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रायपुर में सशस्त्र क्रांति का प्रयास

स्वतंत्रता दिवस विशेष आलेख

आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर भारत माता को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए छत्तीसगढ़ महतारी के संतानों ने अभूतपूर्व योगदान दिया है। हमें गर्व है अपने स्वातंत्र्य-प्रिय सेनानियों पर जिन्होंने 1857 से पूर्व ही विदेशियों की सत्ता के विरोध में सशस्त्र विद्रोह किया था।

1942 में रायपुर के परसराम सोनी सशस्त्र क्रांति के प्रयास में जुटे थे। लेकिन 15 जुलाई को मित्र शिवनंदन की मुखबिरी के कारण गिरफ्तार कर लिए गए। गोलबाजार में गिरिलाल रहते थे। सोनी जी ने उनसे रिवाल्वर और तीन कारतूस लिए और शिवनंदन के साथ लौट गए। जैसे ही वे सायकल से सदर बाजार रोड पहुंचे त्यों ही शिवनंदन ने घंटी बजाई। घंटी बजते ही केंद्रीय सीआईडी के इंस्पेक्टर नरेंद्र सिन्हा, अंग्रेज डीएसपी और सिटी इंस्पेक्टर उन पर टूट पड़े। सोनी जी समझ गए गद्दारी हो चुकी है।

सोनी जी ठा.प्यारेलाल सिंह, मौलाना रऊफ और भूतनाथ बैनर्जी से बहुत प्रभावित थे। भूतनाथ बैनर्जी नागपुर षडय़ंत्र केस में 6 साल पूरी कर लौटे थे। सोनी जी को क्रांतिकारी कवि राजनांदगाव के कुंजबिहारी चौबे के पिता छबिलाल चौबे के पास से 32 बोर की रिवाल्वर मिली। उन्होंने उसकी नकल कर हू-ब-हू दूसरा रिवाल्वर तैयार कर लिया।

गिरिलाल मुंगेर से रायपुर आकर बंदूक सुधारने का काम करते थे। उनका संबंध चटगांव के क्रांतिकारियों से था। वे दोनों आरएमई वर्क्स और रायपुर फ्लोर मिल के कारीगरों से सामग्रियां हासिल करते और सोनी जी के घर में रिवाल्वर तैयार करते। डॉ.विपिनबिहारी सूर और उनके भाई निखिलभूषण सूर से उन्हें रसायन शास्त्र की किताब मिली जिसके आधार पर बम बनाना सीख गए।

उन्होंने ईश्वर सिंह परिहार से पिकरिक एसिड से बम बनाने का हुनर भी सीख लिया। विस्फोटक के लिए सामग्रियां प्रधानाध्यापक ठा.ज्ञान सिंह अग्निवंशी अपने एंग्लो वर्नाकूलर स्कूल की प्रयोगशाला से और होरीलाल सीपी मेडिकल स्टोर्स से उपलब्ध कराने लगे। जल्द ही सोनी जी टाईम बम, पोजिशन बम और स्मोक बम बनाने में दक्ष हो गए। धीरे-धीरे परसराम सोनी का दल बढ़ने लगा। मालवीय रोड का ओरियेंटल होटल क्रांतिकारियों का मिलन स्थल था।

परसराम सोनी इतनी गोपनीयता बरतते थे कि रोज मिलने वाले ओरियेंटल होटल के उनके साथियों को भी जानकारी नहीं थी कि वे सभी एक ही मकसद से काम कर रहे हैं। गिरफ्तारी के बाद सोनी जी के घर की तलाशी हुई, कुछ भी आपत्तिजनक वस्तु नहीं मिली। पर तलाशी के दौरान कुछ पत्रों में उनके साथियों के नाम-पते मिल गए।

धर-पकड़ शुरू हो गई। प्रेम वासनिक सरकारी गवाह बन गया। क्रमश: गिरिलाल, डा. सूर, मंगलमिस्त्री, कुंजबिहारी, दशरथ लाल चौबे, सुधीर मुखर्जी, देवीकांत झा, होरीलाल, सुरेंद्रनाथ दास, क्रांतिकुमार भारतीय, कृष्णाराव थिटे, सीताराम मिस्त्री, समर सिंह और भूपेंद्रनाथ मुखर्जी जेल पहुंचा दिए गए। भारतीय रक्षा अधिनियम, आर्म्स एक्ट और एक्सप्लोसिव सब्सटेंस एक्ट के तहत मामला चला।

अभियुक्तों की ओर से रायपुर के दिग्गज वकीलों एम. भादुड़ी, पी. भादुड़ी, चांदोरकर, पेंढारकर, अहमद अली, बेनीप्रसाद तिवारी और चुन्नीलाल अग्रवाल ने पैरवी की। शासन की ओर से मुकदमा लड़ने शहर का कोई वकील तैयार नहीं हुआ। अंग्रेज आर्म्स एक्सपर्ट तो यह मानने के लिए ही तैयार नहीं था कि रिवाल्वर ‘हेंड मेंड’ है। उसने परसराम की ‘कारीगरी’ की भरे कोर्ट में तारीफ की।

शिवनंदन के अलावा समर सिंह भी सरकारी गवाह बन गया। 27 अप्रैल 1943 को गिरिलाल को 8 वर्ष, परसराम सोनी को 7, भूपेन्द्रनाथ मुखर्जी को 3, क्रांतिकुमार और सुधीर मुखर्जी को दो-दो साल, दशरथलाल चौबे, देवीकांत झा, सुरेंद्रनाथ दास को एक-एक वर्ष की सजा सुनाई गई। मंगल मिस्त्री को नौ, और कृष्णराव थिटे को छ: माह की कठोर सजा हुई।

कुंजबिहारी चौबे तथा सूर बंधुओं पर दोष सिद्ध नहीं हो पाया। पर डॉ.सूर को डीआईआर के तहत जेल में ही रखा गया। रणवीर सिंह शास्त्री उस वक्त गुरुकुल कांगड़ी में थे। इसलिए उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई। सजा के खिलाफ नागपुर हाईकोर्ट में अपील दायर की गई। जस्टिस नियोगी ने भूपेंद्रनाथ मुखर्जी, सुधीर मुखर्जी, कृष्णराव थिटे और देवीकांत झा को बरी कर दिया। परसराम सोनी ने अपील करने से इंकार कर दिया था।

मई 1946 में भगत सिंह के साथी क्रांतिकारी जयदेव कपूर रायपुर आए। गांधी चौक की सभा में उन्होंने परसराम सोनी की रिहाई की मांग की। सजा काट कर रिहा हो चुके क्रांतिकुमार भारतीय और सुधीर मुखर्जी ने नागपुर जाकर मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल से परसराम और गिरिलाल की रिहाई की अपील की। 26 जून 1946 को वे दोनों रिहा कर दिए गए। अंग्रेजों के रिकॉर्ड में यह मामला ‘रायपुर षड़यंत्र केस’ के नाम से प्रसिद्ध है।

डायनामाइट का धमाका

शांति कई बार तूफान के पूर्व भी व्याप्त होती है। एक धमाका हुआ था जेल की दीवार को उड़ाने के लिए। रायपुर के बनियापारा निवासी बिलखनारायण अग्रवाल 1942 में नरसिंहपुर के खादी भंडार में कार्यरत थे। 1942 में उन्होंने खादी भंडार की नौकरी से इस्तीफा देकर भूमिगत हो गए।

बिलखनारायण अग्रवाल जबलपुर चले गए। वहां उनके हाथ एक डायनामाइट लग गया। किसी तरह छिपते और बचते वे रायपुर पहुंचे। प्रश्न था डायनामाइट का क्या उपयोग किया जाए? उन्होंने नागरदास से इसकी चर्चा की। बिलखनारायण, नागरदास, नारायण दास, ईश्वरीचरण शुक्ल, जयनारायण पांडेय ने जेल की दीवार को उड़ाने की योजना बनाई।

अनुमान था कि डायनामाइट से जेल की दीवार उड़ा कर बन्दी साथियों को छुड़ाया जा सकता है। एक रात साथी शिवबालकराम गंगले के साथ जयनारायण पांडेय ने जेल की दीवार में डायनामाइट लगा दिया। बाकी साथी चौकसी करने लगे। विस्फोट हुआ, मगर दीवार को अपेक्षानुसार क्षति नहीं पहुंची।

क्रांतिकारी अपने उद्देश्य में भले ही विफल रहे लेकिन उनके दुस्साहसिक कारनामे से ब्रिटिश प्रशासन भौंचक रह गया। स्थानीय अधिकारियों को जांच में खाली हाथ रहना पड़ा। सेंट्रल इंटेलिजेंस की टीम रायपुर आई लेकिन साल भर तक वह भी अंधेरे में हाथ-पांव चलाती रही। घटना की आंच मंद पड़ने लगी थी कि शारदा चौक के एक पान की दुकान में जयनारायण पांडेय के एक साथी के मुंह से धमाके के विषय में कुछ बातें निकल गई। पांडयेजी दूसरे ही दिन गिरफ्तार कर लिए गए। मगर उनके विरुद्ध पुलिस कोई प्रमाण इकट्ठा नहीं कर सकी और उन्हें रिहा कर दिया गया।

उससे पूर्व ईश्वरीचरण शुक्ल और नारायणदास को लैटर बॉक्स जलाने व टेलीफोन के तार काटने के आरोप में जेल भेजा जा चुका था। नागरदास, बिलखनारायण अग्रवाल और शिवबालकराम गंगेले फरार हो गए। नागरदास को घटना के चार साल के बाद सागर में और बिलखनारायण को रायपुर में गिरफ्तार किया गया। मगर गंगेले जी कभी पुलिस के हाथ नहीं लगे। शायद इसलिए उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का सम्मान भी नहीं मिल पाया।

आलेख

आशीष सिंह
पत्रकार, इतिहास और संस्कृति के अध्येता
413, ऐश्वर्या गर्ल्स हॉस्टल के पास,
सुंदरनगर, रायपुर (छत्तीसगढ़) 492013

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