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Yearly Archives: 2020

अन्न बहन-बेटी तथा मां के प्रति सम्मान का लोकपर्व पोला

कहीं भी हो लोक जीवन का आलोक एक विशेष प्रकार की इन्द्रधनुषीय आभा को प्रदर्शित करता है। इस आभा में लोक के रीति-रिवाज और संस्कार की उज्जवलता सर्वाधिक आकृष्ट करती है। क्योंकि इसमें आडम्बर के लिए कोई स्थान नहीं होता। लोक जीवन की सरलता और सहजता ही उसे विशिष्ट बनाती …

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प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़ के बलिदानी

आधुनिक भारतीय इतिहास में अंग्रेजी हुकूमत के ख़िलाफ़ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में 1857 में हुए पहले शस्त्र विद्रोह से मानी जाती है। इसी तरह छत्तीसगढ़ में सोनाखान के प्रजावत्सल जमींदार नारायण सिंह को 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का पहला शहीद माना जाता …

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जारी है 82 वर्षों से राम नाम का अनूठा उत्सव

भगवान श्री राम मनुष्य के जीवन सुख दुख के साथी हैं, मनुष्य सुख हो या दुख दोनों में उन्हें याद करता है। श्री राम को सदा याद रहते हैं, कभी विस्मृत नहीं होते। वे लोक संस्कृति में समाये हुए हैं, कहा जा सकता है कि रोम रोम में बसे बसे …

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दक्षिण कोसल के रामायण कालीन ऋषि मुनि एवं उनके आश्रम : वेबीनार रिपोर्ट

दक्षिण कोसल के रामायण कालीन ऋषि मुनि एवं उनके आश्रम विषय पर ग्लोबल इनसाइक्लोपीडिया ऑफ रामायण उत्तर प्रदेश और सेंटर फॉर स्टडी एंड हॉलिस्टिक डेवलपमेंट छत्तीसगढ़ द्वारा अंतर्राष्ट्रीय वेबीनार श्रृंखला की 9 वीं कड़ी का आयोजन दिनाँक 9/8/ 2020, रविवार, शाम 7:00 से 8:30 के मध्य किया गया। इस वेबीनार …

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विष्णु के आठवें अवतार : योगेश्वर श्री कृष्ण

भगवान कृष्ण का जन्मदिन, श्री कृष्ण जन्माष्टमी, जुलाई या अगस्त के महीने में पूरे भारत में बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इसे जन्माष्टमी या गोकुलाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है, जिसमें हिंदू लोग श्रीकृष्ण के जन्म को विष्णु के आठवें अवतार के रूप में …

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लोक आस्था का दर्पण : आठे कन्हैया

लोक की यह खासियत होती है कि उसमें किसी भी प्रकार की कोई कृत्रिमता या दिखावे के लिए कोई स्थान नहीं होता। वह सीधे-सीधे अपनी अभिव्यक्ति को सहज सरल ढ़ंग से शब्दों रंगो व अन्य कला माध्यमों से अभिव्यक्त करता है। तीज-त्यौहारों की परम्परा तो शिष्ट में भी है और …

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जनजातीय संस्कृति में निहित टोटमवाद और पर्यावरण संरक्षण

भारतीय संस्कृति में वृक्षों की बड़ी महत्ता है। वृक्षों को ‘देव’ माना गया है। हमारी संस्कृति में पीपल, बरगद, नीम, आम, आंवला इत्यादि वृक्ष पूजनीय है, इन्हें ग्राम्य वृक्ष माना गया है। इसी कारण वृक्षों को न ही काटने की परंपरा है न ही जलाने की। आज भी गाँव में …

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छत्तीसगढ़ी संस्कृति में मितान परम्परा

“जाति और वर्ग भेद समाप्त कर सामाजिक समरसता स्थापित करने वाली परम्परा” जग में ऊंची प्रेम सगाई, दुर्योधन के मेवा त्यागे, साग बिदूर घर खाई, जग में ऊंची प्रेम सगाई। जीवन में प्रेम का महत्व इतना होता है कि वह मनुष्य की जीवन लता को सींचता है और पुष्ट कर …

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भगवान श्री राम की ऐतिहासिकता

भगवान राम की एतिहासिकता को लेकर लम्बे समय समय से एक दीर्घकालिक बहस विद्वानों के बीच होती रही है और राम मंदिर तथा राम सेतु जैसे मुद्दों ने इस चर्चा को व्यापक बनाने का काम किया है। किंतु आम जन-मानस को भगवान राम की ऐतिहासिकता जैसे विषयों से बहुत सरोकार …

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प्रकृति-प्रेम का प्रतीक : भोजली

प्रकृति ने बड़ी उदारता के साथ छत्तीसगढ़ की धरती को अपनी सौंदर्य-आभा से आलोकित किया है। जंगल-पहार अपने स्नेह सिक्त आँचल से जहाँ इस धरती को पुचकारते हैं, वहीं नदी और झरने अपने ममता के स्पर्श से दुलारते हैं। हरे-भरे खेत इसकी गौरव-गरिमा का बखान करते हैं, तो पंछी-पखेरू यहाँ …

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