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भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के पथप्रदर्शक

भारतीय इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण घटना भारत की स्वतंत्रता है। जो ब्रिटिश शासन के विरूद्ध एक अत्यंत कठिन और लंबी लड़ाई का अंत था। स्वतंत्रता किसी भी देश के नागरिकों की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के अनुरूप कार्य कर अपनी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं शिक्षा इत्यादि सभी क्षेत्रों में सर्वांगीण उन्नति का अवसर प्रदान करती है।

इसीलिए भारतीयों ने ब्रिटिश शासन से अपनी पहचान, अपनी संस्कृति और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ी। सम्पूर्ण भारत वर्ष में देश की स्वतंत्रता के लिए सैंकड़ों स्वंतत्रता संग्राम सेनानियों एवं महापुरुषों ने आत्मबलिदान कर दिया, फलस्वरूप 15 अगस्त 1947 को हमारा देश आज़ाद हुआ। जिसे स्वतंत्रता दिवस के रूप में प्रतिवर्ष मनाते हैं जो हमारी एकता व बलिदान की भावना का प्रतीक है।

भारतीय इतिहास में स्वामी विवेकानंद युगपुरुष और युवा पीढ़ी के आदर्श माने जाते हैं। इनका जन्म 12 जनवरी1863 को हुआ था। इनके पिता विश्वनाथ दत्त और माता भुवनेश्वरी देवी थी। इनके आध्यात्मिक गुरु रामकृष्ण परमहंस थे। विवेकानंद जी ने ईश्वर और आध्यात्मिकता के विषय में अपनी समझ का श्रेय इन्हें ही दिया।

स्वामी विवेकानंद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के पथप्रदर्शक के रूप में माने जाते हैं। उन्होंने अपने शक्तिशाली भाषणों और शिक्षाओं से स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को प्रेरित किया। स्वामी जी में सब कुछ सकारात्मक था। कुछ भी नकारात्मक नहीं था। वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उज्ज्वल नक्षत्र के समान थे।

उन्होंने भारतवासियों को भारत पर गर्व करने की प्रेरणा प्रदान की। स्वामीजी के संदेश था “गर्व से कहो कि मैं भारतीय हूँ। प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है। वीर बनो! निडर और साहसी बनो! हे शक्ति की अधिष्ठात्री माँ! मेरी दुर्बलता को दूर कर दो। मेरी कापुरुषता को दूर कर दो मुझे सच्चा मनुष्य बना दो।”

स्वामीजी का कथन था ” यदि किसी व्यक्ति को अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए कार्य करना है तो उसे बलिदान के लिए तैयार रहना होगा। व्यक्ति तब तक बलिदान नहीं दे सकता, जब तक उसके मन में मातृभूमि के प्रति प्रेम नहीं है।” स्वामी जी धार्मिक, सामाजिक स्वतंत्रता को प्रथम मानते थे। इसके बिना किसी प्रकार की उन्नति असंभव है।

वे व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की सोच रखने वाले महात्मा थे। 25 वर्ष की आयु में जब परिव्राजक सन्यासी के रूप में भारत भ्रमण पर निकले तब भारत पराधीन था। अंग्रेजों का शासन था। अपने साढ़े चार वर्ष के भ्रमण के दौरान उन्होंने देखा कि वर्षों की गुलामी के कारण भारतीयों में आत्मसम्मान, आत्मविश्वास, आत्मगौरव और स्वावलंबन पूर्णतः समाप्त हो चुका है।

स्वामी जी को अपना उद्देश्य स्पष्ट हो गया कि उन्हें राजनीति से दूर रहकर हर भारतवासी में आत्मविश्वास जगाने का कार्य करना होगा और उन्होंने आत्मविश्वास जगाने का ,चरित्र निर्माण का, मनुष्य निर्माण का कार्य पूरे जीवन भर अनेक कठिनाइयों को सहते हुए किया क्योंकि बिना आत्मविश्वास के आत्मनिर्भर बनना संभव नहीं और स्वतंत्रता के लिए यह अतिआवश्यक है।

स्वामी विवेकानंद ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पीछे सबसे प्रेरक बौद्धिक उत्साह के रूप में कार्य किया। स्वामी जी ने युवकों को प्रेरित किया। उनके प्रेरक और भावोत्तेजक विचारों को पढ़कर अनेक लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया।

उन्हें अरविंदो घोष, हेमचन्द्र घोष, महात्मागांधी और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे महान नेताओं द्वारा प्रेरणास्रोत के रूप में देखा जाता है। महात्मा गांधी ने प्रेरित करने का श्रेय देते हुए कहा “स्वामी विवेकानंद की किताबें पढ़ने के बाद मुझे एक हजार गुना अधिक ऊर्जा मिली।”

स्वामी जी ने भारतीयों को उनके गौरवशाली परंपराओं की याद दिलाते हुए उन्हें पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए प्रोत्साहित किया। ग्यारह सितंबर 1893 को शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा के उदघाटन के दिन हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाले युवा,तेजस्वी संन्यासी स्वामी विवेकानंद जी ने अमरीका के उस अतुल जनसमुदाय को संबोधित किया।

“अमरीका निवासी भगिनी एवं भ्रातृगण” ऐसा संबोधन वहाँ की जनता के लिए बड़ा दिव्य था। स्वामी जी के प्रभावकारी इन शब्दों में निहित आंतरिक भावना, स्वामी जी का महान व्यक्तित्व, उनका तेजस्वी मुखमंडल और गेरुआ वस्त्र का इतना भव्य प्रभाव हुआ कि पूरे धर्म-सम्मेलन में उन्हें सर्वश्रेष्ठ एवं महानतम व्यक्ति कहकर वर्णित किया गया।

अंग्रेजों की गुलामी में सड़ रहे भारतवर्ष का मस्तक इसके फलस्वरूप आज उन्नत हो गया था। उस संबोधन में उन्होंने घोषणा की थी कि “भारतमाता स्वतंत्रता प्राप्त करेगी।” उनके शब्दों पर भारत के बारे में पश्चिमी दुनिया की धारणा और भारतीयों को खुद को देखने के तरीके, दोनों पर गहरा प्रभाव पड़ा। यह भाषण आज भी 19वीं सदी के सबसे शक्तिशाली, प्रभावशाली भाषणों में से एक के रूप में याद किया जाता है।

स्वामी विवेकानंद का राष्ट्रवाद और आध्यात्मवाद, देशभक्ति और धर्म पर आधारित था। उन्होंने निःस्वार्थ सेवा, मानवीय गरिमा की भावना और राष्ट्रीय एकता के लिए पुरुषत्व पर बल दिया। स्वामी जी जानते थे कि संगठन में महान शक्ति निहित है और मुट्ठीभर अंग्रेज संगठित होकर कार्य करने के कारण ही करोडों भारतवासियों पर शासन कर पा रहे हैं। स्वामीजी के अनुसार त्याग और सेवा भारत के राष्ट्रीय आदर्श हैं इन दो बातों को उन्नत करने से सब कुछ उन्नत हो जाएगा।

स्वामी विवेकानंद जी ने देश की एवं देशवासियों की समस्या को अपनी समस्या मानते हुए भारतवासियों की गुलामी के कारण कुंद हो रही मानसिकता पर प्रहार करते थे। आजादी की समस्या को बहुत बड़ी समस्या नहीं मानते थे। उनका कहना था कि “अगर प्रत्येक देशवासी जाग्रत हो जाए तो देश की बाकी समस्याएं स्वतः ही हल हो जाएंगी।“

दुर्बल भारतवासियों में शक्ति और विश्वास का संचार करना ही स्वामी जी का उद्देश्य था। वे अपने देशवासियों में इतना उच्च भाव जगाना चाहते थे जो उन्हें सभी कार्यों में ओजस्वी और वीर बना सके। इन्होंने देशवासियों को संबोधित करते हुए कहा “उतिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत”-उठो,जागो और लक्ष्य की प्राप्ति तक रुको मत।

उन्होंने एक नवंबर 1896 में अपने एक अनुयायी को पत्र में यह लिखकर दिया कि “50 साल बाद देश आज़ाद हो जाएगा।” ऐसा ही हुआ।
14 फरवरी1897 को मद्रास में दिए गए एक भाषण में विवेकानंद ने अपने साथी भारतीयों से अगले पचास वर्षों तक अकेले और विशेष रूप से मातृभूमि की पूजा करने का आह्वान किया और उनसे “गुलाम बनना छोड़ देने का आग्रह किया।”

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में साल 1905 में लोकमान्य तिलक जी ने पूर्ण स्वराज्य की मांग शुरू की। अपने विचार में लोकमान्य तिलक ने कहा कि “उनके स्वराज्य की मांग के पीछे स्वामी विवेकानंद जी के विचारों का शक्ति पुंज है।”

इस प्रकार बहुत से स्वतंत्रता सेनानियों जैसे रानी लक्ष्मीबाई, तात्याटोपे, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, रामप्रसाद बिस्मिल आदि महान क्रांतिकारियों के बाद महात्मा गांधी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, चंद्रशेखर आज़ाद, लाला लाजपतराय आदि द्वारा किए गए संघर्ष और उनके बलिदान द्वारा ही हमारा भारत देश पूरी तरह आज़ाद होकर एक स्वतंत्र देश बनाया जा सका।

स्वामी विवेकानंद जी ने लाखों युवाओं और वरिष्ठ क्रांतिकारियों के मार्गदर्शन किया। जिन्होंने स्वामी जी के विचारों से प्रभावित होकर अपना जीवन भारत को स्वतंत्रता दिलवाने के लिए न्योछावर कर दिया। यह स्वामी जी का ही प्रभाव था जिसके कारण उनके अनेक अनुयायी और शिष्य पुनरुत्थान के कार्य के लिए भारत आये थे।

जिसमें मार्गरेट नोबल जिन्हें भगिनी निवेदिता के नाम से जाना गया,श्रीमान एवं श्रीमती कैप्टन सेविएर, जोसेफाइन मैक्लिओड और सारा ओलेबुल शामिल थे। भगिनी निवेदिता ने तो स्वामी जी के स्वर्गवास के बाद सीधे तौर पर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी।

स्वामी विवेकानंद जी मात्र 39 वर्ष 5 महीने और 24 दिन के जीवन में 1500 वर्षों का कार्य कर गए। इनके विचार आज भी विश्व में करोडों लोगों को प्रेरणा प्रदान कर रहे हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रेरक बनकर मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए समाज को प्रेरित करते रहे। भारतीय स्वतंत्रता दिवस पर उन्हें शत शत नमन।

संदर्भ ग्रंथ
विवेकानंद- राष्ट्र को आह्वान -संकलन, रामकृष्ण मठ
किशोरों के विवेकानंद-स्वामी योगात्मानंद
भारतीय स्वाधीनता संग्राम में स्वामी विवेकानंद की भूमिका nationalist online
Swami vivekananda jyanti-आज़ादी के बारे में क्या थे विवेकानंद के विचार–hindi News18.com

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