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Tag Archives: बस्तर

स्थापत्य कला में गजलक्ष्मी प्रतिमाओं का अंकन : छत्तीसगढ़

लक्ष्मी जी की उत्पत्ति के बारे में कहा गया है कि देवों तथा असुरों द्वारा समुद्र मंथन करते समय उससे उत्पन्न हुये चौदह रत्नों में से लक्ष्मी जी भी एक रत्न थीं। वे कमल के आसन पर बैठी हुई कमल पुष्प हाथ में धारण किये हुये प्रकट हुई थीं। लक्ष्मी …

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सरोवरों-तालाबों की प्राचीन संस्कृति एवं समृद्ध परम्परा : छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ में तालाबों के साथ अनेक किंवदंतियां जुड़ी हुई है और इनके नामकरण में धार्मिक, ऐतिहासिक तथा सामाजिक बोध होते हैं। प्रदेश की जीवन दायिनी सरोवर लोक कथाओं तथा लोक मंगल से जुड़े हुए हैं। यहा तालाबों की बहुलता के पृष्ठभूमि में प्राकृतिक भू-संरचना, उष्ण-कटिबंधीय जलवायु नगर और ग्रामों का …

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काकतीय वंश की कुलदेवी मां दंतेश्वरी

बस्तर का दंतेवाड़ा जहां विराजमान है काकतीय राजवंश की कुलदेवी मां दंतेश्वरी। डकनी, शंखनी और धनकिनी नदी संगम तट पर माता का मंदिर अपनी पारंपरिक शैली में बना है वनवासियों की आराध्या दंतेश्वरी माई के दरबार से बस्तर के हर तीज-त्यौहार और उत्सव प्रारंभ होते हैं। अपनी समृद्ध वास्तु कला, …

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देवी का ऐसा स्थान जहाँ पद चिन्हों से जाना जाता है वार्षिक भविष्य

शिव और शक्ति से उद्भूत लिंगेश्वरी देवी (लिंगई माता) लिंग स्वरूपा जहां विराजमान हैं। लगभग दो फुट का प्रस्तर लिंग शिव स्वरूप लिए हुए है, जिसमें समाहित शक्ति लिंगेश्वरी देवी का सिंगार लिए हुए हैं। जहां शिव और शक्ति एकाकार हुए हैं यही अद्भुत रूप लौकिक जगत के लिए दर्शनीय …

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बस्तर की सामूहिक पूजा पद्धति ककसाड़

छत्तीसगढ़ प्रदेश के बस्तर संभाग में जीवन-यापन करने वाली जनजाति देव संस्कृति के पोषक है। वह अपने लोक देवी देवताओं के प्रति अपार श्रद्धा रखता है। उसकी यह भावना उसके कार्य-व्यवहार से परिलक्षित होती है। जनजाति समाज के तीज-त्यौहार देव कार्य सब अपने देवताओं को प्रसन्न करने और प्रकृति के …

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आदिमानवों द्वारा निर्मित गुहा शैलचित्र : लहूहाता बस्तर

जंगल में गुजरते हुए पहाड़ की चढ़ाई, ऊपर पठारी भाग में चौरस मैदान और चौरस मैदान के नीचे सभी ओर गहरी खाई, मैदान से खाई के बीच बेतरतीब पत्थरों की दीवार। दीवार में प्राकृतिक रुप से बने अनेक गुफानुमा स्थान। 8-10 वर्ग कि.मी. का पठारी क्षेत्र पूर्णतः वीरान किन्तु चारों …

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गढ़धनौरा गोबरहीन का विशाल शिवलिंग एवं पुन्नी मेला

महाशिवरात्रि पर्व पर त्रेतायुग के नायक भगवान श्रीराम के वनवास काल स्थल एवं 5वीं-6वीं शताब्दी के प्राचीन प्रसिद्ध शिवधाम गढधनौरा गोबरहीन में मेला लगता है। श्रद्धालु शिवभक्तों, प्रकृति से प्रेम करने वाले प्रकृति प्रेमियों एवं सभ्यता संस्कृति इतिहास में अभिरूचि रखने वाले जिज्ञासुओं की भारी भीड़ के चलते यंहा पर …

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जनजातीय संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग : महुआ

आम तौर पर महुआ का नाम आते ही इसका सम्बन्ध शराब से जोड़ दिया जाता है। जबकि यह एक बहुपयोगी वृक्ष है। इस वृक्ष के फल, फूल, पत्ती, लकड़ी, तने की छाल सबका अपना उपयोग है। इस वृक्ष के बहुपयोगी होने के कारण जनजातीय समाज इस वृक्ष को पवित्र मानता …

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बस्तर की मुरिया जनजाति का प्राचीन विश्वविद्यालय घोटुल

इसे बस्तर का दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिये कि इसे जाने-समझे बिना इसकी संस्कृति, विशेषत: इसकी वनवासी संस्कृति, के विषय में जिसके मन में जो आये कह दिया जाता रहा है। गोंड जनजाति, विशेषत: इस जनजाति की मुरिया शाखा, में प्रचलित रहे आये “घोटुल” संस्था के विषय में मानव विज्ञानी …

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बस्तर की वनवासी संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग : साजा वृक्ष

बस्तर में निवासरत विभिन्न जाति एवं जनजाति के लोग प्रकृति आधारित जीवन-यापन करते है। ये लोग आदिकाल से प्रकृति के सान्निध्य में रहते हुये उसके साथ जीने की कला स्वमेव ही सीख लिए हैं। यहाँ के रहवासियों का मुख्य व्यवसाय वनोपज, लघुवनोपज संग्रहण कर उसे बेच कर आय कमाना है। …

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