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विदेशी यात्रियों की दृष्टि में छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ की प्राचीनता और उसकी महत्ता के संदर्भ में अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं। इसके बावजूद प्राचीन काल के संदर्भ में कोई उपयुक्त रुप से कालक्रमानुसार वृतांत नहीं मिला है जिससे क्रमबध्द प्रामाणिक इतिहास की पुनर्रचना की जा सके। इसके लिए एक अंश तक ही पौराणिक साहित्य पर निर्भर किया जाता है। छत्तीसगढ में उत्खनन से और वनप्रांतरों तथा पर्वतों में जो प्रमाण मिले हैं वे छत्तीसगढ के इतिहास को बूझने में सहायक हैं। इस इतिहास को जानने का एक और साधन वह साहित्य है जो विदेशी यात्रियों द्वारा लिखा गया है।

विशेषकर सातवीं शताब्दी में आए चीनी यात्री ह्वेन सांग्, अठारहवीं शताब्दी में आए अंग्रेज यात्री लेकी, अठारहवीं शताब्दी के ही एक अंग्रेज अधिकारी जे.टी. ब्लंट और उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय पुरातत्व को प्रकाश में लाने वाले एलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा छत्तीसगढ यात्रा के उपरांत प्रस्तुत विवरण अतिविशिष्ट हैं। तत्कालीन मध्यप्रदेश में गजेटियर विभाग के पूर्व संचालक श्री शम्भु दयाल गुरु के अपने ग्रंथ ‘’मध्यप्रदेश : विदेशी यात्रियों की निगाह में’’ छत्तीसगढ में आये विदेशी यात्रियों के विवरण भी शामिल हैं। श्री गुरु के अतिरिक्त श्री हरिठाकुर ने भी अपने लेखों में इन यात्रियों के यात्रा विवरणों का उल्लेख किया है।

छत्तीसगढ के प्राचीन गौरव के पुन: स्मरण की दृष्टि से ये विवरण प्रस्तुत हैं।

ह्वेन सांग

चीनी यात्री ह्वेन सांग सन 629 ई. में, उन्तीस वर्ष की अवस्था में, वह ताशकंद, समरकंद, बलख और बामियां होता हुआ भारत आया था। लगभग 16 वर्ष तक उसने भारत के विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा की और दक्षिण में काँचीपुरम तक गया। ह्वेन सांग जिन राज्यों से होकर गुजरा उनकी राजनैतिक परिस्थितियों का वर्णन भी उसने किया है। उसने भारत की आबो-हवा, नगरों और इमारतों, भाषा और साहित्य, जाति-पाति और रीति-रिवाजों, पेड़-पौधों, खान-पान, न्याय और प्रशासन व्यवस्था आदि के संबंध में विस्तार से वर्णन किया है।

दक्षिण कोसल में

अपनी भारत यात्रा के दौरान ह्वेन सांग ने 633 ई. में कलिंग अर्थात उड़ीसा होते हुए उत्तर पश्चिम दिशा में पहाड़ों और जंगलों के रास्ते किआओं-साला अर्थात दक्षिण कोसल में प्रवेश किया। दक्षिण कोसल आजकल छत्तीसगढ के नाम से जाना जाता है। ह्वेन सांग लिखता है कि कोसल का क्षेत्रफल 6,000 ली से अधिक था। दक्षिण कोसल चारों पहाड़ों से घिरा था और यहां जंगल और दल-दल थे। कोसल की राजधानी का क्षेत्रफल चालीसा ली था। यहां की भूमि अच्छी और उपजाऊ थी और यहां प्रचुर मात्रा में खाद्यान्न उत्पन्न होता था। दक्षिण कोसल के शहर और गांव पास-पास बसे थे और आबादी बहुत सघन थी। यहां के लोग ऊँचे-पूरे और काले रंग के थे।

वह लिखता है कि यहाँ के लोग बहादुर थे परंतु वे अधीर और कठोर स्वभाव के थे। उनमें बौध्द धर्म के अनुयायी भी थे और ऐसे लोग भी थे जो बौध्द धर्म को नहीं मानते थे। ह्वेन सांग के शब्दों में दक्षिण कोसल के लोग अध्ययनशील और बुध्दीमान थे। उसने लिखा है कि यहां का राजा क्षत्रिय जाति का था और वह अपने गुणों और दया के लिए विख्यात था। राजा बौध्द धर्म का आदर करता था। ह्वेन सांग ने दक्षिण कोसल में लगभग 100 बौध्द विहार देखे थे। इनमें महायान शाखा के लगभग दस हजार भिक्षु निवास करते थे। उसने करीब 70 देव मंदिर भी देखे, जिनमें भक्तों की भीड़ होती थी। राजधानी की दक्षिण दिशा में एक प्राचीन स्तूप था जिसे अशोक ने निर्मित किया था। ह्वेन सांग लिखता है कि इस स्थान पर भगवान तथागत ने अविश्वासियों को अपने चमत्कार दिखाकर अपने वश में किया था। बाद में इस विहार में नागार्जुन ने निवास किया था। इस देश का राजा सातवाहन था। उसने नागार्जुन का बहुत सत्कार किया और उनके निवास पर प्रहरी उपलब्ध कराया था। ह्वेन सांग यह भी लिखता है कि देव बोधिसत्व नामक भिक्षु, श्री लंका से नागार्जुन का शिष्य बनने की इच्छा से यहां आया था।

पुरातत्ववेत्ता सर एलेक्जेंडर कनिंघम ने कोसल को विदर्भ माना था तथा चांदा या वैरागढ को कोसल की राजधानी माना है। सन 1954-55 में रायपुर जिले के सिरपुर नामक स्थान में उल्खन्न किया गया। सुप्रसिध्द लक्ष्मण मंदिर से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर दो बड़े बौध्द संघा राम और अनेक छोटे विहारों का उद्घाटन हुआ। मुख्य संघाराम में साढे 6 फुट ऊँची, भूमि स्पर्श मुद्रा, बुध्द की एक विशाल मूर्ति प्राप्त हुई है। विहार में 14 कमरे थे और वह दो-मंजिला इमारत थी। प्रकट हुआ है कि उसमें लगभग दो शताब्दियों तक भिक्षुओं का निवास रहा है। स्फटिक से बना एक बौध्द स्तूप तथा अनेक सीलें भी प्राप्त हुई हैं जिनमें बौध्दधर्म से संबंधित धर्मालेख हैं। इससे चीनी यात्री ह्वेन सांग के दक्षिण कोसल के वर्णन की पुष्टि होती है। हो सकता है कि सिरपुर ही वह स्थान हो जिसे दक्षिण कोसल की राजधानी के रुप में ह्वेन सांग ने इंगित किया था।

लेकी

अठारहवीं सदी के अंतिम दशक में, अंग्रेज यात्री भारत आया। इसका नाम था लेकी। लेकी ने सन 1790 में कलकत्ता से नागपुर तक की यात्रा उड़ीसा और छत्तीसगढ के मार्गों से की थी। कुछ समय नागपुर रुकने के बाद वह सिवनी, जबलपुर होता हुआ बघेलखंड क्षेत्र से बनारस चला गया। उसने इन क्षेत्रों के अनेक स्थानों, नदी-पहाड़ों, खेती-बाड़ी, लोगों के रहन-सहन, राजनीतिक परिस्थितियों आदि का बहुत रोचक वर्णन किया है।

रायपुर जिला

उड़ीसा से सम्बलपुर-रायपुर राजमार्ग से लेकी ने मई, 1790 में रायपुर जिले में प्रवेश किया। उसने बलसोड़ा ग्राम से दो मील दूर महानदी पार की। वह लिखता है कि उस स्थान पर महानदी का पाट 300 गज चौड़ा था। वहाँ से वह आरंग होता हुआ रीवां ग्राम पहुँचा।

आरंग तथा रीवां ग्राम

लेकी ने लिखा है कि आरंग एक बड़ा और समृध्द नगर था, जहाँ अनेक व्यापारी तथा जुलाहे निवास करते थे। आरंग से आगे रीवां ग्राम में आम का एक विस्तृत बगीचा था। अंग्रेज यात्री ने रीवां ग्राम में, आम के बगीचे में, एक विशाल तालाब के किनारे पड़ाव डाला। यहां उसे लोगों ने बताया कि महानदी का उद्गम 120 मील दक्षिण-पूर्व, सिहावा के जंगल में एक पहाड़ी से होता है।

नवांगाँव

रीवां ग्राम से लेकी उसी रास्ते पर आगे बढा और 6 मील आगे वह नवांगाँव पहुँचा। उस समय अँधेरा घिरा हुआ था, फिर भी उसने देखा कि नवांगाँव में एक बड़ी संख्या में पेड़ और एक तालाब भी था। उसने लिखा है कि वह एक मैदानी इलाके से यात्रा कर रहा था, और वहाँ अनेक ग्राम थे परंतु उनमें से कोई ऐसा नहीं था जो एक बड़े यात्री-दल को पर्याप्त पानी अथवा विश्राम-स्थल की सुविधा प्रदान कर सके।

रायपुर शहर

दिनांक 18 मई, 1790 को लेकी रायपुर पहुँचा। उसने लिखा है कि रायपुर एक बड़ा शहर था और अनेक व्यापारी तथा धनाढ्य व्यक्ति वहाँ निवास करते थे। वहाँ उसने एक किला देखा जिसकी दीवारों का नीचे का भाग पत्थरों से तथा ऊपरी भाग मिट्टी से निर्मित किया गया था। किले में पाँच द्वार तथा अनेक बुर्ज थे। रायपुर शहर में उसने एक विशाल तालाब भी देखा जो चारों ओर से पक्का बंधा हुआ था, परन्तु उसका पानी खराब था।

रतनपुर राज्य

रतनपुर राज्य, जिसमें छत्तीसगढ अधिकांश क्षेत्र शामिल था, कलचुरियों के शासनकाल में एक समृध्दशाली राज्य था। लेकी ने लिखा है कि रतनपुर एक बहुत अच्छा प्रदेश था और धान की भरपूर खेती के कारण इसे भारत के इस क्षेत्र का बर्दमान होने की संज्ञा दी जा सकती है। उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल का बर्दमान वह क्षेत्र है जहाँ प्रचुर मात्रा में धान की खेती होती है। 

लेकी के यात्रा- वृत्तांत से हमे यह भी ज्ञात होता है कि नागपुर के भोंसले राजा मूधाजी के भाई, बिम्बाजी, की विधवा पत्नी उस समय जीवित थी और रतनपुर राज्य में उनकी प्रति पूर्ण आदर भाव व्यक्त किया जाता था। शासन की कार्यपालन शक्ति महीपतराव के हाथ में थी। उसने लिखा है कि रायपुर की राजस्व आय, जिसमें सामान ढोने वाले जानवरों पर कर भी शामिल था, कुल 70,000 रु. तथा रतनपुर की राजस्व आय 1,50,000 रु. थी।

उसकी लेखनी से रतनपुर राज्य की आर्थिक स्थिति में अवनति का भी संकेत मिलता है, क्योंकि उसके अनुसार बिम्बाजी के शासनकाल में रतनपुर की आय पांच या छ: लाख रुपये थी। इस आश्चर्यजनक आर्थिक अवनति का कारण उसे ज्ञात नहीं हो सका। रतनपुर के निवासी सज्जन थे, और उन्होंने यात्रियों के साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया।

दुर्ग  

अगले दिन रायपुर से आठ मील की दूरी पर यात्रियों ने खारुन नदी पार की और कुम्हारी गांव पहुंचे। वहां से डोंगरघाट के रास्ते लेकी नागपुर के लिए चल पड़ा। अनेक गांव और नालों को पार करते हुए उसने दुर्ग के किले के पास पड़ाव डाला।

दुर्ग को लेकी गांव की संज्ञा देता है। इससे स्पष्ट है कि लगभग 200 वर्ष पूर्व दुर्ग बहुत छोटा रहा होगा। दुर्ग ग्राम में उसने पान के अनेक बगीचे देखे। इसके डेढ़ मील आगे चलकर उसने शिवनाथ नदी देखी जो ढाई सौ गज चौड़ी थी।

डोंगरगढ़  

उसने रास्ते में बड़ी संख्या में ग्राम देखे। लेकी कुछ दिन की यात्रा के बाद छीपा ग्राम होता हुआ डोंगरगढ़ पहुँचा। उसने लिखा है कि डोंगरगड़ में पहले एक किला था परन्तु किला और गाँव दोनों ही उसे खंडहर नजर आए। उसने लिखा कि डोंगरगड़ के आस-पास की पहाड़ियों नागपुर को रतनपुर या छत्तीसगढ से अलग करती थीं। रतनपुर का राजा “राजा छत्तीसगढ” कहलाता था।

जे.टी. ब्लंट

ईस्ट इंडिया कंपनी शासन ने उड़ीसा, बरार तथा उत्तरी सरकार के बीच के (अर्थात छत्तीसगढ क्षेत्र के ) भूभाग में मार्ग की खोज करने के लिए, सन 1794 में केप्टन जे.टी. ब्लंट भेजना तय किया। एक जमादार तथा 30 सैनिकों के दल के साथ वह अपनी खोज की यात्रा पर दिनांक 28 जनवरी, 1795 को चुनारगढ से रवाना हुआ।

केप्टन ब्लंट मिर्जापुर होते हुए करगोम्माह पहुँचा। वहां का राजा मोतीलाल उससे मिलने आया। उसकी लेखनी से ज्ञात होता है कि करगोम्माह के उत्तर में कोरायर राज्य, उत्तर-पश्चिम में निगवानी कोटी तथा बघेलखण्ड, पश्चिम में पेन्ड्रा तथा अमरकण्टक और पूर्व में सरगुजा है। उसने लिखा है कि ये सब इलाके बहुत जंगली और बिरले बसे हैं। इसमें हिन्दू यात्रियों को छोड़कर, जो अमरकण्टक के पास सोन तथा नर्मदा नदियों के उद्गम के दर्शनार्थ जाते हैं, अन्य कोई यात्री शायद ही आता है। अमरकण्टक पहुँचने का रास्ता रतनपुर होकर है परन्तु परतापगढ के गोंड राजा द्वारा ब्राम्हाणों से तीर्थ यात्रियों से दान में प्राप्त धन सामग्री लूट लिए जाने के कारण उस समय उस रास्ते पर कोई आवा-जाही नहीं थी।

दिनांक 3 मार्च को ब्लंट ने स्थानीय गाइड की सहायता, से बड़ी मुश्किल से जंगली रास्ता तय किया और राजा मोतीलाल की सीमा छोड़कर हसदो नदी पार की और मरहठों के खास परगना महतिन में प्रवेश किया। नदी के तट पर शेर के पंजे दिखायी दिये। तट से दूसरे छोर पर मंगोरा ग्राम था, जिसमें केवल एक परिवार का निवास था। वे बाहरी दुनिया से बिल्कुल अनभिज्ञ थे। वहां चांदी अथवा ताँबे के सिक्कों का प्रचलन नहीं था बल्कि कौड़ियों का उपयोग किया जाता था।

रतनपुर   

दिनांक 13 मार्च को ब्लंट रतनपुर पहुँचा। “यहाँ छत्तीसगढ की राजधानी तथा सुबेदार का निवास स्थान था। अत: मैंने एक बड़ा शहर पाने की आशा की थी, परन्तु मुझे बहुत निराशा हुई जब मैंने देखा कि वह एक बेतरतीब और बड़ा गांव है, जिसमें करीब 1000 झोपड़ियाँ हैं, जिनमें से अनेक सुनसान थीं। और सूबेदार इत्तुल पंडित (विट्ठल पंडित) का मकान भी, जिसमें खपरे छाये हुए थे और जो बाजार में स्थित था, एक घटिया मकान ही कहा जायेगा।“

बरार सरकार ने ब्लंट को, रतनपुर के प्रशासक के नाम एक परिचय पत्र दिया था अत: प्रशासक ने अपने भाई को उसकी आव-भगत करने भेजा। जब उसे बताया गया कि कोरायर के रास्ते से वह रतनपुर पहुँचा है तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ, क्योंकि वह रास्ता जंगली और पहाड़ी है और उस रास्ते पर यात्रा करने में मरहठा सेनाओं को भी बहुत कठिनाई होती है। जब ब्लंट ने उसे बतलाया कि वह छत्तीसगढ़ तथा बस्तर होता हुआ जयपुर (उड़ीसा) जायेगा, तो प्रशासक के भाई ने सूचित किया कि वह इलाका भी बहुत पहाड़ी और जंगली है। तथा वहां के निवासी भी बर्बर हैं अत: उस रास्ते पर कठिनाई होगी।

ब्लंट के यात्रा वृत्तांत से बस्तर की स्वतन्त्र स्थिति का पता चलता है। जब ब्लंट ने पूछा कि क्या वहां मरहठा सरकार को भुगतान राशि नहीं दी है। यों भी, पूरे बस्तर इलाके पर कभी भी मरहठों का आधिपत्य नहीं रहा। गोड़ों को लगातार लूटने तथा उन्हें परेशान करने के कारण ही अन्तत: राजा मरहठा सरकार का अस्तित्व मानने को तैयार हुआ। उसने यह भी सूचित किया कि हाल ही में बस्तर राजा का वकील 5000 रु. लेकर आया था। इससे संकेत मिलता है कि मरहठा सरकार के साथ संकेत मिलता है कि मरहठा सरकार के साथ वह अच्छे संबंध रखने का इच्छुक है। प्रशासक के भाई ने ब्लंट को सलाह दी कि उसे बिम्बाजी की विधवा रानी से कांकेर के गोंड़ राजा के नाम पत्र ले जाना चाहिए। उससे बस्तर होते हुए विजयानगरम तक की यात्रा में बड़ी सहायता मिलेगी।

ब्लंट ने लिखा है कि चुनार से रतनपुर की कुल 296 मील की यात्रा, 44 दिन में पूरी की गयी। समय को देखते हुए दूरी कम मानी जायेगी। परन्तु सड़कों की कठिनाई और खराब मौसम के कारण न केवल उनकी गति अत्यन्त धीमी रही बल्कि उनके गाय-बैलों को भी बड़ी तकलीफ का सामना करना पड़ा। परिणामत: उसका दल इतना थक गया था कि कुछ दिनों आराम करना नितांत आवश्यक हो गया ।

एक बार फिर उसे नर्मदा और सोन नदियों के उद्गम तथा उनके लिए हिन्दुओं की तीर्थयात्रा संबंधी सही विवरण जानने की उत्कट इच्छा हुई। इसलिए शाम को जब इत्तुल (विट्ठ्ल) पंडित उसके पास आया तो उसने पूछा कि यात्री रतनपुर से अमरकण्टक तक जाने के लिए अक्सर कौन से रास्ते से जाते हैं और वहां जाने की प्रबल इच्छा जाहिर की। पंडित ने बतलाया कि गोंड इतने सशक्त हो गये हैं कि कुछ समय से वहां जाने की किसी ने हिम्मत नहीं की। उसे संदेह भी हुआ कि उन तकलीफदेह जंगलों और पहाड़ों में भटकने का आखिर क्या कारण है?

जब ब्लंट ने उसे बतलाया कि अमरकण्टक के विशाल हिन्दु मन्दिर और मूर्तियाँ, जिनका मानवता पर इतना प्रभाव है, देखने की उसकी बलबती इच्छा है, तो पंडित ने कहा कि यहां यात्रा करना अव्यावहारिक है। प्रतापगढ का गोंड राजा अवश्य ही उसे घाट में बंदी बना लेगा। वहां से निकल पाना असंभव होगा। अत: जब मरहठों से यात्रा के लिए कोई सहायता प्राप्त नहीं हुई तो “मैने बड़ी निराशा और सोच-विचार के बाद, उस स्थान की यात्रा का इरादा त्याग दिया, जिसे मैं हिन्दुस्तान के सर्वाधिक प्राकृतिक रहस्य के स्थानों में से एक मानता था। इसके बाद, ब्लंट ने दो पंडितों से रतनपुर से अमरकण्टक के रास्ते का तथा अमरकण्टक का पूरा विवरण प्राप्त किया। उसने विस्तार से उसे अंकित किया है।“

रतनपुर के अवशेष 

दिनांक 16 मार्च, 1795 को ब्लंट रतनपुर के पश्चिम में स्थित इमारतों तथा तालाब को देखने गया। उसने एक पहाड़ी पर दो हिन्दू मंदिर देखे। एक मंदिर बिम्बाजी द्वारा राम-लक्ष्मण की प्रतिष्ठा में बनवाया गया है और एक में स्वयं बिम्बाजी की मूर्ति स्थापित है क्योंकि उसके वीरतापूर्ण कार्यो के कारण मरहठा उसे देवता की तरह पूजने लगे हैं। उसके मंदिर में चढोत्री और बलिदान दिये जाते हैं। रतनपुर के किले के उत्तरी तथा दक्षिणी ओर दो बड़े तालाब हैं। किले के उत्तरी तथा दक्षिणी ओर दो बड़े तालाब हैं। किले के उत्तरी छोर पर एक मकान में बिम्बाजी की विधवा रानी आनंदी बाई और एक और रानी निवास करती हैं। एक और रानी सती हो गयी थी। दक्षिण-पश्चिम में नीले पत्थर की करीब 9 फीट ऊंची एक मूर्ति है जिसमें सिंदूर पुता है।

एक पहाड़ी से ब्लंट ने रतनपुर शहर तथा किले का सुन्दर दृश्य देखा। किला अनेक तालाबों तथा कुण्डों से घिरा था। उसके आगे लाफागढ की पहाड़ियाँ दिखायी देती है। दक्षिण दिशा की ओर दूलापुर तालाब नामक एक बड़ी झील थी। उसकी लंबाई 2 मील थी। पश्चिम में, एक मील की दूरी पर मूसा खां पठान का मकबरा था। गोंड़ परिवर्तन करने का प्रयत्न कर रहा था।

पहाड़ी से उतरकर, खण्डहरों के बीच राजा रघुनाथ राव का पुराना महल था। धन पाने की लालसा में उसकी दीवारों की तोड़-फोड़ की गयी थी। इस महल का उसी स्थान पर निर्माण किया गया था, जहां कभी प्राचीन रतनपुर था। प्राचीन रतनपुर का नाम राजेपुर था। तालाब के बीच में छत्तीस मेहराबों पर चौबीस गुम्बद निर्मित किये गये थे। ब्लंट को बतलाया गया कि वह प्राचीन रतनपुर के राजाओं की स्मृति में बनवाया गया स्मारक है।

इसमें संदेह नहीं की रतनपुर अति प्राचीन नगर है और यदि उसके खण्डहरों तथा पुरालेखो का परीक्षण करने के लिए उसे पर्याप्त समय मिलता तो शहर के बारे में वह और भी उपयोगी जानकारी एकत्र कर लेता। 5 दिन रतनपुर रुकने के बाद उसने अपनी यात्रा प्रारंभ की।

छत्तीसगढ़  

ब्लंट ने छत्तीसगढ इलाके से यात्रा का सुखद वर्णन किया है। वह लिखता है कि इस इलाके में छोटी-छोटी अनेक नदियां हैं। यहां ग्रामों की बहुत अधिक संख्या है और लगता है कि पेड़ो के झुण्डों तथा तालाबों से उसे सुन्दरता से सजाया गया हैं। इनके पहले की यात्रा की कठिनाइयों का उसे जो सामना करना पड़ा उसके मुकाबले यह दृश्य वास्तव में पूरी तरह आनंददायक है। यहां मरहठा सरकार का पूरा प्रभुत्व है और इस क्षेत्र में खेती-बाड़ी बहुत अच्छी है अत: उसे अच्छा व्यवहार मिला। हर प्रकार का अनाज यहां इफरात व्यवहार मिला। हर प्रकार का अनाज यहां इफरात मात्रा में होता है। इन सुविधाओं से वह इतने दिनों से वंचित था इसलिए जब ये प्राप्त हो गई तो पहले की यात्रा की सारी कठिनाइयां और तकलीफें वह भूल गया।

उपजाऊ छत्तीसगढ़

उसने लिखा है कि छत्तीसगढ की जमीन काली और उपजाऊ है। उसने यह आश्चर्य जनक जानकारी भी दी है कि यहां एक बड़ी मात्रा में गेंहूं, वनस्पति तेल, अलसी और अनेक प्रकार की दालों का उत्पादन होता है। चावल की यहां बहुतायत नहीं है और इसकी पैदावार केवल बड़े जलाशयों के पीछे की जाती है।

छत्तीसगढ से बड़ी मात्रा में अनाज का निजाम के राज्य तथा उत्तरी और दक्षिणी सरकारों में निर्यात किया जाता है। और वहां से नमक आयात किया जाता है, जो फुटकर में इतना महंगा बिकता है कि कभी-कभी तो चांदी की बराबरी से तुलता है। अच्छी उपज के समय निर्यात के लिए एक लाख बैलों की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि बरार के राजा के अत्यधिक उत्पादन वाले क्षेत्रों में वह एक था। यहां गांव की संख्या अधिक है, परंतु वे गरीब हैं। गाय-बैलों की भी बहुतायत है। छत्तीसगढ की जनसंख्या अधिक नहीं है और सरकार उसकी वृध्दि के लिए कोई कदम नहीं उठाती।

ब्लंट की यात्रा के समय छत्तीसगढ सूबा और उसके अंतर्गत आने वाला और इलाका, एक निश्चित राशि पर, विट्ठल पंडित को सौंप दिया गया था। सूबेदार प्रतिवर्ष वह राशि नागपुर में जमा करता था। जान-माल की सुरक्षा का अभाव था। साथ ही, जमीदारों को, कर लगाने का अधिकार था इससे व्यापारी हतोत्साहित होते थे और मरहठा इलाके में वे घोड़े, हाथी, ऊंट तथा शाल के सिवाय और कोई सामग्री नहीं लाते थे। अनाज तथा अन्य जीवनोपयोगी वस्तुओं का व्यापार बंजारों के हाथों में था। वे ही सड़कों का रख- रखाव करते थे।

उसने लिखा है कि मरहठा अपने इलाके के किसानों को अत्यंत दयनीय स्थिति में रखते थे क्योंकि उनकी मान्यता थी कि इससे रैयत में सरकार के प्रति विद्रोह या आक्रमक भावना फैलने की कम संभावना रहती है। इनके बीच में सिक्कों का चलन बहुत कम है।

रायपुर

उसने लिखा है कि रतनपुर से 13 दिन में, 100 मील की यात्रा के बाद, वह 31 मार्च को रायपुर पहुँचा। रतनपुर के बाद छत्तीसगढ का दूसरा सबसे बड़ा शहर रायपुर है। वास्तव में, जनसंख्या और व्यापार की दृष्टि से वह प्रथम नगर ही कहा जायेगा। “मैंने उसमें, 3000 झोपड़ियों की गणना की। नगर के उत्तर-पूर्वी छोर पर एक बड़ा, पत्थर से निर्मित किला है। यद्यपि उसकी दीवारें जीर्ण-शीर्ण हो गयी हैं, तथापि उसकी खाई गहरी और चौड़ी है।“ कटक से नागपुर तक का एकमात्र राजमार्ग रायपुर से होकर गुजरता है। दोनों नगरों के बीच संचार व्यवस्था बनाये रखने का वह एक मात्र मार्ग है।

सात दिन की यात्रा के बाद, ब्लंट का दल छत्तीसगढ के दक्षिणी छोर पर पहुँच गया। वहां पहली बार उन्होंने महानदी पार की और कांकेर के घने जंगल में प्रवेश किया। कांकेर क्षेत्र में सड़क एक संकरे रास्ते अथवा एक दर्रे में बदल जाती है, जो जंगली पेड़ों और घनी पहाड़ियों को पार कर वे गोडवाने के प्राचीन राजाओं के क्षेत्र में पहुँचे। वहां के निवासी पहाड़ पर निवास करने वाले गोंड प्रजाति के लोग थे। एक गांव मिला जिसमें केवल 5 झोपड़ियां थीं और निवासियों की संख्या कुल कुलाचार थी। उन्होंने हरकारे के माध्यम से ब्लंट को कहलाया कि यदि उनके राजा की आज्ञा न होती तो वे उसके दल को कांकेर क्षेत्र में प्रवेश न करने देते।

कांकेर

छत्तीसगढ की सीमा से मरहठा अमीन ने ब्लंट के दल की यात्रा की सूचना कांकेर भेज दी थी अत: राजा का वकील उससे मिलने आया और उसे राजा के निवास पर भेंट के लिए ले गया। दिनांक 6 अप्रैल, 1795 को वह कांकेर नगर पहुँच गया। कांकेर एक ऊंची पहाड़ी और महानदी के दक्षिणी तट के बीच बसा हुआ है। पहाड़ी पर राजा का किला है, जहां दो तोपें चढी रहती हैं। नदी के उत्तरी छोर पर, एक आम के बगीचे में उसने डेरा डाला।

यहां हरकारों ने उसे सूचित किया कि कांकेर तथा बस्तर के राजा में बैर है और कांकेर के राजा ने बस्तर के उत्तर-पूर्वी इलाके का तहस-नहस करके उस पर अधिकार स्थापित कर लिया है। कांकेर से बस्तर की सीमा केवल 6 कोस है।

दूसरे दिन कांकेर का राजा श्यामसिंह उससे मिलने आया। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि राजा अच्छी हिन्दुस्तानी बोल सकता था। उत्तरी सरकार पहुँचने के लिए उसने जगदलपुर कोटपार, जयपुर होते हुए रास्ता बतलाया। राजा ने यह जानकारी भी दी कि समुद्री किनारे पहुंचने का यह रास्ता बंजारों द्वारा उपयोग में लाया जाता है, परंतु उन्होंने भी उस पर हाल में चलना छोड़ दिया है। इसका कारण यह है कि बस्तर के राज के विद्रोही रुख के कारण मरहठों ने पड़ौसी गोंड जमींदारों को उकसा कर, काफी दूरी तक गांव बर्बाद कर दिये हैं। उसने ब्लंट को सिहावा (महानदी का उद्गम स्थल) तथा रायगढा होते हुए जयपुर का एक दूसरा रास्ता सुझाया।

परन्तु जब ब्लंट ने सिहावा के रास्ते से जयपुर जाने का इरादा बना लिया तो श्यामसिंह ने उसे यह कहकर रोक दिया कि वहां का राजा अंग्रजों का बहुत विरोधी है। अत: बच कर निकल पाना कठिन है। फिर उसे बस्तर के राजा, दरयाव देव, की क्रूरता के किस्से कांकेर के राजा से सुनने को मिले। दरयाव देव ने जगदलपुर के स्थान पर उससे 5 कोस दूर स्थित, केसलूर, के पहाड़ी दूरी में अपने- आपको मरहठो से सुरक्षित कर लिया है और दरयाव देव अपनी मर्जी के माफिक मरहठों को कर देता है। इससे मरहठे नाराज हैं और बस्तर इलाके में उत्पात मचाते हैं। ऐसी स्थिति में मरहठों के परवाना का दरयाव देव कोई आदर नहीं करेगा अत: जयपुर अथवा जगदलपुर होते हुए उसे विजयानगरम नहीं जाना चाहिए। कांकेर के राजा ने अंग्रेज यात्री को समझाया कि कांकेर के राजा ने अंग्रेज यात्री को समझाया कि कांकेर से पहाड़ी और जंगली रास्ते से, पश्चिम दिशा में, 40 कोस दूरी पर बैरागढ (जिला चांदा, महाराष्ट्र) पहुँचा जा सकता है। वहां चांदा शहर होते हुए राजमार्ग से दक्षिण पहुँचा जा सकता है। कांकेर से 40 मील आगे की यात्रा में ब्लंट को एक भी ऐसी बस्ती नहीं मिली जिसे गांव की संज्ञा दी जा सके। कांकेर के राजा से आगे मिलने वाले गोंड़ जमींदारों के नाम उसने परिचय पत्र लिखा लिए थे। उनसे बड़ी सहायता मिली। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि राजा अच्छी हिन्दुस्तानी बोल सकता था। उत्तरी सरकार पहुँचने के लिए उसने जगदलपुर, कोटपार, जयपुर होते हु रास्ता बतलाया। राजा ने यह जानकारी भी दी कि समुद्री किनारे पहुंचने का यह रास्ता बंजारों द्वारा उपयोग में लाया जाता हैं, परंतु उन्होंने भी उस पर हाल में चलना छोड़ दिया है। इसका कारण यह है कि बस्तर के राजा के विद्रोही रुख के कारण मरहठों ने पड़ौसी गोंड़ जमींदारों को उकसा कर, काफी दूरी तक गांव बर्बाद कर दिये हैं। उसने ब्लंट को सिहावा (महानदी का उद्गम स्थल) तथा रायगढा होते हुए जयपुर का एक दूसरा रास्ता सुझाया।

ब्लंट वहां से खतरे झेलता हुआ इंद्रावती नदी के तट पर पहुंचा, पर आगे का रास्ता खतरनाक समझकर उसने दूसरी राह ली और वह गोदावरी नदी पारकर 24 मई, 1795 को राजमुंद्री पहुंचा।

एलेक्जेंडर कनिंघम

एलेक्जेंडर कनिंघम का नाम भारतीय पुरातत्व जगत में सबसे प्रकाशमान सितारे की तरह हमेशा जगमगाता, रहेगा, यद्यपि कनिंघम की गणना उन विदेशी यात्रियों में नहीं की जा सकती जो कुछ माह या कुछ वर्षों तक भारत की यात्रा करके वापस चले गये। कनिंघम तो एक इन्जीनियर के रुप में भारत आये थे। परंतु धीरे-धीरे भारत की पुरातात्विक धरोहर से उन्होंने इतना तादात्म्य स्थापित कर लिया कि वे उसकी सुरक्षा के लिए बेचैन हो उठे। वास्तव में कनिंघम पहले व्यक्ति थे जिन्होंने देश-व्यापी पुरातात्विक सर्वेक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने सन 1848 में एशियाटिक सोसायटी आफ बेंगाल की शोधपत्रिका में सर्वेक्षण के समर्थन में एक लेख प्रकाशित किया था।

भारत में जब पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग का गठन किया गया और कनिंघम उसके डायरेक्टर जनरल के पद पर, नियुक्त किया गया। उन्होंने देशभर की यात्राएं की। अपनी इन यात्राओं के दौरान कनिंघम ने (तत्कालीन) मध्यप्रदेश के लगभग सभी क्षेत्रों का अर्थात मध्यभारत बुंदेल स्थानों की यात्राएं कीं। उसने उन स्थानों का सर्वेक्षण किया और जो कुछ देखा उसका छायाचित्रों, रेखा चित्रों तथा नक्शों के साथ विस्तार से वर्णन किया है। उसका तथा उसके सहयोगियों का सर्वेक्षण दर्जनों जिल्दों में, आर्कियालाजिकल सर्वे रिपोर्ट्स के नाम से प्रकाशित हुआ है। कनिंघम के बाद आज तक कोई नया सर्वेक्षण पुस्तकें आज भी पुरातत्व के क्षेत्र में शोध की एक मात्र आधार हैं।

सन 1881-82 की यात्रा

सन 1881-82 के शीतकाल में कनिंघम ने तत्कालीन सेन्ट्रल प्राविन्सेज की यात्रा की। इस यात्रा में उसने मुख्य रुप से वर्तमान छत्तीसगढ क्षेत्र के अनेक स्थानों का भ्रमण किया। उसने लिखा है कि इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य राजिम, आरंग तथा सिरपुर के प्राचीन नगरों का सर्वेक्षण करना तथा वहां उपलब्ध उत्कीर्ण लेखों की प्रतिलिपियाँ प्राप्त करना था। यात्राओं के बाद उसका मत था कि “मेरी शोधों के परिणाम से स्पष्ट हो गया है कि महाकोसल, अथवा अब जिसे छत्तीसगढ कहा जाता है, में जो प्राचीनतम अवशेष हैं, वे इन तीन स्थलों पर हैं। इन तीन प्राचीन स्थानों पर जो अवशेष हैं वे अत्यधिक दिलचस्प हैं क्योंकि मैने उत्तर भारत में जितने भी मंदिरों का अध्ययन किया है उन सबसे, ये मंदिर, न केवल योजना में वरन अलंकरण में भी भिन्न हैं। राजिम का राजीव-लोचन मंदिर तथा सिरपुर का ईंट का मंदिर, छत्तीसगढ में, मेरे देखे हुए प्राचीन्तम अवशेष हैं। छत्तीसगढ के स्थानों का कनिंघम द्वारा किया गया वर्णन निम्नलिखित है।

डोंगरगढ

रायपुर पहुँचने तक कनिंघम को डोंगरगढ के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं हो सका। परन्तु रायपुर के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर कर्नल लूसी स्मिथ के हवाले से उसने डोंगरगढ का वर्णन किया है। उसने लिखा है कि गत 40 वर्ष के भीतर वहां 6 प्राचीन मंदिर थे, परंतु नागपुर के शासनकाल में उन्हें तोड़ डाला गया और उनके सामान का उपयोग नागपुर-रायपुर सड़क पर पुल बनाने में किया गया। डोंगरगढ के आस-पास अनेक तालाब, जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। यहां इतना जंगल था कि सन 1858 में मेजर हेनरी शेक्सपीयर के संतरी को, जो उसके तम्बू पर पहरा दे रहा था, एक शेरनी उठा ले गयी थी।

सन 1864 में डोंगरगढ मात्र 20 घरों की एक जंगली बस्ती थी। परंतु यहां इतवार का बाजार भरता था। आबादी बढती गयी यह बाजार बढता ही चला गया। नागपुर, रायपुर तथा बिलासपुर के खरीददारों तथा विक्रेताओं, दोनों के लिए डोंगरगढ की स्थिति केन्द्रीय होने के कारण भी इसका महत्व बढा। कनिंघम की यात्रा के समय वहां कुल 2000 मकान थे, जिनमें से 1500 खपरैल के थे। “सड़कें पेड़ों के बीच से अजीब ढंग से बनी है और जंगल में एकाएक समाप्त हो जाती है।“

अनुमान है कि व्यस्त समय में डोंगरगढ के गंज में 13,000 बैलगाड़ियों, 36,000 पाड़ा और बैल जो गाड़ी ढोने के काम में लाये जाते हैं, तथा 18,000 गाड़ीवानों का जमाव रहता है। इसके सिवाय काँवर तथा सर पर सामान लाने वालों तथा बंजारों की भी एक बड़ी संख्या होती है। इस प्रकार, व्यस्त मौसम में, बाजार के दिन, यहाँ 1,00,000 लोगों से कम की भीड़ नहीं रहती।

दुर्ग

दुर्ग (जो ब्रिटिश शासनकाल में द्रुग कहलाता था) एक प्राचीन नगर है। यहां शिवनाथ नदी के पूर्वी तट पर एक किला है। नागपुर से रायपुर तथा पूर्व की ओर जाने वाले मार्ग पर यह स्थित है अत: अनेक शताब्दियों से यह एक महत्व का स्थान रहा होगा। जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है, यह दक्षिण महाकोसल में एक प्रमुख दुर्ग रहा होगा। एक उत्कीर्ण लेख में एक राजा, शिव देव, तथा शिवपुर और शिव दुर्ग का उल्लेख आया है। दुर्ग क्योंकि शिवनाथ नदी के तट पर स्थित है अत: कनिंघम का अंदाज है कि इसका पूरा नाम शिवदुर्ग रहा होगा, जो बाद में संक्षिप्त होकर केवल दुर्ग रह गया। नगर हजारों पेड़ों से घिरा है, जिसमें इमली के पेड़ों की एक बड़ी संख्या है।

देवबालौदा

रायपुर से 12 मील पश्चिम में, देव-बालौदा एक छोटा-सा गांव है। यहां बलुआ पत्थर से निर्मित एक शिव मंदिर है। आरंग और देव-बालौदा के मंदिर में साम्य है, यद्यपि आरंग का मंदिर जैन मंदिर है। उसने मंदिर का वर्णन किया है और उसके संबंध में एक कथा अंकित की है।

राजिम

महाकोसल में सबसे अधिक पवित्र स्थान है राजिम। यहां विष्णु को समर्पित मंदिरों का एक सुन्दर समूह है। राजिम महानदी के पूर्वी तट पर, पैरी से उसके संगम के कुछ नीचे स्थित, 3000 जनसंख्या का शहर है। यह स्थान हराभरा, आम के अच्छे पेड़ों से आच्छादित है। धान के खेतों और पेड़-रहित मैदानों से होकर, यहां पेड़ों के झुरमुट में पहुँच कर मन पुलकित हो उठता है। वर्षा ॠतु में महानदी और पैरी के कारण यहाँ बाढ आ जाती है।

यहाँ का प्रमुख मंदिर राजीव लोचन का है। उड़ीसा में जगन्नाथ मंदिर जाते हुए हजारों तीर्थ यात्री यहां आते हैं। तीर्थ यात्री यहां रामचन्द्र के प्रति श्रध्दालु मन से आते है, यद्यपि यहां मूर्ति चतुर्भुजी विष्णु की है। राजीव-लोचन अर्थात ‘कमल नयन’ उपाधि राम को दी गयी है, विष्णु को नहीं, इसलिए यह नाम उतना प्राचीन नहीं है, जितना कि मंदिर है। मंदिर निश्चय ही विष्णु को समर्पित था।

कनिंघम ने राजीवलोचन के संबंध में प्रचलित अनेक किंवदन्तियां व कथाएं प्रस्तुत की है। राजिम के मंदिर, राजीव-लोचन के प्रमुख मंदिर के आस-पास एक समूह में है। ये हैं राजीव-लोचन और उसके अहाते के चार कोनों पर वराह, नृसिंह, बद्रीनाथ और वामन, पश्चिम में राजेश्वर, दक्षिण-पश्चिम में दानेश्वर और उत्तर-पूर्व में जगन्नाथ के मंदिर्। उसने मंदिरों के स्थापत्य और मूर्तिकला तथा राजिम के उत्कीर्ण लेखों का वर्णन किया है।

आरंग

आरंग का प्राचीन नगर, पूर्व की ओर जाने वाले मार्ग पर रायपुर से सेंसरशिप मील दूर स्थित है। यह राजिम और सिरपुर के लगभग बीच में स्थित है। नगर के पश्चिम तथा पूर्व में, महानदी तक सघन जंगल है।

यहां चारों ओर प्राचीन और सुन्दर तालाब हैं, जिन पर मंदिर और मूर्तियाँ हैं। ये सब हिन्दू मंदिर हैं। परंतु इस समय जो मंदिर विद्यमान है वह जैन मंदिर है। आधे मील दूर वागेश्वर मंदिर है, जिसके दर्शन करने के लिए जगन्नाथ जाने वाले सब यात्री आते हैं।

नवागांव

आरंग और रायपुर के बीच स्थित यह एक प्राचीन गाँव है। यहां देवरा ताल नामक, 360 फीट लंबा और 250 फीट चौड़ा एक बड़ा तालाब है। नवागांव में, जो कि आरंग से सेंटाउरस मील पश्चिम में है, मुझे मंदिरों के पूरे समूह मिले। ये मंदिर आरंग से लायी गयी सामग्री से निर्मित किये गये हैं। यहां पत्थर से निर्मित दो मंदिर तथा ईंटों से निर्मित दो मंदिर हैं।

सिरपुर

राजिम से 40 मील उत्तर-पूर्व में, महानदी के दाहिने तट पर, सिरपुर नामक एक प्राचीन गांव है। यहां एक विस्तृत क्षेत्र में अवशेष फैले हुए हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार इस नगर की लंबाई 5 कोस या 10 मील थी। कुछ लोग प्राचीन नगर के विस्तार को 13 मील मानते थे। परन्तु प्राचीन अवशेष मात्र एक मील लम्बे तथा आधा मील चौड़े क्षेत्र में फैले हुए हैं।

स्थानीय विश्वासों के अनुसार इसका प्राचीन नाम शबरीपुर था। इसका कारण यह है कि यह वही स्थान है जहां शबरी ने अपने जूठे बेर भगवान राम को खिलाये थे। यदि शबरी आश्रम सिरपुर में था तो महानदी को पंपा और पूर्व की पहाड़ियों को ॠष्यमुख पर्वत मानना पड़ेगा। परन्तु मैं व्यक्तिगत तौर पर महानदी को सुक्तिमती नदी मानने और कोसल की राजधानी उसको तटों पर होने को अधिक युक्तिसंगत मानता हूँ।

कनिंघम ने सिरपुर में विद्यमान प्रमुख अवशेषों और उत्कीर्ण लेखों का वर्णन किया है। इनसे सिरपुर या श्रीपुर, जैसा कि उत्कीर्ण लेखों में इसका नाम अंकित है, का प्राचीन महत्व ज्ञात होता है। उसने गंधेश्वर मंदिर, लक्ष्मण मंदिर ईंटों के दो जीर्ण-शीर्ण मंदिर, सिरपुर के सबसे बड़े मंदिर का प्रतिनिधित्व करने वाले टीले (सुरंग), छोटा-किला और अनेक मूर्तियों का वर्णन किया है। उसने गंधेश्वर मंदिर के पास 250 या 300 गज वर्गाकार एक तालाब (रकेला ताल) का वर्णन किया है। यह तालाब पारस पत्थर के लिए प्रसिध्द है। तालाब के दक्षिण में इतना ही बड़ा एक टूटा-फूटा किला है।

सिमगा

कुंवरा गांव होता हुआ वह सिमगा पहुँचा। सिमगा शिवनाथ नदी के दाहिने तट पर एक समृध्द प्राचीन नगर है। यह रायपुर से बिलासपुर और रतनपुर मार्ग पर, रायपुर से 29 मील उत्तर में स्थित है। यहाँ एक बड़ा तालाब है। परंतु सबसे महत्वपूर्ण है यहां प्राप्त सती स्तम्भ। इनमें एक सती स्तम्भ, जिसे रायपुर संग्रहालय में जमा किया जा चुका है, अदभुत है। सबसे अधिक अलंकृत सती स्तम्भों में से यह एक है। इसका वर्गाकार आधार है जो जैसे-जैसे उठता जाता है 8, 16 और 32 दिशाओं में बदलता जाता है। सिमगा ऐसी महत्वपूर्ण स्थिति में है कि यहाँ से एक मार्ग सहसपुर, कवर्धा होता हुआ मंडला, जबलपुर जाता है और दूसरा बिलासपुर, रतनपुर, सोहागपुर और रीवा।

‘बोरम देव (भोरमदेव)

कवर्धा होता हुआ कनिंघम बोरम देव मंदिर पहुँचा। वह लिखता है कि यह मेकल पहाड़ी की तलहटी में, एकान्त घाटी में स्थित है। इसे देखने के लिए उसके मन में कुतूहल इस आम विश्वास के कारण जागा कि वह एक गोंड़ मंदिर है, जो नाग राजा के पूजन के लिए समर्पित है। परन्तु कनिंघम ने पाया कि बोरम देव मंदिर वास्तव में एक विष्णु मंदिर है। गोंड़ों का इस मंदिर से कोई वास्ता नहीं है, सिवाय इसके कि उन्होंने अपनी भाषा का नाम बोरम देव या “बड़ा देव” इस पर थोप दिया है।

बोरम देव मंदिर के निर्माण की 10वीं, 11वीं 12वीं सदी ईस्वी, जो भी रही हो, इसमें संदेह नहीं कि इसका संस्थापक अमीर और सशक्त था, क्योंकि मैंने जितने मंदिर देखे हैं उनमें सबसे अधिक अलंकृत मंदिरों में से यह एक है। उसने मंदिर का विशद वर्णन किया है।

आलेख

डॉ सुशील त्रिवेदी

श्रीराम नगर, रायपुर छत्तीसगढ़

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