यक्ति को उस तने को काटकर रस निकालना आता है। यह घर का व्यक्ति या बाहर का व्यक्ति दोनों हो सकता है। इस वृक्ष को उसे सौंप देते हैं। अब यही इस वृक्ष का स्वामी होता है। इस व्यक्ति को ही यह अधिकार होता है कि वह इस वृक्ष में चढ़ कर सुबह-शाम सल्फी का रस उतारे, अन्य किसी को इस वृक्ष को चढ़ना ही नहीं, छूना तक मना होता है। इसके पीछे लोगों की आम धारणा यह है कि दूसरे व्यक्ति के पेड़ में चढ़ने से सल्फी का रस कम निकलता है, या पेड सूख जाता है। बस्तर के ग्रामीण क्षेत्र परम्परागत विश्वास के चलते वृक्ष से निकलने वाला रस ज्यादा आये, या किसी की बुरी नजर लगने से रस कम आये, इस विचार से तरह-तरह के टोना-टोटका किया जाता है।

सबसे पहले सल्फी के वृक्ष का स्वामी उस तना (ठोंडा ) को काटता है। उसके नीचे एक काली हण्डी बाँध देता है जिसमे उस तने से निकलने वाला रस हण्डी में जमा होता है। उस हण्डी को तने के साथ पत्तों से ढक दिया जाता है, ताकि किसी की नजर न लगे। वृक्ष से उतरने के बाद वह व्यक्ति कटे हुये तने के उस भाग से वृक्ष के चारों ओर ठोकता है और अपने कुलदेवी, ग्राम देवी, कैना (जल की देवी ) कोडो (रक्षक देव ) आदि का आह्वान करके सबसे प्रार्थना करता है कि “हे देव सब बुरी बलाओं से इस वृक्ष की रक्षा करें, किसी की बुरी नजर या साया इस पर ना पड़े और पर्याप्त रस प्राप्त होता रहेे।”

इसके बाद उन देवताओं की विधिवत पूजा कर उन देवताओं को जैसा विधान है, उस प्रकार भेंट दिया जाता है। यहाँ उस कैना (जल की देवी ) की जिस जगह से इस वृक्ष के बीज या पौधों को लाया गया है। यहाँ पर कैना देवी पूजा की जाती है और उन्हें चूड़ी फून्दड़ी श्रृंगार के सामान, लाली, सुपारी और चियाँ (मुरगी का बच्चा ) की बलि दी जाती है। कैना जल वृद्धि करने वाली देवी मानी जाती है। इसलिये जहाँ से बीज या पौधा लाया गया है, उस गाँव के कैना को भी प्रसन्न किया जाता है। ताकि सल्फी के वृक्ष से ज्यादा रस निकले ।

सल्फी वृक्ष का रस होने के कारण इसका स्वाद खट्टा कसेला और हल्का मीठा पन लिये होता है। इस रस को पीने के बाद कुछ ना कुछ खारी (नमकीन) चीज चखी जाती है, जिसे “चाखना” कहते है। वृक्ष से सुबह शाम रस निकाला जाता हैं। सल्फी को और अधिक नशीला करने के लिये हाण्डी में कुछ जड़ी डाली जाती है। जैसे सियांड़ी फल का छिलका, सर्पगंधा की पत्तियां, रेला (घुड़साल) आदि। इस तरह की जड़ी सभी लोग नहीं मिलाते, केवल जिनका उदेश्य रस बेचना होता है, उन्ही के द्वारा ये जड़ी मिलाई जाती है ।

रस को तूमा में भरने से पहले तीन बार “ओरकी“ से जमीन में गिराया जाता है। इसे मिट्टी को तर्पण करना कहतें है। “ओरकी” गदा नुमा सूखी लौकी है जिसके दोनो सिरे में छेद किया जाता है। एक ओर से रस भरकर दूसरी ओर से तूमा में डालते हैं। भरे हुये तूमे को एक रस्सी के सहारे नीचे खड़े व्यक्ति तक पहुँचाते हैं। इस समय वृक्ष के नीचे जितने भी व्यक्ति खड़े रहते हैं, उन्हे पत्तों की चिपड़ी में सल्फी दी जाती है। यह ”मरा डप्पा“ कहलाता है। इसके पीछे सब लोगों को संतुष्ट करने का भाव होता है।

मान्यता यह भी है कि वृक्ष के नीचे खड़ा व्यक्ति सल्फी पीने की कामना के साथ आया होता है, उसकी कामना किसी कारण अतृप्त न रह जाये और उसकी नजर न लग जाये इसलिये यह परम्परा बनाई गई होगी। इसे पीने के बाद जिसे जितनी आवश्यकता होती है मोल चुका कर उतनी सल्फी वह लेता है। सल्फी बस्तर के ग्रामीणों में खासा लोकप्रिय पेय है। जिसे पीते हुये वह अपने सगा-सम्बन्धी से दुःख-सुख बाँटता है। गाँव में किसी के भी घर में सामाजिक कार्य होने से उस दिन की सल्फी उस घर वालों के लिये रखी जाती है। जिसका की बाद में घर वालों के द्वारा मुल्य चुकाया जाता है। सल्फी उतारने वाला और जिसके घर में सल्फी का वृक्ष है उनके बीच पूर्व से तय शुदा हिस्सेदारी होती है, उसके अनुसार ही रस का बटवारा होता है।

बस्तर में कुछ बड़े गाँवों में हर सप्ताह बाजार लगता है, जहाँ आस-पास के गाँव के लोग आते हैं। इन बाजारों में आने वाले लोग चाहे जिस वर्ग के भी हो, वे अपने साथ कुछ न कुछ वस्तु लेकर आते हैं, चाहे वह उपज हो या कुछ अन्य वस्तु, जिसका कोई मोल हो, उसे बेच कर वे अपनी जरूरत का सामान खरीदते है। इस बाजार में सल्फी बिकने के लिये आती है, जिस व्यक्ति के घर में सल्फी होती है या जो सल्फी उतारने का काम करता है वह व्यक्ति अपनी सल्फी इन बाजारों में बेचकर अपनी जरूरतों के सामान की खरीददारी करता है।

यदि सल्फी ज्यादा मात्रा में आने लग जाती है, तब उस व्यक्ति द्वारा सल्फी को आवश्यक रूप से इन बाजारों में ला कर बेचा जाता है। बस्तर के हाट-बाजारों में सल्फी का मिलना आवश्यक है, इसका अच्छा व्यवसाय हो जाता है। आकस्मिक होने वाले सामाजिक कामों के लिये इन बाजारों से ही सल्फी क्रय की जाती है। शहरी क्षेत्र के लोगों के बीच सल्फी को नशा के लिये पीने का अत्यधिक चलन है। हाट-बाजारों में अपने सगा-सहोदर से सुख-दुःख बतियाने के समय भी सल्फी खरीदकर पीया जाता है।

सल्फी के एक वृक्ष में जब आठ दस-तने निकलकर रस दे देते हैं, तब उस वृक्ष पर फल निकलता है। यह फल उस पेड़ के समाप्त होने का सूचक है। ये फल एक एक हाथ के लच्छेदार होते है। जिन्हे सूखकर बीज बनने में लगभग दो से तीन साल का समय लगता है। ये बीज फल सूख-सूख कर झड़ते रहते हैं। ये इतने छोटे-छोटे होते हैं कि परिपक्व बीज की पहचान करना मुश्किल होता है। कोई अनुभवी व्यक्ति ही बड़ी मुश्किल से पहचान कर पाता है।

इन बीजों का अन्य किसी माध्यम से प्रगुणन नहीं होता, केवल व्यक्ति ही इसे उगाता है। इसलिये यह वृक्ष केवल घरों की बाड़ियों में जहाँ यह लगाया जाता है, उसी स्थान पर उगता है। इस बीज को सगा-सहोदर को ही दिया जाता है। नारायणपुर क्षेत्र में इसे बेटी की तरह विदा करने की परम्परा नहीं है। जैसे दक्षिण बस्तर में कहीं कही विषम गोत्रीय सगा को जब बीज दिया जाता है, तब बकायदा दोनो ओर से लायी गयी शराब पीने के बाद ढोल मांदर बजा कर उस बीज को बेटी की तरह विदा किया जाता है। यदि दोनो पक्ष विषम गोत्रीय होते हैं, जिनके बीच रोटी-बेटी का सम्बन्ध हो सकता है, ऐसे परिवार में दो-तीन बार माहला (सगाई) की जाती है, फिर बीज दिया जाता है।

साधारणतः बस्तर के वनवासी से अलग अन्य कोई समाज का व्यक्ति सल्फी के बीज को अनुकूल अवसर में रोप देता है। परन्तु वनवासी समाज का कोई व्यक्ति किसी अन्य गाँव से लाये बीज को बहुत सुरक्षित सहेजकर रखता है और अवसर की प्रतीक्षा करता है। यह अवसर उसके घर में किसी बच्चे के जन्म का होता है। जन्म लेने वाला बच्चा यदि लड़की होती है तब छः दिन पश्चात जिस दिन को वह छठी मनाना कहता है। उस दिन नवजात के जन्म नाल काटने के बाद उसे जहाँ गाड़ा जाता है। वही उसी नवजात के हाथ से उस सल्फी के बीज को गिरा कर रोप देता है। इसे वह गोण्डी में “पुला पोहना” कहता है।

वनवासी समाज की ऐसी मान्यता है कि लड़कियाँ बड़ी जल्दी बढ़ती हैं। इसी तरह यह सल्फी का वृक्ष भी जैस-जैसे वह कन्या बढ़ेगी, उसी तरह यह भी बढ़ता जायेगा और घर के मुखिया के जीवन काल में ही इस वृक्ष से रस मिलना शुरू हो जायेगा। कहा जाता है कि जो व्यक्ति सल्फी का वृक्ष रोपता है। वह उस वृक्ष का रस नही पी पाता है। क्योंकि इससे निकलने वाला तना (ठोंडा ) को निकलने में ही बीस से पच्चीस वर्ष लग जाते हैं। तब तक रोपने वाले का अवसान हो जाता है। इसलिये जहाँ भी सल्फी के वृक्ष मिलेगें वहाँ कतार में या झुंड में मिलते हैं। इसका कारण है कि सल्फी के वृक्ष को हर वर्ष उसके बीज परिपक्व होने पर रोपा जाता है। एक वृक्ष रस देने लगता है और उसके खत्म होने तक दूसरा वृक्ष भी रस देने के लिये तैयार हो जाता है।

सल्फी एक मादक पेय है वृक्ष से निकलने वाला यह रस प्रायः मीठा होता है। जिसमे नशा नहीं होता इस रस को नशीला बनाने के लिये रस जमा होने वाली हण्डी में जड़ी डाली जाती है। जिससे रस में हल्का सा कसेला और कड़वापन आ जाता है और यह रस नशा करने लगता है। सल्फी में मिलाई जाने वाली ये जड़ी औषधीय होती हैं। जिनकी पहचान कुछ व्यक्तिओं को ही होती है।

बताते है कि आदिकाल में तलुर मुत्तो (ग्राम देवी ) आदिम समाज पृथ्वी माता को ग्राम देवी मानता है उनका मुदिया (पति) निवारत थे। पति करगांल प्रतिदिन शाम सबेरे दूर सल्फी उतारने जाते थे। यहाँ तलुर धान कूटकर चावल बनाती उसे सूपा से साफ करती और खाना बनाकर करगांल का रास्ता देखती, करगांल आता खाना खाता थोड़ा आराम करता फिर चला जाता, यह क्रम कुछ दिनों तक चलता रहा, एक दिन तलुर अपने मुदिया से पूछती है। “तुम सल्फी उतारने हर दिन जाते हो, पीते भी हो पर नशा नहीं होता क्यों? कैसा लगता है, सल्फी का स्वाद?” करगां बताता है कि “सल्फी का स्वाद मीठा लगता है।” तब तलुर, करंगाल से कहती है कि “रस की हाण्डी में कल “भालू मूसर की जड़” जिसे गोण्डी में “रेला” और “अंयड़ी पदला“ की जड़ डाल देना फिर देखना नशा कैसे नहीं होगा।” करंगा, तलुर के बताये अनुसार उपाय करता है। दूसरे दिन रोज की तरह तलुर धान कूट कर चावल साफ कर खाना बनाती है और अपने मुदिया का रास्ता देख रही होती है कि तभी करगां “रेला रेला रियो रिला” गाते आता है। तलुर समझ जाती है कि आज मुदिया को सल्फी का नशा हुआ है। घर आकर करंगा बताता है कि तुमने जैसा बताया था, मैने वैसा ही किया अब सल्फी नशा करती है और पीने में भी स्वाद है। तबसे रस को नशीला बनाने के लिये जड़ी डालने का चलन प्रारम्भ हुआ।       

बस्तर का आदिम समाज अपनी परम्पराओं को इस कदर सहेज कर रखता है कि उसके लिये वह कितना ही बड़ा नुकसान क्यों ना हो उठाने में परहेज नहीं करता। इसलिये वह अपनी सबसे प्रिय सल्फी के वृक्ष को अपने सगा-सम्बन्धियों को भी देने से नही चुकता। सल्फी के वृक्ष जिस घर में भी होते हैं वहां झुण्ड में होते है। कभी जब उस घर के मुखिया का अवसान होता है। तब उसके मृत्यु संस्कार में उसके विषम गोत्रीय सगा-सम्बन्धी जो उसके समधियान पक्ष के लोग होते हैं। जमा होकर दाह संस्कार करते है। इसे “बिछ्छर छुवाना” यानि शुद्धिकरण करना कहा जाता है।

उसी दौरान मुखिया का मठ (मृत्यु स्तम्भ ) बनाते हैं तब उस जगह पर उनके द्वारा उस मृतक मुखिया की प्रिय चीज गाड़ दी जाती है। यह प्रायः सल्फी के वृक्ष का तना होता है। इसका आशय होता है कि उन सम्बन्धियों को उस मृतक के यादगार के रूप में सल्फी का वृक्ष दिया जाना है और मृतक मुखिया का परिवार अपने घर में उगे हुये सल्फी का एक वृक्ष अपने समधियान पक्ष को देता है। समाज के समक्ष दिये गये इस वृक्ष पर जिस घर में यह उगा होता है। उस घर का केवल देख-रेख करने का अधिकार होता है। उपभोग करने का नहीं।

इस वृक्ष के रस का जब समधियान पक्ष उपयोग कर रहा होता है इस दूसरे पक्ष को पीने का आमंत्रण देता है। ऐसी स्थिति में वह पक्ष उसका मोल चुकाता है। या फिर बदले में अपनी ओर से सल्फी या शराब रखता है। बस्तर में सल्फी आजीविका का साधन ही नही, आर्थिक आधार एवं सामाजिक सरोकार भी रखता है। इसलिये यहां के लोग इसे अपने संस्कृति से जोड़ कर लोक गीत, लोक कला के द्वारा प्रदर्शित करतें हैं।

आलेख

श्री शिवकुमार पाण्डेय
अधिवक्ता
नारायणपुर, बस्तर, छत्तीसगढ़

            

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